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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
September 26 at 7:49pm ·

तेरि आँख्यूंमा आंसू देखी
हिया मेरु भरी ऐगे छो
टप टप चूँदा आँख्यु बिटि वो
तेरा मनै पीड़ा बतै गे छो !

कॉपी राइट @पराशरगौर
२६ सितमबर २०१४ सुबेर १०. १५

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाली सेर - 2 देखे ... साथ में दाद भी देना ना भूले।

फुकेगे होलु जिस्मत फुकेगे होलु दिल भी
अब खरवलणी रँगूँण, अब कवि फैदा नी ! ( ग़ालिब साहिब )

--- पाराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"सुरमई आँखों का जादू "

आपकी नजरों ने देखा है
जब से हमको प्यार से
अब क्या कहे सनम
जिंदगी बदल गई है तब से !

भीड़ से कट कर
अब तो रहने लगे
नीड से अब तो
आँखे चुराने लगे
जज्बातों पे अपने
अब तो रहा न असर
उठने लगे है वो ,
अबतो चुपके चुपके होल से !

आप के नाम से
अब तो हम जाने जाने लगे है
असर ये हुआ की अब हम
अपनों में हे बदनाम होने लगे है
धड़कने बे-काबू होती है मेरी
आता है जब जब जिक्र आपका
छुपते छुपाये छुपती नहीं बाते
बात राज के दबाने से ....... !
पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 28
आच सुबेर

आच सुबेर सुबेर
ऐई ये खैल
कैरी की सौंसरो को
मिल दैल फैल

चल खुठा चल
चल छूछा चल

ध्यै लगणु तिथे
कैथे व्हालु बुलाणु
छोड़ि कि गै छे
कु ऊ खुठा पैल भैर

चल खुठा चल
चल छूछा चल

अपरा बाना
खूब सोची तिल
वैका बाण
कब सोच्ण तिल

चल खुठा चल
चल छूछा चल

जन मि छोड़ी गयुं
ऊनि ईं छे कया तू
आँखि मा दाड़ी तेरी
ऊनि मुखडी छे मेंमा

चल खुठा चल
चल छूछा चल

खेल ई लुलू
ते दगडी भेंटि ई दुलू
मासाण माटी मा मेर
बालपाणा ते देक ई लुलू

चल खुठा चल
चल छूछा चल

आच सुबेर सुबेर
ऐई ये खैल
कैरी की सौंसरो को
मिल दैल फैल

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किले

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

कित्गा निर्मल कित्गा सुंदर
पाड़ा हमारू गौं घार हमारू

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

पुंगड़ो की माया डालों की साया
हेरालु डंडों कंठों कैन यख बसाया

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

बगदी अलकनंद भागीरथी माँ नंदा
बोई गंगा की धारो कैल बग्यू

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

आम अखरुट लीची किन्गोड़ा
बुरांस फ्योंली कैल पक्याो कैल फ़ुल्यो

किले नि जाणा पाई
किले नि पछाण पाई

हरी कु द्वारा बद्री केदार को घार
उकलू छोड़ी किले मेरु मन उंदार

किले नि जाणा पाई
नि पछाण पाई

कित्गा निर्मल कित्गा सुंदर
पाड़ा हमारू गौं घार हमारू

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देखिल्या : राम पुर तिराहा (महान कवि कि शहीदों तै श्रधांजलि )

कवि मदन डुकलाण

(गढ़वाळि क महान कवि मदन डुकलाण क कविता अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हुन्दन। मदन डुकलाण कि गणत इकिसवीं सदी क महान अंतर्राष्ट्रीय कवियुं मा होंद. ये महान गढ़वाळि कवि न उत्तराखंड आन्दोलन टैम पर रामपुर तिराहा पर हुंईं दैसत कु बिरतांत बड़ो बढिया ढंग से करी. ल्या महान कवि क राम पुर तिराहा पर कुछ पंगत-भीष्म कुकरेती)
हक्क का बाना ह्वेंगीं शहीद हमरा लाल देखिल्या
वूंका जुल्म वूंकी दैसत का हाल देखिल्या ।
त्वेन दे छे माया कि मीतै दगड्या ज्वा समळौण
ल्वे मा भीजी आज तर्र वो रुमाल देखिल्या ।
देखिके घैल मा बैण्यु कि कुंगळि क्वन्सि जिकुडि
गङ्गा जमुना मा बि आज ऐगे उमाळ देखिल्या ।
देखी ल्वेखाळ निहत्थों कु आज गांधी जनमबार मा
शिव का हिमालम ह्यूं बि आज ह्व़े गे लाल देखिल्या ।
सर्वाधिकार @ मदन डुकलाण देहरादून
(ग्वथनी गौं बटे , २००२ से साभार )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नेतागिरी का कु-करतबी जागर

१-जागर को पवांण (शुरवाती पूजा)
जै जस दियां ये , जै जस दे हाई कमांड माता
जै जस दे प्रजातंत्र को नाम पर खानदानी राज को दिवता
जै जस दे जन सेवा का नाम पर जनता तैं ठगण वाल़ू दिवता
जै जस दे है कमांड मा बैठ्युं युवराज दिवता
जै जस दे पंचनाम दिवता
जै जस दियां -ठगी , परपंच , मक्कारी , स्वारथ , कुर्सी की भूख का पंचनाम दिवता ए

२- बिघन दूर करणो जागर

हाई कमांड का बड़ा बड़ा नेता - घडी घडी का बिघन टाळ
प्रजातंत्र का नाम पर खानदानी माता का जाया , तू बिघन टाळ
परपंच को खेत्रपाल प्रताप सिंग कैरों , आया राम गया राम की धरती हरयाणा त्वे तैं नमस्कार
पार्टी का नाम पर चन्दा बाज तेरो सुमरिन
पैलो सुमरिन करदो मै भ्रष्टाचार की देवी
दूजो सुमरिन करदो मै अनाचार की देवी

३- जागरण का दिवता

चुनाव का परब जाग , गौ स्वरुप वोटर जाग
धर्मस्वरूप संसद जाग, ठाटबाट को कांठा जाग
भानुपंखी हवाई जाज की फोकट की जातरा जाग
चमचों की भीड़ जाग , बेशर्मी की होड़ जाग
मथि वाळ तैं पुळयाँण, बिरोध्युं तैं जुत्याण सीख रे बाबा
जनमुखी का मुखोटा पैरंण सीख रे बाबा, भितर बिटेन जन बिरोधी का अवगुण सीख रे बाबा
दिवाकर भट्ट की आत्मा जाग रे बाबा , जै डाळी तैं लगाई वीं डाळी तैं काटण सीख रे बाबा
पोखरियाळ की जिन्दी आत्मा जाग , कोशियारी की जिन्दी आत्मा जाग , दुसर तैं सी एम् की कुर्सी मा नि बैठण दीणे कौंळ सीख रे बाबा
सी एम् , पी एम् की कुर्सी पर सदाब्रत टक्क लगाण सीख रे बाबा
भारत मुखी का मुखोटा पण स्विस बैंकमुखी का कुढब सीख रे बाबा
ज़ात पात का नाम पर वोट -भीख मांगण सीख रे बाबा
भारत तैं जात पांत , भासा का नाम पर लड़ाण का पैंतरा सीख रे बाबा
चुनाव मा गुल़ादंगी का हथियार चलाण सीख रे बाबा
जु मि कुरू त वो ठीक , जु बिरोधी कारन तो वो सब गलत , बिरोध्युं पर बेबजै लांछन भगार लगाण सीख रे बाबा
लालू यादव की जिन्दी आत्मा जाग , प्रजातंत्र बचाणो बान कज्याण तैं मुख्यमंत्री बणाण सीख रे बाबा
मुलायम सिंग की जिन्दी आत्मा जाग , जु हैंक पर गोळी चलाओ त ठीक पण अफु पर लाठी चली त प्रजातंत्र को नाश बुळण सीख रे बाबा
करुणा निधि की जिन्दी आत्मा जाग , टू जी स्कीम का घोटाला को ठीकरा मीडिया पर फोड़ण सीख
बी जे पी की ज़िंदा आत्मा जाग, कोंग्रेस मा भ्रष्टाचार देख पण यदुरप्पा को भ्रष्टाचार तैं न्याय को नाम दीण सीख रे बाबा
गूणी अपण पूँछ नि दिखदु पण बांदर को पूँछ तैं लम्बो बताण सीख रे बाबा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नजर उत्तराखंडै कुर्सी

विद्वान कवि ; पूरन पंत 'पथिक'

मिस्यां छन बस घोषणौ पर ,
जौंको उत्तराखंडै कुर्सी।
अहा भैजि शिल्यानास,
नजर उत्तराखंडै कुर्सी।
सूणां दाज्यू उद्घाटन,
चयेंद उत्तराखंडै कुर्सि ।
धर्म लोकार्पण इबारे ,
बचै रखण अपणि कुर्सी।
लाल बत्ती -गाडी -घ्वाड़ा हम सणि ,
चयेंद छ्वटि -म्वटि या उच्ची कुर्सी।
अबि मिलीं छन, बचै रखणि,
टैम्परैली अपणि कनि बि कुर्सी।
शान या इज्जत हमारी
एम्बेसेडर दगड या कुर्सी।
प्रोटोकॉल, रिगदा लोग
कोष ई च हमारी कुर्सी।
लूछि दियां , लमडै दियां ना ,
लाल बत्ती अर या कुर्सी।
अहा कुर्सी , वाह कुर्सी ,
हमारी जो तु छे कुर्सी।
हमारी ब्वेन पिवै कुर्सी ,
खवै अर पेराई कुर्सी।
ढिक्याण -डिसाण उठण -बैठण
हम खुण्ये या बणै कुर्सी।
सांग बी जब सज्यालु तबि बि तू दगड़ इ रैली ,
किलै,
कैकुण,
क्योक बिसरण या कुर्सी।
हमारी छे तू , त्वे कुण हम ,
बिन तेरा कंगाल हम, ये कुर्सी।
चौदा साल कन खस्स खस्किन ,
अहा कुर्सी, वाह कुर्सी।
वक्त कम, ठेकेदारी बिंडी
कनि बचीं रैली तू मेरी गळकंठी कुर्सी।

Copyright @ Puran Pant 'Pathik' Dehradun

garhwali.dhai100@gmail.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रिटारिट

-महाकवि : कन्हैयालाल डंडरियाल

पैलि त मि सिरफ़ सुणदु छयो

पर अब द्यखणु छौं

कि दुन्यs रिटणीं च

जिकुड़ी चौछवड़ि गाणी (इच्छा ) रिटणी छिन

नेतौंक चौछवड़ि नीति रिटणीं च

फूलूं फर म्वारि रिटणीं च

पुंगड्यूंम ब्वारि रिटणीं च

कीली फर बाछि रिटणी च

बजारुम पैसा रिटणु च

आंख्युं अगनै जैंगण रिटणीं छिन

मि द्यखणू छौं

रिटदी असहाय जिंदगी तैं

रिटदा आस्था बिश्वास तैं

हर प्राणी चौछवड़ी रिटदी मौत तैं

Copyright@ H.K Dandriyal, Delhi

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi


कदुग जल्दी बीति जांछी उ टैम जब इजाक पास रौंछी।
जब क्वे दुःख-सुख हौंछी इजाक काखि में ख्वर हौंछी॥