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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 22 at 7:53am ·

संभाली नि सैकी मन

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

खोजी खोजी तिले कख मन
कख कख खोजी तिल यख बथा
बथों दगडी कै अकास उडी
कै संगी तिल यख बगत बिता
संभाली नि सैकी मन......

एक दिनी सबल यख यकलु रै जाणा
तिल संभाली , खोजी की कया पान
सपनियु कु ये जग जंजाल मा
रे मन तिल खौलयूं खौलयूं रै जाण
संभाली नि सैकी मन......

हात पकड़ी कु ये मेरु मन
बथा कै बाटा कै उकाल उन्दार हिटान
मोरी जालु कया पालु मेरु मन
अब त अपरा थे तू खुद समजा दे
संभाली नि सैकी मन......

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 18 at 6:31am ·

आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

बिंगणु नि यख क्वी अपरा गै ई
अपरा गै ई क्ख्क हर्ची रे हर्ची गे ये सारी
सुनदा नि पाणि बिसी गै ई
बिस्दा बिस्दा अपरू की खुद नि बिसी गै ई
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

क्द्गा बी तू बोगी पाणी
क्द्गा बी बोगी पाणी कैल नि सुणु नि सुणु तेरु पाणी
संसार ते थे जपै माया जपै माया संसार ते थे
हात तेरी नि ऐई कुच जपै तिल कया पाई माया संसार से
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 13 at 2:00am · Edited ·

अपरा पाड़ों मा ह्युंद पोड़ी गे होलू

अपरा पाड़ों मा ह्युंद पोड़ी गे होलू
कै कोयेडु कै कुल्हण वो घाम लुकियूं होलू

डंडा धारा घार दार सब गरठियुं होलू
जदु दगडी सबी कु कामकाज थमी होलू

टैम टेबल हर्ची हर्ची सुबेर ब्योखोन होलू
आग तपदा तपदा छूईं मा बेल हर्ची गै होलू

नींदि नि सबी थे अपरू अंग्वाल लेलीं होलू
मेरु पाड़ा सन्कुली निरजक सै गै होलू

अपरा पाड़ों मा ह्युंद पोड़ी गे होलू
कै कोयेडु कै कुल्हण वो घाम लुकियूं होलू

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दूर परदेश में एक बेटा जिसकी माँ पहाड़ में अकेली है उनकी भावनाओं को समेटी हुई ये कविता अव्शय पढ़ियेगा !

गढ़वाली कविता- बैठी छों सारु
रचना- बालकृष्ण डी ध्यानी

हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश
डंडी कंडी छोड़ी की मी बैठ्युँ परदेश
हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश....

हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश
कमरी टूटी मेरी टूटी डाला की देठ
हे बेटा, मेरी लाटू ऐजा ऐ स्वदेश....

कंन कै की ऐनी माँजी
कंन के की ऐनी
अबै त अयुँ मी भैर देश
लागी गई दोई बरसा, वीजा की कैद

हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश
डंडी कंडी छोड़ी की मी बैठ्युं परदेश
हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश....

अन्ख्युंमा आँसू का रेघ बेटा जी
अन्ख्युंमा आँसू का रेघ
ऐंसू का साल पाड़े मा तै बिगर
काफल नी पाकी ई चैता

हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश
कमरी टूटी मेरी टूटी डाला की देठ
हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश....

मी भी यख य्क्लू बैठ्युं चा बोई
मी भी यख य्क्लू बैठ्युं चा
आंदी जांदी बथों दगड़ी
म्याल्दी माया तेर याद आणी चा

हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश
डंडी कंडी छोड़ी की मी बैठ्युं परदेश
हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश....

यकुली ना झुरी बेटा
यकुली ना झुरी
रै वख राजी खुशै खुशैतू परी
अपरी मुल्की अपरी भाई-भैनु थें ना भूली

हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश
कमरी टूटी मेरी डाला की देठ
हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश....

दोई बरसा का बाद ईजा
दोई बरसा का बाद
ऐलु की परती की फिर
अपरू मयदेश अपरू गढ़ देश

हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश
डंडी कंडी छोड़ी की मी बैठ्युं परदेश
हे बोई तू देखी म्यारू गढ़ देश....

बैठी छों सारु बेटा जी
बैठी छों सारु बेटा
कब आला वो दिन
जबै सबै आला परती की अपरा अपरा घार

हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश
कमरी टूटी मेरी टूटी डाला की देठ
हे बेटा, मेरु लाटू ऐजा ऐ स्वदेश....

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 24 at 10:04am

मेंसों हैं कैदियो हामरि तकदीर पर सड़ण छोड़ि दियो
हाम घर बटिक दवाइ ना इजैकि आशीष लिबेर चलनुं
निदिओ हामुकें खुशि रौणकि आशीष तो क्वे बात ना
उसिक लै हाम ख़ुशी धरन न्हें लोगों में बांटी देइ करनुं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Abha Saxena
December 22 at 6:26pm

पहाड़ी के बीच
ऊँचे नीची पहाड़ी पगडंडियों में
बल खाती घुमावदार सड़कों के बीच
दिखती है चाय की दुकान
यह दुकान होती है
छोटे मोटे मकानों में
किसी भी पगडंडी पर
किसी खोखे जैसी दुकान
उस में चाय भी बनती है
आलू प्याज के बनते हैं पकौड़े भी
यहाँ कभी कभी टहलते हुये
होते हैं लोग इकट्ठा
करतें हैं अपने ऊँची चोटी पर बसे गाँव की बातें
इसी बीच इन्हीं दुकानों पर
वे कर लेते हैं अपने बेटे बेटी के रिश्ते भी पक्के
इन लोगों की कमर भी झुक जाती है बोझ उठाये उठाये
सारी चर्चायें होती हैं पर नहीं होती कोई भी चर्चा
खेतों में खपती ठंड में ठिठुरती माँ की
झाइयों से घिरी पत्नी की
बीमार रहते बच्चे की....
पहाड़ का जीवन होता ही है
मुश्किल.......
उसी पहाड़ी के बीच मेरा भी घर है
और है उसमें एक चाय की छोटी सी दुकान......
जिसमें बनते हैं आलू प्याज के पकोड़े भी
आभा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 22 at 8:17am

ना कभ्भें बखत रुकिसकों ना जोर चलों तकदीरों पै
तुमरि याद भौत ऐं जब नजर पड़ें तुमार तस्वीरों पै

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 21 at 8:17am

इज तो खुद स्वरगै कि फूल छू, प्यार करण वीक आपण असूल छू
इजैकि हर प्रार्थना वां मंजूर छू, इजकें नाराज करण हामरि भूल छू

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 20 at 8:48am

फूलोंल तो बणें माउ, और मोतियोंल बणनि हार
जीवन बणों अनमोल जब भाल मिलनि संस्कार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 19 at 8:09am

मंजिल देखि बेर आपणी डरि झन जाया
बाट में औणी परेसानील टुटी झन जाया
जब लै जरुरत पड़ो आपणोँक जिंदगी में
हाम तुमार आपणे भाय भुलि झन जाया