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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26, 2014 ·
·

गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की

रडदा मनख्यूं की हेरदा अंन्ख्युं की
हरच दा अपरुँ की डुब दा दाणियों की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

आँखों माया की टक्कों काया की
धैये लगै गिची की बाटा हेटे खुठी की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

बैयठला पहड़ों की न्हना घारों की
बिस्या दा गद्नियुं की उजाडया सारियूं की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

बांदर सुंघरूं की उत्त्पात गुलदारों की
भूकी पोट्गी की हर्ची गे कुछैलि की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

सीं सरकार की बिसरी राजधानी की
वों शहीदों की ये मेरा उत्तराखंड की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

अखरा दा विकासा की टूट दा धागा की
बुज्दा विस्वास की वै आत्म साथा की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

रडदा मनख्यूं की हेरदा अंन्ख्युं की
हरच दा अपरुँ की डुब दा दाणियों की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Bhagwati Prasad Dhyani and Mannu Rawat
December 23, 2014 at 5:44am · Edited ·

खुद लगींच च ये घारा की

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

तिबरी डांड्याला की
चौक छनि ग्वैरा स्यारा की
कन के गुजरी हुलु कन व्हालु वों कु हाल
गुजरी गे व्हालु अब बस्ग्याल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

घुघती घूर घुर वो हिलांस उडी आकास की
काफल किन्गोड़ा चख्या बेडू पाको बारा मासा की
कौथिक कु बारा तिज-तियोहरा की
कैल कैल कै हुलु मी याद
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

चैत की ऐगे छैगे वाह्ली ब्यार
स्वामी आणा वहला सब का छूटी मा घार
फागुन मची वाहली हुलयार
मेर गलुडी थे कु रांगाल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

संभाली नि सैकी मन

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

खोजी खोजी तिले कख मन
कख कख खोजी तिल यख बथा
बथों दगडी कै अकास उडी
कै संगी तिल यख बगत बिता
संभाली नि सैकी मन......

एक दिनी सबल यख यकलु रै जाणा
तिल संभाली , खोजी की कया पान
सपनियु कु ये जग जंजाल मा
रे मन तिल खौलयूं खौलयूं रै जाण
संभाली नि सैकी मन......

हात पकड़ी कु ये मेरु मन
बथा कै बाटा कै उकाल उन्दार हिटान
मोरी जालु कया पालु मेरु मन
अब त अपरा थे तू खुद समजा दे
संभाली नि सैकी मन......

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मिल जबै मीथै खोजी

मिल जबै मीथै खोजी
मी नी मिल मीथैई क्ख्क भी
कै बाटा मी हर्ची गयुं
खवैगे मेर लिखे वा पर्ची
मिल जबै मीथै खोजी .........

रै मी अपरी पास सदनी
अपरा थे भी नि मी जाणा पाई
कमै मिल खुभ ये टक्का
पर वोंको मोल भी नि मी जाणा पाई
मिल जबै मीथै खोजी .........

जीकोडी कण तेर दुकदुकी रे
अपरुँ दगडी भी तू नि रै पाई
रै सदनी ये सरीर भित्रा भितर
एक बेल तू भी कैगे मीथे बिराणि
मिल जबै मीथै खोजी .........

अब मिली त किले मिली मीथै
जब सब ध्यणी व्हैगै हैंक कैकि
जल्म मेरु इनि फुंड तू खती गैई
हाक मारू त मारू अब क्ख्क मी
मिल जबै मीथै खोजी .........

मिल जबै मीथै खोजी
मी नी मिल मीथैई क्ख्क भी
कै बाटा मी हर्ची गयुं
खवैगे मेर लिखे वा पर्ची
मिल जबै मीथै खोजी .........

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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संभाली नि सैकी मन

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

खोजी खोजी तिले कख मन
कख कख खोजी तिल यख बथा
बथों दगडी कै अकास उडी
कै संगी तिल यख बगत बिता
संभाली नि सैकी मन......

एक दिनी सबल यख यकलु रै जाणा
तिल संभाली , खोजी की कया पान
सपनियु कु ये जग जंजाल मा
रे मन तिल खौलयूं खौलयूं रै जाण
संभाली नि सैकी मन......

हात पकड़ी कु ये मेरु मन
बथा कै बाटा कै उकाल उन्दार हिटान
मोरी जालु कया पालु मेरु मन
अब त अपरा थे तू खुद समजा दे
संभाली नि सैकी मन......

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

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हरच दा अपरुँ की डुब दा दाणियों की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

आँखों माया की टक्कों काया की
धैये लगै गिची की बाटा हेटे खुठी की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

बैयठला पहड़ों की न्हना घारों की
बिस्या दा गद्नियुं की उजाडया सारियूं की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

बांदर सुंघरूं की उत्त्पात गुलदारों की
भूकी पोट्गी की हर्ची गे कुछैलि की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

सीं सरकार की बिसरी राजधानी की
वों शहीदों की ये मेरा उत्तराखंड की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

अखरा दा विकासा की टूट दा धागा की
बुज्दा विस्वास की वै आत्म साथा की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

रडदा मनख्यूं की हेरदा अंन्ख्युं की
हरच दा अपरुँ की डुब दा दाणियों की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २


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दिल्ली सैर ऐ तू ना ऐ ना

ऐ जा ऐ भानुमती ऐ
दिल्ली सैर ऐ की घुमी जा ऐ
कनके की लगुलु ते दगड छुईं ऐ
ऐ की ऐ दिल्ली मा मिसी जा ऐ
टैम यख हर्ची रुपया वै खर्ची
तू बी ऐ खर्ची जा ऐ
ऐ जा ऐ भानुमती ऐ
दिल्ली सैर ऐ की घुमी जा ऐ

ना कैर ऐ बात ऐ ये पहाड़ की ऐ
पहाड़ मा क्या अब रैगे या ऐ
ये उन्दरु मन मेरु राम गे ऐ
ये उकलू सोची साँस फूली गे ऐ
तू बी ऐ फूली जा ऐ
ऐ जा ऐ भानुमती ऐ
दिल्ली सैर ऐ की घुमी जा ऐ

ना कैर ना कैर ऐ इनि भैर भितर ऐ
ये पहाड़ निच ऐ ऐ दिल्ली सैर च ऐ
यख निच आजादी दी ऐ अपरा बिचार की ऐ
ऐ खुट अपरा ना ऐ यख भैर धैर ऐ
ना रेगे अब ऐ बैठालूँ को ऐ सैर ऐ
ऐ जा ऐ भानुमती ऐ
दिल्ली सैर ऐ की घुमी जा ऐ

ना ऐ ना ऐ भानुमती ऐ
दिल्ली सैर ऐ तू ना ऐ ना
नि लगुलु ते दगड छुईं ऐ
ऐ दिल्ली मा ना ऐ ना
टैम यख हर्ची रुपया वै खर्ची
तू ना ऐ सब जाला खर्ची ऐ
ना ऐ ना ऐ भानुमती ऐ
दिल्ली सैर ऐ तू ना ऐ ना

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मेरु पहाड़ मेरु संगे

मेरु पहाड़ मेरु संगे
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

कन कांडा पौड़ी यख
तू बी क्ख्क रौडी गे गंगे
यूँ ह्यूं चलूँ थे यकलू
तू बी क्ख्क छोड़ी गे गंगे
अपरू झोळू अपरू संगे
भगा अपरू ना मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

इन जली हम यकुला ही
क्वी हम थे ठंडो करी ना पैई ना
घुम्या दोई यकुलाई ये
अपरा क्वी यख छेई ना
जनी ये घाम जनि छाया
एक साथ जनि कबी ना मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

कन जुनि ये कन जुनि मी
कै बाटा मा हम हिटण ना लग्यां
ना मिली मी ना मिली ये हम थे
जो बाटा कबि हुम्लु थे बनया
क्ख्क बिरदी व्हाली वा माया
ये जिकोडी हम थी मिलली ना
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

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गा कुंगला ही ज्यू होंदा
स्याल भुक्का नी मोरदा
पाड़ मा जीबन
सौगु ही ज्यू होंदु
नौन्याल देस नी पैट दा
ज़मीन की सच जणदा तुम त
सैरा पुंगड़ा डुटयाल नि बसदा
नेतो की सच जांणी की भि
हर बार किल्है ढगदा
भोल की आस मा हम
हर कै पर विस्वास
किल्है कर दा
जुकुड़ी की सच जणदा तुम त
मुखुडी कू रंग देखी नी ढगदा
.
रचना - शैलेन्द्र जोशी
.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुर कंठ मा
संज्या गीत आज
हैप्पी न्यू इयर का
सभि का गौलो पर
दन्कुदु दन्कुदु
खेलदू कुददु ऐगे
बाला कि मुखडी सि
ऐगे नयु बरस
जिकुड़ी मा हर्ष
नया साल मा
कल्पना कि उडान
उड़नि जेट विमान
जनि तेज आज
सुप्न्या का गंतव्य मा
थमली रुक्ली स्या उडान
जन भि होलू नयु साल
लुक्यु ढकायु भवसिया बतालु
फ़िलहाल तुम तै
मुबारक हो नयु साल
नयी बथो सुर सुरि
पुराणी हव्वा फर फर
कुसल मंगल रा सदानी
दग्ड़ीयों तुम तै हैप्पी न्यूइयर
रचना .........शैलेन्द्र जोशी

.