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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 तेरा गौं कू नौं.....

क्‍या छ भुला अर कख छ भुला,
झट्ट बतौं तू मेरा सौं,
टिहरी जिल्‍ला मा छ मेरु,
पराण सी प्‍यारु बागी नौसा गौं....


मैं भी पहाड़ कू मनखि छौं,
जख छन हिंवाळि डांडी कांठी,
मनख्‍यौं मा भारी  प्रेम जख,
तिल की दाणी भी खांदा बांटी...

भुला बतौणु सुणा हे भैजि,
खासपट्टी की एक उंचि धार मा,
पराण सी प्‍यारु  मेरु गौं,
सुबेर उठि चंद्रबदनी मंदिर दिखेन्‍दु,
सच बोन्‍नु छाैं मेरा सौं.....

पछाण्‍ना निछन भैजि तुम,
तुमारी हि जाति कू छौं मैं,
मेरु प्‍यारु गौं छ पबेला,
भारी खुशी होलि मैकु,
जू आप मेरा गौं ऐल्‍या......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
स्‍वरचित कविता एवं सर्वाधिकार सुरक्षित
,
दिनांक: 13.11.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 क्‍यौकु लग्‍यां छैं.....

हे लग्‍द बग्‍द,
कुछ त सोचा मन मा,
कैकु तुम भलु भि करा,
ये मनखि जन्‍म मा....
धौंकरा फौंकरी जैका खातिर,
हात कू मैल छ यू पैंसा,
क्‍यौकु पड़़्यां घंघतोळ मा,
दिन मा द्वी घड़ी हैंसा....
माटा कू बण्‍युं छ मनखि,
मन मा केकु घमंड,
दुर्दिन औन्‍दा जब छन,
ह्वै जांदु मनखि झंड.....
कवि "जिज्ञासु" की बात हेजि,
समझ मा क्‍या औणि,
या जिन्‍दगी मनखि तैं,
दिन रात रुवौणि....
क्‍यौकु लग्‍यां छैं,
हे लग्‍द बग्‍द,
मन मा होयुं अभिमान,
जै दिन जैल्‍या,
कफन हि मिललु,
क्‍यौकु जोड़ना छैं,
सौ घड़ी कू सामान.....
-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
16.10.2014, सर्वाधिकार सुरक्षित
पढें और अहसास करें।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 दादा अर नाती...

हात मा ह्वक्‍का धरयुं दादा कू,
खुग्‍लि फर बैठ्युं नाती,
साज वैन भ्‍वीं धोळ्यालि,
नाती छ भारी उत्‍पाती....

बोडाजिन झटट साज उठैक,
नाती की मुंडळी फलोसी,
तेरु दोष क्‍या छ रे नाती,
मैं ही छौं भारी दोषी...

खित खित हैंसणु नाती अफुमा,
हबरि कौंताळ मचौणु,
प्रिय नाती का पुळ्याट मा,
दादा खुश छ होणु.....

याद करा ऊ दिन आप भी,
जू दादा जी दगड़ि  बितैन,
दादा जी आज स्‍वर्गवासी,
अहा! कख ऊ दिन गैन....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
स्वरचित कविता, सर्वाधिकार सुरक्षित,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 मधुर मिलन हमारु...

    मधुर मिलन हमारु...
    समीर भैजिन,
    हमतैं नौएडा बुलाई,
    "विद्रोही" जी सी,...
    मुलाकात कराई,
    "आजाद" भैजिन,
    जू आजाद निथा,
    अपणु अमूल्‍य समय,
    हमारा खातिर,
    जुगाड़ करिक,
    एक मुलकात करि,
    मन सी खुश ह्वैन भारी,
    रै होलि किस्‍मत हमारी,
    अतं मा मिल्‍यन,
    मित्र पंचम सिंह कठैत जी,
    अर प्रिय कवि "फरियादि",
    चर्चा ह्वै पहाड़ फर,
    कनुकै गौं बसला,
    हमारा पहाड़ का,
    किलै होणी बरबादी.....
    -जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
    द्वी अगस्‍त-2014 कू हमारी नौएडा मा एक यादगार मुलकात ह्वै।
    समय बलवान होंदु, छंद हि यनु ऐगि वे दिन।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi


दोस्ती उकें मिलें जैक तकदीर हैं
भौत कम हाथों में यसि लकीर हैं
कभ्भें नाराज निहवो दोस्त कै-कै
भगवान कसम भौत तकलीफ हैं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
December 1 at 7:15pm ·

कुछ पाड़ेंकि चाहत में भौत कुछ छुटि जां
के जाड़ियों सबरौक धाग कत्ति टुटि जां ।
कैहैं दगड़ी कौंछा यांतो आपण स्योव लै
कत्ति कें दगाड़ हिटो कत्ति कें छुटि जां ॥

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिंदगी में अघिल जाण भौत जरुरी छु.....
पर तदु अघिल झन न्है जाया कि अपुण लोग पछिन छुटि जाओ.....
और मलाल है जाओ कि "म्यर गौं, म्यर देश अब म्यर न्है......"
"य पहाड़ अब पैली जै नि रैगोय" तस नि कया....
कदुकै दूर न्है जाओ, पहाड़ कै भेटने रया....
क्वी मिलो पछाणो नि पछाणो तुमुकैं....य पहाड़ पछाण
ल्यौल.....
याँ तो आज लै बेडु पाकनि.....
डाना में मुरुली बाजें.....सिल पिस बे भात खानि....
इष्ट पुजी जानि.....हिस्याव, किलमोड़ी बोट
जामनी.....
हरयाव काटि जाँ......घुघुत उड़ाइ जानी......
स्यार में गीत लागनी......होई में हुडुक बाजुँ.....
ह्यूँ, डाव, द्यो लागूँ......और कुनी_
"फूल देई छमा देई, जदुकै दी छै उदुकै सही...."
पहाड़ तुमुहै कुणौ, कि तुम कैं जाओ, मिकैं झन भुलिया..
अपना उत्तराखंड...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पावन मेरो उत्तराखण्ड गढ़भूमि मेरो गढ़देश पावन मेरो उत्तराखण्ड।
सौ बार मिलु जन्म ये भूमि म ये च आखिरी ख्वेश।

पावन मेरा उत्तराखण्ड गढ़भूमि मेरा गढ़देश
पावन मेरा उत्तराखण्ड।
सौ बार मिले मुझे जन्म इस गढ़भूमि में यही आखिरी ख्वाइश है मेरी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
November 20 at 3:19pm · Edited ·

नेगी दा के बोल लगता है जैसे व्यंगकार परसाई को समझा रहे हो ऐसा नहीं है भैया

अज्यु बि तू रूप रंग कि खाण छाई
मै कुथै सदानी तू नयी नवांण रयी
तेरी ज्वनि से उम्र हारी गै
सदानी तेरी माया को मतवालू रयु
पयार छक्वे छकि कि बि मि तिस्यालू रयु
ओहो धारी गै जून मेरी डंडयाली धारी गै
ओहो तेरी करारी नजर मारी गै

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता----------------- शैलेन्द्र जोशी
भै नरु
हरु करियु भारु करियु त्वेन गढ़ गीतों तय भै नरु
हे त्वे जनि गितैर नि ह्वे सक दू फेर
गढ़ कवी गढ़ रफ़ी गढ़ कविन्द्र हे नरेन्द्र सिंह नेगी
सब्दो कु कोठार चा गढ़वाली भासा खुनी मौलियार चा
भै नेगी महान छाया गढ़ गीतों की जान छ्या
गीतों की गंगा सदनी तयरा मुख बीटी बग दी
हैसदी हैसदी गा दी गीत मुड मा टोपला हाथ मा बाज़ा
बहुत स्वाणु लग दू जब गांदी जब कुई पहाड़ी गाना
जब तू ढौल मा ऐकी ढौलैर हुवीकी
यु गीतों की छालार बैकी डैरो डैरो पौंच जादी
उत्तराखंड की समस्या मा रचय बस्य तयारा गीत
त्यरा नयु कैसीट जब बाज़ार मा अन्दु ता धरा धडी बिक जादू
त्यरा नया गीतों की जग्वाल मा लूग रैदन
जनि गीत बाज़ार मा अदन ता समलोणीया ह्वे जादन
कालजय गीतों कु रचनाकार गढ़वाली गीतों कु सिंगार
मखमली भोंन कु जादूगर भै नेगी
हिवाले संसकिरती तय हिवाला ऊँचे देंन वाला अपणु तोर कु कलाकार
गढ़ गीतों कु हीरा भी तू छे नवरतन छे तू गढ़ कु गढ़ रतन छे तू
बात बोदू गढ़ की मन की गढ़ गौरव छे तू
नौसुरिया मुरली जनि सुरीली गौली छा तेरी
गंगा जनि शीतलता चा तेरा गीतों मा
मायालु गीत तेरा मायालु भोंण चा
गीतों कु बाट की लेंन पकड़ी की गीतों का बटोई बणी की
गीतों का बाट ही बणी ग्या
ये मुलुक का सुर सम्राट बनी ग्या
गीतों कु पियूष जुगराज रया सदनी संसकिरती पुरुष