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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Manoj Bhatt and 134 others
Yesterday ·
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दूर तक विं सड़की का छोर मा

कु हुलु आनु व्हालु
ये दंडी काण्ठियों मा
हेर दी मेरी आंखी हेर दी
दूर तक विं सड़की का छोर मा

हेरी ले दी ईं आंखी दगड्या मेरी
बिजी जाली ये तांसी बी मेरी
सुकी व्है जालु ये परान मेरु
देके जालु क्वी मेरु तेरु आन व्हालु

सरी माया भोरी ले ईं दंडी मा
उजाळु वहैगे अबै ईं कंठी मा
देक मयादार मुखडी कु हेर
छूछा लाटा मेरा अब ना कैर देर

कद्ग दिन बीती गयां
ना पत्री ना क्वी ठौर रैबार अंयां
कन व्हालु कया खाण व्हालु
मेरे पोट्गी लथड़ु वख कन रैण हुलु

कु हुलु आनु व्हालु
ये दंडी काण्ठियों मा
हेर दी मेरी आंखी हेर दी
दूर तक विं सड़की का छोर मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Dhirendra Dhiru Dhapola and 113 others
January 11 ·
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किले मी हुलु बैठी रुनु

अब बी मै मा कया च बांकी
मी नि जण दूं मै कया इन दडयूं
किले लगी हुली बडुळि ईं तांसी
ये जीकोडी किले झुरनी व्हाली
अब बी मै मा कया च बांकी

डाला की छैयां मिली की बी
किले ई सरीर मेरु इन ऊफानु हुलु
कूच इन दडी व्हालु ये बगता ने बी
अब भैर ऐकि ऊ मि थे किले डराणु हुलु
अब बी मै मा कया च बांकी

इन धगुली टूटी इन दगड़यों मेरी
टूटी की वा क्ख्क बोगी ग्याई
अच कल लगणि जन काणी मेरी
इन काणी अब यख कैंकी ना हो
अब बी मै मा कया च बांकी

तपरणु मी यकुलि अपरी अपर मा
अपरी आगी मा मी छों अब जलणु
किले भागी अपरी मुल्क देश छोड़ी
अब पछतैकी किले मी हुलु बैठी रुनु
अब बी मै मा कया च बांकी
.
एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
January 9 ·
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दिन बीती जाला

दिन बीती जाला हो हो
दिन बीती जाला ....... २
ये पहाड़ मा
ये म्यार गढ़वाल मा

बस तेर बाटो हेरी रे
कन तेरी ये देरी हो
ये उमरी भरी की खैरी
कब तक मिल इन सैरी रे

दिन बीती जाला हो हो
दिन बीती जाला ....... २
ये पहाड़ मा
ये म्यार गढ़वाल मा

आषाढ़ की भीगी बरखा रे
पुष्प माघ मोरी जानू जदू हो
चैत की मैना कु उल्यार मा
फागुन फूलों फुल्यार रे

दिन बीती जाला हो हो
दिन बीती जाला ....... २
ये पहाड़ मा
ये म्यार गढ़वाल मा

यख समा सुम वार-पार रे
सास ब्वारी रोजी को टांटा बार हो
हुक्कों की गूंजी गुडगुडहाट मा
नान छोरों को राखलादार मा

दिन बीती जाला हो हो
दिन बीती जाला ....... २
ये पहाड़ मा
ये म्यार गढ़वाल मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
January 8 at 1:32pm ·

दादा बणिक....

सुखद अहसास होणु छ,
पोता देखिक मन,
भारी खुश होणु छ,
जब जब रोणु छ,
खुग्‍लि फर उठैक,
नाती तैं नचाैणु छौं,
बोल्‍दन बल,
पूत सी सूत प्‍यारु होन्‍दु,
सच मा अहसास होणु छ,
सौभाग्‍य मेरु,
दूसरा नौना कू ब्‍यो,
14-15 जनवरी कू होणु छ,
मैं कामना करदु,
यनु सौभाग्‍य दगड़यौं,
जिंदगी मा अापतैं भी मिलु,
मन बुरांस का फूल की तरौं,
आपकी मौळ्यार रुपी,
जिंदगी मा,
दादा बणिक खिलु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
8.1.2015, दोपहर 1.15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
January 8 at 9:59am ·

द्वी दिन की जिंदगी......

सच माणा न माणा,
सच छ दिदौं,
लग्‍दु यनु सच हिछ,
औन्‍दु मनखि जान्‍दु भी,
खौरि का दिन बितौन्‍दु मनखि,
कनि असंद औन्‍दि छ,
या जिंदगी हमारी,
हैंसौन्‍दि रुऔन्‍दि छ.....

हैंसि हैंसि जिंदगी,
अपणि जीवा,
यांहि मा रंगत भारी छ,
सब कुछ हात हमारा दिदौं,
जिंदगी या प्‍यारी हमारी छ.....

तैं बुरांस की जिंदगी देखिक,
सबक हमतैं लिन्‍यु चैन्‍दु,
ऋतु मौळ्यार मा खिल्‍दु बिचारु,
दुख वेका मन मा भी होला,
हैंस्‍दु छ अर हैंसौंन्‍दु......

भला बुरा कू ख्‍याल रखा,
परमपिता कू ध्‍यान करा,
माता पिता गुरु की सेवा,
जौंका आशीर्वाद सी मिल्‍दा,
द्वी दिन की जिंदगी मा हमतैं,
आशीर्वाद रुपी मेवा.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
मेरी कविता का द्वार आपका स्‍वागत मा ऊगाड़ा छन, कविता मेरी छ, यींकु रंग रुप कू आनंद लेवा, कनि लगि मन की बात लिखा, उत्‍साहवर्धन का खातिर।
रचना स्‍वरचित एवं ब्‍लाग पर प्रकाशित
दिनांक 8.1.15 समय 10 बजि सुबेर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
January 7 at 4:28pm ·

फुरर उड़ि जा हे घुघति,
प्‍यारी सुवा का पास,
राजि खुशी छौं कि ना,
लगिं होलि सास....

ऊ जमानु अब बितिगी,
मोबाईल मेरा पास,
घुघति मू रैबार नि देन्‍दु,
होयिं छ ऊदास.....

कब्‍बि सुवा ऊदास रंदि थै,
आज घुघति ऊदास,
कू देलु रैबार वीं मू,
आज लगिं रंदि सास.....

दिन सब्‍यौं का, औन्‍दा जान्‍दा,
यीं धरती मा, सच्‍ची छ या बात,
हे कनु जमानु ऐगि अब,
कंदुड़यौं फर छन हात.......

भुला मनोज रावत (बौल्या) द्वारा लिख्‍यां गढ़वाळि गीत पढ़िक मेरा कविमन मा यनु कबलाट पैदा ह्वै।
7.1.15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
January 7 at 1:49pm ·

लग्‍द बग्‍द लग्‍युं छौं,....

मेरा नौना कू ब्‍यो छ,
कखि सौदा पत्‍ता होणु,
न्‍युतेरु तैं न्‍युतु दियेणु,
हबरि मन मा डौर लगणि,
क्‍वी लंगि संगि छूटि न जौ,
वनत मैंन फेसबुक मा,
कार्ड पोस्‍ट करियालि,
जू प्रेमी औण चालु,
हृदय सी स्‍वागत छ....

मेरु ज्‍यु पराण यनु हिछ,
सोचि ब्‍यो पहाड़ प्रेम मा,
अपणा गौं मुल्‍क मा हो,
मेरु गौं, कुल देव्‍ता,
पित्र देव्‍ता,ग्राम देव्‍ता,
मेरा गौं का मनखि,
सैत भारी खुश होला....

पेणी पाणी कू बंदोबस्‍त,
बल दिदा जरुरी होयुं चैंदु,
खराण्‍यां ह्युंद लग्‍युं छ,
तब त ढ़िक्‍याण की भी,
जरुरत कतै निछ दिदा,
सैडि रात मण्‍डाण लगलु,
नाची नाची रात कटलि,
ढ़ोल दमौं मुस्‍क्‍या बाजु,
वेकु बंदोबस्‍त होयुं छ,
अपणि जिंदगी मा मैं,
बैण्‍ड बाजा कू विरोधी छौं,
वैसी प्‍यारु हमारु,
उत्‍तराखण्‍डी ढ़ोल छ....

कवि छौं लिखि दिनि,
मन मा भौंकुछ न सोच्‍यन,
मन की बात पेट मा,
कतै मेरा पचदि नि,
सोचि मैंन लिखि द्यौं,
किलैकि मेरा नौना कू ब्‍यो छ.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
मेरा कविमन कू कबलाट
7.1.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
January 6 at 4:44pm ·

ह्युंद का दिन लग्‍यां,
हरि बोला जी,
जाडडु भौत होणु छ,
आंखा कंदूड़ खोला जी....

लत्‍ता कपड़ा खूब पैरा,
शरील ढ़कै रखा जी,
चुल्‍ला की आग तापा,
मोटी रजै ओढा जी....

गरम सरम खूब खवा,
थोड़ी थोड़ी पेवा जी,
ढिक्‍याण मुख रखिक,
फंसोरिक सेवा जी....

आलु मौळ्यार जब बौड़ि,
ह्युंद तैं अड़ेथा जी,
हर ऋतु कू अपणु मजा,
भला भाग हमारा जी.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु",
मेरा कविमन कू कबलाट कविता का रुप मा
दिनांक: 6.1.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
January 8 at 1:32pm ·

दादा बणिक....

सुखद अहसास होणु छ,
पोता देखिक मन,
भारी खुश होणु छ,
जब जब रोणु छ,
खुग्‍लि फर उठैक,
नाती तैं नचाैणु छौं,
बोल्‍दन बल,
पूत सी सूत प्‍यारु होन्‍दु,
सच मा अहसास होणु छ,
सौभाग्‍य मेरु,
दूसरा नौना कू ब्‍यो,
14-15 जनवरी कू होणु छ,
मैं कामना करदु,
यनु सौभाग्‍य दगड़यौं,
जिंदगी मा अापतैं भी मिलु,
मन बुरांस का फूल की तरौं,
आपकी मौळ्यार रुपी,
जिंदगी मा,
दादा बणिक खिलु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
8.1.2015, दोपहर 1.15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


सबक हमतैं लिन्‍यु चैन्‍दु,
ऋतु मौळ्यार मा खिल्‍दु बिचारु,
दुख वेका मन मा भी होला,
हैंस्‍दु छ अर हैंसौंन्‍दु......

भला बुरा कू ख्‍याल रखा,
परमपिता कू ध्‍यान करा,
माता पिता गुरु की सेवा,
जौंका आशीर्वाद सी मिल्‍दा,
द्वी दिन की जिंदगी मा हमतैं,
आशीर्वाद रुपी मेवा.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
मेरी कविता का द्वार आपका स्‍वागत मा ऊगाड़ा छन, कविता मेरी छ, यींकु रंग रुप कू आनंद लेवा, कनि लगि मन की बात लिखा, उत्‍साहवर्धन का खातिर।
रचना स्‍वरचित एवं ब्‍लाग पर प्रकाशित
दिनांक 8.1.15 समय 10 बजि सुबेर