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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
July 12 · Edited ·

माया सी चार द्यब्ता सी
ह्वेकी बि दिखेंदी नि
माया भरम चा
स्या क्वी जादू
पिरेम माया कु बोल्दन
त पिरेम क्या माया चा
स्या बस ठगौणीया छवी
सबाल मन मा स्यु चा
माया मा मनखी ठगदू अफ्वी
स्या ठगांदु क्वी
माया जन भगवानै माया
हर कैका समझ मा नि आंदी
पर विकी माया सैरी दुन्या चल्दी
पिरेम माया बि इन्नी चा
हवेकी बि हर कैका बिंगणा मा
नि आंदी स्या माया
माया सी चार बिंग सकदु
वू ही ज्यू ठगै माया मा
अब्ब मैमा क्या पुछणा लग्या
विस्बास नि होंदु पुछ ल्या कै मायादार मा
रचना ............................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
July 11 ·

ऐसु बरस म्येरा मुल्क नंदाजात होली
बाराबरस मा नंदाजात अपणा मुलूक बौड़ाली
दीदी भूली नंदा का गीत गाली
ध्याणी अपणा मैत जाली वख नाचली गाली
मै कनी अभागी छोऊ रमियु देस मा मन मेरु पौच्यु हिमालय
नौटी कासुवा ईधा बधाणी की दीदी भूली नंदा गीत गाली
चौसिंघ्या खाडू का पैथर छातोलियो तै लेकी जात्रा का जत्रोई जाला
सेम कोटी भगोती कुलसारी की दीदी भूली नंदा गीत गाली
मेरु मन पौच्यु वख
चैपड़ो नन्दकेसरी फल्दिया गोउ मुन्दोली
कण भैटुली होली अपणी मैत बैटूली
कुरुड़ बाधण वाला भी पौचिया होला नन्दकेसरी
नंदा जात कु कनु मिलन देखा
कुरुड़ दसोली दसमद्वार डोली
गैरोली पाताल पातर नाचोणिया
सिलासमुद्र च्न्दनियाघाट
वख बुग्यालो लोग हिटणा होला
मेरु मन पौचियु वख
घाट माँ कानी भारी करुणा
नंदा मैत से विदा होली
मि अभागी यख परदेश मा खुदेणु छोऊ
रचना शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
15 hrs · Edited ·

उत्‍तराखण्‍ड का माटा कू,
बण्‍युं मनखि छौं,
ऊदमतो कतै निछौं,
खाली हात अयौं,
अर खाली हात जाण,
रख्‍युं चैंदु हे चुचौं,
गंगा जी का पाणी जनु,
छाळु ज्‍यु पराण........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 9.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 9 at 5:31pm ·

बौळ्या सी ऊ बण्‍युं थौ,
किलै बण्‍युं रै होलु,
हम बण्‍यां छौं,
कुजाणि क्‍यौकु,
बिंगण मा नि औणु छ.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 9.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 8 at 10:49am · Edited ·

कनि होलि....
कैमा कब्‍बि नि पूछि,
ख्‍याल भी नि आई,
मांगण तेरी करयालि बेटा,
एक दिन मैकु बताई.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 8.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
14 hrs ·

कत्‍यौन....

अजग्‍याल मुक्‍क मोड़यालि,
बोन्‍न बच्‍यौंणु भी छोड़याळि,
किलै बदलि होलु ऊंकू मन,
निराश्‍युं सी छौं,
मैं भी अजग्‍याल इलै...

कैकु दोष भी देण किलै,
मनख्‍यौं कू जंजाळ,
यीं धरती मा भौत छन,
तौ भी एक द्वी घड़ी,
मन मिलैयुं चैंदु,
अपणा चाण वाळौं का दगड़ि,
मेरा मन की बात,
या हिछ दगड्यौं......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 11.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 9 at 5:31pm ·

बौळ्या सी ऊ बण्‍युं थौ,
किलै बण्‍युं रै होलु,
हम बण्‍यां छौं,
कुजाणि क्‍यौकु,
बिंगण मा नि औणु छ.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 9.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
December 8 at 10:49am · Edited ·

कनि होलि....
कैमा कब्‍बि नि पूछि,
ख्‍याल भी नि आई,
मांगण तेरी करयालि बेटा,
एक दिन मैकु बताई.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 8.12.14

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


नवीन पंत जी की वाल पर यह तस्बीर देख कर, मन में कुछ भाव उभर कर आये ,
जिन को कबिता रूप में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ ,,
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             "धरती मेरा गढ़वाल की"
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देखि धरती गढ़वाल की ,मन रंगमतु व्हे जांदु ,
स्वर्ग जन दिखेंदी या ,मन अपरा बस नि रांदु ,
                 दूर दूर प्रदेशु  बीटी जू भी यख घूमण कु अौंदु ,
                 देखि कै ये धरती का स्वर्ग स्यु रंगमतु व्हे जांदु ,
हमुन नि पछाणी सकी कभी यीं धरती कु मोल ,
अभी भी कुछ नई बिगड़ी ,नी त पछतौला भोळ ,
                 नदी घाटी हरी भरी ,डांडी काँठी मन मोहि लेंदी ,
                 देखि चांदी सी हिंवाळी चोंटी ,मन  सकुंन देंदी ,
देव भूमि छ या,आज भी छ यख देब्तो कु बास ,
तभी त बुलौंदि रांदी या ,मनख्यों तै अपरा पास ,
                 पवित्रता और सम्मान सदानि यानि बण्यू रौउ ,
                 देव भूमि की खूबसूरती मां कभी कमी नई अौउ ,
हे देव भूमि मन मां सबु का सदानि तू बसीं रैई ,
गोद मां अपुरी सबु तै बुलैक ,मन तै सकुंन देई ,
                  देखि धरती गढ़वाल की ,मन रंगमतु व्हे जांदु ,
                  स्वर्ग जन दिखेंदी या ,मन अपरा बस नि रांदु ,
                  --------------------------------------------------
                   द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
                   दिनांक >२५ /११ /२०१४
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                   http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"हिमालय बचाओ आंदोलन "के सभी कार्य कर्ताओं का हार्दिक अभिनन्दन ,जो अपना अमुल्य समय दे कर इस मुहिम में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे है ,और घर घर ,गाऊँ गाऊँ जा कर लोगो में मिमालय के अस्तित्व के प्रति जागृति ला रहे है ,मैं सच्चे दिल से सब को नमन करता हूँ ,,
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          -----आवो हिमालय बचाएं----
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हिमालय तेरी आभा को हम ,आंच न आने देंगे ।
सदा चमकता रहे भाल  तेरा ,शान न जाने देंगे  ॥
                दुनियां वालो जागो ,अस्तित्व इसका बचना है ।
                धरा के इस गौरब को ,सदा के लिए सजाना है ॥
पर्याबरण जाग्रति की एक ऐसी लहर जगा  दो ।
हिमालय के प्रदूषण को सदा के लिए भगा दो ॥
                 बचा रहेगा अस्तित्व हिमालय का जब तक ।
                दुःख विपदाओं से ,बचे रहेंगे हम तब तक ॥
तेरी नदियों के शीतल जल से दुनियां हरी रहे ।
शुख समृद्धि और हरियाली से सदा भरी रहे ॥
                 जागृति की एक लहर सब मिल कर ला देंगे ।
                 चमकता भाल दुनियां का ,मलिन न होने देंगे ॥
हिमालय तेरी आभा को हम ,आंच न आने देंगे ।
सदा चमकता रहे भाल  तेरा ,शान न जाने देंगे  ॥
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                        द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
                        दिनांक >०४/११/२०१४
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