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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
May 7 at 1:12pm · Edited ·

गौं का गौं....

खाली होणा,
अर बजेंणा छन,
निर्दयी ह्वैग्‍यन,
मनख्‍यौं का मन......

द भै ऊदौळि सी ऊठणि छन......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
दिनांक 7.5.15
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित,
अवलोकनार्थ स्‍वागत छ आपकु.....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
May 7 at 9:43am

ब्‍वै बोन्‍नि छ.....

मेरा लाटा,
अजग्‍याल तू,
ध्‍यान सी पढ़णु छैं.....

हां ब्‍वै,
तेरी ब्‍वारि का मैसेज,
पढ़णु छौं.....

क्‍या लिखणि छ,
बेटा तेरी ब्‍वारि,
यख त अजग्‍याल,
भौत धाण काज छ,
कब औणि छ ब्‍वारि....

ब्‍वै, ब्‍वारि लिखणि छ,
जब तक तेरी ब्‍वैं,
ज्‍युंदी छ,
तब तक नि औण मैंन...

बेटा,
जब तेरु ब्‍यो ह्वै थौ,
वांसी पैलि मैंन,
बोल्‍यालि थौ बेटा,
बिजली अर ब्‍वारि कू,
क्‍वी भरोंसु नि होंदु,
कब चलिजौन,
अर कब ऐ जौन........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
दिनांक 7.5.15
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित,
अवलोकनार्थ स्‍वागत छ आपकु.....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड में बाबा के ढाबे
गुल चमन है इनकी बातों में रिस्ता है कितनी जातों में
कहीं नदी वार कहीं नदी पार ये कैसा युद्व अनाथों में
यहाॅं पुरूष घूमते बाडों में नारी है नरक पहाडों में
शिखरों में सूरजअस्त हुआ गढवाल में भैजी मस्त हुआ

नीचे से दारू ढोते हैं उत्पात यहाॅं पर होते हैं
खडा कौन है पाॅंओं पर घर बार लगा है दाॅंव पर
आज हिमालय लुटता है घर - घर में रिस्ता टुटता है
ये देव भूमि की लीला है यहाॅं लाल खून भी पीला है

घर से ही माल उठाता है व्यापारी खूब कमाता है
यहाॅं हर देश का मानव है ये देव भूमि अब दानव है
संस्कार गये अब पानी में ये बूढी कौम जवानी में
नेता में देखो लाली है बस, उत्तराखण्ड ही खाली है

राज्य लूटकर चन्दा भी दिल्ली के दल में जाता है
उत्तराखण्ड को राजनीति का मरा भूत भी खाता है
क्यों होते हैं रोज फैसले राजनीति गलियारों से
मुख्यमंत्री बदल रहे है दिल्ली के दरबारों से

भीख माॅंगकर उत्तराखण्ड को स्वीटजरलैंड बनायेंगे
स्विस बैंक के सारे खाते उत्तरारखण्ड में आयेंगें
सपने देखो अपने देखो राजनीति ये गाती है
अब तो टुच्चेपन के भाषण से भी जनता शर्माती है

सबसे ज्यादा उत्तराखण्ड में रामदेव की धरती है
योग - पीठ गलियारे में सरकारें पानी भरती हैं
सारे आसन राजनिति के टी 0 वी0 में दिखलाते है
सत्ता और सियासत की कपाल भारती गाते है

अन्तर्राष्ट्रीय सभी भिखारी उत्तराखण्ड में रहते हैं
य़े सभी निशाचर उत्तराखण्ड को देव-भूमि भी कहते हैं
अय्यासी के महल बने हैं, पर्वत की मालाओं पर
ध्यान योग के शिविर में सर्कस, परदेशी बालाओं पर

सारे नेता, नौकर - शाही बाबा जी के चरणो पर
उत्तराखण्ड भी टिका हुआ है,मठ,मन्दिर उपकरणो पर
स्वर्ग-मोक्ष की इस धरती पर राजनीति लहराती है
मोक्ष-दायिनी माँ गंगा भी अब गीत इन्ही के गाती।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
May 8 at 5:22pm ·

10 मई बिटि 15 मई तक....

गौं मुल्‍क जाणु छौं दगड़्यौं,
मन मा ऊदास नि ह्वैन,
ज्‍यु जिबाळ छ या जिंदगी,
बाटु मेरु देख्‍दु रैन.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
दिनांक 8.5.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
May 8 at 9:05am ·

खाणौं,
कथ्‍गा हि सवादि हो,
लग्‍दु छ बल खारु,
जब तक मेरा,
मुल्‍क का मनखि,
पेन्‍दा निछन,
द्वी घूंट दारु,
ब्‍यो बरात मा,
खुशी की बात मा.....

कविमन का ऊमाळ छन भैजि.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
दिनांक 8.5.15
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित,
अवलोकनार्थ स्‍वागत छ आपकु.....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्रमशः-2
पर्वत का सर्बत
उत्तराखण्ड में इस्क समाया नेता से इन्दर घबराया
उर्वषी ,मेनका ,रम्भा गायब देखा तो मंत्री संग पाया
अय्यासी का जो फन देखा हुआ इन्द्र को खुद में घोखा
बोला चलो मेनका दीदी यहाॅं का नेता बडा अनोखा

ये राज नही अब राग बना 36 व्यंजन का साग बना
जो राजसभा को भातें हैं वो उत्तराखण्ड से जाते हैं
बाण नही बस तरकस है ये देव भूमि अब सरकस है
सबकी नजरों में टुकडा है ये कैसा गजब का जुकडा है

अधिकारी सब पर भारी है बस,खेल उन्ही का जारी है
नेता की हस्ती पहचानी करते हैं अपनी मनमानी
नौकर से मालिक डरता है फिर दोनों का घर भरता है
इनकी ही कलमें चलती हैं फाइल से सत्ता पलती है

खर्चा कई लाख करोडों में बस, माल नदारद रोडों में
फाइल में सडक बनाते हैं ये खुल्लम खुल्ला खातें हैं
जो भी सत्ता में आता है अपना ही खेल दिखाता है
पाॅंच साल का करा धरा उसमें भी जाॅंच बिठाता है

विद्यालय बन जाते हैं बच्चे भी फर्जी आते हैं
जो अन्न मिला सरकारों से मिल बाॅंट सभी खा जाते हैं
वेतन भी अच्छा पाते हैं शिक्षक सरकार हिलातें हैं
गुरूजी तो घर में रहतें हैं ये शिशू निकेतन कहते हैं

शिक्षक हडताले करते हैं शिक्षा मंत्री भी डरते हैं
बस, माॅंगे पूरी होती हैं बच्चों की किस्मत रोती हैं
गुरूजी के बच्चे अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा पाते हैं
उत्तराखण्ड के नव-अंकुर इन पहाडों में सड जाते हैं

नदियाॅ तो हिम से झरती हैं जनता प्यासी क्यों मरती है
पाताल से पानी लाना है पहाडों में पम्प लगाना है
पानी से बिजली गायब है ये कैसी बात अजायब है
बे - सिर पैर की बातें हैं ये नेता की औखातें हैं

शिखरों में रेल बिछाायेगें ये कैसा खेल खिलायेगें
बस, गैरसैंण की बातें हैं कुछ इसी बात की खातें हैं
घर - घर में खाने के लाले ,दो चार बने बस मतवाले
भाषण में कैसी भांषा है ये उत्तराखण्ड तमाशा हैं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ना समझी का उत्तराखण्ड
मै तो एक परिन्दा हूॅं कविता में व्यंग दरिन्दा हॅूं
एक छोटे पद का बाबू हॅूं जो पहले से बे - काबू हूॅं
जनमानस में भाव जगा था नया राज्य बनवायेंगें
सुख सुविधा से इस प्रदेश का भारत भाल सजायेंगें

ना समझी की उत्सुकता ने घर घाट से खो डाला है
जनता नंगी घूम रही है बस नेता ही मतवाला है
सूबे के सरदार बनेगें दल - बल से मंत्री आयेंगें
कई जन्मों के दुख दरिद्र पाॅंच साल में धुल जायेंगें

राजनीति की दुर्वाशना खण्ड-खण्ड से खुष होती है
हल्केपन की राजनीति से नई पीढियाॅं ही रोती हैं
केन्द्र समर्पित हो जाते तो जीवन स्वालम्बी होता
उत्तराखण्ड का जन-मानस क्यों भ्रष्टाचारों से रोता

उत्तराखण्ड बनाया हमने क्या खोया क्या पाया हमने
जनता के थे क्या-क्या सपने यहाॅंतो लूट रहैं हैं अपने
लूट रहे है सेवक घर को जनता का क्या भला करेगें
उत्तराखण्ड की देव भूमि को राॅड,भाॅंड और साॅंड चरेंगें

पलता था जीवन घ्याडी में अब घूम रहैं हैं गाडी में
मुर्ग मसल्लम चलता है ,जीते थे धबडी बाडी में
घर में नही झंगोरा था अब बासमती की बातें हैं
परेशान थे भाडे से अब बत्ती लाल घुमाते हैं

तृष्कार का जीवन था अब संग में डी.एम डोल रहा है
राजनीति की कृपा से बस भ्रष्ट जोर से बोल रहा है
मुशकिल था लखनउ जाना अब तो देहरादून ठिकाना
देख के नेता गली-गली में श्वान-देव ने भी पहचाना

कोई पौडी का कोई टिहरी का ये कैसा खेल जगीरी का
कुमाॅंऊ यहाॅं पर भारी है बस,दोनो कौम भिखारी हैं
क्या विकास की बोली है बस, भरती अपनी झोली है
हर नेता यहाॅं अधूरा है चमचों का रूतबा पूरा है

कोई नेगी है कोई रावत है हर पद के पीछे दावत है
विस्थापित बशवाने हैं पर अपने नही ठिकाने हैं
सभी मुवावजा खातें हैं नाली का बिगाह बनाते हैं
भू - माफिया भारी है बस मालिक यहाॅं भिखारी है
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ना समझी का उत्तराखण्ड
मै तो एक परिन्दा हूॅं कविता में व्यंग दरिन्दा हॅूं
एक छोटे पद का बाबू हॅूं जो पहले से बे - काबू हूॅं
जनमानस में भाव जगा था नया राज्य बनवायेंगें
सुख सुविधा से इस प्रदेश का भारत भाल सजायेंगें

ना समझी की उत्सुकता ने घर घाट से खो डाला है
जनता नंगी घूम रही है बस नेता ही मतवाला है
सूबे के सरदार बनेगें दल - बल से मंत्री आयेंगें
कई जन्मों के दुख दरिद्र पाॅंच साल में धुल जायेंगें

राजनीति की दुर्वाशना खण्ड-खण्ड से खुष होती है
हल्केपन की राजनीति से नई पीढियाॅं ही रोती हैं
केन्द्र समर्पित हो जाते तो जीवन स्वालम्बी होता
उत्तराखण्ड का जन-मानस क्यों भ्रष्टाचारों से रोता

उत्तराखण्ड बनाया हमने क्या खोया क्या पाया हमने
जनता के थे क्या-क्या सपने यहाॅंतो लूट रहैं हैं अपने
लूट रहे है सेवक घर को जनता का क्या भला करेगें
उत्तराखण्ड की देव भूमि को राॅड,भाॅंड और साॅंड चरेंगें

पलता था जीवन घ्याडी में अब घूम रहैं हैं गाडी में
मुर्ग मसल्लम चलता है ,जीते थे धबडी बाडी में
घर में नही झंगोरा था अब बासमती की बातें हैं
परेशान थे भाडे से अब बत्ती लाल घुमाते हैं

तृष्कार का जीवन था अब संग में डी.एम डोल रहा है
राजनीति की कृपा से बस भ्रष्ट जोर से बोल रहा है
मुशकिल था लखनउ जाना अब तो देहरादून ठिकाना
देख के नेता गली-गली में श्वान-देव ने भी पहचाना

कोई पौडी का कोई टिहरी का ये कैसा खेल जगीरी का
कुमाॅंऊ यहाॅं पर भारी है बस,दोनो कौम भिखारी हैं
क्या विकास की बोली है बस, भरती अपनी झोली है
हर नेता यहाॅं अधूरा है चमचों का रूतबा पूरा है

कोई नेगी है कोई रावत है हर पद के पीछे दावत है
विस्थापित बशवाने हैं पर अपने नही ठिकाने हैं
सभी मुवावजा खातें हैं नाली का बिगाह बनाते हैं
भू - माफिया भारी है बस मालिक यहाॅं भिखारी है
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

hailendra Joshi
May 11 at 11:34pm ·

बिनसिरौ घाम
सुबैरो घाम
दुफरौ घाम
ब्याखुनी को घाम
तपैकी घमैकी
अछले जांदू पर
नयी तकनीक से पैदा ह्यु
रातों घाम मनमर्जी कु च
जब तक चैल्या तपल्या घमेल्या
चका चौंध हुयी च दीदा ................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
May 11 at 3:30am ·

वो आये यात्रा जात्ररा मे
टेंट वेंट लगाया बुग्यालो मे
ऊँचे हिमालयो मे
शांत वातावरण हवाओ मे
जड़ी बूटिया फुल पोधे
कुरचे वुरचे
दारू सारु पी
बोतल सोतल
फेकी
पैकेट सैकेट खाने वाने का
कूड़ाकरकट जहा तहा
सन्यासी कम अय्यासी ज्यादा
टट्टीया वट्टीया करी
जल्द दिये पर्यटक साब
जवाबदारी किसकी
सरकार तो माफीदार है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,शैलेन्द्र जोशी