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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 13 at 11:28am · Edited ·

जल्‍म्‍युं छौं पहाड़ मा, वख नि रंदु छौं,
रिस्‍तौं की डोर सी, वख सी बंध्‍यु छौं....

-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
13.10.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 1 at 10:57am ·

गढ़वाळ का, ढुंगौं मा बैठि,
मन खुश होन्‍दु छ भारी,
मुल्‍क छुटिगी, पोटगि का बाना,
होयिं छ भारी लाचारी....

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" की अनुभूति
01.10.2014, दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
September 30 at 11:20am ·

गौं बिटि रैबार अयुं छ,
बल बग्‍वाळि औणि छन,
घौर अवा तुम बग्‍वाळ्यौं मा,
खेलला गौं मा भैला,
भलि रसाण ऐ जालि तब,
स्‍वाळा पकोड़ा खैल्‍या,
टक्‍क हमारी तुम फर,
बग्‍वाळ्यौं मा तुम ऐल्‍या......

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" की अनुभूति
30.9.2014, दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
September 29 at 2:44pm ·

उजाळु....

आज कू,
भलु नि लगणु छ,
सब्‍बि धाणि ह्वैक भी,
टरकणि हि टरकणि...

ख्‍याल औन्‍दु,
मन मा जब,
वा अंधेरी रात ही,

भलि थै, भलि थै...

मनख्‍यौं मा मनख्‍वात थै,

प्‍यार भरी बात थै,
छल कपट, दूर की बात,
आज का उजाळा सी,
भलि वा रात थै......

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" की अनुभूति
29.9.2014, दूरभाष: 09654972366

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
17 hours ago
पहाड़ी पहाड़ी ? हाँ जी,,
तिन दारू प्याई,,? न नाजी,,
गिच्चू खोल बल,,!! ल्या जी,,,
झूट बोनू छै,,? नाजी,,
न न न, मेरी पियीं नीच नि च,,,
न, मेरी पियीं नि च,,,
हा,,, मिथे केन पिलाई च,,,
पिलाई च बल,,,
जू भी च भलु च,,,
अर मिथे मज़ा औणी ची भई,,,
ब्यो मा यार,, ब्यो मा यार,,
मिथे कच्ची मिली यार,,,!!

द्वारा राजीव नयन बहुगुणा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur

subh prbhat mittro

"मा की आशीश '

सोची छो मेरा भी आला दिन बोडि की
नौनु पड़े छो मिन भुलु कुडि पुंगड़ि बेचिकी
सोचे छौ कैकी ब्वारी सुख पौलु
चलिगे वो लेकी वी, मै थै यखुली छोड़ि की !

वेका खुट्यू काण्डु नि बैठ्या जख भी रा ओ
मिट काटि ल्यूलु दिन अपणा जनि तनी कैकी
कॉपीराइट@पराशरगौर , १८/१०/१४

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
October 16 at 1:03am ·

"कुडी " ( मकान)

शांजाहान भी बनै छै
एक कुड़ी
वा कुड़ी ताज महल ह्वै गे !

म्यारा बूढ़ोंन भी बीनै छै
एक कुड़ी
जैथै म्यारा पर ददा, दादा अर बाबन बरती
पर
हम उन्दू ऐग्यां
प्रबासी ह्वेग्याँ
आर हमरा रैंदा रैंदा
वा कुड़ी खन्द वार ह्वेगे !

कॉपी राईट @ पराशर गौर
१४ ओक्टबर २०१४ दिनम ३,२७ पर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1
तेर माया मा

तेर माया मा,हैंस ना पाऊं
तेर माया माँ ,रुन नि पाऊं

ये जीकोडी की तेरी दुकदुकी मा
वो तेर परेली छपकेनि मा
पिरित से मेर ते र पिरित जोडना पाऊं

ईं आँखा मा,देका ना पाऊं
ईं गिची दगडी ,बोल ना पाऊं

वो नीलू सरगा ऊ बगदी गद्नि
हैरा भैरा बग्याल ते समन देक ना पाऊं
बौल्या मी तेरु रूपा कु जुनि से चमकी नि पाऊं

ये बाँयां मा पकड़ी नि पाऊं
ते थे य हिरदय अंग्वाल नि ले पाऊं

यकुलु मेरु प्रेम याकलू चली
वे तेर बाट ते मेर बाटा मिलि नि पाऊं
बैठ्युं रुं ते थे हे राम हक़ नि दे पाऊं

तेर माया मा,हैंस ना पाऊं
तेर माया माँ ,रुन नि पाऊं

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 29
जियु मेरु

जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

यख काय खोज्नु रे
अंधारों ये बाटे मा रे
उजाळु बन उडी जा रे
कुच निच यख रख्युं तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

अपने ई छाल मा मेलेली
वख ई सरी माया पसरी च
कन हिरदय त्यारू रे
निठुरु निठुरु कै बान ये
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

परखे बसे बरसाकी
मेरु दुःख मेरु पासे रे
कैल ने सम्झेरे
जियु मेरु कण घेरु तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 28
आच सुबेर

आच सुबेर सुबेर
ऐई ये खैल
कैरी की सौंसरो को
मिल दैल फैल

चल खुठा चल
चल छूछा चल

ध्यै लगणु तिथे
कैथे व्हालु बुलाणु
छोड़ि कि गै छे
कु ऊ खुठा पैल भैर

चल खुठा चल
चल छूछा चल

अपरा बाना
खूब सोची तिल
वैका बाण
कब सोच्ण तिल

चल खुठा चल
चल छूछा चल

जन मि छोड़ी गयुं
ऊनि ईं छे कया तू
आँखि मा दाड़ी तेरी
ऊनि मुखडी छे मेंमा

चल खुठा चल
चल छूछा चल

खेल ई लुलू
ते दगडी भेंटि ई दुलू
मासाण माटी मा मेर
बालपाणा ते देक ई लुलू

चल खुठा चल
चल छूछा चल

आच सुबेर सुबेर
ऐई ये खैल
कैरी की सौंसरो को
मिल दैल फैल

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित