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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
6 hrs ·

कच्ची ( दारु ) "

( सूर्य अस्त /पहाड़ मस्त.. स्वर्गीय कबी गुरुदेब कन्हया लाल डंडरियाल जी की कबिता " चा " से प्रेरित होकर )

कच्ची भवानी इस्ट च मेरी
दिलम बस्दा, बस क़चि वा
एक तुराक जख्मी मिलजा
मंदिर मिखुणि ब्ख्मै चा !
सुधनी मीथै अपणा बिरण की
याद नि औंदी मी कै की ...
स्वीणम बीणम रटना रैंदा
दगड्ओ मीथै, बस कचिकी
बच्यु छो, मी कच्ची पीणाकु
मुरुणच मिन, कच्ची पेकी !

मुरुणु बैठ्लू मुगदानो की तब
बाछी नि लाणी खोजिकी
हथपर दिया दगड्ओ मेरा
बोतल बस एक कच्ची की !

गिचम म्यारो घी नि धुल्णु
धुल्या , पैली तुराक भटी का
हबन कनी चितामा मेरी
पैलू पैलू कनस्तर कची का !

कफ़न कपड़ा कवी नि दीणा
डुरडा ह्वी बस बबला का
लास पर मेरी चोछ्याड़ी बटी
लटकी ह्वी अध्य ,बोतल कच्ची का !

सटी लगया ना छुरक्यु मेरी
ख्ल्या रस्तोमा बोतल कच्ची की
अर उकै कदमा रवा सांग मेरी
ज़ोकी दूकान ह्वी कच्ची की !

लास मेरी मडघट माँ दगड्यो
ली जैया ना तुम भूलीकी
फुक्या मीथै कै रोंला / गदाना
जख गंघ आणीहो कच्ची की !

चिताका चोछड़ी मडवे म्यारा
बिठाली उ , क़चि दीणा
किरय्म मारू वी बैठला
बैठी जैल, दिनभर क़चि पिणा !

एक द्शादीन कटुडया आलू
कटुडम वे थै भी क़चि देल्या
दवा दशाका दिन बमणू थै भी
कची पीलोंण तस्लोला !

कची बणी ह्व़ा सुंदर सी
अर गंध आणि हो जैमा
एक गिलास म्यारा सिरोंदो
धैरिदिया तुम मीकु खाँदै माँ !

पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


आज का अनुबादित गढ़वाली शेर :

देखी नी *1जुनल् कभी भी अपणी मुखड़ी कु दाग

तभित * 2 नखरा कै कि इतगा *3 बौलीणी च वा !

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*1जुनल् = chaand ! * नखरा= mijaaj/swang *3 बौलीणी = unmat/ khush

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Parashar Gaur
June 29 at 10:04pm ·

*१ फुकैगे होलु जिस्म त , फुकैगे होलु दिल भी
अब *२ खरवलोणी छे * ३ रंगूण , *४ कुवी फैदा नी
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*१ फुकैगे= भस्म *२ खरवलोणी = छीतराना ,*३ रंगूण = राख
*४ कुवी =बेकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

News Feed
राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
June 26 at 11:41pm ·

न नाच न नाच
तू सुप्न्यो मा
मौसम की बात या
तू खूद्दौ न ।

न नाच न नाच
तू सुप्न्यो मा ।

भटकली तू सुप्न्यो मा
देख दुन्याँ हैसली
आँख्यो भीटि याद अपरी
आँसू बणी ख्वै जाली ।

न नाच न नाच
तू सुप्न्यो मा । गीत @ सर्वाधिकार, सुरक्षित पूर्व प्रकाशित - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
June 26 at 11:54am ·

गढ़वाली युगल गीत " डोंट वरी , बी हैप्पी ,बी हैप्पी माई डियर "

लड़की --- चर्चा हुईनी ,छुईं लगीनी गौ गाल बिटी

ह्वेग्युं बदनाम डियर --------

लड़का --- डोंट वरी , बी हैप्पी ,बी हैप्पी माई डियर !

लड़की ---- अच्छी नीन छुई , अच्छा नींन किस्सा

सुणी सुणी यूँ s सणी

ममी डैडी होला गुस्सा

कुछ्त स्वाचो ,कुछ्त कारो

मलकणीच आँखि , धड़कुनणुच दिल डियर ... !

लड़का --- डोंट वरी , बी हैप्पी ,बी हैप्पी माई डियर !

दुन्या जलतेरि च जलदि रा

मित चांदू त्यारा म्यारा किस्सा

बस इन्नि चल दी रा -----------

रकुम्मा गैणी , सरु -कुमैणी

छुम्मा की भि छुईं लगीनी

तबित ह्वै नौ जब

खव्ल्यु ख्व्ल्यूमा जणै गैनी डियर !

लड़की ---- उत मोरी गैनी, तेरि गैनी किसा हवे तमाम

मित मारि शरमकी मनु छों डियर ......।

लड़का --- डोंट वरी , बी हैप्पी ,बी हैप्पी माई डियर !

कूल बेबी कूल . इट वींल बि आल राइट

डोंट गिब अप फाइट , स्टैंड अप फॉर राइट

यु लब च बेब्बी लब , लब वांट सेक्रिफाइज

दिखे जालु जू भी ह्वालु मरला ज्यूला दगडी डियर !

कॉपी राइट @पराशर गौर कनाडा दिनाक २० अप्रैल १९९३

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सौण आलो , गदिरा भरेला
डा शिवा नन्द नौटियाल
जब मैना सौण को आलो
बरखा होली गदिरा भरेला , स्वीँसाट होलो गाड को।
काळा काळा बादळ आला , रंग मल्हार गाला
अंधेरो होलो चाल चलकेली उज्याळो होलो धार को।
थम थम मोर नाचला , मिंडखा टर्र टर्र बोलाला
पैरा पोड़ला रस्ता टुटला चोट होली रात को।
छाम छम के कोदो गोडेलो , कुयोड़ो होलो रात सि लगली
जबतक कुटी दाथी हाथ मा , नाम नि होलो बाटा को।
घाम की खुद सी लागली , छी छी होली पाणी की
घाम आलो कमाण पोड़ली , रंग अनोखे सौण को।
हरो तरो सभी जगा होलो , छोया फुटला जगु जगु मा
पशु पंछी पाणी पाला , कुयेड़ो फटालो जिकुड़ी को।
जब मैना सौण को आलो
बरखा होली गदिरा भरेला , स्वीँसाट होलो गाड को।

--
इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मैदानुं माँ रैकि पहाडुं की कल्पना हूणि छन
भग्यान विनोद उनियाल (अमाल्डु , डबरालस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )

अन्नु दा कि
फटीं कुर्ति
फटीं सुलरि
समाज -वादै खोज मा
पहाड़ छोड़ीइ
मैदानु मा ऐ ग्ये
वे कि
फटीं टुपलि
बदले ग्ये खादिकि
सफेद टोपी मा
कुर्ति
अर सुलरि -चम्म सुलार
बृजु दा अब
पक्को बगुला भगत अनिल उदयपुरी बण्यू च
मैदानु , दिल्ली मा रैकि
पहाडुं की कल्पना हूणि च
ऊंचि ऊंचि डाँड्यूं मा
कागजी कुँआ ख्वदेणा छन
अर
तब ब्याखान दियेणा छन
ऊँ हौरि अन्नुऊँ तैं
जौंका गात पर
फटीं कुर्ति बि नी च
भुलौं टक लगै सुणों
समाजवाद , विकास सुदी नि आंदो
यां का बाना
खांण प्वड़दन
खैरि -सुसगरि
ख्यलण प्वड़दन कतनै खंड
बदलण प्वड़दन -दल का दल
मिथै इ देखल्यावदि

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वखि मेरु बस्युं च ये मन

वखि मेरु बस्युं च ये मन
वखि मेरु झिझयूं च ये तन

देकि देकि मुंबई देकि मिळ दिल्ली
घुमी की ऐगयुं मि देकि देश बिदेश
फिर बी मेरु मन नि ई मानी
चल जोंलों पीणा अपरी मुल्की कु पाणी

वखि मेरु बस्युं च ये मन
वखि मेरु झिझयूं च ये तन

चबलहाट ही रैगे मै मा बस बाकी
टक्कों से लुकी गै मैसे वो मेरी बाड़ी
जदगा बी कमायुं ऊ पौड़गे रे मिथे कम
अब नि रेगे उकलू उंदरु मा हिटणा कु दम

वखि मेरु बस्युं च ये मन
वखि मेरु झिझयूं च ये तन

बूढ़ेगे रे अब मेरी आँखा की नजरि
देखेंदु अब कम च पटेगे रे अब मेरी कमरी
आंसूं मेरा मेरा ऐनका अब बस टिप्दा
तिबारी मा बैठ्याँ हाल मेरा मेरा बाटा हेरदा

वखि मेरु बस्युं च ये मन
वखि मेरु झिझयूं च ये तन

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फिर देका सुंदर ऐ फजल व्है जालि...।

फिर ऐग्याई हो अ हो अ
फिर ऐग्याई
ऐग्याई ये फजल
म्यारा पहाड़ो मा
म्यारा उकाळि उन्दरु मा
डाँडो को घारू मा
फिर ऐग्याई हो अ हो अ
ऐग्याई ये फजल

कन छै ग्याई हो अ हो अ
कन छै ग्याई
छै ग्याई ये रे फजल
ये सरया अकास मा
भर फाल मार चखुला सरग घर मा
फिर ऐग्याई हो अ हो अ
ऐग्याई ये फजल

उठ गै सरी धरती
कण उजाळु रे छैगे
जियु मेरु ये सरीर मेरु
कन जगी गे रे
फिर ऐग्याई हो अ हो अ
ऐग्याई ये फजल
.
अंधार ये छोड़ि कि
ऐगे ऊ सब दूर गई बाटा मोडिकी
क्वी नि बैठ्यूं अब यख हेर मा
सब बस्या अब अपरा अपरा डेरा मा
फिर ऐग्याई हो अ हो अ
ऐग्याई ये फजल

सुप्निया म्यार देख्या
जन इनि सच व्है जाई
मेरा पहाड़ों राम राज्य ऐ जाई
फिर देका सुंदर ऐ फजल व्है जालि...।

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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