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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सच की आँखि मोतीबिन्द : व्यंग्यात्मक कविता
लोकप्रिय कवि : हरीश जुयाल 'कुट्ज'

सच की आँखी मोतीबिन्दु , झूठा आँखा छाळा छन
बुरै चमकणी च चम्म , भलै फरै जाळा छन।
बैला -बांजs घास पींडु खैकि उतण हुयाँ छन
जौंन अन्नै दाणी कमै उंका गिच्चों म्वाळ छन।
मनखि बिरड़ि कांठि उजड़ि रंग ढंग बिगड़ि गे
डाळि बूटी कुल्हड़ि खैगे डाळा बण्या डाला छन।
डिस्कों डांस दर्वाजा सब्युं कुण खुल्यां छन
थड्या गीत चौंफळौ घार लग्यां ताळा छन।
सत्तू रैगै सासु मा सपड़ांग रैगै ब्वारि मा
मैल्या मुलक गाणि रैगे तैल्या मुलक क्याळा छन।
विधाता कि पोथि का तु द्वी वचन हि गेड़ धैर
अद्दा दिन त ग्वारा , 'जुयाल' अद्दा दिन काळा छन।

Copyright @ Harish Juyal, Malla Tasila, Badalpur , Pauri Garhwal

Contact -09568021039

harishjuyalkutaj2012@gmail.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ठग : व्यंग्यात्मक कविता

लोकप्रिय कवि : हरीश जुयाल 'कुट्ज'
पीठ पिछ्नै आग लगाकि मुजाण कु अयाँ छन
पर्या काँधम बंदूक धैरीक टैगर दबाण कु अयाँ छन।
कैन उड़ण मुल्कs असमान मा फुर्र फुर्र
चखुला नमान सबि हवै जाज चलाण कु जयां छन।
यूंकि चाल ढाल बींगिक इन लगणु च ये बगत
बोट मंगणा बान दुबरा , हमतैं लडाण कु अयाँ छन ।
कखि धनकुर्योंन धाण कार , हळयूंन हैळ लगाइ
बाजा दिल्ली लखनौ मछर -माखा उड़ाण कु जयां छन।
भेस बणाकि अयाँ तौंकि सानी बाच सै नि छन
पैरिक स्यु खलड़ी आज स्याळ ठगण कु अयाँ छन।
कैन चा बीड़ी पेइ , क्वी छुयुं मा मिस्यां छन
क्वी जुयाल' की कविता सुणिक सिरफ़ जम्हाण कु अयाँ छन।


Copyright @ Harish Juyal, Malla Tasila, Badalpur , Pauri Garhwal

Contact -09568021039

harishjuyalkutaj2012@gmail.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भादौं की अँधेरी रात (गढ़वाली -कुमाउँनी लोकगीत में वियोग )

भादौं की अँधेरी खकझोर , ना बास , ना बास पापि मोर।
ग्वेरुं की मुरली तू न बाज , भैंस्यूं की घांड्यूं न डाँडो गाज ।
स्वामी जी तुम तैं कनि सूझी ?मेरी चादरी आंसुंन रुझी।
तुम्हारा बिना क्या लाणी -खाणी ? मन की मन मा रैनै गाणी।
ऐ जावा डेरा अब मेरा स्वामी , आंख्युं से आंसू नि सकदु थामी।
संदर्भ - डा नन्द किशोर हटवाल , उत्तराखंड हिमालय के चांचड़ी
इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाली -कुमाउनी प्रेम लोकगीतों में उपमा

सिर धौंपेली लटकाई कनी?
संदर्भ : डा नन्द किशोर हटवाल
इंटरनेट प्रस्तुति : भीष्म कुकरेती

सिर धौंपेली लटकाई कनी,
काला सर्प की केंचुली जनी !
सिंदुर से भरी मांग कनी,
नथुला मा गड़ी नगीना जनी !
सी आँखि सरमीली कनी ,
डांडू मा खिलीं बुरांसी जनी !
मुखडी को रंग कनो ,
बाल सूरज को रंग जनो !
ओंठु का बीच दांतुड़ी कनी ,
गंठ्याई मोत्यूं माल जनी !
स्वर मिठास कनी ,
डांड्यों मा बासदी हिलांस जनी

Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Vikas Dhyani
40 mins ·

"किलै मांग यु उत्तराखंड"

टुटदी तिबरी,उजड्यू खंड
क्या इलै ही मांग उत्तराखंड?
लोग परदेशों मा बस्या,
रयु क्या वे उत्तराखंड?
खाणी-सीणी परदेशों मा,
पिकनिक खुणि उत्तराखंड?
धुरपालि की पाल टुटी,
देली मा कंडली जमी
फेसबुक मा स्टेट्स द्यखणु,
की आई लव उत्तराखंड।
पलायन पहाड़ कु हुयु
क्या इलै ही मांग उत्तराखंड?
नेता मस्तमौला हुया,
डेरा डल्यु दून मा,
शहीद आंदोलनकारी ह्वेगी,
उत्तराखंड की लड़ै मा,
स्वच्दा होला वु भी आज,
की किलै मांग यु उत्तराखंड?
कुछ त सोचो भाइयो तुम भी,
की किलै मांग यु उत्तराखंड,
आओ फिर से बसोंला पहाड़ मा,
सपनों कु बुण्यु उत्तराखंड,

फोटो साभार-नवीन भट्ट
विकास ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"किलै मांग यु उत्तराखंड"

टुटदी तिबरी,उजड्यू खंड
क्या इलै ही मांग उत्तराखंड?
लोग परदेशों मा बस्या,
रयु क्या वे उत्तराखंड?
खाणी-सीणी परदेशों मा,
पिकनिक खुणि उत्तराखंड?
धुरपालि की पाल टुटी,
देली मा कंडली जमी
फेसबुक मा स्टेट्स द्यखणु,
की आई लव उत्तराखंड।
पलायन पहाड़ कु हुयु
क्या इलै ही मांग उत्तराखंड?
नेता मस्तमौला हुया,
डेरा डल्यु दून मा,
शहीद आंदोलनकारी ह्वेगी,
उत्तराखंड की लड़ै मा,
स्वच्दा होला वु भी आज,
की किलै मांग यु उत्तराखंड?
कुछ त सोचो भाइयो तुम भी,
की किलै मांग यु उत्तराखंड,
आओ फिर से बसोंला पहाड़ मा,
सपनों कु बुण्यु उत्तराखंड,

Poem by विकास ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मनुष्य जन्मते गाली खाता है , गाली खाते खाते मरता है

झसका दिंदेर , हंसोड्या , चबोड़्या : भीष्म कुकरेती

हमन बचपन मा जब उत्तरप्रदेश की किताब फरकै छे तो हर जगा एक वाक्य अवश्य हूंद छौ बल भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है और कर्ज में ही मर जाता है। पर गढ़वाल मा किसान शब्द प्रयोग वर्जित छौ तो हम छ्वारा पैरोडी करदा छा बल गढ़वाली बड़ा खाऊ है , जन्मते ही गाली खाता है , मरने पर गाली खाता है और फिर अपने पुरखों के साथ स्वर्ग में भी पृथ्वी से भेजी गाली खाता है। गां मा गाळी खाण अर कोचि -कोचिक गाळि खलाण हमर मनख्याति (मानवीय ), सामाजिक , सांस्कृतिक धरम अर कर्तव्य का अलावा संस्कृति दत्त अधिकार छौ। गाळि खाण हमर महान कर्तव्य छौ तो गाळि दीण पवित्र अधिकार छौ।

चूँकि हम बच्चा हूंद छा तो स्वील हूणै चखळा -पखळि याने त्यौहार मा हम बगैर न्यूत पयाँ का बि शामिल ह्वे जांद छा अर तब हमन जाण कि बच्चा एक अन्धकार से भैर आंद तो मोळ (गोबर ) की गंध अर गाळयूं धुंवा मा कदम रखद। हम तैं ज्ञान हूंद छौ कि बच्चा की नाक मा सबसे पैल छनि /सन्नी /गौशाला की गंध प्रवेश करद अर कानुं मा प्रथम शब्द या वाक्य गाळि पौंछदन ।

नौनी ह्वे तो दादी , बड्या दादी , कक्या दादी, काकी, बोडी सब नौनी कु 'निहुण्या' . 'हूंदी मोर जांदी', आदि सुअलंकृत गाळियूं से स्वागत करदा छा। गाळि नौनी ही ना नौनिक ब्वे से लेकि नौनिक नना , पड़नाना तक पौंछि जांद छा। नौनी हूँदि हि गां मा इन बरजात पड़ जांद छौ जन शोक भारत मा क्रिकेट वर्ल्ड कप फाइनल हरण पर पोड़द । हम बच्चा यूँ शोकयुक्त वाक्यों तैं सुणिक सीधा नागराजा मंदिर अटक जांद छा अर नौनु प्रार्थना करद छौ कि ये नागराजा दुसर जनम मा हम तैं नौनि नि बणै अर नौनि प्रार्थना ना नागराजा तैं धमकांदी छे कि तीन हमतैं नौनी किलै बणाइ। नौनी नागर्जा तैं आज्ञा दींदा छा -खबरदार ! हैंक जनम मा हम तैं नौनी बणाइ तो !

इन नी च कि नौनु ह्वे गे तो नवजात बच्चा तैं 'गाळि महातम्य' सुणनो नि मील धौं ! मनुष्य कमियूं पुतळा च तो मूळ नक्षत्र , पंचक मा , औंस मा , शराधुं मा जनम लीण या बच्चा मा क्वी ना क्वी शारीरिक कमजोरी क बान बच्चा की मा अर बच्चा का नना व पड़नाना नानी अवश्य ही गाळि खांद छा। जन कि कन म्वार एक ? चिपण्या नाक अपण बेशरम -बिलंच नना से लेक ऐ ग्यायि। माहौल मा गाळियूँ कुयड़ु नि ह्वावो तो वु जनम अपसकुन्या माने जांद छौ। कुछ नि हो तो स्वील हूणों बगत -गैर बगत , सुबेर , स्याम , दुफरा , बरखा का नाम से स्विलकड्या तैं गाळि पुराण सुणाये जांद छौ।

जनम लीणो बाद फिर तो बच्चा हर पल गाळियूँ पालना मा पाळे जांद छौ जन कि - ये तैकि टुटकि लगावो तैन टट्टी कर दे ; तैक गिच्च गोरुक हड़क क्वाचो तैन /तैंनि म्याळ बुकै याल ; नि द्याखल/द्याखलि ऐंसुक बग्वाळ फाणुक भरीं कड़ै मा पिसाब करी दे आदि आदि। यदि बच्चा तैं गाळि नि दीण हो तो बच्चा का नना , नानी , पड़नानी , पड़नना गाळी खांद छा जन कि - ये कन म्वार वैकु (नानाका ना नाम ) तै घुत्तान (बच्चेका नाम ) माटु बुकै दे। दादीन अपण सासु से मैताक गाळी खयिं रौंद छे तो अफु पर क्वी बि उधार नि रावो का नियम तहत सासुक गाळियूँ तैं ब्याज समेत बौड़ाणो बान हरेक दादी अपण ब्वारि तैं मैताक गाळी दीन्दी छे।

बच्चा या बच्ची विटामिन G की गोळी याने गाळि खै खैक जवान ह्वे जांद छा अर तब जवानी मा वु विटामिन G की गोळी ना इंजेक्सन लीद छौ यथा - खडर्युं करा , खत्ता धरेल तेरी , निहुण्या , कीड़ पोड़ जैन तैं पूठी पर या नाक पर ; आँखि फूटी जैन , गेरी फुटि जै। सुबेर नि बिजी , तडम लग जै, बांज पड़ी जैन आदि आदि। अब युवावस्था मा गाळियूँ मा सेक्स का इन्जाइम डळे जांद छौ - मतबल अपण ब्वेक मैसु , अपण बैणि मैसु , अपण बुबाक सैणि आदि आदि। कुछ शोभनीय गाळियूँ तैं मि लेखि बि नि सकुद अब।

ब्यौ हो तो गाळि शास्त्र मा परिपूर्ण इवोल्युसन या विकास ह्वे जांद अर परिवार मा जथगा वयस्क लोग ह्वावन उथगा तरह की अतिविशेष गाळि वातावरण मा तैरणा रौंद छा। चूँकि गाळि दीण कर्तव्य बि छौ अर अधिकार बि त हरेक मनिख हर पल नई गाळि अविष्कृत करदु छौ अर पुराणी गाळि परिष्कृत करद छौ। गाळि दीण अर खाण मा लिंगभेद नि हूंद छौ। जनकी सासु अपण ब्वारी तैं गाळि दींदी छे - ये अपण बुबाकी सैणी त ब्वारि अपण कजे कुण बुल्दि छे - ये अपण ब्वेक मैसु सुणणु नि छे तू ? तेरी ब्वे रंडोळ मि तैं कन गाळी दीणी च। इथगा माँ ससुर कु जबाब हूंद छौ - "ब्वारी ! मि अबि बच्युं छौं, रांड करणाइ त अपण ब्वेक कौर जैं जंघड्यूं से इन पातरन जनम ले " । इन कर्तव्य निर्वाह अर अधिकार प्राप्ति कु कर्मकांड हर समय चलदो ही रौंद छौ।

मनिख/मनिख्याणि मोरद इ इलै च कि गाळियूँ से मुक्ति मिल जावो किन्तु या दुनिया मर्यां मुर्दा तैं गाळियूँ से मुक्ति नि दींदी। मुर्दा तैं बि कैना कै रूप मा गाळि दिए ही जांद छौ - अबि मोरण छौ ये निर्भगिन , कुगति मीलली आदि आदि। अर मरणो बाद सोरग मील या नरक फिर बि मनुष्य तैं झड़दिदा , पड़दादी , ददा -दादी , ब्वे -बुबा का नामसे पृथ्वीलोक मा गाळि मिलण बंद नि हूंदन।

भलो ह्वेकि अब शहरूं मा चूँकि गाळी अंग्रेजी मा दिए जांदन तो ऊँ बैड वर्डसुं तैं गाळि नि माने जांद।



Copyright@ Bhishma Kukreti 17 /9/ 2014
*लेख में घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख की कथाएँ , चरित्र व्यंग्य रचने हेतु सर्वथा काल्पनिक है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कोका कोला द्वारा जल जीरा की बेज्जती !
चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती
कोका कोला -हटो ! हटो ! मि ऐ ग्यों ! मि ऐ ग्यों ! भैर जावो। भैर ह्वे जावो।
जल जीरा -क्या च यु त्यार बुबाक फ्रिज च जु बेज्जती करणु छे अर बुलणु छे -हटो ! हटो
कोका कोला -देख दुकान्युं मा जु बि फ्रिज छन वो सब म्यार मालिकाक छन।
जल जीरा -सूण यु घौर च समझे। क्वी दुकान नी च जु तू इथगा रौब से बात कौर !
कोका कोला -देख मि तुम सरीखा छुट मुट ड्रिंकुं दगड़ बात नि करदो। आइ फील इंसल्ट इन टाकिंग विद यु टाइनी ब्रैंड
जल जीरा -ये जादा अंग्रेजी नि झाड़ हाँ ! मि संस्कृत मा बुलण बिस्योल त फिर त्यार मुख पर ताळु जालु
कोका कोला -सुण बै जल जीरा ! क्या औकात च तेरि जु मेरि दगड़ बात कौर ? फिर जख तलक संस्कृत को सवाल च- इण्डिया मा कु समझद संस्कृत ?
जल जीरा -ठीक च ठीक च। पण म्यार दगड़ इज्जत से बात कौर।
कोका कोला -तेरी इज्जत क्या च हैं ?
जल जीरा - मी भारत मा द्वी हजार साल से छौं।
कोका कोला -तो ?
जल जीरा -कम च कि मि भारत घरों मा द्वी हजार साल से आयुर्वेदिक पेय छौं।
कोका कोला -अबै जब इंडिया मा आयुर्वेद ही अपण महत्व की लड़ाई लड़णम नाकामयाब च त ते सरीखा पेय की क्या औकात ?
जल जीरा -ये औकात पर नि जा हां !
कोका कोला -किलै नि बतौं त्वे तैं तेरि औकात। ऐक्स्पाइरी डेट निकळ ग्यायि अर अबि तलक सि फ़्रिजौ कूण्या पर अनाथ जन पड्यूं छे।
जल जीरा -ये अनाथ नि बोल हाँ म्यार बिरतांत ढाई हजार साल पैलाक चरक संहिता मा बि च हां
कोका कोला -अबै आज की बात कौर कु पुछद त्वै सरीका ड्रिंक तैं। कथगा भारतीय चरक संहिता बारा मा जाणदन ?
जल जीरा -पण यु त तू बि जाणदि कि रियलिटी मा मीमा त्वे से जादा स्वास्थ्यवर्धक इंग्रेडिएंट छन।
कोका कोला -ठीक च कि त्वैमा हेल्दी इंग्रेडिएंट छन पण लोग त यी समझदन कि ओनली कोका कोला इज ''रियल थिंग ' अर बाकि सब बेकार छन।
जल जीरा -अरे कै झूट तैं हजार दैं दुरावो। रिपीट कारो त वु झूट सच ह्वे जांद अर लोगुं तैं सच झूठ लगण बिसे जांद।
कोका कोला -यही तो मार्केटिंग है !
जल जीरा -हाँ मार्केटिंग पावर का बल पर ही तो तू अब हम सरीखा स्वास्थ्यवर्धक पेयुं /ड्रिंकुं तैं हीन समजदी।
कोका कोला -ओ बेवकूफ ! ओल्ड रग ! मि त्वै तैं हीन नि समजदु बलकणम भारतीय त्वै सरीखा पारम्परिक , काम का पेय पदार्थ तैं हेय दृष्टि से दिखदन।
जल जीरा -वी त रुण च कि भारतीय मानिक चलणा छन कि जो बि इम्पोर्टेड चीज च वो अमृत च अर जो बि भारतीय चीज च वो दकियासूनी च।
कोका कोला -अर इन्डियन त्वै तैं महत्वपूर्ण स्वास्थ्य वर्धक पेय समझ बि ल्यावन त क्या ह्वे जालो ?
जल जीरा -अरे रिसर्च अर डेवलपमेंट से मि तैं बोटलिंग लैक बणांदा अर मार्केटिंग करदा त जल जीरा की पूछ कोका कोला से जादा हूंदी
कोका कोला -क्या त्वै तैं पक्को विश्वास च कि भारतीय अपण पारम्परिक खाद्य पदार्थों पर अन्वेषण कारल ?अर कामौ पारम्परिक पदार्थों तैं बचाला ?
जल जीरा -वी त रुण च कि अशोक महान का बाद भारतीय समाज निर्माणकारी समाज छोड़िक बिचौलिया समाज ह्वे ग्यायि।
कोका कोला -यां पर आइ एग्री विद यु कि भारतीय समाज लौह अयस्क निर्यात करण मा विश्वास करदो अर वै माटु से लोहा बणाण मा विश्वास नि करदो।
जल जीरा - ट्रेडिंग संस्कृति मा त इनि ह्वाल.
कोका कोला -तो फिर किलै मेरी समणी इथगा अक्कड़ दिखाणि छे ?
जल जीरा -अब त अक्कड़ बि खतम ह्वै गे। किलैकि भारतीय हम तैं कूण्या मा बि जगा नि दींदन ।

Copyright@ Bhishma Kukreti 4 /10/2013

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ठ्यकर्या
महाकवि : कन्हैयालाल डंडरियाल
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यां क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
जनम के उछ्यादी थे , विद्या की कदर ना की
कण्डाळी की झपाग खै , ब्व़े की अर बुबाकि भी
जा रहे थे बुळख्या ल्हें, एक दिन स्कूल को
मूड कुछ बिगड़ गया , अदबाटम भज्याँ क हैं
घर भटी अयाँ क हम गढवाळी भुल्याँ क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
कै गुजरू इनै उनै , पोड़ी सड़कि का किनर
गाँव वालोँ य मित्रु का , घौर कै कभी डिन्नर
कुछ रकम ठी फीस की , कुछ चुराई ड्वारूंद
खर्च कै पुकै पंजै , मैना धंगल्ययाँ क हैं
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यां क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
टैक्निकल जौब में, हाथ काले क्यों करें
करें किलै कूली गिरी , ब्यर्थ बोझ से मरें
डिगचि डिपार्टमेंट का , डिपुटी हम बण्या क हैं
तीस रूप्या रोटी ल्हें , जुल्फा झटग्याँ क हैं
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यां क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
क्या कहें पहाड़ से , तंग हम थे आ गये
च्यूडा , भट बुकै बुकै , दांत खचपचा गए
कौणयाळी गल्वाड़ से क्वलणि तक पटा गयी
अब तो ठाठ से यहाँ , पान लबल्यां क हैं
घौर भटिं अयाँ क हम , गढवाली भुल्यान क हैं
जरा जरा विदेश की अद्कची फुक्यां क हैं
Copyright @ H K Dandriyal

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नजर उत्तराखंडै कुर्सी

विद्वान कवि ; पूरन पंत 'पथिक'

मिस्यां छन बस घोषणौ पर ,
जौंको उत्तराखंडै कुर्सी।
अहा भैजि शिल्यानास,
नजर उत्तराखंडै कुर्सी।
सूणां दाज्यू उद्घाटन,
चयेंद उत्तराखंडै कुर्सि ।
धर्म लोकार्पण इबारे ,
बचै रखण अपणि कुर्सी।
लाल बत्ती -गाडी -घ्वाड़ा हम सणि ,
चयेंद छ्वटि -म्वटि या उच्ची कुर्सी।
अबि मिलीं छन, बचै रखणि,
टैम्परैली अपणि कनि बि कुर्सी।
शान या इज्जत हमारी
एम्बेसेडर दगड या कुर्सी।
प्रोटोकॉल, रिगदा लोग
कोष ई च हमारी कुर्सी।
लूछि दियां , लमडै दियां ना ,
लाल बत्ती अर या कुर्सी।
अहा कुर्सी , वाह कुर्सी ,
हमारी जो तु छे कुर्सी।
हमारी ब्वेन पिवै कुर्सी ,
खवै अर पेराई कुर्सी।
ढिक्याण -डिसाण उठण -बैठण
हम खुण्ये या बणै कुर्सी।
सांग बी जब सज्यालु तबि बि तू दगड़ इ रैली ,
किलै,
कैकुण,
क्योक बिसरण या कुर्सी।
हमारी छे तू , त्वे कुण हम ,
बिन तेरा कंगाल हम, ये कुर्सी।
चौदा साल कन खस्स खस्किन ,
अहा कुर्सी, वाह कुर्सी।
वक्त कम, ठेकेदारी बिंडी
कनि बचीं रैली तू मेरी गळकंठी कुर्सी।

Copyright @ Puran Pant 'Pathik' Dehradun

garhwali.dhai100@gmail.com