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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi


दोस्तो तुमौर नि हौंण पर जिन्दगी में यदुग कमी रैं ।
मीचाहे लाख हसड़े कोशिश करूं पर आँखों में नमी रैं॥

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देखिल्या : राम पुर तिराहा (महान कवि कि शहीदों तै श्रधांजलि )

कवि मदन डुकलाण

(गढ़वाळि क महान कवि मदन डुकलाण क कविता अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हुन्दन। मदन डुकलाण कि गणत इकिसवीं सदी क महान अंतर्राष्ट्रीय कवियुं मा होंद. ये महान गढ़वाळि कवि न उत्तराखंड आन्दोलन टैम पर रामपुर तिराहा पर हुंईं दैसत कु बिरतांत बड़ो बढिया ढंग से करी. ल्या महान कवि क राम पुर तिराहा पर कुछ पंगत-भीष्म कुकरेती)
हक्क का बाना ह्वेंगीं शहीद हमरा लाल देखिल्या
वूंका जुल्म वूंकी दैसत का हाल देखिल्या ।
त्वेन दे छे माया कि मीतै दगड्या ज्वा समळौण
ल्वे मा भीजी आज तर्र वो रुमाल देखिल्या ।
देखिके घैल मा बैण्यु कि कुंगळि क्वन्सि जिकुडि
गङ्गा जमुना मा बि आज ऐगे उमाळ देखिल्या ।
देखी ल्वेखाळ निहत्थों कु आज गांधी जनमबार मा
शिव का हिमालम ह्यूं बि आज ह्व़े गे लाल देखिल्या ।
सर्वाधिकार @ मदन डुकलाण देहरादून
(ग्वथनी गौं बटे , २००२ से साभार )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 29
जियु मेरु

जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

यख काय खोज्नु रे
अंधारों ये बाटे मा रे
उजाळु बन उडी जा रे
कुच निच यख रख्युं तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

अपने ई छाल मा मेलेली
वख ई सरी माया पसरी च
कन हिरदय त्यारू रे
निठुरु निठुरु कै बान ये
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

परखे बसे बरसाकी
मेरु दुःख मेरु पासे रे
कैल ने सम्झेरे
जियु मेरु कण घेरु तेरु रे
जियु मेरु
पाखी बण जा रे
चल चल उदी जोंलों
अपरा ई घार रे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
3 hours ago
बिरदयू गयुं

हुंयुँ छों तुण्ड बरसाता मा
मि विं बरखा की रात मा
मिली जबेर तेर नशेली नजरि मेर नजरि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

छन कया नशा छै
वीं केशा कि लगुली वे रात कली घटा छे
नि छे वे रात पौड़ी जुन की जुन्याली
विं की मुखडी ही बनिगे पुन्याली
विं पुन्याली देके कि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

दंत पंक्ति की रेघा मा
विं परेली की रेशा मा
कन भाग मेरु अटगि
विं की बिन्दुली मा जै अटकी
विं बिन्दुली देके कि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

मिल बी कै दे सिकेसैरी
विंल जबै मिथे देकि
हैंसि विं ग्लौड़ी देक मेर ग्लौड़ी हैंसि
विं थे देक ना बान बाद मा मेर क्ख क्ख दौड़ी भैंसी
विं हैंसि देके कि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

हुंयुँ छों तुण्ड बरसाता मा
मि विं बरखा की रात मा
मिली जबेर तेर नशेली नजरि मेर नजरि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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Yesterday
घुगुती घुरोण लगी

घुगुती घुरोण लगी म्यारा मैत की
बॉडी बॉडी आये गै ऋतू , ऋतू चैत की
घुगुती घुरोण लगी म्यारा मैत की
बॉडी बॉडी आये गै ऋतू , ऋतू चैत की
ऋतू , ऋतू चैत की

डंडी कांठियुं को ह्यू , गौली गे होलु
म्यारा मैता को बॉन , मौली गे होलु
डंडी कांठियुं को ह्यू , गौली गे होलु
म्यारा मैता को बॉन , मौली गे होलु
चकुला घोलू छोड़ी , उड़ाना व्हाळा
चकुला घोलू छोड़ी , उड़ाना व्हाळा
बेठुला मैतुड़ा कु , पैठना व्हाळा
घुगुती घुरोण लगी
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
घुगुती घुरोण लगी म्यारा मैत की
बॉडी बॉडी आये गै ऋतू , ऋतू चैत की
ऋतू , ऋतू चैत की

दंडीयुं खिलना होला , बुरॉन्सी का फूल
पठियुं हैंसणि होली , फ्योली मोल मोल
दंडीयुं खिलना होला , बुरॉन्सी का फूल
पठियुं हैंसणि होली , फ्योली मोल मोल
कुलरी फुलपाटी लेकि , देल्हियूं देल्हियूं जाल
कुलरी फुलपाटी लेकि , देल्हियूं देल्हियूं जाल
दगड्या भगयान थड्या , चौपला लागला
घुगुती घुरोण लगी हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ
घुगुती घुरोण लगी म्यारा मैत की
बॉडी बॉडी आये गै ऋतू , ऋतू चैत की
ऋतू , ऋतू चैत की

तिबारी मा बैठ्या व्हाळा बाबाजी उदास
बटु हेनी होली माजी , लगी होली सास
तिबारी मा बैठ्या व्हाळा बाबाजी उदास
बटु हेनी होली माजी , लगी होली सास
कब म्यारा मैती औजी , देस भेंटि आला
कब म्यारा मैती औजी , देस भेंटि आला
कब म्यारा भाई बेहनो की , राजी ख़ुशी ल्याला
घुगुती घुरोण लगी हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ
घुगुती घुरोण लगी म्यारा मैत की
बॉडी बॉडी आये गै ऋतू , ऋतू चैत की
ऋतू , ऋतू चैत की ऋतू , ऋतू चैत की
ऋतू , ऋतू चैत की ऋतू , ऋतू चैत की
ऋतू , ऋतू चैत की

गढ़वाली गीत नरेंद्र सिंग नेगी का
बस अनुवाद किया है गढ़वाली भाषा को बढ़वा देने के लिये

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
October 4
अपण ब्वे का मैस कु छन ?

कवि -पूरण पंत 'पथिक'

अपण ब्वे का मैस /
होला वो/
जो
हमरि जिकुड़ि मा
घैंटणा रैन /
घैंटणा छन
कीला /वाङा /दांदा !
जो ,
हमारा नौ फर।,
कागज लपोड़िकै /
फाइलों का थुपड़ा लगैकै/
कम्प्यूटर माँ आंकड़ा भोरिकै /
विकास कना छन /
जो,
हम तैं उल्लू का पट्ठा समझिकै
हम तै लाटा मानिकै /
हम तैं मूर्ख समझिकै
हम तैं सीधा -सरल मानिकै
मौज-मस्ती -मटरगस्ती कैरिकै
अपणी मवासी बणाण पर मिस्यां छन
अपण ब्वेका मैस छन वो

Copyright@ पूरण पंत 'पथिक' Dehradun

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Neelam Nautiyal

मेरु भी ब्रत निर्जला .......
=========================
=========================
एक दिनै बात वा,
करवा चौथे रात वा
मग्वी ब्वारी मगु तैं
लाठन सम्झौणी छै
कै मा नि बोली पांणी प्यायी
लोगु माँ बोल्यूं कुछ नि खाई
समझणां छाँ मेरी या बात
मेरु भी ब्रत निर्जला .......

बाजार जा भुझी लौ
मगु तै भगौणी छै
तुम जल्दी घौर ऐजयां
लोगु तैं सुणाणी छै
जल्दी खाणु पकै द्दयोला
सुज्जी सिवैं बणै द्दयोला
ज्यादा नि करयां तुम रात
मेरु भी ब्रत निर्जला .......

मगु जन्नी घौर आई
कूँणा गाई टुप ठस
द्वी हाथ जोडी बोली
द्वी पैग पेनी बस
आंखी लाल बणीं छै
ब्वारी काल बणीं छै
बोल्दी बोल्दी मार्गी लात
मेरु भी ब्रत निर्जला .......

धौंण पकड़ी मथि ठेली
चाँद ऐगी जल्दी मोर
धुप धुपणी टिक्का टिपणी
गिच्चा मेरा मिठै भोर
पाणी धार चखो जरा
दुनिया तैं भी दिखौ जरा
हैप्पी करवाचौथे रात
मेरु भी ब्रत निर्जला .......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
October 7
ऐ जा ऐ आंसू ऐ

ऐ जा ऐ आंसू ऐ
आँखि भते बोगी जा ये
तू किले रुनु छे यकुली
परेली दगडी भिजी जा ये

ऐ जा ऐ आंसू ऐ
आँखि भते बोगी जा ये

उमली उमल सरै जालु
अपर ये दिन बी कटे जालु
ना हेर ये बाटा ये
क्वी नि आनु ये पाड़ा ये

ऐ जा ऐ आंसू ऐ
आँखि भते बोगी जा ये

भेंटि जा ये ग्लोडी ये
लुनु खारु नि छोड़ि जा ये
बडुळि मा छे ये रेघा ये
सांकि कि तिस बुझै जा ये

ऐ जा ऐ आंसू ऐ
आँखि भते बोगी जा ये

तेरी विपदा ये तिल जाणा ये
तेरी खैरी ई तिल ही खाणा ये
ना कैर ये भीतर भैर ये
आंसूं मेर बोल्यूं माणी जा ये

ऐ जा ऐ आंसू ऐ
आँखि भते बोगी जा ये
तू किले रुनु छे यकुली
परेली दगडी भिजी जा ये

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
October 6
बिरदयू गयुं

हुंयुँ छों तुण्ड बरसाता मा
मि विं बरखा की रात मा
मिली जबेर तेर नशेली नजरि मेर नजरि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

छन कया नशा छै
वीं केशा कि लगुली वे रात कली घटा छे
नि छे वे रात पौड़ी जुन की जुन्याली
विं की मुखडी ही बनिगे पुन्याली
विं पुन्याली देके कि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

दंत पंक्ति की रेघा मा
विं परेली की रेशा मा
कन भाग मेरु अटगि
विं की बिन्दुली मा जै अटकी
विं बिन्दुली देके कि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

मिल बी कै दे सिकेसैरी
विंल जबै मिथे देकि
हैंसि विं ग्लौड़ी देक मेर ग्लौड़ी हैंसि
विं थे देक ना बान बाद मा मेर क्ख क्ख दौड़ी भैंसी
विं हैंसि देके कि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

हुंयुँ छों तुण्ड बरसाता मा
मि विं बरखा की रात मा
मिली जबेर तेर नशेली नजरि मेर नजरि
बिरदयू गयुं
मि बिरदयू गयुं ऊँ अदा बिच बाट मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1
तेर माया मा

तेर माया मा,हैंस ना पाऊं
तेर माया माँ ,रुन नि पाऊं

ये जीकोडी की तेरी दुकदुकी मा
वो तेर परेली छपकेनि मा
पिरित से मेर ते र पिरित जोडना पाऊं

ईं आँखा मा,देका ना पाऊं
ईं गिची दगडी ,बोल ना पाऊं

वो नीलू सरगा ऊ बगदी गद्नि
हैरा भैरा बग्याल ते समन देक ना पाऊं
बौल्या मी तेरु रूपा कु जुनि से चमकी नि पाऊं

ये बाँयां मा पकड़ी नि पाऊं
ते थे य हिरदय अंग्वाल नि ले पाऊं

यकुलु मेरु प्रेम याकलू चली
वे तेर बाट ते मेर बाटा मिलि नि पाऊं
बैठ्युं रुं ते थे हे राम हक़ नि दे पाऊं

तेर माया मा,हैंस ना पाऊं
तेर माया माँ ,रुन नि पाऊं

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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