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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बिनसिरौ घाम
सुबैरो घाम
दुफरौ घाम
ब्याखुनी को घाम
तपैकी घमैकी
अछले जांदू पर
नयी तकनीक से पैदा ह्यु
रातों घाम मनमर्जी कु च
जब तक चैल्या तपल्या घमेल्या
चका चौंध हुयी च दीदा ................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
May 11 at 3:30am ·

वो आये यात्रा जात्ररा मे
टेंट वेंट लगाया बुग्यालो मे
ऊँचे हिमालयो मे
शांत वातावरण हवाओ मे
जड़ी बूटिया फुल पोधे
कुरचे वुरचे
दारू सारु पी
बोतल सोतल
फेकी
पैकेट सैकेट खाने वाने का
कूड़ाकरकट जहा तहा
सन्यासी कम अय्यासी ज्यादा
टट्टीया वट्टीया करी
जल्द दिये पर्यटक साब
जवाबदारी किसकी
सरकार तो माफीदार है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये बी यखा कु रच्यु खेल चा

आच-कल म्यारा पहाड़े मा
ढोल दामू की धूम चा
ब्योला ब्योलि ब्यो लग्युं
बरातियों की मौज चा

देसी बिदेसी ब्रांड दारू की
आच-कल खुभ बिक्री चा
नचेडा नच नचेकी तुण्ड
अत पत खुठा लेतेड चा

घाम कु हुयूँ च लत पत
छर छर छयूँ च यख वख
धिंगतालु की थाप मा
कन मचयूँ देक झख छप चा

मद मस्त छईं छे पहाड़
कोक सोडा पानी निट कु यु मेल चा
जियुंदगी यख द्वि दिना की
ये बी यखा कु रच्यु खेल चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चिमना नि जगणा छीं .....

गुठ्यारा ढुंगा उतंणा हुयां छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?
द्वार मोरीयूं का ताला फांस खांणा छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?
दथुड़ी बिंयार उज्यलु खुज्यांणी छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?
लैंदा बैला बाघल भख्वरेणा छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?
खुद हरचि ग्या ,जिकुड़ा डूंडा हुयां छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?

पंद्यरा बिलखंणा छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?
भ्यूंल ढंडी प्वड़णौं तड़फुणूं च !
गालुंद कैका नि जांणु ?
बाटा लुकंणा छीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?
गौं का तीर ढीस मरघट सरक गीं !
गालुंद कैका नि जांणु ?

घाम रोजहि बियांणु च
मेरी समझ नि आंणु च !
तड़तड़ा घाम मा स्यु को ह्वालु
ढैया मा चिमना जगांणु च ।

द्वारा सुरेश थपलियाल घनजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पांणि का ढुंगा ! अर पांणी गत !

तिसला छिन पांणि का ढुंगा !
डैमवला पांणी का मुंड फर बंदूक लगै
अपहरण कैरगीं पांणी की उतलफाल !

सरकण से भी आँखा घुरयांणा छिन
दौड़णौ त प्रशन हि नि बणदू !
पांणी की जिकुड़ी फर म्वाला लगैकि
स्यूं जोर से पांणी का हत खुटा भटगैकि
तीसू रखंणा छिन वो पांणी थै भि !
ताकि ऊंकू विज्ञानिक कारण ह्वे साका पूरु !
भूखा तिसला म्वरदा पांणी थै छ्वड़दै
वेग से भागलो जब यो जान बचैकि
बिजली पैदा ह्वेली !

बिजली पैदा ह्वेली !
अर बिजली विभागा कु 'कर्मचारी घार घार जैकि बांट साकला बिजलीकु बिल !
बिजली मंत्री खुश रालो जनता खुंणै
२४ घंटा की बिजली आपूर्ति का चुनावी वादा पुरू हूंणा से ।

पांणी ढुंगा तिसला छिन !
उंकू भी नबंर आलो रोड़ी बणणा को
मंत्री जी कोठी लेंटर पर बिछ कै पे लिंयां
तरै कु छक्वे पांणी ! तब ।

द्वारा सुरेश थपलियाल घनजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये बी यखा कु रच्यु खेल चा

आच-कल म्यारा पहाड़े मा
ढोल दामू की धूम चा
ब्योला ब्योलि ब्यो लग्युं
बरातियों की मौज चा

देसी बिदेसी ब्रांड दारू की
आच-कल खुभ बिक्री चा
नचेडा नच नचेकी तुण्ड
अत पत खुठा लेतेड चा

घाम कु हुयूँ च लत पत
छर छर छयूँ च यख वख
धिंगतालु की थाप मा
कन मचयूँ देक झख छप चा

मद मस्त छईं छे पहाड़
कोक सोडा पानी निट कु यु मेल चा
जियुंदगी यख द्वि दिना की
ये बी यखा कु रच्यु खेल चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
May 20 at 7:24am ·

अपरी मा मि अब

अपरी गरीबी की
कथा कैमा लगाण
दोई बल्द कु जौड़
कै फुंगडा मिल हकाण

बंजा पौड़ी धरती यख
नि रैगे विंका सैगुस्याण
रीता पौडी रै गै सदनी
बणीगे ऊ जंगलाता धौर

निर्भगी रे माया
कया तेर यख पछाण
सुख़ मा सब दगडी
दुःख मा सब व्हैगे बिराण

कथगा धैये लगाण
क्ख ऊं थे हुमन रैबार पठणा
बंद व्हैगे अब ऊ सब चिठ्ठी-पत्री
क्ख हुलु ओंका अब ठों ठिकाण

अपरी मा मि अब
लग्युं छों यखुली बचाण
रैगे जीयू द्वि सांस कु ठौर
चखुली बण हुमन उड़ जाणा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
19 hrs · Edited ·

ऊदास नि ह्वैन.....

दिदा भुलौं मैं भोळ ब्‍याख्‍ना,
अपणा प्‍यारा गौं,
कुलदेवी चंद्रवदनी मंदिर का धोरा,
बागी नौसा जाणु छौं,
नेट सी एक हफ्ता दूर रौलु,
प्‍यार सी बतौणु छौं.....

मेरी खुद मा नि खुदेन,
नि रयेलु त 09654972366 फर,
फोन प्‍यार सी लगैन,
रोमिंग की चिंता न करयन,
खौलु काफळ अपणा मुल्‍क,
भिन्‍डी ने तरसेन,.....

तुमारु ज्‍यु करलु त,
झोळा उठैक तुम भी,
अपणा गौ मुल्‍क ऐन,
अपणा प्‍यारा पहाड़ कू,
ठंडु बथौं खैन....

ज्‍यु नि मारयुं चैंन्‍दु,
चार दिन की छ या जिंदगी,
बग्‍त औण फर चलि जौला,
जब तक ज्‍यूुदा छौं,
जल्‍मभूमि का गीत गौला,
तख औला अर जौला........

मेरा कविमन की कुतग्‍याळि
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 22.5.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

स्‍वर्गवासी रामबाबू ''जंगली"......

बणु का पंछी पोथ्‍लौं,
अर बण का जीवू की,
बोलि निकाळ्न वाळा,
''जंगली" जी आज,
हमारा बीच निछन......

''जंगली" जी सदानि,
बण का जीव अर,
पोथ्‍लौं का प्रति प्रेम,
बढ़ौण कू संदेश,
जगा जगा जैक,
देन्‍दा रन्‍दा था......

यना जीव जंतु प्रेमी,
जौकु दुखद अंत,
मन मा करुणा,
पैदा करदु,
क्‍वी मदद नि मिलि,
ईलाज का खातिर,
सरकार बिटि,
जबकि ''जंगली" जी,
उत्‍तराखण्‍ड की शान था....

मंगला रावत जी का,
सहायतार्थ कार्यक्रम मा,
''जंगली" जिन,
बाग बंदर अर पोथ्‍लौं की,
आवाज निकाळिक,
सुणै थै,
गढ़वाळ भवन,
सभागार मा.....

शत शत नमन,
रामबाबू ''जंगली" जी कू,
शांति अर सदगति,
प्रदान करवन,
भगवान बद्रीविशाल जी,
स्‍वर्गवासी ''जंगली" जी तैं,
मेरा कविमन की,
कामना छ..........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 20.5.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा प्‍यारा उत्‍तराखण्‍डी भै बंधो जरा मन मा गुणा क्‍या छुटणु छ हमारा हातु सी?

मेरी गढवाळि कविता कू एक अंश।

लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हातु सी छुटदु जाणु छ..........................

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 20.5.2015