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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 19 at 5:40pm · Edited ·

गली संगडी अर
मनखी चौडु ह्वेगे
बगत कि दौड़ा दौड़ी मा
दिल छुपियु कुजणी
कै मुसदुला मा
चौड़ी गात
सैनि सक्णी
छोटु दिल कु भार
पिरेम भौ कु
कखी मोल न भोऊ
रयु अज्क्याल
इन्नी छन भैजी सब्भी
मन्ख्यो का हाल
क्या वार क्या पार
रचना .......................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Ratan Singh Aswal
December 20 at 8:57pm

हे मेरि ब्वै... हे मेरि ब्वै,
तू अब बीरणी ब्वै कन हवै,
पैहलि तू इन नि छै॥

तेरू पाणि न सिंचणा का,
न खाणा कू काम अई
हे मेरि ब्वै... हे मेरि ब्वै ॥

तू चल्दी रइ अर अपणा लड़ीक्यूँ की
ज्वानी भि अपणा द्ग्ड्या लीग्ये।
बिरणा करणा छना तेरी छत्ति मा छेद
हे मेरि ब्वै... हे मेरि ब्वै,
तू अब बीरणी ब्वै कन हवै॥

सभि पुरी ब्वाल बुलणा छना कि तू उंकी छें,
अर इक भग्यान त त्यारा मोह मा बूढ़ेन्द दा ज्योगी हवै,
हे मेरि ब्वै... हे मेरि ब्वै,
तू अब बीरणी ब्वै कन हवै॥

चौद्दा साल हवेगिन मितें पर तू मेरा कुछ काम नि अई,
मीं तें पैदा करिकी तू बिरणी किलें हवै।
हे मेरि ब्वै... हे मेरि ब्वै
तू अब बीरणी ब्वै कन हवै॥

सोचि छो कि तेरी ऊर्जा मेरि कुछ काम ऐलि
पर चकड़ेतों न इन भि हवेंन नि द्ये
हे मेरि ब्वै... हे मेरि ब्वै,
तू अब बीरणी ब्वै कन हवै॥

तुमरु अपडु

रतन सिंह आसवाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
November 21 ·

प्रकृति कु बहुत कुछ दियुं हमथेन,
अपणा ही बणी गेनी मेरा बिराणा,
सहेज नि साकु त क्या कन तब,
पुरखों की धरती बगणीच आज,
ज्वानि,जवानी भगणीच आज,
सहेज नि साकु त क्या कन तब,
रुन्दु नवालु धै लगान्दु तुम्हारी धरती सुखणीच आज।
"मैती"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
October 26 ·

उतलु पुतलु
(गढ़वाली लोरी )

उतलु पुतलु , भलु गिचलू
चुप ह्व़े जालू म्यार थुपलु
आ बिरळी आ बिरळी
म्यार थुपलु की गिची काट
चुप ह्व़े जादी , कुतु पुतलु
भलु च म्यार छ्वटु बुबुलू
आ रे मुसा आ रे मुसा
म्यरा चुन्च्लू की खुट्टी काट
आ रे कवा आ रे कवा
म्यारा कुतुलू कू चुप्पा छांट
चुचुलू मुतुलू कूँता कुंतुलू
चुप ह्व़े जालू म्यरा बछरू

Utlu, putlu, bhalu gichlu
Chup hwe jalu myaro thuplu
Aa birali , a birali
Myra thuplu k gich chaat
Bhalu ch myar , chhwatu babulu
Aa re musa aa re musaa
Myar chunchulu k khut kat
Aa re kauva aa re kauva
Myar kutlu k chuppa chant
Chuchlu mutlu koonta kuntalu
Chup hwe jalo myar बछरू

Translation
Utlu, Putlu, kind Gichlu
Will be calm, my Thuplu
Come on cat, Come on cat
To lick mouth of my Chunchulu
Rat! Come on, come on rat
To bite foot of my Chunchulu
Come on crow come on crow
To fasten hair of my Kuntalu
Utlu, Putlu, kind Gichlu
Will be calm, my Thuplu
The above lullaby has many proper nouns of no meanings. The lullaby has many words and vowels which are repeated many times. The main aim of various no-meaningful words is to make the poem lyrical and for soothing effects. The pets and common bird crow are used as objects for making poem simple and understandable. The poem is very figurative

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
September 8 ·

इस कविता के कम से कम तीन अर्थ निकलते हैं
चुनै र् वटि
-महाकवि : कन्हैयालाल डंडरियाल
मि छौं चुनै र् वटि
म्यार द्वी हैड़
इन तपैदिन तक़दीरन कि
मि कड़कड़ि ह्वे ग्यों
उल्टां सुल्टाँ यकसानि रै ग्यों।
मर्चुं कि फ़ोळि अर लुणै गारि
जीजा अर दीदी
लगद जन मैत्या पौणो सि
कबि कब्यार भ्यलि डैळि
मि अर तु
हौरि क्वी ना
किलैकि तु पिघळि जान्दि
मी देखी मेरी खैरी सूणि
तू त छे मेरि
त्वे दगड़ मि कनि भलि लगदु य नौणी गुंदकी।
य भौत मताळ ग्यूं कि फुलकी
यूंकि खट्याण बिगर बातै तिड़याँण
यी त छन म्यरा द्यूर अर द्यूराण
xx
हाँ झुंगरु चैल सकद
उन त वैकि अर मेरी
हार सार अलग
चौ चलण अलग
वेक अर म्यार क्य दगुड़
उत सिरफ़ बुन बच्याणौ
खैरि खुदि की छ्वीं लगाणी

यीं दिल्लीम मीतैं

आया गायों कि नजर से बचौंदन
इनै उनै लुकांदन
गैसम हीटरम पकौन्दन
यूँ हलुळ जैगी जैगी ह्वे ग्यों
भैर काळी अर भितर आली काची
मितैं मुंगर्युं खुद लगद
मूळै भटुळि लगदिन
दाळ , गैथ भट याद अंदिन
xx
सचे तुम घौर जैल्या त
मरसुम मेरी स्यवा बोलि दियां
हळया गुयरुं घसेर्युं लखड़ेल्यूं
कि भुकी पे दियां
कन रैंदु छा मि कबि
उंक हतु हतुम नचणु।
xx
ह्यरां यख त द्यूराण
इन बणी रैंद जन फकर्याण
डाँड्यूं मs कन मिल्दि छै मी दगड़ि छप्प
हम ह्वे जांद छा ढबड़ि रोट
यख त चौकम चुल्लम मेजुम प्लेटुम
बिराजणा छन
म्यारा द्यूर अर द्यूराण।
सचे बतौं मि तैं यीं दिल्ली से
पौड़ी गे बिखळाण
Copyright@ H.K Dandriyal, Delhi

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
August 21 ·

कृष्ण जन्म कथा जागर लोकनृत्य -गीत की संगीत स्वर लिपि

गढ़वाली लोक नृत्यगीत- संगीत (गढ़वाली लोक नाटकों ) में शास्त्रीय संगीत स्वर लिपि, ताल, राग रागिनी- 35

जमुना पार होलू कंसु को कंसकोट
जमुना पार होलू गोकुल बैराट
कंसकोट होलू राजा उग्रसेन
तौंकी राणी होली राणी पवनरेखा
बांयीं कोखी पैदा पापी हरिणा कंश
दांयी कोखी पैदा देवतुली देवकी
ओ मदु बामण लगन भेददा
आठों गर्भ को होलू कंसु को छेदक
हो बासुदेव को जायो प्रभो , जसोदा को बोलो
देवकी नंदन प्रभो , द्वारिका नरेश
भूपति-भूपाल प्रभो , नौछमी नारेणा
भगत वत्सल प्रभो , कृष्ण भगवान्
हो परगट ह्व़े जाण प्रभो, मृत्यु लोक मांज
घर मेरा भगवान अब , धर्म को अवतार
सी ल़ोल़ा कंसन व्हेने , मारी अत्याचारी
तै पापी कंसु को प्रभो कर छत्यानाश
हो देवकी माता का तैंन सात गर्भ ढेने
अष्टम गर्भ को दें , क्या जाल रचीने
अब लगी देबकी तैं फिलो दूजो मॉस
तौं पापी कंस को प्रभो, खुब्सात मची गे
हो क्वी विचार कौरो चुचां , क्वी ब्यूँत बथाओ
जै बुधि ईं देवकी को गर्भ गिरी आज
सौ मण ताम्बा की तौन गागर बणाई
नौ मण शीसा को बणेइ गागर की ड्युलो
हो अब जान्दो देवकी जमुना को छाल
मुंड मा शीसा को ड्युलो अर तामे की गागर
रुँदैड़ा लगान्द पौंछे , जमुना का छाल
जसोदा न सुणीयाले देवकी को रोणो
हो कू छयी क्या छई , जमुना को रुन्देड
केकु रूणी छई चूची , जमुना की पन्दयारी
मैं छौं हे दीदी , अभागी देवकी
मेरा अष्टम गर्भ को अब होंदो खेवापार
हो वल्या छाल देवकी , पल्या छाल जसोदा
द्वी बैणियूँ रोणोन जमुना गूजीगे
मथुरा गोकुल मा किब्लाट पोड़ी गे
तौं पापी कंस को प्रभो , च्याळआ पोड़ी गे
हो अब ह्वेगे कंस खूंण अब अष्टम गर्भ तैयार
अष्टम गर्भ होलो कंस को विणास
अब लगी देवकी तैं तीजो चौथो मॉस
सगर बगर ह्व़े गे तौं पापी कंस को
हो त्रिभुवन प्रभो मेरा तिरलोकी नारेण
गर्भ का भीतर बिटेन धावडी लगौन्द
हे - माता मातेस्वरी जल भोरी लेदी
तेरी गागर बणे द्योलू फूल का समान
हो देवकी माता न अब शारो बांधे याले
जमुना का जल माथ गागर धौरयाले
सरी जमुना ऐगे प्रभो गागर का पेट
गागर उठी गे प्रभो , बीच स्युन्दी माथ
हो पौंची गे देवकी कंसु का दरबार
अब बिसाई देवा भैजी पाणी को गागर
जौन त्वेमा उठै होला उंई बिसाई द्योला
गागर बिसांद दें कंस बौगी गेन
अब लगे देवकी तैं पांचो छठो मास
तौं पापी कंस को हाय टापि मचीगे
हो- अब लागी गे देवकी तैं सतों आठों मॉस
भूक तीस बंद ह्व़े गे तौं पापी कंस की
हो उनि सौंण की स्वाति , उनि भादों की राती
अब लगे देवकी तैं नवों-दसों मास
नेडू धोरा ऐगे बाला , तेरा जनम को बगत
अब कन कंसु न तेरो जिन्दगी को ग्यान
हो! पापी कंस न प्रभो , इं ब्युन्त सोच्याले
देवकी बासुदेव तौंन जेल मा धौरेन
हाथुं मा हथकड़ी लेने , पैरूँ लेने बेडी
जेल का फाटक पर संतरी लगे देने
हो उनि भादों को मैना उनि अँधेरी रात
बिजली की कडक भैर बरखा का थीड़ा
अब ह्वेगे मेरा प्रभो ठीक अद्धा रात
हो , हाथुं की हथकड़ी टूटी , टूटी पैरों की बेडी
जेल का फाटक खुले धरती कांपी गे
अष्टम गर्भ ह्व़ेगी कंस को काल
जन्मी गे भगवान् प्रभो , कंसु की छेदनी

संपूर्ण पूर्ण सप्तकी

ढोल -दमाऊ के बोल - झे ग तु । झे झे इ । झे ग तु । झे झे इ

स्थायी चरण -
ध ध ध । सा - सा । रे म प । म रे म
ज मु ना । पा s र । हो s लू । s कं s
म प - । रे - धसा । रे - - । रे सा ध
सु को s । कं s स । को s s । ट s s

सा ध ध । सा - सा । रे म प । म रे म
ज मु ना । पा s र । हो s लू । s कं s
म प - । रे - सा । घरे@ - - । रे - -
सु को s । कं s स । को s s । ट s s

अंतरा -
ध ध ध । सां - सां । रें - सां । - सां ध
ज मु ना । पा s र । हो s लू । s गो s
सां सां - । सां धप@ मरे@ । म - प । मरे@ साध @ रेसा @

कु ल s ।बै s s । रा s ट । s ss s
ध ध ध । सा - सा । रे म प । म रे म
ज मु ना । पा s र । हो s लू । s गो s
म प - । रे - सा । घरे@ - - । रे - -
कु ल s ।बै s s । रा s ट । s s s
इसी तरह सभी चरणो की प्रथम पंक्ति स्थाई और द्वितीय पंक्ति अंतरा में गायी जायेंगी।
ध - इस सारे गीत ध# है

s =आधी अ

@ - नीचे अर्धचन्द्राकार चिन्ह

# चिन्ह नीचे बिंदी का है जैसे फ़ारसी शब्दोँ में लगता हैं

मूल संगीत लिपि -केशव अनुरागी , नाद नंदनी (अप्रकाशित )
संदर्भ - डा शिवा नंद नौटियाल , गढ़वाल के लोकनृत्य गीत
इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
July 28 ·

गो माता, बैल अर सांड
पहाड़ का कस्बों की पहचान
अर हमारा पाखण्ड का स्पष्ट हस्ताक्षर
आप कुछ भी ब्वाला
यु ठीक नि हुणु च

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 23 at 7:18am ·

मेंसों हैं कैदियो हामरि तकदीर पर सड़ण छोड़ि दियो
हाम घर बटिक दवाइ ना इजैकि आशीष लिबेर चलनुं
निदिओ हामुकें खुशि रौणकि आशीष तो क्वे बात ना
उसिक लै हाम ख़ुशी धरन न्हें लोगों में बांटी देइ करनुं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 21 at 7:18pm ·

ना कभ्भें बखत रुकिसकों ना जोर चलों तकदीरों पै
तुमरि याद भौत ऐं जब नजर पड़ें तुमार तस्वीरों पै

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

तिबरी डांड्याला की
चौक छनि ग्वैरा स्यारा की
कन के गुजरी हुलु कन व्हालु वों कु हाल
गुजरी गे व्हालु अब बस्ग्याल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

घुघती घूर घुर वो हिलांस उडी आकास की
काफल किन्गोड़ा चख्या बेडू पाको बारा मासा की
कौथिक कु बारा तिज-तियोहरा की
कैल कैल कै हुलु मी याद
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

चैत की ऐगे छैगे वाह्ली ब्यार
स्वामी आणा वहला सब का छूटी मा घार
फागुन मची वाहली हुलयार
मेर गलुडी थे कु रांगाल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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