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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बहने दो मुझे

बहने दो मुझे,बहने दो मुझे
अपने पहाड़ों पे
बहने दो मुझे,बहने दो मुझे
अपने पहाड़ों पे
मुक्त हो के स्वछंद उड़ जाने दो मुझे
अपने खुले आकाशों में
बहने दो मुझे,बहने दो मुझे
अपने पहाड़ों पे

दोनों हाथों को उठकर
खूब दौड़ लगाने दो
मुझे इसकी चढ़ाई पे जाके
बलखा कर नदी की तरह
निचे आ जाने दो
बहने दो मुझे,बहने दो मुझे
अपने पहाड़ों पे

इसकी फ़िजा में घुल जाने दो
मुझको अपनों से मिल जाने दो
फूलों की खुशबू अब बन जाने दो
पतझड़ में गीत बहार के गाने दो
मुझे बस इसका अब बन जाने दो
बहने दो मुझे,बहने दो मुझे
अपने पहाड़ों पे

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

त ल्यावा अब " डुट्याळ"
----Ganesh Naithani
कनुक्वै चलदु म्यारु गढ़्वाळ,
जु नि रैंदा यख डुट्याळ.
सासुन् बोलि आवा गढ्वाळ,
अपणी कूड़ि पुंगड़ि संभाळ.
ब्वारि न् बोलि कैर डुट्याळ,
बांजा सेरों हैरा कु करदु
उजड़्यां भीड़ा पैरा कु धरदु
कु पुगड़ौं थै ग्वाड - न्याळ
जु निरैंदा यख डुट्याळ.
ब्वे न मंगायी पाणी घात
बेटि न सूणी वींकि बात
बानु लगायी पोड़ि गे रात
ब्यो का कंडा - भारा कु सरदु
गौं कु राशन - पाणि कु भ्वरदु
कु बंदरु खुणै करदु घ्याळ
जु नि रैंदा यख डुट्याळ.
कूड़ि चिणऩा सल्लि नि रैनी
बोड़ु हिटळना हळ्या नि रैनी
ज्यूड़ा बोटणा ग्वाळि नि रैनी
कनमा बणदि नहर अर गूल
कुजि बणांदु सड़कि - इस्गोल
कनक्वे बणदा बड़ा-२ पुळ
जु नि रैंदा यख डुट्याळ.
हर्चि गेनि दूधै ठेकी
जंदरि- सिल्वटि अब कैकि नि देखी
चक्यूं मै ल्हाणा कुटै पिसै की
कूड़ि पुंगड़ि सग्वड़ि नि रैंदि
गौड़ि भैंसी बखरि नि रैंदी
छन्यूं मा बसदा बाघ अर स्याळ
जु नि रैंदा यख डुट्याळ .
क्य पै हमुन छोड़िकि घौर
यीं बात पर बि कैरा गौर
अपुणु सि मुल्क मुल्क नि हौर
म्यारा भै- बंदु रख्यां ख्याल
बदलि नि तुमल जु उल्टि चाल
गढ्वाळ बण जालु एक दिन नैपाल
Copyright@ Ganesh Naithani, 2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सौण आलो , गदिरा भरेला
डा शिवा नन्द नौटियाल
जब मैना सौण को आलो
बरखा होली गदिरा भरेला , स्वीँसाट होलो गाड को।
काळा काळा बादळ आला , रंग मल्हार गाला
अंधेरो होलो चाल चलकेली उज्याळो होलो धार को।
थम थम मोर नाचला , मिंडखा टर्र टर्र बोलाला
पैरा पोड़ला रस्ता टुटला चोट होली रात को।
छाम छम के कोदो गोडेलो , कुयोड़ो होलो रात सि लगली
जबतक कुटी दाथी हाथ मा , नाम नि होलो बाटा को।
घाम की खुद सी लागली , छी छी होली पाणी की
घाम आलो कमाण पोड़ली , रंग अनोखे सौण को।
हरो तरो सभी जगा होलो , छोया फुटला जगु जगु मा
पशु पंछी पाणी पाला , कुयेड़ो फटालो जिकुड़ी को।
जब मैना सौण को आलो
बरखा होली गदिरा भरेला , स्वीँसाट होलो गाड को।

--
इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 कवि : दिनेश ध्यानी

गेड भली
नि होंदी
जिकडू म ,
दगडयु म,
समाज म,
अर
मन्ख्यों म।
खुमसा खुमस
भि
अच्छी नि होंदी
परिवार म,
घर गौ म,
समाज म,
अर
आपसदारी म।
सब्यों को
अपरू नसीब च,
अपरू भाग्य च,
अपरू काम अर
अपरू सागोर च
काम कन्नो,
बात ब्व्वनो।
इलै
समाज हो,
साहित्य हो,
घर हो चा
कखि बि होवन
मिलि की रवा
मिलि की चला
अर सब्यों तैं
ऐथर बढ़ौना
जतन करा
नथर
कैन क्य स्वचण
कि फलण बल
हमरा
बड़ा छाया
पर तौन
हमु थैं कब्बि
सै रस्ता
नि बथाया। ...दिनेश ध्यानी। ८/७/१५. १बजे दिन।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
10 hrs ·

आज का अनुबादित गढ़वाली शेर

जब जब भी देखी * ऊन * ऐनाम अपणी * अन्वार
देखे *चुल हैशी *मूल , *अफ़ी आफूम शर्मैगी वा !
------------------------------------------------------------
* ऊन = उसने ! * ऐनाम= शीसे में *अपणी = अपनी * अन्वार= सूरत
चुल = एक झटके से छुप छुप कर हैशी *मूल = खित हँसकर ,
*अफ़ी आफूम = अपने आप में !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
20 hrs ·

मेरा हक मुझे कब मिलेगा

मेरा हक मुझे कब मिलेगा
बता दे तू इतना मेरा पहाड़ कब तक खिलेगा
लड़ी हमने भी लड़ाईयां कितनी
बता दे तुझे कितना और रक्त चलेगा
मेरा हक मुझे कब मिलेगा

अब तक वो मशालें जली पड़ी है शहीदों के मजारों पर
जब ये सोया खून फिर खौलेगा बोल अब तू कब बोलेगा
कब तक अब बता दे तू इसकी साफ तस्वीर उभरेगी
इसक रूप यौवन चेहरा कब फिर निखरेगा और चमकेगा
मेरा हक मुझे कब मिलेगा

देख ली हैं हमने अब सरकारें तुम्हरी बस आती और जाती हुयी
बैठ कर उस सिंहासन पर दिल्ली के वो गुणगान वो गाती हुयी
नहीं फर्क पड़ता है तुम्हे कोई हमारे अपनों के रुदान का
कानों में तुम्हरे हमारी आवाज क्यों कर अब तक पहुँचती नहीं
मेरा हक मुझे कब मिलेगा

फिर धमका करना होगा क्या इन कान के बहरों को जगाने को
सत्ता की मौज में मस्त सोये हुये उन कुंभंकरण को उठाने को
फिर चलेंगे जलेंगे ये कदम अपने हक को वो अब पाने को
घोटालों की इन सारी सरकारों से अपना खोया अधिकार पाने को
मेरा हक मुझे कब मिलेगा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bhishma Kukreti


प्रसिद्ध गढवाली कवि नेत्र सिंह असवाल कि कुछ गढवाली गजल
Garhwali Gazal by नेत्र सिंह असवाल
मुखै ऐथर सौ चरेतर करदीं लोग
पीठ पीछ सर्र , भूलि जैन्दि लोग I
**
गाळि दियांला , नुँना कि म्वरदा
फिर भी रोज नई, गाळि दिंदि लोग I
***
ऊंस चट्याँन , तीस नि जांदी
तीस बढ़ाणौ , ऊंस पिंदी लोग
**
म्वरणु भजुणु अब आम बात छ
बस गीत मुंड हलैअ , मिसांद रंदी लोग I
**
उज्याड़ बाड़ खांद , चुप द्यखदा रंदी लोग
निगुसें का ढांगा थैं , कच्यांद रंदी लोग
**
सर्वाधिकार नेत्र सिंह असवाल, नई दिल्ली

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रसिद्ध गढवाली कवि नेत्र सिंह असवाल कि कुछ गढवाली गजल
Garhwali Gazal by नेत्र सिंह असवाल
मुखै ऐथर सौ चरेतर करदीं लोग
पीठ पीछ सर्र , भूलि जैन्दि लोग I
**
गाळि दियांला , नुँना कि म्वरदा
फिर भी रोज नई, गाळि दिंदि लोग I
***
ऊंस चट्याँन , तीस नि जांदी
तीस बढ़ाणौ , ऊंस पिंदी लोग
**
म्वरणु भजुणु अब आम बात छ
बस गीत मुंड हलैअ , मिसांद रंदी लोग I
**
उज्याड़ बाड़ खांद , चुप द्यखदा रंदी लोग
निगुसें का ढांगा थैं , कच्यांद रंदी लोग
**
सर्वाधिकार नेत्र सिंह असवाल, नई दिल्ली

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड विकास दर्शन
@@ दर्शन सिंह बिष्ट
आंगनवाडी म् ज्यादतर
वूं कि घरवळि मौज म्
बी.पी.एल कार्ड वेकू
जैका चार नौना फ़ौज म्
विकलांग पेंसन वेकी
जु रात कर्दा चोरी
पार्टी इमानदार लुंड
जु दिन- रात गप्पी मदू दु कोरी
खच्चर बतिया सचिव -साब की कौफिम
ग्राम सभा की सुख - सुविधा प्रधान जीक चौकी म
सर्वाधिकार दर्शन सिंह बिष्ट

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रेम ही प्रेम अब पहाड़े मा

रूप मा अछेरी छे तू
कै का भागा की कसेरी छे तू
पिंगली पिंगली सारी मा
ऐजा हैराली धरती की आड़ी मा

अपरी मुखडी देखे जा तू
दूर भ्तेक इनि छूईं लगे जा तू
देर ना कैर तू यख अणा कुन
ऐकि सिन्कोली फुंड जणा कुन

द्वि एक दूजा थे देक दा रूंला
माया कु इनि भूक तिस मिटोंल
जल्दी ऐजा तू वै डाला मुंड
लाज सरम अब तू चुला दे फुंड

जख देका अब वक देके जांदू
रोलां खोलों बीच बजार मा नचे जांदू
स्कूला कलेजा कु अब बनी ये खेल
मौक मिलु तब अब ऊ रचे जांदू

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित