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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
September 24 at 10:12pm ·

गीतों में तुम थी , धुन में थी तुम
थी शब्दौ मे तुम्हारी अनवार ( छबी )
एक बिम्ब सा खींचा था
खिचा था मेरे नैनों के आर- पार !
-- पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
September 24 at 7:39pm ·

आओ दूर कहीं , दूर चले
जहाँ कोलाहल ना हो
निस्तब्ध्ता हो चारो और
केवल मौन ही मौन हो !

झिँगारो का सुरमई स्वर हो
पत्तों से टप टप टपकता पानी का स्वर हो
दूर छितिज पर दूर कहीं सिंदूरी सा रंग हो
आत्मईसा अपना पन भू -ताल में हो
आओ चलो चले एक नये पथ पर
बन पथिक अनजाने हो !
--- कापी राइट @ पराशर गौर
२४ सितम्बर २०१४ समय सुबह १०,०७ पर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
September 24 at 7:38pm ·

आओ दूर कहीं , दूर चले
जहाँ कोलाहल ना हो
निस्तब्ध्ता हो चारो और
केवल मौन हे मौन हो !

झिँगारो का सुरमई स्वर हो
पत्तों से टप टप टपकता पानी का स्वर हो
दूर छितिज पर दूर कहीं सिंदूरी सा रंग हो
आत्मईसा अपना पन भू -ताल में हो
आओ चलो चले एक नये पथ पर
बन पथिक अनजाने हो !
--- कापी राइट @ पराशर गौर
२४ सितम्बर २०१४ समय सुबह १०,०७ पर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 24 ·

हम देखते रह गये बस
चाँद न जाने किसके
घर पर सवेरा कर गया
हम मन मे ही
खुसर फुसुर
करते रह गये
न जाने किस गली
किस नुकड़ मे कोई
अजनबी चाँद से
गुफ्तगू कर गया
ये चाँद का अपना हक़ है
वो किस के आकाश मे
चांदनी बिछाये
किस्मत मे तारा
बनना रहा होगा
जो चाँद को देख तो
सकते है पर हो
नहीं सकते
रचना .............शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
17 hrs ·

किसी kavi/kaviyatri की पंगतियाँ आपके साथ बाटना चा रहा हूँ jo mujhe achee lagee देखे।

लड़कियो के जिंदगी " पर

गर्म तपती दोपहरी है
लड़कियों की जिन्दंगी
एक पथ रीली डगर है
लड़कियों की जिंदगी !

चाहिए हो अग्नी परीक्षा
या हो चौसर के बिसाद
हर शदी में दांव पर है
लड़कियों के जिंदगी !

हर घड़ी , हर पल सताए
पत्थरों का डर जिसे
वो चमकता कांच घर है
लड़कियों के जिनदगी !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
12 minutes ago
जियु मेरु

जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

यख काय खोज्नु रे
अंधारों ये बाटे मा रे
उजाळु बन उडी जा रे
कुच निच यख रख्युं तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

अपने ई छाल मा मेलेली
वख ई सरी माया पसरी च
कन हिरदय त्यारू रे
निठुरु निठुरु कै बान ये
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

परखे बसे बरसाकी
मेरु दुःख मेरु पासे रे
कैल ने सम्झेरे
जियु मेरु कण घेरु तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
आच सुबेर

आच सुबेर सुबेर
ऐई ये खैल
कैरी की सौंसरो को
मिल दैल फैल

चल खुठा चल
चल छूछा चल

ध्यै लगणु तिथे
कैथे व्हालु बुलाणु
छोड़ि कि गै छे
कु ऊ खुठा पैल भैर

चल खुठा चल
चल छूछा चल

अपरा बाना
खूब सोची तिल
वैका बाण
कब सोच्ण तिल

चल खुठा चल
चल छूछा चल

जन मि छोड़ी गयुं
ऊनि ईं छे कया तू
आँखि मा दाड़ी तेरी
ऊनि मुखडी छे मेंमा

चल खुठा चल
चल छूछा चल

खेल ई लुलू
ते दगडी भेंटि ई दुलू
मासाण माटी मा मेर
बालपाणा ते देक ई लुलू

चल खुठा चल
चल छूछा चल

आच सुबेर सुबेर
ऐई ये खैल
कैरी की सौंसरो को
मिल दैल फैल

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 27
किले

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

कित्गा निर्मल कित्गा सुंदर
पाड़ा हमारू गौं घार हमारू

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

पुंगड़ो की माया डालों की साया
हेरालु डंडों कंठों कैन यख बसाया

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

बगदी अलकनंद भागीरथी माँ नंदा
बोई गंगा की धारो कैल बग्यू

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

आम अखरुट लीची किन्गोड़ा
बुरांस फ्योंली कैल पक्याो कैल फ़ुल्यो

किले नि जाणा पाई
किले नि पछाण पाई

हरी कु द्वारा बद्री केदार को घार
उकलू छोड़ी किले मेरु मन उंदार

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

कित्गा निर्मल कित्गा सुंदर
पाड़ा हमारू गौं घार हमारू

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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Shailendra Joshi
August 24 ·

हम देखते रह गये बस
चाँद न जाने किसके
घर पर सवेरा कर गया
हम मन मे ही
खुसर फुसुर
करते रह गये
न जाने किस गली
किस नुकड़ मे कोई
अजनबी चाँद से
गुफ्तगू कर गया
ये चाँद का अपना हक़ है
वो किस के आकाश मे
चांदनी बिछाये
किस्मत मे तारा
बनना रहा होगा
जो चाँद को देख तो
सकते है पर हो
नहीं सकते
रचना .............शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday at 8:12am ·

जियु मेरु

जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

यख काय खोज्नु रे
अंधारों ये बाटे मा रे
उजाळु बन उडी जा रे
कुच निच यख रख्युं तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

अपने ई छाल मा मेलेली
वख ई सरी माया पसरी च
कन हिरदय त्यारू रे
निठुरु निठुरु कै बान ये
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

परखे बसे बरसाकी
मेरु दुःख मेरु पासे रे
कैल ने सम्झेरे
जियु मेरु कण घेरु तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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