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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हमर बगतमा स्कूल नि जाणो कुछ कारण

इना उना बिटेन ::: भीष्म कुकरेती

आज प्याज गडै च।
आज वैक सुलार भीजि गे ।
आज सरा गां अयेड़ी खिलणो जाणु च।
आज वैक छुट भाई तैं अखळ लग्यां छन।
आज हमन ए सालक पैलि कखड़ी तुड़ण ।
मेरी ब्वेक तब्यत खराब च तो साधू आज अपण ददिम रालु ।
मेरी तब्यत खराब च त हौळ लगाणो बान मि सून तैं भिजणु छौं ।
आज भद्वाक दीदीक खुट पर ढाल हुयुं च तो भद्वान पाणी सारण।
भोळ सौणाक ब्वेक स्वील हूणों चानस च त आज से सौणा स्कूल नि ऐ सकुद।
झगड़ु तैं पल्ली गाँवन अल्लु लाणन अर भोळ एक माण आपकुण (मास्टर जी ) बि भेज द्योलु
फत्तूक ददा आँख नि दिखदन अर आज फत्तूक ददान फत्तू दगड़ जीमण खाणो पल्ली गां जाण ।
आज पली ख्वाळ बरखी च अर म्यार लूथान भौत दिनों से खीर नि खै तो आज वैतैं छुटि चयाणी च।
आज म्यार मौनू स्कूल नि ऐ सकुद। भौत दिन से मीन पळेक नि बिसाइ तो आज गोरमा मौनू जाणु च।
गुन्दरू तबियत खराब च , वैदराज जीन सख्त हिदैत देकि वैमा द्वी चार दिन बेकार का काम नि करैन ।
ब्याळि म्यार घन्तु छुट भुला तैं संबालणो जगा किताब पढ़णु छौ त वैक बुबान थींचि दे तो आज स्कूल नि ऐ सकुद।
हमर बगत माने सन साठ से पैल !

Copyright@ Bhishma Kukreti 3 /11 /2014
*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।

CLEAN INDIA , स्वच्छ भारत !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
November 14 at 1:36pm ·

जब बीटी खिची मिन अपणी सेल्फी
भोर भोरिक आणा छोरों का कमेंट
क्वी बोल्नु बने दे मिथै अपनी गर्ल फ्रेंड
क्वी बोल्नु बने दे अपनी ब्योली
एक अनार चा सौ बिमार छिन
कै कै कु करू दिल कु इलाज
दिल तू ही बता
ज्वान त ज्वान
बुडिया बि लाइक
करदा म्येरी सेल्फी
क्वी शेयर करदा
क्वी करदा डाऊनलोड
कन्न कमाल करियु त्येरु सेल्फी
सैरी दुन्या मा बबाल करयु त्येरु सेल्फी
सब्बयु की जिकुड़ी राणी बानायु
मैकू त्वेंन सेल्फी
फेसबुक मा म्येरी सेल्फी
ट्विटर मा म्येरी सेल्फी
लाइन मा म्येरी सेल्फी
वाटसअप मा म्येरी सेल्फी
वी चैट मा म्येरी सेल्फी
कुजणी कख कख
कै कै सोशल साईट मा म्येरी सेल्फी
पर वू कु भगी होलू
जैका जुकड़ा तक पौचली
म्येरी सेल्फी
रचना ................शैलेन्द्र जोशी


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 17 at 1:07pm ·

हेजि, ह्युंद ऐगि जी,
देखणा होला आप,
लत्‍ता, कपड़ा अर ढ़िक्‍याण,
निवाति सी औन्‍दि जब,
पैरदा अर लेन्‍दा छौं,
खुश होन्‍दु ज्‍यु पराण....
कवि जिज्ञासु की अनुभूति आप ज्‍या होला सोचणा तब।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 17 at 9:53am · Edited ·

वेकि मति मरि...

जब थोरड़िन मुक्‍क कोचि,
परेड़ा पेट चौक मा,
खैंचि खैंचि भैर नि आई,
थोरड़ि कू मुक्‍क,
काटी दिनि धौण वींकी,
फिर भी भैर नि आई,
अब क्‍या होलु, सोचि वेन,
बल परेड़ु फोड़ा अब,
होण क्‍या थौ वनि करि,
परेड़ु फूटि थोरड़ि मरि,
वेकि कनि मति मरि,
वे अजाण निर्बुद्धान,
कुछ सोचि बिचारि नि...

यनु होण का बाद,
गोसीणन बोलि,
"आज जेठा जी नि होन्दा त,
कुजाणि क्‍या होन्‍दु थौ".....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
स्‍वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक: 17.11.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 14 at 12:58pm ·

जब होश आई...

भारी शर्म सी लगि,
किलैकि काम हि,
यनु करयालि थाै,
मिलिगे थौ दगड़या एक,
वेन बोलि प्‍यार सी,
चला भैजि धार ऐंच,
आज वखि मू,
रंगमता ह्वैक,
भ्‍वीं मा लठगि जौला...

होण क्‍या थौ,
वनि ह्वै, होश भी नि रै,
कल्‍पना छ या मेरी,
मन बोन्‍नु हात तै,
कलम पकड़ि लिख दौं,
जब होश आई...
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
स्‍वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक: 14.11.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 11 at 5:37pm ·

मेरा लाल.....

उत्‍तराखण्‍ड की,
धरती बोन्‍नि छ,
ह्वैग्‍यन मेरा कुहाल,
नि लेन्‍दा जल्‍म तुम,
मेरी सजीली गोद मा,
नि होन्‍दा मेरा यना हाल,
निराशेक बणि छ बिकराळ,
बांदर सुगंर कन्‍ना छन राज,
बांजी पुंगड़ि टूट्यां कूड़ा,
यू हि रैग्‍यन अब यख,
बंजेणु छ कुमाऊं गढ़वाळ,
कुछ त सोचा,
हे मेरा लाल.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
रचना स्‍वरचित एवं ब्‍लाग पर प्रकाशित
दिनांक 11.11.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
November 5 at 10:56am ·

पर्वतराज हिमालय...

जिसे निहारा मैंने,
बचपन से,
जब जब गया,
चन्द्रकूट पर्वत शिखर पर,
मां चन्द्रबदनी मंदिर में,
अहसास किया,
हंसता हैं हिमालय,
हमें निहार कर....

आवाज उठ रही है,
हिमालय बचाओ,
ऐसा क्या हो गया?
संवेदनशील हिमालय को,
जो आज आशंकित हैं,
हिमालयी क्षेत्र के लोग....

सुनते हैं,
कीड़ा जड़ी के लिए,
लालची लोग,
ग्लेशियर को जबरदस्ती,
पिघला रहे हैं,
कहो तो,
संवेदनशील हिमालय को,
सता रहे हैं.....

हिमालयी क्षेत्र के लोग,
हिमालय को,
शिव पार्वती का,
निवास मानकर,
जो है भी,
पूजते हैं,
पास होते हुए भी,
नहीं सताते उसको.....

कौन जाता है,
हिमालय के पास,
पर्यटक बनकर,
मानते हैं,
सबका है हिमालय,
कूड़ा घर है क्या ,
ऐसा क्यों करते हैं?

चिंतन करें,
हिमालय के पास,
एक पेड़ लगाते,
कूड़ा साथ लाते,
मूक हैं सभी,
हिसाब लगता है,
कितने आए,
कितने कमाए,
ये भी तो सोचो,
हंसने वाला हिमालय,
आंसू टपका रहा है.....

पर्वतजन का पहाड़,
सूना है आज,
सूने सूने गांव,
टूटते घर,
बंजर होते खेत,
ऐसा हो गया है,
हिमालयी क्षेत्र में,
कुछ मित्रों ने,
सैकड़ों मील पैदल चलकर,
जानने की कोशिश की,
हिमालय बचाओ,
अभियान के तहत,
पर्वतजन और हिमालय,
क्यों हैं संकट में?
भागीदार बनें,
संदेह न करें......

माधो सिंह भण्डारी जी के,
पुरातन गांव,
मलेथा के लोग,
सजग हैं,
और दिखा दिया,
ऐसे ही तो बचाना है,
पहाड़ और हिमालय के,
अस्तित्व को......

पर्वतराज हिमालय,
अस्तित्व में रहेगा,
हंसता रहेगा,
हमारा भी,
अस्तित्व रहेगा,
जागो! जागो!
कहीं अबेर न हो जाए,
हिमालय से बहती,
सदानीरा नदियां,
कहां से दिखेगीं?
आने वाली पीढ़ी को......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
"हिमालय बचाओ अभियान" को समर्पित मेरी ये स्वरचित कविता सप्रेम भेंट।
दिनांक 3.10.2014.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 28 at 1:00pm ·

मेरा गौं बिटि....

दिखेन्‍दा छन,
पूर्व दिशा मा,
हिंसरियाखाळ,
पश्‍चिम दिशा मा,
जामणीखाळ,
उत्‍तर दिशा मा,
रणसोलीधार,
दक्षिण दिशा मा,
ललोड़ीखाळ...

खाळ मा खाळ,
निछन आज,
रै होलि कबरि,
क्‍या बोन्‍न तब,
मेरा मुल्‍क मा,
धार ही धार,
खाळ ही खाळ,
दिखेन्‍दि छन,
दूर दूर तक,
मेरा गौं,
बागी नौसा बिटि....

-कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
28.10.2014, सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डांसी ढुंग मेँ घुरी गया मैँ ,
चौकोङि के गध्यार मेँ ।
परुलि तेरे प्यार मेँ रङ गये हम कच्यार मेँ ।।
दिल मैँ अपना हार गया .
परुलि तुझसे प्यार हुआ ।
तू भी अपना घर बना ले दिल के मेरे उड्यार मेँ

परुलि तेरे प्यार मेँ रङ गये हम कच्यार मेँ ।।
तुझे देखकर अलजि गया .
भली के मैँ पगलि गया ।
तेरा रस्ता देख रहा हूँ बांजांणि के धार मेँ ।
परुलि तेरे प्यार मेँ रङ गये हम कच्यार मेँ ।।
तेरे घर मेँ आया था .
चांण पकौङी लाया था ।
तेरे बाप ने जांठ
दिखाया छिपना पङा भकार मेँ ।
परुलि तेरे प्यार मेँ रङ गये हम कच्यार म
Poem by deepak..