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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्‍या छ जिंदगी.....

जिंदगी कू राज,
जाण्‍न का खातिर,
जिंदा रणु जरुरी छ......

मेरी यीं कविता तैं आप मेरा ब्‍लाग फर देखि अर पढ़ि सकदा छन
-कवि जिज्ञासु, 12.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
21 hrs ·

घंघतोळ....

मन मा होयुं भारी,
पहाड़ जौलु कि नि जौलु,
रिटैरमेंट का बाद,
तख जुग्‍ता रौलु कि नि रौलु.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 12.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
June 11 at 2:10pm ·

पहाड़ की याद.....

भड़ोक्‍युं थौ मन भारी,
होयिं थै लाचारी,
द्वी कटोरी पळ्यौ पिनि,
मन ह्वै खुश भारी......

छप छपि सी पड़ि तब,
लिंबु की खटै खाई,
फंसोरिक सेयौं तब,
यनि निंद आई.....

रुड़यौं का दिन छन,
होन्‍दा काफळ रसीला,
लगिं संगि खाणा होला,
हे प्रभु तेरी लीला....

छोया ढुंग्‍यौं का पाणी की,
भारी याद औणि,
पहाड़ की याद भुलाैं,
भारी छ सतौणि....

कवि जिज्ञासु की कलम सी कल्‍पना ठेट दर्द भरी दिल्‍ली मा।
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 11.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
June 11 at 11:53am ·

हे सरुलि,
तेरी मुखड़ि,
यनि छ दिखेणि,
कांठा मा की जोन जनि,
मुल मुल हैंसणि........

कवि जिज्ञासु की कलम सी श्रृंगार रस की रसधारा
दिनांक 11.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
June 11 at 9:32am ·

झम्‍मज्‍याट भि नि पड़ि......

मेरा मुल्‍क का कुछ मनखि,
बैठ्यां था कछड़ि लगैक,
अर पेण लग्‍यां था दारु,
कुछ मनखि यना था,
जौंकु जिंदगी मा,
बल दारु हिछ सारु,
दारु विदेशी थै,
वींकु नशा घतघतु,
मनखि झटट सी,
नि ह्वै सकदु रंगमतु....

बोतळ खाली ह्वै,
हौर ल्‍हौण भि कखन थै,
काळी रात की बात थै,
तब एक मनखिन बोलि,
अरे भाई, क्‍या होलु,
झम्‍मज्‍याट भी नि पड़ि....

जै मनखि का घौर,
कछड़ि सजिं थै,
वेकु ऊ रिस्‍तेदार थौ,
ऊ तब कखिन,
जुगाड़ लगैक,
लोकन ब्राण्‍ड ल्‍हाई,
वे मनखिन घूंट लगाई,
तब रोठ्ठी खान्‍दु खान्‍दु,
झम्‍मज्‍याट दूर करि,
ऊताणदण्‍ड ह्वै ग्याई......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
कल्‍पना मा ठेट गढ़वाळि शब्‍दु का प्रयोग कू मेरु प्रयास
सर्वाधिकार सुरक्षित, दिनांक 11.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
June 10 at 11:09am · Edited ·

ज्‍युकड़ि टुकड़ि टुकड़ि करिक,
हैंस्‍दु हैंस्‍दु चलिग्‍यें,
मन सी सोच हे लठयाळा,
भौंकुछ तू करिग्‍यें......कवि जिज्ञासु ऊवाच

लाल दा अर बिष्‍ट जी अपणि दिव्‍य दृष्‍टि जरुर डाळ्यन अर मन का उद्गार भी हास्‍य अंदाज मा व्‍यक्‍त करयन, या मेरा कविमन की आस छ आपसी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मान्यताप्राप्त ! पलायन
-.--.--.--.--.--.--.-

थमेदीं नि अज्यूं भि लंग्यार, प्रवासीयूं का देश ,
पंक्ति फर पंक्ति
रूंदी पिड़ा जिकुड़ीयूं कि , कवीयूं कि अभिव्यक्ति !

नब्ज चयेंद पाड़ मा सांगल सि चयेंद जीवट इच्छाशक्ति !
यखुलि नि छौं मि बिना पंखूंणो
'पलायन पंछी'
मुंडमा सब्युं की माटै खैरीयूं की फंची ,
अकलकंठ की बात करद कुमति ।
जग्गा बदलि ,बदली त् गे भक्ति !
निरसू पलायन गीत ह्वे त् जालू बंद ....द्वी एक दिनु मा
प्रवासी भैबंद मान्यताप्राप्त नागरिक छीं बल !
अपंणा अपंणा प्लॉटुमा !
बंणिक पर्यटक आंदा-जांदा छीं अपंणा देश मा !
अर् खौल्ये जंदी बगछट मौलदा डांडौं कु अवारापन देखि अफ्वी ,
चम चलक्वार ऐ जांद मुखड़ीयूं
पहाड़ा सौंर्दयगीत लगंदीं जब आस औलदी प्रवासीयूं कि ।
.
सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हमारा गौं मा बिजळि.....

जब बिटि आई,
तब बिटि ह्वैग्‍यन,
मेरा गौं का रोगी,
बोला त भोगी,
अपणा अपणा भितर,
यकुलि बैठिक,
देखणा छन समाचार,
होणु छ शहरी,
संस्‍कृति कू प्रचार.......

http://jagmohansinghjayarajigyansu.blogspot.in/
पूरी कविता अाप मेरा ब्‍लाग फर देखि अर पढ़ि सकदा छन...

-जगमोहन सिंह जयाडा़ जिज्ञासु,सर्वाधिकार सुरक्षित,
ब्‍लाग फर प्रकाशित, दिनांक 12.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 हमारा गौं मा बिजळि.....

जब बिटि आई,
तब बिटि ह्वैग्‍यन,
मेरा गौं का रोगी,
बोला त भोगी,
अपणा अपणा भितर,
यकुलि बैठिक,
देखणा छन समाचार,
होणु छ शहरी,
संस्‍कृति कू प्रचार,
दिल्‍ली वाळा भैजि कू,
फोन औन्‍दु त बतौन्‍दा,
हे भैजि,
आज तुमारी दिल्‍ली मा,
क्‍या ह्वैगि हपार,
आप की बणिगि सरकार....

जै दिन मैच हो,
ठप्‍प ह्वै जान्‍दि धाण,
हळ्या भैजि भि बोल्‍दु,
आज मैंन हौळ नि लगाण,
लग्‍दा जब चौक्‍का छक्‍का,
ह्वै जांदन हक्‍का बक्‍का,
डौर भि लग्‍दि,
कखि बिजळि न चलि जौ,
मोळ माटु नि ह्वै जौ.....

बोडि का नौना कू,
फोन आई,
बेटा आज बिजळि,
नि थै दिन भर गौं मा,
वे तैं बोडिन बताई,
यू फोन त मैंन,
बजार भेजिक,
चार्ज करवाई,
त्‍वैकु बोलि थौ,
एक इन्‍वर्टर लगै दे,
बिजळि कू,
क्वी भरोंसु नि रन्‍दु,
अंधेरा मा दिखेन्‍दु निछ,
मैं गज बज लग्‍युं रन्‍दु......

बिजळि का खातिर,
गौं का छोरा,
ट्रांसफार्मर रन्‍दन घच्‍चकौणा,
ऐगि बिजळि, गौं जथैं,
धै रन्‍दन लगौणा,
किलैकि तार ढीलु होण सी,
बिजळि नि औन्‍दि,
भारी आफत ह्वै जान्‍दि,
हमारा गौं मा,
बिजळि का बिना,
बिजळि कू राज छ आज,
गुलाम ह्वैगि गौं समाज.....

-जगमोहन सिंह जयाडा़ जिज्ञासु,सर्वाधिकार सुरक्षित,
ब्‍लाग फर प्रकाशित, दिनांक 12.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 मन कू बैम.....
घिमणाट सिमणाट होयुं छ,
यू निर्भागि ज्‍यु पराण,
भिभड़ाट सुणि सुणिक,
डरि डरिक भारी डरयुं छ,
यन लगण लग्‍युं जन,
भैर कखि भूत अयुं छ,
ह्वै सकदु बाग हो,
बाखरयौं कू भिभड़ाट,
ओबरा मच्‍युं छ,
कब खुललि काळी रात,
अंधेरु अड़ेथि दिन आलु,
डौर दूर होलि मन सी,
मन कू बैम मिटि जालु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
कल्‍पना मा ठेट गढ़वाळि शब्‍दु का प्रयोग कू मेरु प्रयास
सर्वाधिकार सुरक्षित, दिनांक 10.6.2015