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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
July 9 · Edited ·

यु त हर भाषा मा होंदी चा
गीत कबिता गजल
जब लोक भाषा मा होंदी
क्वी गीत कविता गजल
त वा बस होंदी अपणी
छवीबथ
ज्यू जुकुदी कर देंदी तर
रचना........................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
13 hrs · Edited ·

"जी उठा था मै"


जी उठा था मै

मै तो जी गया

मदीरा को जब

जब जब मैने उसे

अधरो से लगा दिया !

हाला तो बदनाम है

पर प्याला तो नही

पीने वाला है बदनाम

पर पिलाने वाला तो नही

भेद भाव भूल गया मै

जब घूंट एक पी लिया !

उठते है प्रशन बार बार

क्या पीना-पिलाना है जरूरी

कोई आशिक से पूछे की

क्या प्यार करनtा है जरूरी

बौखला जायेगा सुनके "प्रेम"

जो सब्ध उसे ये कह दिया !

copyright@ prshar gaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


"जी उठा था मै"


जी उठा था मै

मै तो जी गया

मदीरा को जब

जब जब मैने उसे

अधरो से लगा दिया !

हाला तो बदनाम है

पर प्याला तो नही

पीने वाला है बदनाम

पर पिलाने वाला तो नही

भेद भाव भूल गया मै

जब घूंट एक पी लिया !

उठते है प्रशन बार बार

क्या पीना-पिलाना है जरूरी

कोई आशिक से पूछे की

क्या प्यार करनtा है जरूरी

बौखला जायेगा सुनके "प्रेम"

जो सब्ध उसे ये कह दिया !

copyright@ prshar gaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
11 hrs · Edited ·

गढ़वालीमाँ एक सेर दिखया ......

गाला गाला पाणी तक, भी नि डैरु मी

कभी डूबू त , कबी छाल ल्ग्युमी

पर जब बीटी देखी , तेरी रतन्य्ली आन्खियुमा

डुबगियुं -- अब नि लागुदु, छाल जणी मी !

copyright@parashar gaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
8 mins

जदुग खूबसूरत आज रात्ति छी उ है खूबसूरत भोव हवो
जदुग ख़ुशी तुमार पास आज छन उ है ज्यादा भोव हवो

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

विकास ध्यानी - उत्तराखण्डी
10 hrs ·

एक छोटी सी पहाडी पर गांव जिसमें पीपल की छांव
छांव में अरमान था एक छोटा सा मकान था
छोडकर उस गांव को उसकी धनी छांव को हम
परदेशी हो गए है, यहां की भीड में खो गए है ।
वो बहते झरनो का किनारा,
जिस पर हमारा बचपन गुजारा
वो लडकपन दिवानापन रोज जंगलो में जाना
फिर जवानी जहां बन गई एक बदनसीबी
छोडकर उस गांव को हम उसकी घनी छांव को हम
परदेशी हो गए है, यहां की भीड में खो गए है।
कितने प्यारे थे वे लोग या भगवान ...थे वे लोग
एक बीधा जमीन थी परन्तु जन्नत वही थी
हार री हमारी बदनसीबी नाम जिसका गरीबी
छोडकर उस गांव को , उसकी घनी छांव को हम
परदेशी हो गए है, यहां की भीड में खो गए है।
याहं तो शहर है श्हर ठहरपा
हादसों से भरी यहां की बस्ती, कोई मेला न मस्ती
क्या है शहर की जिन्दगी, हर व्यकित है अजनबी
छोडकर उस गांव को उसकी घनी छांव को हम
परदेशी हो गए है, यहां की भीड में खो गए है ।

‪#‎जगमोहन‬ जिज्ञासु जी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
22 hrs · Edited ·

क्‍यौकु लग्‍यां छैं.....

हे लग्‍द बग्‍द,
कुछ त सोचा मन मा,
कैकु तुम भलु भि करा,
ये मनखि जन्‍म मा....

धौंकरा फौंकरी जैका खातिर,
हात कू मैल छ यू पैंसा,
क्‍यौकु पड़़्यां घंघतोळ मा,
दिन मा द्वी घड़ी हैंसा....

माटा कू बण्‍युं छ मनखि,
मन मा केकु घमंड,
दुर्दिन औन्‍दा जब छन,
ह्वै जांदु मनखि झंड.....

कवि "जिज्ञासु" की बात हेजि,
समझ मा क्‍या औणि,
या जिन्‍दगी मनखि तैं,
दिन रात रुवौणि....

क्‍यौकु लग्‍यां छैं,
हे लग्‍द बग्‍द,
मन मा होयुं अभिमान,
जै दिन जैल्‍या,
कफन हि मिललु,
क्‍यौकु जोड़ना छैं,
सौ घड़ी कू सामान.....

-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
16.10.2014, सर्वाधिकार सुरक्षित

पढें और अहसास करें।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 15 at 1:29pm · Edited ·

नौना का ब्‍यो मा......

हिसाब लगाई,
कथगा मंगौ,
समझ नि आई,
जुगाड़ करि करि,
जब मंगायी,
कुठार पेट लुकाई,
ताळु लगाई....

ब्‍यो कू दिन आई,
सब्‍बि धाणि बणाई,
पेन्‍दारौं की टक्‍क,
खाण सी पैलि,
पेण पर थै,
बिचारौन बताई.....

पेन्‍दारौं पिलाई,
ऊंकी धीत नी भरे,
घंघतोळ ह्वै भारी,
कथगा होलि रयिं,
हिसाब लगाई,
हौर मंगायी,
खौळ्युं सी रैग्‍यौं,
हात क्‍या आई...

सोचि तब मैंन,

घंघतोळ मा पड़िक,
हे समाज त्‍वैन,
या क्‍या बिमारी,
आज लगाई.......

-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
16.10.2014, सर्वाधिकार सुरक्षित
पढें और अहसास करें।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 14 at 5:15pm ·

तुम क्‍यौकु बोल्‍दा हे भुलौं.......

गौं का मनखि, सब चलिग्‍यन,
पंछी पहाड़ का, गौं मा हि रैन,
कैकु छ पहाड़ प्‍यारु,
तुमसि भला ऊ पोथ्‍ला हिछन,
जौन पहाड़ कतै नि छोड़ी,
सच मा बोला, मुक्‍क नि मोड़ी,
पहाड़ का पंछी छन पहाड़ी,
तुम क्‍यौकु बोल्‍दा हे भुलौं.......

-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
14.10.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 14 at 5:03pm ·

जब ह्युंद आलु.....

ठेणी लगलि,
घाम तापण पहाड़ जौलु,
कोदा की करकरी रोठ्ठी दगड़ा,
तिल की चटणि खौलु,
तातु गथ्‍वाणि प्‍यौलु,
कंडाळि कू साग खौलु
अपणा मुल्‍क जौलु,
जब ह्युंद आलु.....

-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
14.10.2014