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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 8 at 7:21am

कै कै लीजि ज्योंन रौण पड़ों
तो कै कै लीजि मरण लै पड़ों
मन नी लै करनौ तो के करू
दोस्तों ख़ुशी में हसण लै पड़ों

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 9 · Edited
जब से देखी तेरी मुखडी

जब से देखी तेरी मुखडी
मा वा जून की जुन्याली
अंधारू उजाळु व्है जांदी
जब वा आपरी नजरि मिलांदी
जब से देखी तेरी मुखडी

माया इनि लगोंदी छुची
आँखों दगडी वा इनि ब्चांदी
दन्त पंक्ति हैंसी देख्दा देख्दा
विं ग्लोडी ये दिल लुची जांदी
जब से देखी तेरी मुखडी

बांदों मा की बांद छे या
सरगा बाटू ऐ क्वी तू अछेरी
मी बना दे अपरू जीतू बग्वाल
मेर बांसुरी व्हैगे अब से तेरी
जब से देखी तेरी मुखडी

क्या क्या जतन करू मी
कण कणके ते थे मी मनेऊ
कब तेरी मया व्हाली मेरी
दिन राती तेरा सुप्निया सजेऊँ
जब से देखी तेरी मुखडी

जब से देखी तेरी मुखडी
मा वा जून की जुन्याली
अंधारू उजाळु व्है जांदी
जब वा आपरी नजरि मिलांदी
जब से देखी तेरी मुखडी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
1 hr ·

आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

बिंगणु नि यख क्वी अपरा गै ई
अपरा गै ई क्ख्क हर्ची रे हर्ची गे ये सारी
सुनदा नि पाणि बिसी गै ई
बिस्दा बिस्दा अपरू की खुद नि बिसी गै ई
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

क्द्गा बी तू बोगी पाणी
क्द्गा बी बोगी पाणी कैल नि सुणु नि सुणु तेरु पाणी
संसार ते थे जपै माया जपै माया संसार ते थे
हात तेरी नि ऐई कुच जपै तिल कया पाई माया संसार से
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 13 · Edited
अपरा पाड़ों मा ह्युंद पोड़ी गे होलू

अपरा पाड़ों मा ह्युंद पोड़ी गे होलू
कै कोयेडु कै कुल्हण वो घाम लुकियूं होलू

डंडा धारा घार दार सब गरठियुं होलू
जदु दगडी सबी कु कामकाज थमी होलू

टैम टेबल हर्ची हर्ची सुबेर ब्योखोन होलू
आग तपदा तपदा छूईं मा बेल हर्ची गै होलू

नींदि नि सबी थे अपरू अंग्वाल लेलीं होलू
मेरु पाड़ा सन्कुली निरजक सै गै होलू

अपरा पाड़ों मा ह्युंद पोड़ी गे होलू
कै कोयेडु कै कुल्हण वो घाम लुकियूं होलू

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
2 hrs ·

आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

बिंगणु नि यख क्वी अपरा गै ई
अपरा गै ई क्ख्क हर्ची रे हर्ची गे ये सारी
सुनदा नि पाणि बिसी गै ई
बिस्दा बिस्दा अपरू की खुद नि बिसी गै ई
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

क्द्गा बी तू बोगी पाणी
क्द्गा बी बोगी पाणी कैल नि सुणु नि सुणु तेरु पाणी
संसार ते थे जपै माया जपै माया संसार ते थे
हात तेरी नि ऐई कुच जपै तिल कया पाई माया संसार से
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
35 mins · Edited ·


हमारा पहाड़ मा......

ह्युं पड़युं छ,
देवभूमि कू,
श्रृंगार करयुं छ,
याद औणि होलि,
प्‍यारा भै बंधु,
पराण सी प्‍यारा,
वे पहाड़ की......

मनखि तैं,
अपणा मुल्‍कै की याद,
ह्रयुंद, मौळ्यार, बसगाळ,
जब औन्‍दा अपणा मुल्‍क,
तब तब औन्‍दि,
मन मा कुत्‍गयाळि लगौन्‍दि,
जख भी रवा, याद करा,
यथगा हि भौत छ,
ज्‍यु पराण हमारु,
बस्‍युं चैन्‍दु,
हमारा पहाड़ मा......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
मेरी कविता का द्वार आपका खातिर उगाड़ा छन,
अपणा घौर कतै नि ल्‍हिजैन, ख्‍याल रख्‍यन या कविता मेरी छ।
बोला त सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु

मन मा भारी सेळि पड़ी,
मिल्‍यन जब कविमित्र प्‍यारा,
मैकु खुशी ह्वै अति भारी,
मेरा आंखौं का छन तारा.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 12 at 4:15pm ·

बस....

अब नि चैन्‍दु,
भौत ह्वैगि,
यनु बोल्‍दा छन,
मेरा मुल्‍क का मनखि,....

मेरु ध्‍यान कुछ,
मंजिल तक,
पौंछौण वाळी,
बस फर भी जाणु छ,
बिचारि रोज अटकदि रंदिन,
सब्‍यौं की आंखी,
लगि रंदिन,
कब आलि,
यथगा जग्‍वाळ,
जीवन साथी की,
कब्‍बि नि करदु मनखि....

देख्‍दु छौं दिल्‍ली मा,
ड्यूटी भी जांदु बस सी,
भीड़ यथगा रंदि,
जेब कतरौं की मौज,
बिना बोतळ कू जाम,
बिचारि बस तैं,
अग्‍वाड़ि नि जाण देन्‍दु,
सवारी मन मा,
कळसेणि रंदिन,
देर ह्वैगि आज.....

बस की व्‍यथा,
बोल्‍दि छ बिचारि,
अपणु घौर भलु होन्‍दु,
किलै दर दर की,
ठोकर खांदु,
बिचारि बस का भाग मा,
दनकणु हि लिख्‍युं छ,
हमारी व्‍यथा भी,
वीं जनि छ,
कख थौ अपणु मुल्‍क,
कख डबखणा छौं,
आई हम,
बस मा बैठिक हि था,
देश परदेश.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
मेरी कविता का द्वार आपका खातिर उगाड़ा छन,
अपणा घौर कतै नि ल्‍हिजैन, ख्‍याल रख्‍यन या कविता मेरी छ।
बोला त सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक: 12.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 12 at 4:15pm ·

बस....

अब नि चैन्‍दु,
भौत ह्वैगि,
यनु बोल्‍दा छन,
मेरा मुल्‍क का मनखि,....

मेरु ध्‍यान कुछ,
मंजिल तक,
पौंछौण वाळी,
बस फर भी जाणु छ,
बिचारि रोज अटकदि रंदिन,
सब्‍यौं की आंखी,
लगि रंदिन,
कब आलि,
यथगा जग्‍वाळ,
जीवन साथी की,
कब्‍बि नि करदु मनखि....

देख्‍दु छौं दिल्‍ली मा,
ड्यूटी भी जांदु बस सी,
भीड़ यथगा रंदि,
जेब कतरौं की मौज,
बिना बोतळ कू जाम,
बिचारि बस तैं,
अग्‍वाड़ि नि जाण देन्‍दु,
सवारी मन मा,
कळसेणि रंदिन,
देर ह्वैगि आज.....

बस की व्‍यथा,
बोल्‍दि छ बिचारि,
अपणु घौर भलु होन्‍दु,
किलै दर दर की,
ठोकर खांदु,
बिचारि बस का भाग मा,
दनकणु हि लिख्‍युं छ,
हमारी व्‍यथा भी,
वीं जनि छ,
कख थौ अपणु मुल्‍क,
कख डबखणा छौं,
आई हम,
बस मा बैठिक हि था,
देश परदेश.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
मेरी कविता का द्वार आपका खातिर उगाड़ा छन,
अपणा घौर कतै नि ल्‍हिजैन, ख्‍याल रख्‍यन या कविता मेरी छ।
बोला त सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक: 12.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 1 at 12:14pm ·

प्‍यारा दगड़्यौं.....

कुलदेवी माँ चन्‍द्रबदनी की,
अषीम कृपा सी,
आपकी दुआ सी मैं,
30 नवम्‍बर, 2014 कू,
प्रिय नाती का,
जल्‍म लेण का कारण,
दादा बणिग्‍यौं,
बोला त बुढ़या ह्वैग्‍यौं,
जन कि लाेग बोल्‍दा छन,
भारी खुश होयुं छ,
यू मेरु कविमन,
खुशी कू रैबार अपणु,
आप सब्‍यौं तक,
पौंछौणु छौं,
प्‍यारा दगड़्यौं.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु",
दिनांक: 01.12.2014