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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

इस कविता के कम से कम तीन अर्थ निकलते हैं
चुनै र् वटि
-महाकवि : कन्हैयालाल डंडरियाल
मि छौं चुनै र् वटि
म्यार द्वी हैड़
इन तपैदिन तक़दीरन कि
मि कड़कड़ि ह्वे ग्यों
उल्टां सुल्टाँ यकसानि रै ग्यों।
मर्चुं कि फ़ोळि अर लुणै गारि
जीजा अर दीदी
लगद जन मैत्या पौणो सि
कबि कब्यार भ्यलि डैळि
मि अर तु
हौरि क्वी ना
किलैकि तु पिघळि जान्दि
मी देखी मेरी खैरी सूणि
तू त छे मेरि
त्वे दगड़ मि कनि भलि लगदु य नौणी गुंदकी।
य भौत मताळ ग्यूं कि फुलकी
यूंकि खट्याण बिगर बातै तिड़याँण
यी त छन म्यरा द्यूर अर द्यूराण
xx
हाँ झुंगरु चैल सकद
उन त वैकि अर मेरी
हार सार अलग
चौ चलण अलग
वेक अर म्यार क्य दगुड़
उत सिरफ़ बुन बच्याणौ
खैरि खुदि की छ्वीं लगाणी

यीं दिल्लीम मीतैं

आया गायों कि नजर से बचौंदन
इनै उनै लुकांदन
गैसम हीटरम पकौन्दन
यूँ हलुळ जैगी जैगी ह्वे ग्यों
भैर काळी अर भितर आली काची
मितैं मुंगर्युं खुद लगद
मूळै भटुळि लगदिन
दाळ , गैथ भट याद अंदिन
xx
सचे तुम घौर जैल्या त
मरसुम मेरी स्यवा बोलि दियां
हळया गुयरुं घसेर्युं लखड़ेल्यूं
कि भुकी पे दियां
कन रैंदु छा मि कबि
उंक हतु हतुम नचणु।
xx
ह्यरां यख त द्यूराण
इन बणी रैंद जन फकर्याण
डाँड्यूं मs कन मिल्दि छै मी दगड़ि छप्प
हम ह्वे जांद छा ढबड़ि रोट
यख त चौकम चुल्लम मेजुम प्लेटुम
बिराजणा छन
म्यारा द्यूर अर द्यूराण।
सचे बतौं मि तैं यीं दिल्ली से
पौड़ी गे बिखळाण
Copyright@ H.K Dandriyal, Delhi

Bhishma Kukreti

       ठग :  व्यंग्यात्मक कविता

लोकप्रिय कवि : हरीश जुयाल 'कुट्ज'
पीठ पिछ्नै आग लगाकि मुजाण  कु अयाँ छन
पर्या काँधम बंदूक धैरीक टैगर दबाण कु अयाँ छन।
कैन उड़ण  मुल्कs असमान मा फुर्र फुर्र
चखुला नमान सबि हवै जाज चलाण कु जयां छन।
यूंकि चाल ढाल बींगिक इन लगणु च ये बगत
बोट मंगणा  बान दुबरा , हमतैं लडाण कु अयाँ छन ।
कखि धनकुर्योंन  धाण कार , हळयूंन हैळ लगाइ
बाजा दिल्ली लखनौ मछर -माखा उड़ाण कु जयां छन। 
भेस बणाकि अयाँ तौंकि सानी बाच सै नि छन
पैरिक स्यु खलड़ी आज स्याळ ठगण कु अयाँ छन।
कैन चा बीड़ी पेइ , क्वी छुयुं मा मिस्यां छन
क्वी  जुयाल' की कविता सुणिक सिरफ़ जम्हाण कु अयाँ छन।


Copyright @ Harish Juyal, Malla Tasila, Badalpur , Pauri Garhwal

Contact -09568021039

harishjuyalkutaj2012@gmail.com

Bhishma Kukreti

सच की आँखि मोतीबिन्द :  व्यंग्यात्मक कविता
लोकप्रिय कवि : हरीश जुयाल 'कुट्ज'


सच की आँखी मोतीबिन्दु , झूठा आँखा छाळा छन
बुरै चमकणी च चम्म , भलै फरै जाळा छन।
बैला -बांजs घास पींडु खैकि उतण हुयाँ छन
जौंन अन्नै दाणी कमै उंका गिच्चों म्वाळ छन।
मनखि बिरड़ि कांठि उजड़ि रंग ढंग बिगड़ि गे
डाळि बूटी कुल्हड़ि खैगे डाळा  बण्या डाला छन।
डिस्कों डांस  दर्वाजा सब्युं कुण खुल्यां छन
थड्या गीत चौंफळौ  घार लग्यां ताळा छन।
सत्तू रैगै सासु मा सपड़ांग रैगै ब्वारि  मा
मैल्या मुलक गाणि रैगे तैल्या मुलक क्याळा छन।
विधाता कि पोथि का तु द्वी वचन हि गेड़ धैर
अद्दा दिन त ग्वारा , 'जुयाल' अद्दा दिन काळा छन। 

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 12
जियू मेरु आच बैथि बैथि

कया सोच्न व्हालु
जियू मेरु आच बैथि बैथि
कैकू बाट हेनु व्हालु
कूच आनू व्हालु यख अपरू
कया सोच्न व्हालु

क्द्गा घाम चैई
चैत पूस मंगसिर ऐई गैई
दिन आंदा जांदा रैगे हो
जैकू बाटू हेनु ऊ ना ऐई
कया सोच्न व्हालु

धीर धैर ना इनि उकाल सैर
मेरी जीकोडी मेसै बोल
चल सड़की का बाटा बाटा
मिली जालु मीथे मेरु सैन
कया सोच्न व्हालु

रोटी सगा की पोट्गी
जियुंदगि की ई लपड़ा सपोड़ी
दोई दानी खैरी का मित्रा तेर बिना
मिल ना यख चैन से खै
कया सोच्न व्हालु

कया सोच्न व्हालु
जियू मेरु आच बैथि बैथि
कैकू बाट हेनु व्हालु
कूच आनू व्हालु यख अपरू
कया सोच्न व्हालु

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 11
कब आलू बसंत मेरु

कब आलू बसंत मेरु
कब बोई ये मेरु पाड हसला
दानी गलोड़ी का बाटा
वो हर्याळु बणीकी बौगला
कब आलू बसंत मेरु

यूँ डंडो कब काफल पाकला
ऊं कंठो जैकी कब किन्गोड़ा चाखला
नारंगी जनि मुखडी बौऊ की किले उदास हुँयीच
हिंसोला जनि कब खिद खिद हैसेली

मेरा भागा की क्यारी तू झूले रे तू फुले रे
ये विपदा पीड़ा की पाड़ी तू झूले रे तू फुले रे

गीत पिरीती समासूम हुंयां छन
ढोल दामू वो कुल्हण रुश्याँ छन
बांसुरी की धुन किले रूनी च आच
बेटी बिमला की आंखीं कैकी खुद हेरणी आच

कब आलू बसंत मेरु
कब बोई ये मेरु पाड हसला
दानी गलोड़ी का बाटा
वो हर्याळु बणीकी बौगला
कब आलू बसंत मेरु

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 10
कब जाग्ला

कब जाग्ला
कब जगा व्हाला
कब अपरा पहाड़ थे
कब ये अपरा समझला

नींदि इनि चढ़ीच
चौतरफा देक सियिंच
ह्युंद जनि जमीच
उकालु मा दाढीच

भैर ना भित्तर
गैर जनि व्हैगे छित्तर
उड़्ना बन तित्तर
जनि माया की छतर

पैल कैल बुलण
धैल कैल लगण
कुम्भकरण नींदि से
पैल कैल जगण

कब जाग्ला
कब जगा व्हाला
कब अपरा पहाड़ थे
कब ये अपरा समझला

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

Bhishma Kukreti

  नजर उत्तराखंडै  कुर्सी

विद्वान कवि ; पूरन पंत 'पथिक'

मिस्यां छन बस घोषणौ पर ,
जौंको उत्तराखंडै  कुर्सी।
अहा भैजि शिल्यानास,
नजर  उत्तराखंडै  कुर्सी।
सूणां दाज्यू उद्घाटन,
चयेंद उत्तराखंडै  कुर्सि ।
धर्म लोकार्पण इबारे ,
बचै रखण अपणि कुर्सी।
लाल बत्ती -गाडी -घ्वाड़ा हम सणि ,
चयेंद छ्वटि -म्वटि या उच्ची कुर्सी।
अबि मिलीं छन, बचै रखणि,
टैम्परैली अपणि  कनि बि कुर्सी।
शान या इज्जत हमारी
एम्बेसेडर दगड या कुर्सी।
प्रोटोकॉल, रिगदा लोग
कोष ई च हमारी कुर्सी।
लूछि दियां , लमडै दियां ना ,
लाल बत्ती अर या कुर्सी।
अहा कुर्सी , वाह कुर्सी ,
हमारी जो तु छे कुर्सी।
हमारी ब्वेन पिवै कुर्सी ,
खवै अर पेराई कुर्सी।
ढिक्याण -डिसाण  उठण -बैठण
हम खुण्ये   या बणै कुर्सी।
सांग बी जब सज्यालु तबि बि तू दगड़ इ रैली ,
किलै,
कैकुण,
क्योक बिसरण या कुर्सी।
हमारी छे तू , त्वे कुण हम ,
बिन तेरा कंगाल हम, ये कुर्सी।
चौदा साल कन खस्स खस्किन ,
अहा कुर्सी,  वाह कुर्सी।
वक्त कम, ठेकेदारी बिंडी
कनि बचीं रैली तू मेरी गळकंठी कुर्सी।

Copyright @ Puran Pant 'Pathik' Dehradun

garhwali.dhai100@gmail.com

Bhishma Kukreti

 ससोड़  ले दारु ,पेल ले दारु

विद्वान कवि ; पूरन पंत 'पथिक'
अहा दारु , वाह दारु
इख दारु , उख दारू
तख दारू , कख नी दारू
ले दारु , पे दारु
               राजस्व बढ़ौ दारू
                 माफिया बणौ दारू
               चुनाव जितौ दारू
               भाषणो आधार दारु
               कवि सम्मेलनों पछ्याण दारु
सूंग दारु , सुंगा दारु
पे दारु पिलौ दारु
                          जनमबार मा दारु
                          नामकरण मा दारु
                         मुंडन मा दारु
                         जंद्यो लींद दैं दारु
                        ब्यौ बरात्यूं दारु
                        भितर पैंचिम दारु
                        घड्यळम दारु 
मुर्दाघाट मा बरजाति दारु
तिरैं मा बामणु भोग दारु
बरखी मा शुद्ध होणो दारु
शराध मा अभागण दारु
                    सर्वशक्तिमान दारु
                   असली पहलवान दारु
                   कुर्सी चारपाया दारु
                    ऐंच दारु , निस दारु
चखळ पखळम दारु
कळच पळचम दारु
              आपणो परायो दारु
              स्वर्ग बि दारु , नरक बि दारु
              राजनीति का मर्म दारू
              दरवड्यों धर्म दारू
प्रेम दारु , गुस्सा दारु
खुसी दारु , दुःख दारु
                    देव दारु , पिचास दारु
                  अर्दली दारु , वीआईपी दारु
                  नीली बत्ती दारु , लाल बत्ती दारु
                 पंचायत दारु ,ब्लॉक  दारु
                 जिला दारु , प्रदेश दारु
पार्टी दारु , बयान दारु
सत्ता -प्रेस दारू ही दारु
                 कार दारु , जीप दारु
                  टैक्सी दारु , क्या नी दारु
                  सरकारी दारु , प्राइवेट दारु
                 फौजी दारु , स्मगल्ड  दारु
                 कुटीर उद्योग दारु

छि  बि दारु , ला तब दारु , हाँ तब दारु
चंदा कुणि बहाना दारु , सब मा दारु
                 
           हाँ मि दारु , तू दारु , वह दारु
          वाह दारु , आह दारु
          बाड़ा बि दारु , काका बी दारु
           नाती दगड़ ददा बि दारु
          टीचर बि दारु , च्याला बि दारु
मिनरल वाटर संग दारु
ढँढिक  पाणिमा  दारु
निथर नीट ही सै पर पेल ले दारु
               फ़ोकट की , वाह दारु
               अपण खीसाकी , आःह दारु
              भलो बुरो काज दारु
             जोड़ दारु
             तोड़ दारु
             भेंट दारु
             तिकड़म दारु
              रिसवत दारु
            मार दारु , सार दारु
वाह दारु , धन्य दारू
गिच्च बंद कर दे दारु
जै दारु ! वाह दारु !

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ठ्यकर्या
महाकवि : कन्हैयालाल डंडरियाल
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यां क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
जनम के उछ्यादी थे , विद्या की कदर ना की
कण्डाळी की झपाग खै , ब्व़े की अर बुबाकि भी
जा रहे थे बुळख्या ल्हें, एक दिन स्कूल को
मूड कुछ बिगड़ गया , अदबाटम भज्याँ क हैं
घर भटी अयाँ क हम गढवाळी भुल्याँ क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
कै गुजरू इनै उनै , पोड़ी सड़कि का किनर
गाँव वालोँ य मित्रु का , घौर कै कभी डिन्नर
कुछ रकम ठी फीस की , कुछ चुराई ड्वारूंद
खर्च कै पुकै पंजै , मैना धंगल्ययाँ क हैं
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यां क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
टैक्निकल जौब में, हाथ काले क्यों करें
करें किलै कूली गिरी , ब्यर्थ बोझ से मरें
डिगचि डिपार्टमेंट का , डिपुटी हम बण्या क हैं
तीस रूप्या रोटी ल्हें , जुल्फा झटग्याँ क हैं
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यां क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
क्या कहें पहाड़ से , तंग हम थे आ गये
च्यूडा , भट बुकै बुकै , दांत खचपचा गए
कौणयाळी गल्वाड़ से क्वलणि तक पटा गयी
अब तो ठाठ से यहाँ , पान लबल्यां क हैं
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यान क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
Copyright @ H K Dandriyal

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नजर उत्तराखंडै कुर्सी

विद्वान कवि ; पूरन पंत 'पथिक'

मिस्यां छन बस घोषणौ पर ,
जौंको उत्तराखंडै कुर्सी।
अहा भैजि शिल्यानास,
नजर उत्तराखंडै कुर्सी।
सूणां दाज्यू उद्घाटन,
चयेंद उत्तराखंडै कुर्सि ।
धर्म लोकार्पण इबारे ,
बचै रखण अपणि कुर्सी।
लाल बत्ती -गाडी -घ्वाड़ा हम सणि ,
चयेंद छ्वटि -म्वटि या उच्ची कुर्सी।
अबि मिलीं छन, बचै रखणि,
टैम्परैली अपणि कनि बि कुर्सी।
शान या इज्जत हमारी
एम्बेसेडर दगड या कुर्सी।
प्रोटोकॉल, रिगदा लोग
कोष ई च हमारी कुर्सी।
लूछि दियां , लमडै दियां ना ,
लाल बत्ती अर या कुर्सी।
अहा कुर्सी , वाह कुर्सी ,
हमारी जो तु छे कुर्सी।
हमारी ब्वेन पिवै कुर्सी ,
खवै अर पेराई कुर्सी।
ढिक्याण -डिसाण उठण -बैठण
हम खुण्ये या बणै कुर्सी।
सांग बी जब सज्यालु तबि बि तू दगड़ इ रैली ,
किलै,
कैकुण,
क्योक बिसरण या कुर्सी।
हमारी छे तू , त्वे कुण हम ,
बिन तेरा कंगाल हम, ये कुर्सी।
चौदा साल कन खस्स खस्किन ,
अहा कुर्सी, वाह कुर्सी।
वक्त कम, ठेकेदारी बिंडी
कनि बचीं रैली तू मेरी गळकंठी कुर्सी।

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