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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Abha Saxena
December 18 at 3:56pm

गढ़वाल के पहाड़ म्यर पहाड़

गढ़वाल के पहाड़ों की खुशबू ही निराली है
इन हसीन वादियों की धुन भी सुहानी है
पहाड़ों का ठंडा पानी मन को अति भाने लगा
कुलथ की दाल मड़ुए की रोटीे
मन को भी लुभाने लगा
नमक और तेल वाला काफ़ल प्यारो लागे
धौत की दाल, और भट की चुड़कानी, भी मन को भावे
मूली में दही भात, भोजन में मजा लागे
बुरांश से आ रही मन्द मन्द हवा भीनी
खेत में गा रहा कोई, बेड़ू पाको बारामासा
कानों में ना जाने क्या कह रही है
देवदारु के जंगल से गुजरती हुई हवा
बसी हुई है पहाड़ों मे शिव की जटाओं से निकली पावन गंगा
प्रतीक है पहाड़ तो सत्य का, पहाड़ तो सत्य है जीवन का
हर हाल में भी हंस हंस कर जीने की कला
ऊँची ऊँची पहाडियाँ सिखातीं हैं
पहाड़ ही से सीखा मैंने जीवन को जीते जाना
पहाड़ से ही सीखा मैंने सुर ताल में गुनगुनाना
मेरे पहाड़ों की खुशबू ही निराली है
इन हसीन वादियों की धुन भी सुहानी है
......आभा.....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 18 at 6:31am ·

आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

बिंगणु नि यख क्वी अपरा गै ई
अपरा गै ई क्ख्क हर्ची रे हर्ची गे ये सारी
सुनदा नि पाणि बिसी गै ई
बिस्दा बिस्दा अपरू की खुद नि बिसी गै ई
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

क्द्गा बी तू बोगी पाणी
क्द्गा बी बोगी पाणी कैल नि सुणु नि सुणु तेरु पाणी
संसार ते थे जपै माया जपै माया संसार ते थे
हात तेरी नि ऐई कुच जपै तिल कया पाई माया संसार से
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 20 at 9:07am ·

मिल जबै मीथै खोजी

मिल जबै मीथै खोजी
मी नी मिल मीथैई क्ख्क भी
कै बाटा मी हर्ची गयुं
खवैगे मेर लिखे वा पर्ची
मिल जबै मीथै खोजी .........

रै मी अपरी पास सदनी
अपरा थे भी नि मी जाणा पाई
कमै मिल खुभ ये टक्का
पर वोंको मोल भी नि मी जाणा पाई
मिल जबै मीथै खोजी .........

जीकोडी कण तेर दुकदुकी रे
अपरुँ दगडी भी तू नि रै पाई
रै सदनी ये सरीर भित्रा भितर
एक बेल तू भी कैगे मीथे बिराणि
मिल जबै मीथै खोजी .........

अब मिली त किले मिली मीथै
जब सब ध्यणी व्हैगै हैंक कैकि
जल्म मेरु इनि फुंड तू खती गैई
हाक मारू त मारू अब क्ख्क मी
मिल जबै मीथै खोजी .........

मिल जबै मीथै खोजी
मी नी मिल मीथैई क्ख्क भी
कै बाटा मी हर्ची गयुं
खवैगे मेर लिखे वा पर्ची
मिल जबै मीथै खोजी .........

एक उत्तराखंडी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 22 at 7:53am ·

संभाली नि सैकी मन

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

खोजी खोजी तिले कख मन
कख कख खोजी तिल यख बथा
बथों दगडी कै अकास उडी
कै संगी तिल यख बगत बिता
संभाली नि सैकी मन......

एक दिनी सबल यख यकलु रै जाणा
तिल संभाली , खोजी की कया पान
सपनियु कु ये जग जंजाल मा
रे मन तिल खौलयूं खौलयूं रै जाण
संभाली नि सैकी मन......

हात पकड़ी कु ये मेरु मन
बथा कै बाटा कै उकाल उन्दार हिटान
मोरी जालु कया पालु मेरु मन
अब त अपरा थे तू खुद समजा दे
संभाली नि सैकी मन......

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 23 at 5:44am · Edited ·

खुद लगींच च ये घारा की

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

तिबरी डांड्याला की
चौक छनि ग्वैरा स्यारा की
कन के गुजरी हुलु कन व्हालु वों कु हाल
गुजरी गे व्हालु अब बस्ग्याल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

घुघती घूर घुर वो हिलांस उडी आकास की
काफल किन्गोड़ा चख्या बेडू पाको बारा मासा की
कौथिक कु बारा तिज-तियोहरा की
कैल कैल कै हुलु मी याद
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

चैत की ऐगे छैगे वाह्ली ब्यार
स्वामी आणा वहला सब का छूटी मा घार
फागुन मची वाहली हुलयार
मेर गलुडी थे कु रांगाल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Vijaya Pant Tuli Mountaineer and 144 others
Yesterday ·
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गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की

रडदा मनख्यूं की हेरदा अंन्ख्युं की
हरच दा अपरुँ की डुब दा दाणियों की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

आँखों माया की टक्कों काया की
धैये लगै गिची की बाटा हेटे खुठी की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

बैयठला पहड़ों की न्हना घारों की
बिस्या दा गद्नियुं की उजाडया सारियूं की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

बांदर सुंघरूं की उत्त्पात गुलदारों की
भूकी पोट्गी की हर्ची गे कुछैलि की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

सीं सरकार की बिसरी राजधानी की
वों शहीदों की ये मेरा उत्तराखंड की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

अखरा दा विकासा की टूट दा धागा की
बुज्दा विस्वास की वै आत्म साथा की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २

रडदा मनख्यूं की हेरदा अंन्ख्युं की
हरच दा अपरुँ की डुब दा दाणियों की
गीत गानू मी ये बाँझ डण्डों की.... २


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi


जगन दी कें यां किड़ पुताव लै के बुझाल
जो मुर्दों कें नि जागोंन ज्योंनों कें जगाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

य बाट का जान्हौल सुरा -सुरा देबी क मंन्दिरा
चमकनी गिलास सुवा रमकनी चहा छु
तेर पति- मेरी प्रीत को डहा छु
य बाट का जान्हौल सुरा -सुरा देबी क मंन्दिरा
जइ फुली चमेली फुली दैणं फुली खेता
त्यर बाटंक चानै चानै उमर कटि मैता
य बाट का जान्हौल सुरा -सुरा देबी क मंन्दिरा
गाड गध्यारा मारा दैत्यपिसाचा लै
मैं य देख दुबय हैग्युंँ त्यर निसास लै
य बाट का जान्हौल सुरा -सुरा देबी क मंन्दिरा
तेरी गाव मुगं की मावा मेरी गावा जंजीरा
तेरी मेरी भेट हौली देबी को मंनदीरा
य बाट का जान्हौल सुरा -सुरा देबी क मंन्दिरा
अस्यारी को रेट सुवा-अस्यारी को रेट
य दिन य मासं आब कभत हौली भेट
य बाट का जान्हौल सुरा -सुरा देबी क मंन्दिरा
शुभ संन्धया प्रिय मित्रजनौ नमस्कार
,आपुण स्वागत छ हो

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 26 at 11:27am ·

खुली किताब छू मेरि जिंदगी कै हैंणी के लुकौण न्हें
पर य ह्यों जौस अरड़ पाणीकें हाथ मील लगौंण न्हें
कैकणी अगर बास ऐं मिपर तो निभैटो म्यार दगाड़
लेकिन यदुग ठण्ड में आई कुछ दिन मील नाण न्हें

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Gyan Pant
32 mins · Edited ·

..... जिम कार्बेट पार्काक् शेर

"च्योडी़ घूघुत " जसि ले
शकल्
और सूरत ' कि कल्पना
कुमांउनी मैयी में है सकैं ।। च्योड़ि -- छिला हुआ

"अन्यार् " मूँख ...
कै को
मूँख ले अन्यार्
है सकौं बल् ।

"निचोड़ि" मूँख ले
है सकौ हाँ
म्योर और
तुमौर् ले !

भाषा ' कि अमीरी देखौ
"थोव "ले
स्याव जास्
है गियीं ! थोव -- होंठ