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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तुम लगा पलायन का गीत
मैं अबेर च होणी
तुम बिचारा दिल्ली बम्बे वाळा
ह्वेगी होली खाणि पेणी
तुम लगा पलायन का गीत
मैं अबेर च होणी

सुबेर उठिक साळी जाण
मुण्ड मां गागर पाणी ल्योंण
झट रोट्टि कल्यो की बणाण
नितर नोनूं न भूखि इस्कूल चलि जाण
फोन मां बि बच्याणे बगत नी च होणी
तुमलगा पलायन का गीत
मैं अबेर च होणी

फोटु डाला रांजी बांझी पुंगड़यूँ की
फोटु डाला रीता पाणि पन्देरों की
फोटु डाला खन्द्वार कुड़ीयों की
मि तें त सोंचणे बि कख बगत
अभि हकौण बाँदर गूणी
तुम लगा पलायन का गीत
मैं अबेर च होणी

मि त तब भि यकुली छौ
आज बि यकुली छौं
सुबेर बिटि रात तक सदानि
मैं अबेरे रै होणी
तुम भगयान् बोलला पलायन पलायन
मैं त द्वि रोट्टी चपोणे बि बगत नी च होणी
तुम लगा पलायन का गीत
जों कि कोठि भैर छन चीणी
जु गैन यख बि बोग मारी
तों पलायने पिड़ा च होणी
थूका आँसू लगे कना सुदी
रोणी धोणी
तुम लगा पलायन का गीत
मैं अबेर च होणी

@उमा भट्ट

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

य सोरण क्यांकि ह्वेली ?
-.--.--.-

सिनै न देख चसगलाल !

किलै बै ? ककरोट बुखार ।

क.बु : य सोरण भौत पुरणीं च हमरा गौं का भ्याल ! ईं जनै द्यखंणा से मनिख्यूं कु अधा बल चल जांद बल !
पुरंणा लोग ब्वलदा छाया !

च.ला : ओहो ! त्यारा बाबू अधा बल ईं सोरण देखिक ग्या झंणी !
क.बु : त्यारू ददा भि अधा रै ग्या छायो !

च.ला : तु पैड़ लेखि भि इन बथा कनु छै ! मित इसकोल जांणा डौर बचपन मा यखि लुक्यूं रैंदु छायो , निरभै करमकोड़ी !

क.बु : हट कमींणा ! इनै क्वी गौं करू नि आंदु ! यख पुटग बल रिक त कभि बाग रैंद घुस्यूं !

च.ला : अबै यांलै त फैदा ह्वाई मीथै ! पैली बीड़ी पींणी सिखीं अब दारू पींदु यख निजरकु कै ! वेका बाद म्यारू बल अधा चुले फुल ह्वे जांद !

क.बु : रिक अर बागै डैर नि लगदी त्वे निगुसैंकरा ?

च.ला : लाटा भितर कंटर रैंद धर्यूं ! बजांणा खुंणै ! उन भि बैला गोरू थै नि खांदु बाग !

क.बु : तबि छै तु बच्यूं नथर मि जन क्वी मास्टर हूंदु त् कभि क ह्वे जांदि छपिंडी !

च.ला : मास्टर ककरोट बुखार त्वे थै सरकरी बेनिफिट च अर मीथै सोरण बैनिफिट त् मिलंण हि चैंद !
सब्या मास्टर ह्वे जाला त् सोरणु पुटग कु जालु ?

सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मुख से झलके संस्कृति का प्यार
नथुली बिंदी झुमका मांग टिका साथ

संपूर्ण खोज है वो जीवन की
मेरे इस पत्थरों के मधुबन की
श्यामल ममता की वो हरयाली
मेरे ऊँचे निचे पहाड़ों की वो क्यारी

गुलूबंद का वो गालों का हार
उससे ही बंधा पड़ा है मेरा सारा पहाड़
छोटी से कविता है उनके लिये
कैसे कोई उन्हें एक धागे में पिरो सके

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बीत ही जाला दिन

बीत ही जाला दिन ये बी
बीत ही जाला दिन
कब तक राला इन ये बी
कब तक राला इन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

ये बी ना राला
सब फुर्र उडी जाला
ये बी ना राला
सब फुर्र उडी जाला
ये जिबान कु चखुल
दाना चुगै की तीन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

आणु व्हालु ऊ ऐ बी जालु
नि आणु वहालु ऊ क्ख भत्ते आलू
आणु व्हालु ऊ ऐ बी जालु
नि आणु वहालु ऊ क्ख भत्ते आलू
फिर इन रास्ता देकि की
बल बोल दे तिल कया कन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रे मलेथा देक तू बी .......

कया बदली गे
म्यारा पहाड़ों मा
ब्याल मिल फिर देक्यली
कुच नि बदली यख
कुच नि बदली
पैली जनि ही वा रैग्याई
वै हाता मा बी डंडा छ्या
ये हाता मा बी डंडा च
वैल बी मारी मिथे
यैल बी मिथे मऱ्याली
मि थे समझी की बिमारी
म्यारा हात
इनि सदनी रैगे रीता
सड़की की बस मेरी लागि फेरी
आंदोलन बस आंदोलन
म्यारा भग्या म रैगे सदनी
कया बदली गे
म्यारा पहाड़ों मा
रे मलेथा देक तू बी .......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बुरांस खिल्युं चा

बुरांस खिल्युं चा
ये गेल्या देक बुरांस खिल्युं चा
लाल रंगा मा खिल ग्याई देक
देक कन हैंसणुं चा , बुरांस खिल्युं चा

डंडा डंडा मा कांडा कांडा मा
बुरांस खिल्युं चा औ बुरांस खिल्युं चा
अपरी मा देका जख तख देका
नजरी गैं वख तख देखा
पहाड़ सज्युं चा ,बुरांस खिल्युं चा

माया मेरी माया तेरी कैन लगिचा
ढुंगा देशा मा चल देकणु बुरांस खिल्युं चा
हरा हरा पाती जगमगण लगगै बाती
यूँ ह्युं चलूँ चांटी गद्नि का बाटी
भोरीगे साऱ्या घाटी ,बुरांस खिल्युं चा

जिकोड़ो मेरु मेसै कैनु लग्युंचा
तँसूँ तिस बुझाण ऐजा यख बुरांस खिल्युं चा
गलोड़ी का रंग बुरांस का संग
ऐबार छूछा तै थे रैबार पठ्यूं चा
आँखा फूटगे मेरु फिर देकणु ,बुरांस खिल्युं चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
19 hrs ·

पहाड़ की याद.....

भड़ोक्‍युं थौ मन भारी,
होयिं थै लाचारी,
द्वी कटोरी पळ्यौ पिनि,
मन ह्वै खुश भारी......

छप छपि सी पड़ि तब,
लिंबु की खटै खाई,
फंसोरिक सेयौं तब,
यनि निंद आई.....

रुड़यौं का दिन छन,
होन्‍दा काफळ रसीला,
लगिं संगि खाणा होला,
हे प्रभु तेरी लीला....

छोया ढुंग्‍यौं का पाणी की,
भारी याद औणि,
पहाड़ की याद भुलाैं,
भारी छ सतौणि....

कवि जिज्ञासु की कलम सी कल्‍पना ठेट दर्द भरी दिल्‍ली मा।
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 11.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
22 hrs ·

हे सरुलि,
तेरी मुखड़ि,
यनि छ दिखेणि,
कांठा मा की जोन जनि,
मुल मुल हैंसणि........

कवि जिज्ञासु की कलम सी श्रृंगार रस की रसधारा
दिनांक 11.6.2015

Raje Singh Karakoti

अति सुन्दर संकलन प्रिय मेहता जी,

राजे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
14 hrs ·

हमारा गौं मा बिजळि.....

जब बिटि आई,
तब बिटि ह्वैग्‍यन,
मेरा गौं का रोगी,
बोला त भोगी,
अपणा अपणा भितर,
यकुलि बैठिक,
देखणा छन समाचार,
होणु छ शहरी,
संस्‍कृति कू प्रचार.......

http://jagmohansinghjayarajigyansu.blogspot.in/