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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वेकि मति मरि...

जब थोरड़िन मुक्‍क कोचि,
परेड़ा पेट चौक मा,
खैंचि खैंचि भैर नि आई,
थोरड़ि कू मुक्‍क,
काटी दिनि धौण वींकी,
फिर भी भैर नि आई,
अब क्‍या होलु, सोचि वेन,
बल परेड़ु फोड़ा अब,
होण क्‍या थौ वनि करि,
परेड़ु फूटि थोरड़ि मरि,
वेकि कनि मति मरि,
वे अजाण निर्बुद्धान,
कुछ सोचि बिचारि नि...

यनु होण का बाद,
गोसीणन बोलि,
"आज जेठा जी नि होन्दा त,
कुजाणि क्‍या होन्‍दु थौ".....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
स्‍वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक: 17.11.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा लाल.....

उत्‍तराखण्‍ड की,
धरती बोन्‍नि छ,
ह्वैग्‍यन मेरा कुहाल,
नि लेन्‍दा जल्‍म तुम,
मेरी सजीली गोद मा,
नि होन्‍दा मेरा यना हाल,
निराशेक बणि छ बिकराळ,
बांदर सुगंर कन्‍ना छन राज,
बांजी पुंगड़ि टूट्यां कूड़ा,
यू हि रैग्‍यन अब यख,
बंजेणु छ कुमाऊं गढ़वाळ,
कुछ त सोचा,
हे मेरा लाल.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
रचना स्‍वरचित एवं ब्‍लाग पर प्रकाशित
दिनांक 11.11.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
November 24
नाज पाणी कुछ नि दीदा सब बान्दरोंन,सुंगरोंन खयाली,
आप ऐला मुलाकात हेजाली हमर भाग खुलजाली,
रुन्दु बिलांदु उत्तराखंड की या दशा दगड़ा दगड दिखे जाली।
केशव डोबरियाल "मैती"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
November 21
प्रकृति कु बहुत कुछ दियुं हमथेन,
अपणा ही बणी गेनी मेरा बिराणा,
सहेज नि साकु त क्या कन तब,
पुरखों की धरती बगणीच आज,
ज्वानि,जवानी भगणीच आज,
सहेज नि साकु त क्या कन तब,
रुन्दु नवालु धै लगान्दु तुम्हारी धरती सुखणीच आज।
"मैती"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
November 24
नाज पाणी कुछ नि दीदा सब बान्दरोंन,सुंगरोंन खयाली,
आप ऐला मुलाकात हेजाली हमर भाग खुलजाली,
रुन्दु बिलांदु उत्तराखंड की या दशा दगड़ा दगड दिखे जाली।
केशव डोबरियाल "मैती"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
9 hrs

मि मौसम न्हें जो पलभरि में बदइ जौंल
जमीन है बेर लै दूर कें और निकइ जौंल
मि पुराण सिक्क छों कें खेड़ी झन दिया
नाक दिनोंमें सायद मि तुमार काम औंल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi

घाम में रिक्शा चलै बेर कमाई कुछ डबलोंल उ
उच्च शिक्षा पड़नी च्याला लिजी घ्यू मोल ल्हों
नानतीनां कें नि तरसण दी जैल लुकुड़ों लिजी
आपण फाटि हुइ सुर्याव कें चुप-चाप सिणी ल्हों

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भारत लोहनी ज्यू रचित एक और जबरदस्त पहाड़ी कविता...
आजकलाक् नान्तिन...
आजकलाक् नान्तिन, लत्यूंण हैं गईं
अणकस्सी इनरी काव्, बज्यूंण हैं गईं
लटकी पैरनी पेंटा, ढयांग नंगे रें गईं
मिजाजक् खातिर, साव् भिशूंण हैं गईं
आँख दिखेबेर इजके, बाब्के फतोड़ नईं
मिसरी जस पाल् इनुकें, साव् लूंण हैं गईं
इज बाबु लिजी घरम्, मोनक जस बुकाई
दिनभर मोबाइल में, हेल्लो-हाई कूणईं
रवाट् गाव् छिरन ना, पिज्जा-चाऊमिन में फें गईं
कसिक् होला काकड़ जसा, साव् फुल्यूड़े रे गईं
ओरकुट् में दिन कटों इनर, फेशबुक में डूबी गई
खुदेकी खबर ना इनुकें, बिन-धागक स्यूड़ हैं गईं
मनेकी इनेरी नि करा, भूत्यूँण हैं गईं
क्याव् का पात होला सोचि, यो साव् शिशूंण हैं गईं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Khyali Ram Joshi
November 28 at 10:49pm

मि मौसम न्हें जो पलभरि में बदइ जौंल
जमीन है बेर लै दूर कें और निकइ जौंल
मि पुराण सिक्क छों कें खेड़ी झन दिया
नाक दिनोंमें सायद मि तुमार काम औंल