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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 पहाड़ की याद.....
भड़ोक्‍युं थौ मन भारी,
होयिं थै लाचारी,
द्वी कटोरी पळ्यौ पिनि,
मन ह्वै खुश भारी......
छप छपि सी पड़ि तब,
लिंबु की खटै खाई,
फंसोरिक सेयौं तब,
यनि निंद आई.....
रुड़यौं का दिन छन,
होन्‍दा काफळ रसीला,
लगिं संगि खाणा होला,
हे प्रभु तेरी लीला....
छोया ढुंग्‍यौं का पाणी की,
भारी याद औणि,
पहाड़ की याद भुलाैं,
भारी छ सतौणि....
कवि जिज्ञासु की कलम सी कल्‍पना ठेट दर्द भरी दिल्‍ली मा।
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 11.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 हमारा गौं मा बिजळि.....

जब बिटि आई,
तब बिटि ह्वैग्‍यन,
मेरा गौं का रोगी,
बोला त भोगी,
अपणा अपणा भितर,
यकुलि बैठिक,
देखणा छन समाचार,
होणु छ शहरी,
संस्‍कृति कू प्रचार,
दिल्‍ली वाळा भैजि कू,
फोन औन्‍दु त बतौन्‍दा,
हे भैजि,
आज तुमारी दिल्‍ली मा,
क्‍या ह्वैगि हपार,
आप की बणिगि सरकार....

जै दिन मैच हो,
ठप्‍प ह्वै जान्‍दि धाण,
हळ्या भैजि भि बोल्‍दु,
आज मैंन हौळ नि लगाण,
लग्‍दा जब चौक्‍का छक्‍का,
ह्वै जांदन हक्‍का बक्‍का,
डौर भि लग्‍दि,
कखि बिजळि न चलि जौ,
मोळ माटु नि ह्वै जौ.....

बोडि का नौना कू,
फोन आई,
बेटा आज बिजळि,
नि थै दिन भर गौं मा,
वे तैं बोडिन बताई,
यू फोन त मैंन,
बजार भेजिक,
चार्ज करवाई,
त्‍वैकु बोलि थौ,
एक इन्‍वर्टर लगै दे,
बिजळि कू,
क्वी भरोंसु नि रन्‍दु,
अंधेरा मा दिखेन्‍दु निछ,
मैं गज बज लग्‍युं रन्‍दु......

बिजळि का खातिर,
गौं का छोरा,
ट्रांसफार्मर रन्‍दन घच्‍चकौणा,
ऐगि बिजळि, गौं जथैं,
धै रन्‍दन लगौणा,
किलैकि तार ढीलु होण सी,
बिजळि नि औन्‍दि,
भारी आफत ह्वै जान्‍दि,
हमारा गौं मा,
बिजळि का बिना,
बिजळि कू राज छ आज,
गुलाम ह्वैगि गौं समाज.....

-जगमोहन सिंह जयाडा़ जिज्ञासु,सर्वाधिकार सुरक्षित,
ब्‍लाग फर प्रकाशित, दिनांक 12.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ईं भरी दिल्ली मा

ईं भरी दिल्ली मा दिल्ली मा
जख देका वख एक उत्तराखंडी दिक् जालु
देक कि तेथे रे पहाड़ी ऊ बौग व्है जालु
ईं भरी दिल्ली मा

क्वी नि कैदु यख बात कैसे
कब और्री कनकै कि व्हैली अब मुलाक़ात तैसे
बिरनु बिरनु व्हैगे रे मुल्की बल अब तू
ईं भरी दिल्ली मा

बल अब लाट साहब व्हैगे तू
सूटबूट टै कु बल अब रखवालदार व्हैगे तू
पछाण कि बी मीथै अब अजाण व्हैगे तू
ईं भरी दिल्ली मा

कन तेर जामा अब मोरीगे
कन तैसे अपरू पहाड़ बल अब छूटिगे
पास रैकी बल अब तू दूर व्हैगे
ईं भरी दिल्ली मा ईं भरी दिल्ली मा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
June 11 at 5:39pm 

बीत ही जाला दिन

बीत ही जाला दिन ये बी
बीत ही जाला दिन
कब तक राला इन ये बी
कब तक राला इन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

ये बी ना राला
सब फुर्र उडी जाला
ये बी ना राला
सब फुर्र उडी जाला
ये जिबान कु चखुल
दाना चुगै की तीन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

आणु व्हालु ऊ ऐ बी जालु
नि आणु वहालु ऊ क्ख भत्ते आलू
आणु व्हालु ऊ ऐ बी जालु
नि आणु वहालु ऊ क्ख भत्ते आलू
फिर इन रास्ता देकि की
बल बोल दे तिल कया कन
बीत ही जाला दिन
हो ....बीत ही जाला दिन

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
9 hrs 

मै अपने पहड़ों पे लिखता चला गया

मै अपने पहड़ों पे लिखता चला गया
नये सोच नये विचारों को गढ़ता
मै उस पर चलता चला गया
मै अपने पहड़ों पे लिखता चला गया

पुराने को सँजोना था नये को अपनान था
मै उस में समन्वय को बिठाने को
मै उस पर चलता चला गया
मै अपने पहड़ों पे लिखता चला गया

इस पथ पर और भी पहले पथिक चले होंगे
एक सड़क जो उनके क़दमों से बनी होगी
मै उस पर चलता चला गया
मै अपने पहड़ों पे लिखता चला गया

मेरे पीछे पीछे और आयेंगे ये मुझको यकीन है
इस के पथ पे बिछे उन काँटों को
मै चुनता चला गया
मै अपने पहड़ों पे लिखता चला गया

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
22 hrs ·

ढुंगा ऐंच लठगिक,
खुश होयिं छैं भारी,
हैंसणि होलि क्‍वी भग्‍यान,
दूर बिटि बिचारि......

-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
दिनांक 15.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
June 12 at 4:56pm ·

हमारा गौं मा बिजळि.....

जब बिटि आई,
तब बिटि ह्वैग्‍यन,
मेरा गौं का रोगी,
बोला त भोगी,
अपणा अपणा भितर,
यकुलि बैठिक,
देखणा छन समाचार,
होणु छ शहरी,
संस्‍कृति कू प्रचार.......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Shailendra Joshi added 5 new photos.
June 11 at 11:08pm ·

पांच बिस्वा नि लेला
जबतक जमीन दूण मा
मोकछ परापत नि होण
निथर नौनौन बुन
तुम म्यारा सच्चा
उतराखंडी बुबा निछा
चला दग्डयो दूण फिर
मिथे अपणी इज्जत
भौत प्यारी च............शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
June 11 at 10:27pm ·

सड़क्यु मा ल्वे खत्यु
कखी सुखु कखी गिलु
हे लोला कब चिताली तू
ल्वे की बास
किल्हे खतेणु
सड़क्यु मा ल्वे .................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उन्नी जंगल मा
आग बर्फ़ी रुड़ी बुडी
जल बर्खांदु लोला
तिल त जंगल जलैली
करेली खारु
टुक ही टुक
रैगी डालू कु हैरू................शैलेन्द्र जोशी