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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


त्यारा रूपकि, झौल माँ
जल जली म्वासु ह्वेगयुं
तेरि रत्नयली आंखिय डूबि
डूबी २ , मैत हरचियग्युँ
बातत बातो मै ,अग्वाड़ी हिटो
बरसू बिटि हिटणु छउ
हिट -हिट बाटू हर्ची गयुं !
-- कॉपीराइट @ पराशर गौर
१९ जून २०१५ शयम ८. ४५

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Parashar Gaur and 140 others
June 20 at 1:14pm ·

देकि रंग ये शहरा को

देकि रंग ये शहरा को
भुली गे भुल्हा रंग अपरू डैरा को

बरमंड चढ़ी गे अब ये जब टक्का जी
कैथे याद आणा कुच अपरू कका जी

दिल्ली मुंबई अब सारू भैर देश विदेश
प्रवासी बनिगे अपरू उत्तरखंड को हर बच्चा जी

सुप्नीय भोरी आँखों मा बल जब उड़णा का
बल कैल आणा यख भुंया पड़ी कांटा मिटणा को

सिकेसारी किर्मोला का रंगा सरया पहाड़ बिछ्यां
बल तैर बैठ्या छन सब का सब वैमा हिटणा को

मि ध्यानी बी वै बाटा मा हिटयूं
कै गिच से ध्यै लगूं ऊँथे परती की पहाड़े आणा को

देकि रंग ये शहरा को
भुली गे भुल्हा रंग अपरू डैरा को

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
June 12 at 5:58pm ·

ईं भरी दिल्ली मा

ईं भरी दिल्ली मा दिल्ली मा
जख देका वख एक उत्तराखंडी दिक् जालु
देक कि तेथे रे पहाड़ी ऊ बौग व्है जालु
ईं भरी दिल्ली मा

क्वी नि कैदु यख बात कैसे
कब और्री कनकै कि व्हैली अब मुलाक़ात तैसे
बिरनु बिरनु व्हैगे रे मुल्की बल अब तू
ईं भरी दिल्ली मा

बल अब लाट साहब व्हैगे तू
सूटबूट टै कु बल अब रखवालदार व्हैगे तू
पछाण कि बी मीथै अब अजाण व्हैगे तू
ईं भरी दिल्ली मा

कन तेर जामा अब मोरीगे
कन तैसे अपरू पहाड़ बल अब छूटिगे
पास रैकी बल अब तू दूर व्हैगे
ईं भरी दिल्ली मा ईं भरी दिल्ली मा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
June 11 at 5:39pm · Edited ·

बीत ही जाला दिन

बीत ही जाला दिन ये बी
बीत ही जाला दिन
कब तक राला इन ये बी
कब तक राला इन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

ये बी ना राला
सब फुर्र उडी जाला
ये बी ना राला
सब फुर्र उडी जाला
ये जिबान कु चखुल
दाना चुगै की तीन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

आणु व्हालु ऊ ऐ बी जालु
नि आणु वहालु ऊ क्ख भत्ते आलू
आणु व्हालु ऊ ऐ बी जालु
नि आणु वहालु ऊ क्ख भत्ते आलू
फिर इन रास्ता देकि की
बल बोल दे तिल कया कन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
June 12 at 5:58pm ·

ईं भरी दिल्ली मा

ईं भरी दिल्ली मा दिल्ली मा
जख देका वख एक उत्तराखंडी दिक् जालु
देक कि तेथे रे पहाड़ी ऊ बौग व्है जालु
ईं भरी दिल्ली मा

क्वी नि कैदु यख बात कैसे
कब और्री कनकै कि व्हैली अब मुलाक़ात तैसे
बिरनु बिरनु व्हैगे रे मुल्की बल अब तू
ईं भरी दिल्ली मा

बल अब लाट साहब व्हैगे तू
सूटबूट टै कु बल अब रखवालदार व्हैगे तू
पछाण कि बी मीथै अब अजाण व्हैगे तू
ईं भरी दिल्ली मा

कन तेर जामा अब मोरीगे
कन तैसे अपरू पहाड़ बल अब छूटिगे
पास रैकी बल अब तू दूर व्हैगे
ईं भरी दिल्ली मा ईं भरी दिल्ली मा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hrs ·

उत्तराखंड में है गाँव मेरा

उत्तराखंड में है गाँव मेरा
मै उस से जुदा वो सब से जुदा
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

कहते हैं वहां पे दिखता है खुदा
मन में बसा वो मेरे वो क्यों हो गया जुदा
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

कंकड़ कंकड़ बोलता है वहां
मै एक कंकड़ वहां क्यों ना बोल सका
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

ये बहती हवा उसके होने का अहसास दे
जा यंहा से बह के वहां जा के मेरा प्यार दे
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

अकेला यंहा मै है अकेला वहां वो
फासले बढ़ गये क्यों सीने गढ़ गयी दूरियां
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

पूछों किस को है ये किस की खता
चुप हूँ मै अब वो भी अब चुपचाप खड़ा
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

डर है मुझे वो दिन ना आ जाये कहीं
ना हम कहें कभी की
उत्तराखंड में था कभी गाँव मेरा
उत्तराखंड में था कभी गाँव मेरा
उत्तराखंड में था कभी गाँव मेरा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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Anoop Rawat
17 hrs ·

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
त्यारा कारण परदेशी आई.
टुप द्वी दिनों कु ही सै,
अपड़ी देवभूमि भेंटे ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
बाल बच्चों दगड़ी आई.
छुट्यों का बाना ही,
अपडू गौं मुलुक देखि ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
ढोग्यां द्वार खोलि ग्याई.
चौक तिबारी साफ कैरी,
भैर भितर सब हेरी ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
देवी देवतों सेवा लगे ग्याई.
हिंशोला-किन्गोड़ा, काफल, आडू,
सब्बी धाणी खै ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
आपस मिंत्र भेंटी ग्याई.
दाना सयाणा देखि की,
परदेश का बाटा पैंटी ग्याई...

धन्यवाद तेरु रूड़ी,
इनि सदानी आंदी रैई.
मेरा भाई-बंधु थैं,
यनि पहाड़ बुलान्दी रैई...

©२०१५ अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी, उत्तराखंड

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
18 hrs ·

पहाड़ों पे पहली बरसात

पहाड़ों पे पहली बरसात
जब गिरती है झम झम
मयूर नाच उठते हैं
नाच उठते हैं ये तन मन

धरा भीग जाती है
भीग जाते हैं जब ये जल थल
सौंधी सुगंध माटी की
तृप्त करती है जब ये मन

अंकुरित होते हैं भाव
नये नये रूप लेकर वो सृजन सार
देख इन्द्रधनुष के वो सात रंग
पत्थरों पर जब आ जाता यौवन

कई नदी नयी निकलती है
अठखेली लेती है वो झरनों के संग
पहाड़ों पर चल देखने वो उमंग
चलो झूमें और भीगे उसके संग

पहाड़ों पे पहली बरसात ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
17 hrs ·

शाम कु नाजरू शैलेन्द्र जोशी का क्लिक बिटि दगड़ा मा नयी रचना देख सकदी त देखली

म्येरा चंचलता का गदेरो
भित्र लुक्यु ढक्यु
गंभीरता कु गौमूख गंगा
विका भित्र च चिंतन कु
अथाह समोदर
देख सकदी त देखीले
निथर येकू बि
सुधि चंचलता भरि
मजाक समझले ..................................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ के गुलजार नेगी दा की इस रचना की याद आ गयी आज आसमान को देखकर जो आजकल के मौसम अनुकूल है
फोटो क्लिक......................शैलेन्द्र जोशी

असाड कुयेडी लौकण सी पैली
सौंण बरखा पाणी बरखण सी पैली
ऐजयी फिर दिन निछन
भादो का भादोड़ा बाण सी पैली
ऐजयी फिर दिन निछन
बामण बुन्नु च
फिर दिन निछन
देखयाली पत्डू
बंचायाली पत्डू
फिर दिन निछन
कख धरी च चापत्ती
गुड़ चिन्नी मिन्नी च
त्वैमा क्या बुन घर की बात
उबली खिचड़ी चढ़ा यी च
त्वै दगड़ी गै दाळ भात
पेटा अंदडा पिंदडा
सुखण पैली
कख धरी च चापत्ती
गुड़ चिन्नी नि मिन्नी च
चाबी दगड़ी लि गयी
अलमारी नि खुन्नी चा
घर का ताला कुंजा
टूटण से पैली
ऐजयी फिर दिन निछन
बल्द सिंग पल्याणा छिन
घास पाणी तरकिणी चा
भैसी औण देणी चा
एक लत्या गौड़ी लत्याणी चा
लैंदी गौड़ी भैसी छुटण सी पैली
ऐजयी फिर दिन निछन
मैकू प्यारी तू ही रै
त्वैकू प्यारु मैत हवे
त्येरा मैत्यु रै भरुम
सदानी म्येरी
जिकुडी झुरै
नया ब्यो कु डोला
लौण सी पैली
ऐजयी फिर दिन निछन