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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
4 hrs ·

subh prbhat mittro---

गढ़वाली शेर ---

बुलदा छा जु कभी , की बिन तुमारा पट मोरी जौलु

जाणा छन वो आज मै देखी, बच-बची , लुक-लुक्की !

- पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
Yesterday at 5:04am ·

SUbh Prbhat mittro------

गढ़वालै स्त्तुती

जयति जय जै जै हे गढ़वाल
मुकुट जैकू ऊंचो ह्यूचलो कैलाश
दयब्तों के भूमि जवा --
जैमा दयब्तों कु बॉस --- ! जयति---

डांडि -काँठी जैकि लटुली
आँखि छन बद्री -केदार
छाति जैकी पुंगड़ी पटुली
खुटि जैकि हरि हरिद्वार --- जयति

ह्युं जैकि सुखिली चदरी
तिकबंदा छन जैकि नयार
रिंगलि -पिंगलि द्विती जैंकी
गिंयु जौकि पुंगडियु के ह्लयार -- जयति

--- कापी राइट @पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
November 28 ·
·

साज बाज तुम जोड़ा
गीत हम गोला
बाटू तुम बतावा
वेमा हम जोला

आग तुम जागा
झोळ हम लगोला
नींब तुम धरा
घौर हम बणौला

द्वी तुम जगा
ओट हम करला
हौंसला तुम बढ़ा
चोट हम करला

न्यूतेर तुम बुला
सम्मान हम दयोला
विचार तुम द्या
काम हम द्योला

डाळी तुम रोपा
खाद पाणी हम द्योला
क्रांति कु बीज तुम बौआ
आवाद ज्वानी हम द्योला

मंच तुम द्या
समौ हम बँधला
गढ़वाल तुम बणा
कुमौ हम सद्ला

लक्ष्य् तुम बतावा
तीर हम चलौला
पयार तुम बणा
समशीर हम पयोला

कफ़न तुम मुल्या
सर पर हम बँधला
कच्छप (कछुवा ) तुम बणा
समुद्र हम मंथला

दधीचि तुम बणा
बज्र हम चलौला
द्रोणयाचर्या तुम बणा
मच्छी नजर हम लगोला

प्रदीप सिंह खुदेड़ २३.११.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
November 28 ·
·

साज बाज तुम जोड़ा
गीत हम गोला
बाटू तुम बतावा
वेमा हम जोला

आग तुम जागा
झोळ हम लगोला
नींब तुम धरा
घौर हम बणौला

द्वी तुम जगा
ओट हम करला
हौंसला तुम बढ़ा
चोट हम करला

न्यूतेर तुम बुला
सम्मान हम दयोला
विचार तुम द्या
काम हम द्योला

डाळी तुम रोपा
खाद पाणी हम द्योला
क्रांति कु बीज तुम बौआ
आवाद ज्वानी हम द्योला

मंच तुम द्या
समौ हम बँधला
गढ़वाल तुम बणा
कुमौ हम सद्ला

लक्ष्य् तुम बतावा
तीर हम चलौला
पयार तुम बणा
समशीर हम पयोला

कफ़न तुम मुल्या
सर पर हम बँधला
कच्छप (कछुवा ) तुम बणा
समुद्र हम मंथला

दधीचि तुम बणा
बज्र हम चलौला
द्रोणयाचर्या तुम बणा
मच्छी नजर हम लगोला

प्रदीप सिंह खुदेड़ २३.११.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
November 13 at 12:46pm · Edited ·

सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

कुंजेठा गुमाई पड़ता है इसके पश्चिम में
गंगोटी पड़ता है मेरे गाँव के दक्षिण में
पूर्व दिशा में पड़ती है पाबै की धार
उत्तर दिशा मे पड़ती है पुन्डोरी की सार
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

हर बारह वर्ष में मौरी का मेला यहाँ लगता है
छः महीने तक संस्कृति का पर्व यहाँ चलता है
छोटी सी एक नदी कुछ दूरी पर बहती है
कभी इसमें अति पानी था अब खाली खाली रहती है
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

आधुनिकता की दौड़ में मेरा गाँव सरपट दौड़ रहा है
ईंट के मकान बनाता पत्थर के मकान तोड़ रहा है
गाँव के ऊपर स्कूल में शिक्षा का स्तर नहीं पहले जैसा
गुरु अब गुरु नहीं रहा, अब तो उसे चये बस पैंसा
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

न अब गाय है न भैंस, न हल जोतते अब बैल से
अन्न अनाज अब दुकान से, दूध भी आता अब शहर से
प्यार मोहब्बत तो है पर अपनापन नहीं है
बच्चे तो है पर उनमे अब बचपन नहीं है
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

इसी गाँव में मेरा भी छोटा सा रैन बसेरा है
यही कोने पर मैंने अपने बचपन को उकेरा है
मुझे नहीं मालूम अब यहाँ कब लौट पाउँगा
क्या अपनी ज़िन्दगी के बचे लम्हे यहाँ काट पाउँगा ?
सुदूर पहाड़ की थाती पर है मेरा गाँव
सुदूर गगवाड़स्यूं घाटी पर है मेरा गाँव

प्रदीप सिंह रावत ''खुदेड़''
तारीख १३.११.२०१४

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
October 21 · New Delhi ·

गतान्क से आगे......

याद

रोटी मिल तो रही है मुझे
फिर क्यों बेचैन हूँ गाँव की रोटी के लिए
दोस्त तो यहाँ पर भी है
फिर क्यों बेचैन हूँ गाँव की दोस्ती के लिए

न जाने क्यों याद आते है गाँव
जिस चीज के लिए मैंने गाँव छोड़ा
वह मुझे मिल तो गयी
फिर क्यों याद आता है गाँव

नीद आती है पर सो नहीं पाता हूँ
आँखों में आंसू आते है पर रो नहीं पाता हूँ
जब से कुछ सपने पुरे क्या हुए
अब सपने नहीं आते
जब से घर क्या खरीदा है
अब अपने नहीं आते

बीमारी में मुझे मिल रही दवा
फिर क्यों याद आती है माँ की दुआ
सफर तो कर रहा हूँ मैं ac गाड़ी में
फिर भी जाने की लालसा होती है
गाँव की माटी में


खुदेड़

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
20 hrs ·

प्‍यारा दगड़्यौं.....

कुलदेवी माँ चन्‍द्रबदनी की,
अषीम कृपा सी,
आपकी दुआ सी मैं,
30 नवम्‍बर, 2014 कू,
प्रिय नाती का,
जल्‍म लेण का कारण,
दादा बणिग्‍यौं,
बोला त बुढ़या ह्वैग्‍यौं,
जन कि लाेग बोल्‍दा छन,
भारी खुश होयुं छ,
यू मेरु कविमन,
खुशी कू रैबार अपणु,
आप सब्‍यौं तक,
पौंछौणु छौं,
प्‍यारा दगड़्यौं.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु",
दिनांक: 01.12.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 17 at 9:53am · Edited ·

वेकि मति मरि...

जब थोरड़िन मुक्‍क कोचि,
परेड़ा पेट चौक मा,
खैंचि खैंचि भैर नि आई,
थोरड़ि कू मुक्‍क,
काटी दिनि धौण वींकी,
फिर भी भैर नि आई,
अब क्‍या होलु, सोचि वेन,
बल परेड़ु फोड़ा अब,
होण क्‍या थौ वनि करि,
परेड़ु फूटि थोरड़ि मरि,
वेकि कनि मति मरि,
वे अजाण निर्बुद्धान,
कुछ सोचि बिचारि नि...

यनु होण का बाद,
गोसीणन बोलि,
"आज जेठा जी नि होन्दा त,
कुजाणि क्‍या होन्‍दु थौ".....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
स्‍वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक: 17.11.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 11 at 5:37pm ·

मेरा लाल.....

उत्‍तराखण्‍ड की,
धरती बोन्‍नि छ,
ह्वैग्‍यन मेरा कुहाल,
नि लेन्‍दा जल्‍म तुम,
मेरी सजीली गोद मा,
नि होन्‍दा मेरा यना हाल,
निराशेक बणि छ बिकराळ,
बांदर सुगंर कन्‍ना छन राज,
बांजी पुंगड़ि टूट्यां कूड़ा,
यू हि रैग्‍यन अब यख,
बंजेणु छ कुमाऊं गढ़वाळ,
कुछ त सोचा,
हे मेरा लाल.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
रचना स्‍वरचित एवं ब्‍लाग पर प्रकाशित
दिनांक 11.11.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 पहाड़ की फ्यौंलि....


पहाड़ मा जल्‍मिं,
एक नौनी थै,
जैंकु नौं थौ फ्यौंलि,
जब वा ज्‍वान ह्वै,
एक दिन बणि ब्‍योलि...

ब्‍यो का बाद वा,
अपणा स्‍वामी का दगड़ा,
गौं का सामणि,
एक बण मा बैठि,
छ्वीं बात लगौन्‍दि थै,
भारी प्रेम थौ दुयौं मा,
एक दिन, अचाणचक्‍क,
फ्यौंलि भारी बिमार ह्वै,
वींकी बचण की,
क्‍वी आस नि रै,
अंत मा फ्यौंलि का,
पराण उड़िग्‍यन,
वींकू स्‍वामी,
अति ऊदास ह्वै,
गौं का सामणि का,
पहाड़ फर वीं तैं,
दफन करेगे....

वींकू स्‍वामी रोज,
वींकी खाड फर जांदु,
बित्‍यां दिन याद करदु,
एक दिन वेन देखि,
खाड का ऐंच एक डाळि,
उपजिक बड़ी होणी,
वेन वा डाळि,
पाणिन सींची,
कुछ दिन बाद,
वीं डाळि फर एक,
पिंगळु फूल खिलि,
डाळि कू नौं धरेगे,
फ्यौंलि.......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 14.11.2014