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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

छोड़ आया पहाड़ मैं,
सवारने जीवन को,
आ तो गया मगर मैं,
छोड़ आया जीवन को,

भटकता रहा तीर्थों मैं,
पाने ईश्वर को,
बंद कर आया मगर मैं,
द्वार दर्शन को,

बटोरता रहा पैसे मैं,
इक्छुक शौहरत को,
त्याग कर आया मगर मैं,
पित्र दौलत को,

नापता रहा उचाई मैं,
पाने पहचान को,
भुला कर आया मगर मैं,
अपने ही अस्तित्व को,

अपनाता रहा तरीके मैं,
पाने चैन को,
बेच कर आया मगर मैं,
अपने सुकून को,

झूमता रहा मग्न मैं,
शहरी बनने को,
अनजान हो गया मगर मैं,
अपने घर-आँगन को,
छोड़ आया पहाड़ मैं,
गुज़ारने जीवन को,
आ तो गया मगर मैं,
भूल आया जीवन को.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Rajendra Pant Rajan
January 19 at 7:32pm ·

हरदौलवाणी में मेरी कविता को स्थान देने के लिये आदरणीय गुरुदेव देवीप्रसाद गुप्ता जी एवं भाई ललित मोहन राठौर जी का सहृदय आभार ....

मैं सुरतटी थी गंगा मैं
सुरसरी थी गंगा .
लाये थे जिसको भगीरथ हां मैं वही हूं गंगा .
रो रो के आज गंगा बस यों ही कह
रही है .
मेरी देह ना मिटाओ मेरे प्राण ना सुखाओ .
गौमुख से जब मैं निकली खुश भक्त हो रहे थे .
कोइ दीप ला रहा था कोइ धूप दे रहे थे .
देवों ने आके मुझपर अमृत सुमन गिराया .
बंजर तेरी धरा को ये स्वर्ग सा बनाया .
बेदाग मेरा दामन क्यों दाग मैं लगाऊ .
तेरी छोड़ इस धरा को मैं स्वर्ग लौट जाऊ .
मैं सुरतटी थी गंगा ............
मानव तू भी धरम से अपने करम पै रोये .
तेरे पाप को मैं धोऊ करमों को कौन धोये .
मेरे नाम से तू खा के क्यों मोक्ष खो रहा है .
अपने लिये कफन तू क्यों मोल ले रहा है .
अपमान से तेरा क्यों मैं मान को बढाऊ .
तेरी छोड़ इस .............
मानव तेरे करम से भगीरथ भी रो रहे हैं
शिवजी भी अब नयन से बिष को उगल रहे
हैं .
नारद जी बोले शिव से ये कैसी हैं बलायें
गंगा ने आज क्यों दी मानव को बद दुवाऐ .
पिघलेगा अब हिमालय कैसे धरा बचाऊ .
तेरी छोड़ इस धरा ...........
तेरे शोध से ये मेरे दामन सिकुड़ रहे हैं .
बन भूमि सारे तरुवर हिमखण्ड गल रहे हैं .
सब नदियों से भी ज्यादा था शुद्ध जल ये मेरा .
ना गंद डालो मुझ पर कीड़े पनप रहे हैं .
अब रोक लो इसे तुम सबको कहां बहाऊ .
तेरी छोड़ इस धरा ..............
हे भीष्म तेरी माँ ये क्यों नर्क
जी रही है .
कहीं कैद हो के तन को बांधों में फंस
रही है .
नहीं तप मेरे तटों पर बस शौच कर रहे हैं .
अपने उदर का मलवा मुझ पर उडल रहे हैं .
ब्रह्मा जी मेरी सुन लो कैसे मैं दिन बिताऊ .
तेरी छोड़ इस धरा .........
तेरे करम के फल को मेरा जीव भी सहेगा .
पानी बिना मगर और घड़ियाल भी मरेगा .
संस्कार के बिना ही तू भी यूं
ही सड़ेगा .
होगा प्रलय धरा पर भूभाग सब तपेगा .
बिना जल के तुझको मानव मैं नर्क में ले जाऊ.
तेरी छोड़ इस धरा ........
गंगा बिहीन
नगरी तेरी कैसी ये
लगेगी .
घाटों में मेरे फिर से कहां आरती सजेगी .
साधू नही यहां फिर ना कुम्भ ही लगेगा .
सैलाब फिर से जन का तुझको कहां दिखेगा .
बोलेगा फिर तू मानव ये मुंह किसे दिखाऊ .
तेरी छोड़ इस धरा ..........
मैं मोक्षदायिनी हूँ मैं कष्ट हारिणी हूँ .
युग युग से बह रही हूं मैं पाप
नाशिनी हूं .
मेरा ब्यथा को सुनके मनु पुत्र अब तो चेतो .
ना शूल अब चुभाओ जुल्मों को अब तो रोको .
ना अब यहां भगीरथ जिसे और तप कराऊ .
तेरी छोड़ इस धरा को मैं स्वर्ग लौट जाऊ .

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ना ना नि चैनी ईनि नीति

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

प्रगति का नाम परी यूँ की
झौलम-झौल
वादों और्री छुईं मा यूँ की सब
गौळम-गौळ
कब मिलालू बगत यूँ थे
कब करला काम जी
कब हुलु बिकसित राज्यों मा
मेरु उत्तराखंड कु नाम जी

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

टाक्कों बंडल यख संगी साथी
सबु लमाड़-लाम जी
कैन कारण यख काम काज
सबु सुरसुर-सार जी
सीयँ छन यख सबी का सबी
मिल नि लेण यख कैकु नाम जी
टक्कों दगडी इन अल्जी जीयु
ये घियु सबुल बकौरी खाण जी

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

कब आलू दिन ऐ मेरा देबता
ले ले सुबू कु राम-राम जी
मेरु पाड़ा मा पलयान दगडी
व्हैगे बुरु हाल- काज जी
अपरुँ थे मि कया कया बुलूँ
क्ख्क मि जाकी वैथे खोज्युं
हर्ची गै न सब अपरा परया
सम्लौणा व्हैगे बिरदया बाटा

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
January 19 ·
·

हाक दी छे मिन

हाक दी छे मिन
कैल वै थे सुणी णी
बौल्या मनखी की पीड़ा
यक कैल बिंगी णी
हाक दी छे मिन

वै पीड़ा थे लिख्दा रायुं
वै थे गीतों ढालि की गै दा रायुं
कोरा पानी थे आंसू साथ भरदा रांयुं
पैड़ी ना सैकी विं थे कैल सुणी नि साकी

हाक दी छे मिन
दूर जांदा ऊँ उंदरुन बाटों थे
दोइ बायां खोली की
अंग्वाल लेणा कुन ऊँ अपरु थे

कया पाई मिल यक इनि लेखी की
अपरी खूने दगडी होली खेळी की
स्वास परी स्वास खोयी की
इन यखुली इन जग्वाली की

हाक दी छे मिन
टूट दा फुंडा जांद ऊं गारुं थे
आंध्रारु लुकी गै
ऊं तिमणार तिम तिम गैणु थे
हाक दी छे मिन

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दूर तक विं सड़की का छोर मा

कु हुलु आनु व्हालु
ये दंडी काण्ठियों मा
हेर दी मेरी आंखी हेर दी
दूर तक विं सड़की का छोर मा

हेरी ले दी ईं आंखी दगड्या मेरी
बिजी जाली ये तांसी बी मेरी
सुकी व्है जालु ये परान मेरु
देके जालु क्वी मेरु तेरु आन व्हालु

सरी माया भोरी ले ईं दंडी मा
उजाळु वहैगे अबै ईं कंठी मा
देक मयादार मुखडी कु हेर
छूछा लाटा मेरा अब ना कैर देर

कद्ग दिन बीती गयां
ना पत्री ना क्वी ठौर रैबार अंयां
कन व्हालु कया खाण व्हालु
मेरे पोट्गी लथड़ु वख कन रैण हुलु

कु हुलु आनु व्हालु
ये दंडी काण्ठियों मा
हेर दी मेरी आंखी हेर दी
दूर तक विं सड़की का छोर मा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किले मी हुलु बैठी रुनु

अब बी मै मा कया च बांकी
मी नि जण दूं मै कया इन दडयूं
किले लगी हुली बडुळि ईं तांसी
ये जीकोडी किले झुरनी व्हाली
अब बी मै मा कया च बांकी

डाला की छैयां मिली की बी
किले ई सरीर मेरु इन ऊफानु हुलु
कूच इन दडी व्हालु ये बगता ने बी
अब भैर ऐकि ऊ मि थे किले डराणु हुलु
अब बी मै मा कया च बांकी

इन धगुली टूटी इन दगड़यों मेरी
टूटी की वा क्ख्क बोगी ग्याई
अच कल लगणि जन काणी मेरी
इन काणी अब यख कैंकी ना हो
अब बी मै मा कया च बांकी

तपरणु मी यकुलि अपरी अपर मा
अपरी आगी मा मी छों अब जलणु
किले भागी अपरी मुल्क देश छोड़ी
अब पछतैकी किले मी हुलु बैठी रुनु
अब बी मै मा कया च बांकी
.
एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"

आज गरम् टोपली गरम कोट अर गरम सुलार
तब भी जाडू होणू हाय बेसुमार
रोज रोज फोन मां दयखणा टिम्प रेचर
आज कुछ बढ़ी कि ब्याल्ये की चा।। र
स्यूं सगत रजै मां बि बथों वार पार

तें रजै मां त कब्बि नि ह्व़े छो यन
जें पर छा रुंवाली का ढीन्ढ़l हजार

बिना जुतों की क्वंगळी खुट्टी
अर पाल़ा मां धचाक

न गात ढंगा कपड़ा लत्ता
न ढंगो दसा ण
क्न्क्वे बचे हवला सचि
ब्व़े बुबों न अपणा छ् वरों का पराण
आज गरम् टोपली गरम कोट अर गरम सुलार तब भी जाडू होणू हाय बेसुमार रोज रोज फोन मां दयखणा टिम्प रेचर आज कुछ बढ़ी कि ब्याल्ये की चा।। र स्यूं सगत रजै मां बि बथों वार पार तें रजै मां त कब्बि नि ह्व़े छो यन जें पर छा रुंवाली का ढीन्ढ़l हजार बिना जुतों की क्वंगळी खुट्टी अर पाल़ा मां धचाक न गात ढंगा कपड़ा लत्ता न ढंगो दसा ण क्न्क्वे बचे हवला सचि ब्व़े बुबों न अपणा छ् वरों का पराण
Mahi Singh Mehta
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Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी 

हेरी मेरा आँखा हेरी

हेरी मेरा आँखा हेरी
जा ले तू जा देखि ऐ दुःख कख हुलु दाड़ी
खोजी यख सुखा का बाटा तू खोजी
यख देख अब कैकु ना आँखा रोई
हेरी मेरा आँखा हेरी ...............

चल दगड्या चल हिट तू मेरु दगडी
खुठी मेरी तू ना इन पटे जा सिन्कोली
काम ते थे खुभ करन छ रे दगड्या
हिकमत ना हैर मेरु खुठा तू चल अग्ने
हेरी मेरा आँखा हेरी ...............

बोलणु क्या बोलणु की च यख दैर
पैल काम करी फिर गिची तू अपरी गिची खोल
देख छुईं मेरी छुईं मा निज इतगा खोल
तेरु छूटा छूटा काम कियां बनला बड़ा बड़ा बोल
हेरी मेरा आँखा हेरी ...............

हेरी मेरा आँखा हेरी
जा ले तू जा देखि ऐ दुःख कख हुलु दाड़ी
खोजी यख सुखा का बाटा तू खोजी
यख देख अब कैकु ना आँखा रोई
हेरी मेरा आँखा हेरी ...............

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ना ना नि चैनी ईनि नीति

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

प्रगति का नाम परी यूँ की
झौलम-झौल
वादों और्री छुईं मा यूँ की सब
गौळम-गौळ
कब मिलालू बगत यूँ थे
कब करला काम जी
कब हुलु बिकसित राज्यों मा
मेरु उत्तराखंड कु नाम जी

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

टाक्कों बंडल यख संगी साथी
सबु लमाड़-लाम जी
कैन कारण यख काम काज
सबु सुरसुर-सार जी
सीयँ छन यख सबी का सबी
मिल नि लेण यख कैकु नाम जी
टक्कों दगडी इन अल्जी जीयु
ये घियु सबुल बकौरी खाण जी

ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति..............

कब आलू दिन ऐ मेरा देबता
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मेरु पाड़ा मा पलयान दगडी
व्हैगे बुरु हाल- काज जी
अपरुँ थे मि कया कया बुलूँ
क्ख्क मि जाकी वैथे खोज्युं
हर्ची गै न सब अपरा परया
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ना ना नि चैनी ईनि नीति
इन राज नीति मेरा पाड़ों मा
ना ना नि चैनी ईनि नीति
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हाक दी छे मिन

हाक दी छे मिन
कैल वै थे सुणी णी
बौल्या मनखी की पीड़ा
यक कैल बिंगी णी
हाक दी छे मिन

वै पीड़ा थे लिख्दा रायुं
वै थे गीतों ढालि की गै दा रायुं
कोरा पानी थे आंसू साथ भरदा रांयुं
पैड़ी ना सैकी विं थे कैल सुणी नि साकी

हाक दी छे मिन
दूर जांदा ऊँ उंदरुन बाटों थे
दोइ बायां खोली की
अंग्वाल लेणा कुन ऊँ अपरु थे

कया पाई मिल यक इनि लेखी की
अपरी खूने दगडी होली खेळी की
स्वास परी स्वास खोयी की
इन यखुली इन जग्वाली की

हाक दी छे मिन
टूट दा फुंडा जांद ऊं गारुं थे
आंध्रारु लुकी गै
ऊं तिमणार तिम तिम गैणु थे
हाक दी छे मिन

एक उत्तराखंडी

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