Author Topic: Tourism and Hospitality Industry Development & Marketing in Kumaon & Garhwal (  (Read 26756 times)

Bhishma Kukreti

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महाभारत काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म की अति विशेष छवि

(महाभारत काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -13

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     - 13                   

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--118 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 1118   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  महाभारत महकाव्य अनुसार पण्डवों द्वारा राजसूय यज्ञ निहित सैकड़ों देशों को जीतने के बाद चक्रवर्ती  सम्राट युधिष्ठिर ने यज्ञ किया (सभापर्व )
 .    चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर  ने यज्ञ में सम्मलित होने कुलिंद नरेश  सुमुख (सुबाहु ) खस , जोहरी, दीर्घ वेणिक , प्रदर , कुलिंद आदि जाति के नायकों को भी आमंत्रण दिया था।
     सुबाहु ने एक रत्न जड़ित दिव्य शंख दिया था जो अपने आप में  अति विशेष था (सभा पर्व 51/  5से 7 व आगे ) .
    राजा दुर्योधन ने धृतराष्ट्र को सूचना दी कि हिमय राजा अथवा उत्तराखंड के खस , जौहरी , कुलिंद , दीर्घ वेणुक , प्रदर , जौहरी , तंगण , परतंगण जातियों के नायकों ने चींटियों द्वारा निकाले स्वर्ण चूर्ण (दूण के दूण थैलों  में भर कर ) युधिष्ठिर को भेंट दिए। (सभापर्व   52  /4 -6 )
    दुर्योधन ने धृतराष्ट्र को यह भी बताया कि उपरोक्त नायक सुंदर काले चंवर व स्वेत चामर , हिमालयी पुष्पों से उत्तपन स्वादिस्ट मधु भी प्रचुर मात्रा में लाये थे।  उत्तर कुरु देश से गंगाजल और कई रत्न लाये थे।  दुर्योधन ने अपन पिता को आगे सूचित किया कि उन्होंने उत्तर कैलास से प्राप्त अतीव बल सम्पन औषधि व अन्य पदार्थ भी भेंट के लिए लाये थे
' .....
उत्तरादपि कैलासादोषधी: सुममहाबला। ...  (सभापर्व 52 , 5 -7 )
   वास्तव में दुर्योधन ने यह बातें धृतराष्ट्र को ईर्ष्या बस कहीं कि उत्तराखंड के विभिन्न नायकों ने , गंगाजल , मधु , महाबल सम्पन ओषधियाँ आदि वस्तुएं युधिष्ठिर को भेंट में दीं।
       हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि दुर्योधन -युधिष्ठिर काल में मैदानों में प्रभावयुक्त माहबली हिमालयी औषधियां दुर्लभ थीं और तभी एक राजा इन औषधियों का वर्णन इतनी तल्लीनता से करता पाया गया है।
    सभा पर्व के वर्णन से साफ़ है कि गंगाजल का भी दुर्योधन -युधिष्ठिर काल में बड़ा महत्व था।
    हिमालयी वनस्पतियों   के फूलों से विशेष शहद  की भी मैदानों में विशेष छवि व मांग थी।  शहद केवल मीठे के लिए ही उपयुक्त न था अपितु औषधि निर्माण व  चिकित्सा उपचार में हिमालयी शहद का बड़ा महत्व था।
         दुर्योधन ने हिमालयी औषधियों को एक विशेष नाम दिया है - ' कैलासादोषधी: सुममहाबला' । या तो दुर्योधन ने यह नाम दिया है या उत्तराखंडी औषधियों की ख्याति '  कैलासादोषधी: सुममहाबला'   नाम से जन में प्रचलित थी ।
               सभापर्व में उत्तराखंड के कुलिंद राजा सुमुख (सुबाहु) द्वारा शंख भेंट व अन्य नायकों द्वारा औषधि समेत अनेक तरह की भेंट आज की परिस्थिति  में स्थान छविकरण (प्लेस ब्रैंडिंग ) में प्रासंगिक हैं। सभापर्व के इस प्रकरण से साफ पता चलता है कि उत्तराखंड की औषधि प्रसिद्ध थीं व इनका निर्यात भी होता था।  औषधि निर्यात या चिकित्सा निर्यात भी मेडिकल टूरिज्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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                राजनैयिक विशेष उपहार  का औचित्य स्थान छविकरण /प्लेस ब्रैंडिंग हेतु आवश्यक है

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      प्लेस ब्रैंडिंग में राजनायकों द्वारा दूसरे राजनायकों को अपने स्थान की विशेष उपहार वास्तव में राजनैतिक चातुर्य हेतु ही आवश्यक नहीं है अपितु स्थान छविकरण , स्थान छविवर्धन या प्लेस ब्रैंडिंग के लिए भी अत्त्यावस्यक है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में विभिन्न देशों से सैकड़ों शीर्ष राजनैयिक उपस्थित थे।  हिमालयी नायकों द्वारा गंगाजल , शहद व महाबली औषधियों का उपहार देकर उन नायकों ने हिमालयी औषधि अथवा  हिमालयी चिकित्सा का समुचित प्रचार प्रसार किया।  प्लेस ब्रैंडिंग में भी प्रभावशाली व्यक्तियों को स्थान विशेष वस्तु उपहार प्लेस ब्रिंग हेतु कई प्रकार के लाभ पंहुचाता है। प्रभावशाली को दी गयी भेंट से वर्ड - ऑफ़ -माउथ पब्लिसिटी का लाभ मिलता है।
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       उपहार देने में नाटकीयता आवश्यक है

  महाभारत के सभापर्व के इस प्रकरण में दुर्योधन द्वारा उत्तराखंडी औषधियों व अन्य उपहारों का इस तरह से वणर्न करता है कि जैसे सभा में उत्तराखंडी नायकों ने उपहार देते समय उच्च सौम्य  नाटक किया थे कि दुर्योधन को हर पल का वर्णन धृतराष्ट्र से करना पड़ा। उच्च -सौम्य नाटक प्लेस ब्रैंडिंग के लिए एक वश्य्क अवयव है।  उपहार देते समय हाइ ड्रामा किन्तु सफोस्टीकेटेड  ड्रामा आवश्यक है।
 -       
     पत्रकार अथवा लेखकों को स्थान वस्तु की सूचना व्यवस्था

,

      महाभारत दुर्योधन या युधिष्ठिर ने नहीं रचा अपितु लेखकों द्वारा रचा गया था। यदि इन रचनाकारों (विभिन्न व्यास जिन्होंने महाभारत की रचना की ) को उत्तराखंड की औषधियों के बारे में सूचना नहीं होती तो वे व्यास उत्तराखंड की औषधियों का वणर्न करते ही नहीं।  इसलिए उस समय भी और आज भी स्थान छविकरण'प्लेस ब्रैंडिंग हेतु यह आवश्यक है कि लेखकों , सम्पादकों व पत्रकारों को स्थान की विशेष वस्तुओं की पूरी सूचना का प्रबंध हो। 



Copyright @ Bhishma Kukreti  14  /2 //2018   



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
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========स्वच्छ भारत , स्वस्थ  भारत , बुद्धिमान उत्तराखंड ========

 
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;       



Bhishma Kukreti

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पांडवों का वनवास हेतु उत्तराखंड भ्रमण और स्थानीय टूरिस्ट गाइड का महत्व


(महाभारत काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  14


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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )  -14               

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--119 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 119   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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   महाभारत माहाकाव्य में उल्लेख है कि दुर्योधन के प्रेरणा से ग्रसित हो धृतराष्ट्र ने सम्राट युधिष्ठिर को द्यूतक्रीड़ा हेतु हस्तिनापुर बुलाया। द्यूतक्रीड़ा में पांडव सब कुछ हार गए , द्रौपदी चीरहरण हुआ  को 12 वर्ष का वनवास व 13 वे वर्ष में अज्ञातवास हेतु वनों में जाना पड़ा।
               पांडवों ने द्रौपदी के साथ वनवास भोगने बगैर कुंती उत्तराखंड की ओर  कूच  किया। पुरोहित धौम्य के साथ पांडव गंगा तट पर प्रमाणकोटि महान बट वृक्ष के समीप गए (वनपर्व 1 /41 )
            तदनुसार पांडव सरस्वती तट पर काम्यक वन में कुछ समय रहे , वहां से वे द्वैत वन गए और फिर काम्यक वन आ गए।  ऋषि धौम्य पांडवों के साथ रहकर यज्ञ -योग , पितृ श्राद्ध व अन्य कर्मकांड कार्य सम्पन कराते रहते थे (वनपर्व 25 /3 ) .
                  इसी दौरान अर्जुन दिव्यास्त्र लेने तपस्या करने उत्तराखंड चले गए (वनपर्व 37 /39 ) . वहां अर्जुन गंधमाधन पर्वत से आगे इन्द्रकील पर्वत में  इंद्र से मिले।  फिर इंद्र की आज्ञा से गंगा तट पर भगवान शिव की तपस्या से पाशुपातास्त्र प्राप्त किया (वनपर्व 20 /20 -21 ) . फिर सदेह पंहुचकर स्वर्ग से इंद्र से दिव्यास्त्र प्राप्त किये
                           उत्तराखंड में स्वर्ग , दियास्त्र व पाशुपातास्त्र
               
            यह लेखक स्वर्ग और नर्क को केवल कल्पना मानता है।  स्वर्ग का यहां पर अर्थ है दुर्गम स्थल जहां अस्त्र निर्माण शाला हो।  उत्तर -पूर्व गढ़वाल और उत्तर पश्चिम कुमाऊं में ताम्बे की खाने, ताम्बा प्राप्त करने की भट्टियां व टकसाल सैकड़ों साल तक रही हैं और ब्रिटिश काल में जाकर ही बंद हुईं।  मेरा मानना है कि अर्जुन ने इन अणु शालाओं  पर जाकर ताम्बे के अस्त्र (दूर फेंके जाने वाले घातक युद्ध उपकरण ) व शस्त्र (बाण आदि ) प्राप्त किये।  संभवतया अर्जुन को अस्त्र शस्त्र डिजाइन व निर्माण ज्ञान भी था तभी वह अकेला इन्द्रकील पर्वत गया। महाभारत काल में बाणों आदि में विष भी लगाया जाता था और तब विष केवल वनस्पति से ही प्राप्त होता था।  महाभारत में हर बार घोसित किया गया है कि बांस -रिंगाळ के बाण प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिए।  इसका तातपर्य यह भी है कि अर्जुन धनुष,  बाण , भाला , गदा आदि बनवाने इन पर्वत श्रृंखलाओं में गया।  इन वन श्रृंखलाओं में धातु ही नहीं , विष व अन्य वनस्पति  के हथियार हेतु कच्चा माल भी उपलब्ध था और इन्हे बनाने हेतु सिद्धहस्त कारीगर भी उपलब्ध थे।
     यदि तब उत्तराखंड में अस्त्र शस्त्र  अणु शालाएं (अणसाळ ) थीं तो उत्तराखंड में  विशेष टूरिज्म भी था याने धातु टूरिज्म।  स्वीडन में कई प्रकार के युद्ध हथियार बनाये जाते हैं तो स्वीडन मे  युद्ध सामग्री खरीदने वाले स्वीडन में यात्रा करने के कारण विशेष टूरिज्म निर्मित  हुआ है।  टूरिज्म हो तो स्वयं  ही मेडिकल टूरिज्म स्थापित होता जाता है।  मनुष्य गत चेतना हमेशा कहीं भी जाने हेतु सुरक्षा के बारे में सोचती है।  यदि शरीर सुरक्षा  का अंदेशा होता है तो मनुष्यगत चेतना मन , बुद्धि  व अहम में कई बहाने बनाती है और टूर  न करने की सलाह देताी  है।
   अर्जुन को दुर्गम रास्तों में चलने व अपने स्वास्थ्य हेतु प्राथमिक चिकित्सा का भी ज्ञान था।  मेरा दृढ विचार है कि दिव्यास्त्र का अर्थ है जो अस्त्र -शस्त्र सरलता से प्राप्त न हों।   विशेष, दुर्लभ  व असामान्य अस्त्र शस्त्र लेने उत्तराखंड की उत्तरी पहाड़ियों में जाना पड़ा था।
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                        धौम्य व इंद्र   टूरिस्ट गाइड भी थे
       
 पांडवों ने  वनवास   हेतु उत्तराखंड चुना तो उसके पीछे कई कारण भी थे।  सर्वपर्थम कुलिंद राज व अन्य छोटे बड़े राजा पांडवों के हितैषी नायक थे।  दूसरा धौम्य ऋषि गढ़वाल के बारे में विज्ञ विद्वान् थे।  पांडवों द्वारा ऋषि धौम्य को साथ ले जाना वास्तव में अपने लिए एक स्थानीय गाइड ले जाना भी थे।
        महाभारत में उल्लेख नहीं है कि कैसे अर्जुन उत्तरी गढ़वाल (इंद्रकील पर्वत ) पंहुचा।  निसंदेह धौम्य ऋषि ने एक या कई टूरिस्ट गाइडों का इंतजाम भी अर्जुन हेतु किया होगा।
         इंद्रजीत पर्वत में इंद्र अर्जुन को पाशुपातास्त्र लेने शिव के पास भेजता  हैं।  इससे साफ़ पता चलता है कि इंद्र दिव्यास्त्रों का ट्रेडर्स या निर्माता था और शिव दिव्यास्त्रों का निर्माता था जो इंद्र जैसे प्रतियोगी को अपने अस्त्र निर्माण शाला नहीं देखने देता था ना ही उन्हें दियास्त्र ट्रेडिंग हेतु देता था।  या हो सकता है इंद्र व शिव में समझौता रहा होगा कि वे अलग अलग विशेष अस्त्र -शस्त्र बनाएंगे और एक दूसरे के ग्राहक एक दूसरे के पास भेजेंगे।

                          वनपर्व में धौम्य व इंद्र के टूरिस्ट गाइड जैसे कायकलाप

             वनपर्व से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ऋषि धौम्य आज के पंडों जैसे  टूरिस्ट गाइड था व इंद्र ट्रेडिंग टूरिस्ट गाइड था। 
   धौम्य व इंद्र के चरित्र से साफ़ पता चलता है कि उन्होंने टूरिस्ट गाइड की सही भूमिका निभायी।
  दोनों ने स्थानीय स्थलों व अन्य जानकारी बड़ी ईमानदारी से पांडवों को दिया।
    जब आवश्यकता पड़ी स्थान विशेष की जानकारी भी दी।  जैसे  धौम्य द्वारा इन्द्रकील पर्वत की जानकारी अर्जुन को देना (यद्यपि महाभारत मौन है ) व इंद्र द्वारा अर्जुन को दिव्यास्त्र शिव के पास भेजना।
    दोनों के कायकलाप बतलाते हैं कि वे ज्ञान /सूचना देते वक्त पक्षहीन थे।
    दोनों सूचना देने में व्यवहारकुशल थे।
  धौम्य व इंद्र ने पांडवों की कमजोरी  और अज्ञानता का कभी भी नाजायज फायदा नहीं उठाया।
 यद्यपि महाभारत मौन है किन्तु हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि धौम्य व इंद्र ने पांडवों को नुकसानदेय या विकट परिस्थितियों  के बारे में भी बताया होगा जिससे पांडव सावधानी वरत सकें।
    अवश्य ही धौम्य व इंद्र ने पांडवों को स्वास्थ्य संबंधी सूचना भी दी होगी।



Copyright @ Bhishma Kukreti  15 /2 //2018 


संदर्भ -

शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास भाग -2 , पृष्ठ 314 -315

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
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पांडवों का उत्तराखंड भ्रमण : बहुत कुछ अभी भी नहीं बदला
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(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास ) - 15


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 Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  15                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--120 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 120   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  अर्जुन के स्वर्गागमन के बाद पांडव , द्रौपदी को लेकर ऋषि धौम्य व ऋषि लोमस के साथ उत्तराखंड के तीर्थ भ्रमण हेतु चल पड़े। लोमश ऋषि तीर्थों के ज्ञाता थे व उनके शरीर पर लम्बे लम्बे बल थे।  पांडव कनखल से आगे गंगा किनारे किनारे सभी जन उशीरबीज , मैनाक , कालशैल पहाड़ियों को पार करते हुए सुबाहु के राज में पंहुचे।  राजा सुबाहु  ने उनका स्वागत किया। यहां से पांडवों ने सेवक , रसोइए  , पाकशाला के अध्यक्ष व द्रौपदी की सामग्री  को सुबाहु  को सौंपकर  आगे बढ़े।
उशीरबीज व मैनाक को लक्ष्मण झूला से बंदरभेळ पर्वत श्रृंखला समझा जा सकता है और कालशैल की पहचान ढांग गढ़ से हो सकती है। (वनपर्व 140 /27 -29 )
    गंधमाधन पर्वत के पदतल पर पंहुचते ही वहां भयंकर आंधी व मूसलाधार बारिश ने उन्हें आ घेरा।  महारानी द्रौपदी वर्षा व थकान  से बेहोश हो गयी। (वनपर्व 143 -5 )
     भीमसेन द्वारा घटोतकच को याद करने पर घटोत्कच वहां उपस्थित हुआ और वह व उसके राक्षस गण द्रौपदी , पांडवों को पीठ पर उठाकर बद्रिकाश्रम ले गए। (वनपर्व 145 /9 )
     
    एक दिन भीम द्रौपदी के लिए सुगंधित कमल लेने कदलीवन पंहुचा वहां हनुमान से भेंट हुयी।  गंधमाधन में भीम ने जटासुर को मारा ।

      बद्रिकाश्रम से पांडव आर्ष्टिपण आश्रम आये जहां उन्हें अर्जुन मिल गए।  पांडव कैलाश , वृषपर्चा , विशालपुरी का न्र नारायण आश्रम , पुष्करणी होकर सुबाहु की राजधानी पंहुचे।  वहां से रसोइये , द्रौपदी का सामन लेकर आगे बढ़े और उन्होंने घटोत्कच को भी विदा किया।
   आगे वे काम्यक वन में  पंहुचे जहां दुर्योधन भी पंहुचा और गंधर्व नरेश द्वारा दुर्योधन को बंधक बनाने की घटना का उल्लेख वनपर्व में मिलता है।
             फिर वहीं जयद्रथ द्वारा द्रौपदी हरण व उसकी हार की कथा वनपर्व में है। जयद्रथ ने गंगाद्वार (हरिद्वार ) में तपस्या की व शिव वरदान प्राप्त किया।
 
 फिर  गुप्त वनवास हेतु पण्डव मत्स्य नरेश के यहां चले गए।   महाभारत में वनपर्व के आगे कुरुक्षेत्र का युद्ध वर्णन है ।
       
              - उत्तराखंड पर्यटन संबंधी कुछ तत्व -

वनपर्व में  में उत्तराखंड संबंधी भौगोलिक , राजनैतिक व सामाजिक वर्णन तो है ही साथ पर्यटन प्रबंधन संबंधी कई सूत्र व सूचनाएं भी देता है।
 आश्रमों में जो भी सुविधा थी वह  वास्तव में मोटर रोड आने तक की 'चट्टी ' प्रबंध जैसी सुविधा ही थी।  चट्टी तमिल शब्द है और आश्रम संस्कृत शब्द है।  इन आश्रमों में पर्यटकों को कई सुविधाएं मिलती रही होंगी वह वनपर्व में पांडवों द्वारा उत्तराखंड तीर्थ यात्रा वर्णन में साफ़ साफ़ झलकत है।
    पण्डवों द्वारा अपने रसोईये को छोड़कर  , अन्य सामान छोड़कर उत्तराखंड यात्रा पर निकलने का अर्थ है कि उत्तराखंड के आश्रमों में भोजन व्यवस्था अवश्य थी। चूंकि आश्रम अध्यक्ष संस्कृत विद्वान् थे तो कर्मकांड के अतिरिक्त औषधि विज्ञान के भी ज्ञाता होते थे। लोमश ऋषि तीर्थों के ज्ञाता भी थे  अतः उन्होंने टूरिस्ट गाइड की भी भूमिका निभायी थी।
     उस समय भी भार वाहन , परिहवन हेतु कुली की आवश्यकता पड़ती थी जो वनपर्व में घटोत्कच व उसके राक्षसों द्वारा बखूबी निर्वाह किया गया।
  आज भी यात्री अपना सामान पर्वत के पदतल पर होटल वालों के पास छोड़ देते हैं और फिर वापसी में होटल वाले से ले लेते हैं।
       आश्रम उस समय के होटल या मोटल जैसे ही थे जो यात्रियों की आवश्यकताओं को पूरी करते थे।  बाद में इन आश्रमों ने  चट्टियों का रूप धारण किया और आज होटल , मोटल के रूप में विद्यमान  हैं।
  वनपर्व में पर्वतों , जंतुओं व वनस्पतियों का भी वर्णन है।  आगे इन वनस्पतियों का जिक्र होगा जो औषधि पर्यटन हेतु आवश्यक अवयव थे।
 
                   
 



Copyright @ Bhishma Kukreti  16  /2 //2018

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महाभारत में उत्तराखंड संबंधी औषधीय वनस्पति
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Edible, Medical useful  and Economical Plants of Uttarakhand in Mahabharata epic
(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -16


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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )   -  16                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--121 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 121   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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     महाभारत  महाकाव्य  में कई चरित्र उत्तराखंड भ्रमण करते हैं या उत्तराखंडी मैंदानों में पर्यटन करते हैं।
  भाभर अथवा हरिद्वार (गंगा द्वार ) व कण्वाश्रम के जंगलों में बेल , आंक , खैर , कैथ व धव /बाकली वनस्पति वर्णन है और ग्रीष्म ऋतू में जहां बलुई मिटटी होती है कंटीली झाड़ी उगती है।  (आदिपर्व) , मालनी तट पर तून का उल्लेख है (आदिपर्व ) . जहां नदियों में पानी नहीं सूखता वहां घनघोर वनों का उल्लेख मिलता है।
     निम्न वनस्पति का उल्लेख महाभारत में मिलता है ( डबराल )-

                    खाद्य फल देने वाली वनस्पति
     

  अम्बाड़ा , अंजीर , अनार , आम , आंवला , इंगुद , कैथ , खजूर (छाकळ ), गम्भीरी , जामुन , ताल , तिन्दुक , नारिकेल (?), नीम्बू , पिंडी , भेदा , बरगद , बदरी , बेर बेल , भिलावा , केला आदि।


                       खाद्य न देने वाले वृक्ष


अम्लबेल , अशोक , कदम्ब , करौंदा , तमाल , देवदार , पाकड़ , परावत , पिप्पल , पीपल , मुंजातक , लकुच , शाल , सरल , शीशम , क्षौद्र आदि


                 फूल वनस्पति


      अशोक , इंदीवर , कनेर , कुटज , कुरवल , कोविदार , चम्पा , तिलक ,पारिजात , पुन्नाग , बकुल , मंदार , शेम , . कमल की अनेक जातियों का वर्णन मिलता है। कीचकबेणु का वर्णन कई बार मिलता है। फूलों के वनों का भी वर्णन महाभाऱत में मिलता है।  इन्द्रकील वन में अर्जुन पर फूलों की वर्षा होती है।

        बुग्याळों को कुबेर बातिकाएँ कहा गया है जो कि ऊँची नीची भूमि क्षेत्र में फैला हुआ उल्लेखित है। बुग्यालों पर देवता , गंधर्व , अप्सरायेँ मुग्ध रहतीं थीं।  गंधमादन की बुग्याळें मनुष्य ही नहीं वायुयान के लिए भी अगम्य थीं।

         कुछ वृक्ष अति काल्पनिक है जैसे कदली फल जो ताड़ वृष से भी ऊँचे वर्णित हैं।

           

          मेडिकल टूरिज्म के बीज

  उपरोक्त अधिकांश वनस्पतियां औषधि  निर्माण में आज भी प्रयोग की जाती हैं और उनका उल्लेख का चरक संहिता , सुश्रुता संहिता या निघंटुओं में भी मिलता है।  चरक संहिता का संकलन 3000 साल पहले हुआ होगा।  किन्तु औषधि , विभिन्न अवयवों के अनुपातिक मिश्रण से औषधि निर्माण विधि , औषधि प्रयोग तो हजारों साल से चल रहा था और वह श्रुति संचार विधि से सुरक्षित व प्रचारित होता था। महाभारत में वर्णित उत्तराखंड में मिलने वाली वनस्पतियों के उल्लेख से साफ़ जाहिर है कि इन वनस्पतियों का उपयोग गैर उत्तराखंडी भी करते थे।  व इनसे उत्तराखंड में या बाहर औषधि भी निर्मित होती थी।  उत्तराखंड में ऋषियों के आश्रम होने से अनुमान लगाना मुश्किल नहीं कि ये विद्वान औषधि विज्ञानं पर भी अन्वेषण करते थे व श्रुति संस्कृति से औषधि विज्ञानं को प्रसारित करते थे व सुरक्षित भी रखते थे। 


Copyright @ Bhishma Kukreti  17 /2 //2018 


शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -२, 327 -328

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3- शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -2, p 327 -328
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   


Bhishma Kukreti

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महाभारत में उत्तराखंड के तीर्थ ,  आश्रम  और  शिक्षा  निर्यात से  लाभ

 Religious and Educations Centers Of Uttarakhand  in Mahabharata Epic
(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  17

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )  -17                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--122 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 122   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
 
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                                     महाभारत में उत्तराखंड के तीर्थ

    महाभारत महाकाव्य में दक्षणियानन  भाग में गढ़वाल को अति महत्व दिया गया है और लगता है कि वे महाभारत रचियता व्यासों का जन्म या तो गढ़वाल में हुआ था अथवा उन्होंने यहाँ जीवन बिताया था।  महभारत में निम्न तीर्थों का उल्लेख  हुआ है  जो ऋषि धौम्य द्वारा पांडवों को सुनाया गया था -
       गंगाद्वार के  पास कनखल , कुब्जाम्रक , कुशावत , गंगाद्वार , नागतीर्थ , नील पर्वत , बिल्वक  तीर्थ थे. अन्य तीर्थ थे - अगस्त्य वट , अग्निशिर , अंगार पर्ण ,अनगिराश्रम , गंगामहाद्वार , बलाका , भारद्वाज तीर्थ , भृगु तीर्थ , भृगुतुंग (उदयपुर पट्टी , हरिद्वार निकट ), बसुधारा आदि। यमुना स्रोत्र को भी तीर्थ मन गया है।
        प्रय्ग शब्द का खिन प्रयोग नहीं हुआ है किन्तु संगम शब्द का प्रयोग हुआ है। इन तीर्थों में देव पूजन अथवा मंदिरों का वर्णन नहीं मिलता है।  देवयतनों का उल्लेख केवल कण्वाश्रम प्रसंग में मिलता है।  यह भी इतिहास सम्मत है कि मंदिर बौद्ध संस्कृति की देन  है ना कि सनातन धर्मियों की।
     
                         महाभारत में उत्तराखंड में आश्रम

              महाभारत में कुलिंद जनपद के अंतर्गत निम्न आश्रमों का वर्णन है -अंगिराश्रम , उपमन्यु आश्रम,  कण्वाश्रम , देवलाश्रम , नर -नारायण आश्रम , भारद्वाज आश्रम।

                  महाभारत में उत्तराखंड में   विद्या केंद्र

    महाभारत में उत्तराखंड निम्न विद्या केंद्रों का वर्णन मिलता है -
  व्यास आश्रम - व्यास आश्रम बद्रिकाश्रम में स्थित था। वहां केवल पांच शिष्य वेदाध्ययन करते थे -महाभाग सुमन्तु , महाबुद्धिमान जैमुनि , तपस्वी पैल , वैशम्पायन व व्यासपुत्र शुकदेव

  शुकाश्रम - शुक आश्रम गंधमादन में स्थित था। शुक अस्त्र -शस्त्र , धनुर्विद्या का ज्ञान देते थे। पांडवों ने  धनुर्विद्या यहीं प्राप्त की थी।
 
  भारद्वाज आश्रम - भारद्वाज आश्रम गंगा द्वार के पास था और राजकुमार  द्रुपद , द्रोण अदि यहाँ विद्या ग्रहण व धनुर्विद्या सीखते थे।

     कण्वाश्रम - कण्वाश्रम भाभर में मालनी नदे तीर पर था और वास्तव में विश्व विद्यालय था जहां नाना प्रकार की विद्यायी सिखलाई जाती थीं।  कण्वाश्रम के पास छोटे छोटे अन्य विद्या केंद्र भी थे।

       आश्रमों में सभी तरह की विद्याएं दी जाती थीं।  छात्रावास थे।
       उपरोक्त तथ्यों से पता चलता है कि उत्तराखंड से शिक्षा निर्यात होती थी।

               शिक्षा निर्यात विकासोन्मुखी होता है

             देहरादून , श्रीनगर , पंत कृषि विश्वविद्यालय  उदाहरण हैं की शिक्षा निर्यात वास्तव में शिक्षा पर्यटन ही है और उससे से स्थान का  विकास होता है और प्लेस ब्रैंडिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देहरादून में IMA , लाल बहादुर संस्थान , पेट्रोलियम संस्थान उदाहरण हैं कि किस तरह शिक्षण संस्थान  स्थान को अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिला सकते हैं।         



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Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
३- शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास भाग -2 , पृष्ठ 335 ,359 -363
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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महाभारत और मेडिकल टूरिज्म में मीडिया प्रतिनिधित्व का महत्व
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(Benefits from Media in Place Branding )
(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -18

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  18                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--123 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 123   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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   मेरे नियमित पाठक व विद्वान् समीक्षक श्री गजेंद्र बहुगुणा  ने मेरे द्वारा उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म को महाभारत से जोड़ने पर घोर आपत्ति जताई।  उनका कहना था कि महाभारत कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है और  यदि महाभारत के चमत्कार सत्य थे तो वह टेक्नोलॉजी कहाँ गयी।
        आज उत्तर देने का समय आ गया है।  पहली बात यह है कि मैं मार्केटिंग पर लेख लिख रहा हूँ ना कि इतिहास पर।  मार्केटिंग कुछ नहीं है अपितु एक कला, विज्ञानं व दर्शन का मिश्रण है और हर संवाद (चित्र , शब्द, स्वाद , सूंघने  व स्पर्श से जो अनुभव हो ) मार्केटिंग ही है।  फिर मान भी लिया जाय कि महाभारत महाकाव्य सर्वथा काल्पनिक है जैसे जेम्स हेडली के उपन्यास तो भी यह सत्य है कि यह महकाव्य है ही। महाभारत में जो है उसकी विवेचना या महाभारत का संदर्भ देने  में कोई बुराई नहीं है। महाभारत के उदाहरण देने में कोई कुतर्क भी नहीं है।
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                     उत्तराखंड को महाभारत से लाभ

          महाभारत में उत्तराखंड पर बहुत अधिक लिखा गया है और हस्तिनापुर  पर कम। महाभारत में उत्तराखंड का भूगोल , नदियां , पहाड़ , भूमि , पेड़ , समाज , संस्कृति , दर्शन सभी कुछ मिल जाता है।  महाभारत में उत्तराखंड विवरण से आज भी उत्तराखंड पर्यटन या स्थान छविकरण को लाभ ही मिलता है। महाकवि कालिदास ने महाभारत से विषय उठाकर कई नाटकों की रचना की जिसमे मध्य हिमालय ही केंद्र में हैं। महाभारत के कारण कई प्राचीन संस्कृत व आधुनिक हिंदी नाटकों की पृष्ठभूमि उत्तराखंड ही रही है   महाभारत में उत्तराखंड वर्णन से उत्तराखंड के बारे में कई धारणाएं आज भी हैं और कई धारणाओं ने इतिहास भी रचा है। तैमूर लंग का गढ़वाल पर धावा बोलने प्रयाण के पीछे महाभारत की रची छवि थी कि गढ़वाल में स्वर्ण चूर्ण भंडार व धातु अणु शालाओं की भरमार।  शाहजहां के सेनापति द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण के पीछे भी उपरोक्त दोनों धारणाएं थी।  और मजेदार बात यह रही कि दोनों बार घटोत्कच के पत्थर फेंकने की रणनीति ने आक्रांताओं को ढांगू क्षेत्र से भगाया गया।  दोनों बार गढ़वालियों ने घटोत्कच का ही रूप लिया।
              महाभारत में वर्णित तीर्थ बद्रिकाश्रम , गंगोत्री या गंगा महत्व ने उत्तराखंड की छवि को मलेसिया -इंडोनेसिया , ईरान तुरान तक पंहुचाया।  उत्तराखंड यदि हजारों साल पहले ही धार्मिक स्थल बन पाया तो उसके पीछे महाभारत जैसे महाकाव्य या अन्य श्रुतियाँ ही थीं।
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                 महाभारत और  स्थान छविकरण में मीडिया प्रतिनिधित्व का महत्व

      महाभारत , कालिदास साहित्य , ध्रुवस्वामिनी नाटक , हुयेन सांग का यात्रा वर्णन , स्कंदपुराण (केदारखंड ) , तैमूर लंग का लिखवाया /लिखा इतिहास , पीछे बहुत से यात्रियों द्वारा यात्रा वर्णन वास्तव में आज के मीडिया द्वारा उत्तराखंड विषयी जानकारी देना जैसा ही है।  कई टीवी चैनलों में उत्तराखंड संबंधित विषय दिखाना भी महाभारत में वर्णित उत्तराखंड जैसा ही तो है।  स्थान ब्रैंडिंग (मेडिकल टूरिज्म एक भाग है ) हेतु उत्तराखंड पर्यटन के भागीदारियों  को मीडिया प्रतीतिनिधित्व क महत्व समझना आवश्यक है।
  प्रसिद्ध प्लेस ब्रैंडिंग विशेषज्ञ मार्टिन बोइसेन (2011 ) ने सिद्ध किया कि मीडिया द्वारा किसी भी स्थान की छवि वृद्धि या छवि बिगाड़ने में अत्यंत बड़ी भूमिका निभाते हैं।  इसका अनुभव हमें तब होता है जब उत्तराखंड में जब यात्रा मार्ग पर सड़क टूट जाती है और टीवी मीडिया सुबह से शाम तक ब्रेकिंग न्यूज द्वारा ऐसा दिखलाता है जैसे फिर से केदारनाथ डिजास्टर पैदा हो गया है।  बहुत से संभावित पर्यटक अपनी उत्तराखंड यात्रा स्थगित कर देते हैं।  किन्तु फिर यही मीडिया उत्तराखंड की बाड़ियों में बर्फबारी (बर्फ का राक्षस ही सही ) की सूचना देता है तो हिम का आनंद लेने वाले उत्तराखंड की ओर गमन करने लगते हैं।  मसूरी पर्यटकों से भर जाता है।
       सचिन तेंदुलकर या महेंद्र सिंह धोनी का मसूरी में घर खरीदना या उमा भारती का उत्तराखंड में आश्रम होना  मास मीडिया द्वारा सूचना उत्तराखंड पर्यटन या निवेश हेतु सकारात्मक समाचार बन जाता है।पतांजलि विश्वविद्यालय आदि का मीडिया में स्थान पाना उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म हेतु सकारात्मक पहलू है।
    किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा उत्तराखंड भ्रमण जैसे प्रधान मंत्री द्वारा केदारनाथ यात्रा का विवरण मीडिया द्वारा देना एक लाभकारी सूचना थी।  केदारखंड में डिजास्टर के बाद केदारनाथ यात्रा की जो नकारात्मक छवि बनी थी वह छवि मोदी जी की यात्रा से धूमिल पड़ गयी है और अब दूर  दूर  के यात्री केदारनाथ यात्रा हेतु तैयार हो गए हैं।
     अभी कुछ दिन पहले केदारनाथ मंदिर में कपाट बंद समय बर्फबारी  में कुछ अधिकारी या नेताओं द्वारा बर्फबारी में भी कपट खोलने की चित्र सहित सूचना मीडिया में फैली।  हमारे कई पत्रकार जो उत्तराखंड पर्यटन को ऊंचाई पर देखना चाहते हैं और स्वयं कई धार्मिक पर्यटन स्थलों के बारे में सूचना देने बहुत खोज व परिश्रम करते हैं ने इस घटना नकारात्मक पहलू को सोशल मीडिया में प्रचारित करना शुरू कर दिया ।   आधुनिक प्लेस ब्रैंडिंग से अपरिचित इन  विद्वानों ने शीतकाल में केदारनाथ कपाट खोलने पर इंटरनेट मीडिया में प्रश्न चिन्ह लगाने शुर कर दिए।  जब कि यह सूचना तो समस्त भारत के कोने कोने में जानी चाहिए थी कि अब केदारनाथ यात्रा सुरक्षित यात्रा है।  वास्तव में शीतकाल में केदारनाथ कपाट खुलने पर  कई  संवेदनशील व उत्तराखंड प्रेमी पत्रकार द्वारा नकारात्मक रुख अपनाना यह दर्शाता है कि तत्संबन्धी विभाग 'प्लेस ब्रैंडिंग में मीडिया रिप्रेंजेंटेसन ' का महत्व नहीं समझ सके।  अधिकारियों को पत्रकारों को अवगत कराना चाहिए था  व उन्हें विश्वास दिलाना चाहिए था कि शीत  काल में केदारनाथ कपाट खोलने का अर्थ है अब हम नई से नई टेक्नोलॉजी प्रयोग कर रहे हैं।  प्लेस ब्रैंडिंग के भागीदारों को भी (उत्तराखंड के पत्रकार व राजनीतिक कार्यकर्ता भी भागीदार हैं -स्टेकहोल्डर ) प्लेस ब्रैंडिंग/स्थान छविकरण की समझ में बदलाव लाना आवश्यक है।  आज प्लेस ब्रैंडिंग में भारी बदलाव आ चुका है।
   प्लेस ब्रैंडिंग विशेषज्ञ जैसे कैरोल व मैककॉम्ब्स (2003 ) का सही कहना है कि मीडिया कवरेज जितनी अधिक हो स्थानछवि वृद्धि या छवि कमी को उतना लाभ -हानि होता है।  मीडिया समाचार में वर्णित स्थान गुणों से ग्राहक स्थान छवि बनाता जाता है।

            मूर्धन्य लेखकों /पत्रकारों को उत्तराखंड से बाहर के पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिए

  प्लेस ब्रैंडिंग पिता  एस. ऐनहोल्ट प्लेस ब्रैंडिंग के भागीदारों को सदा आगाह करते हैं कि प्लेस ब्रैंडिंग में जनसम्पर्क सूचना सबसे अधिक कारगार हथियार है।  उत्तराखंड के लेखकों को अन्य प्रदेशों , देशों के पत्र पत्रिकाओं में उत्तराखंड संबंधी लेख समाचार प्रकाशित करने या करवाने चाहिए।
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             मीडिया को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है

   बहुत बार मीडिया स्थान विषय के बारे में नकारात्मक सूचना देते हैं। प्लेस ब्रैंडिंग विद्वान् मर्फी का कहना है कि स्थान छवि भागीदारों को इन नकारात्मक सूचनाओं को एकदम से खारिज नहीं करना चाहिए अपितु अन्य ब्रैंडिंग हथियारों से सकारात्मक छवि हेतु आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
        मीडिया को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है किन्तु मीडिया प्रतिनिधित्व विधि द्वारा टूरिज्म  विभाग वांछित सूचना मीडिया में दिलवाते ही हैं।


 
     
             



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Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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जातक कथाओं में उत्तराखंड टूरिज्म


(  जातक कथाओं में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -19

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  19                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--124 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 124   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  जातक कथाएं जातक कथाओं का संग्रह बुद्ध निर्वाण के बाद शुरू हुए किन्तु उनमे बहुत सी कथाएं काशी -कौशल में बुद्ध के समय से पहले से ही चलती आ रहीं थीं जिन्हे बुद्ध ने अपने व्याख्यानों में उदाहरण हेतु सुनाया था।  पाली साहित्य के इतिहासकार भरत सिंह अनुसार कुछ जातक कथाएं बिक्रमी संबत से दो शतक पहले लिपबद्ध हो चुके थे व  बाकी बिक्रमी संबत से चौथी सदी तक लिपिबद्ध होती रहीं। जातक कथाएं बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं अधिक हैं।
   चूँकि बुद्ध का उत्तराखंड से सीधा संबंध न था तो उत्तराखंड का वर्णन जातक कथाओं में न मिलना स्वाभाविक है किन्तु कथाओं के संकलनकर्ताओं का उत्तराखंड परिचय था अवश्य।

           जातक कथाओं में उत्तराखंड के कई पर्वत श्रेणियों का वर्णन मिलता है।

              जातक कथाओं में उत्तराखंड वनस्पति, औषधि  और टूरिज्म

     

   डा डबराल का मत है कि महावेस्संतर जातक में भाभर क्षेत्र के वनों व वनस्पतियों का जितना सुंदर वर्णन मिलता है उतना अन्य भारतीय साहित्य में मिलना दुर्लभ है।

 जातक कथाओं में दक्षिण उत्तराखंड की वनस्पतियों में कुटज , सलल , नीप , कोसम्ब , धव , शाल , आम , खैर , नागलता पदम् , सिंघाड़े , धान , मूंग। कंद -मूल , कोल , भल्लाट बेले , जामुन बिलाली , तककल जैसे वनस्पति का उल्लेख मिलता है।

     महाकपिजातक खंड ४ में एक कथा अनुसार गंगा जी में बहते एक  आम चखकर वाराणसी नरेश उस आम के मूल स्थान को ढूंढते उत्तराखंड के उस वन में पंहुचा जहां से वह आम पंहुचा था।

       सिंहली में लिखित महाबंश (पृष्ठ 27 ) अनुसार सम्राट अशोक को मानसरोवर का गंगाजल , , उसी क्षेत्र का नागलता की दातुन , आंवला , हरीतकी की औषधियां व आम बहुत पसंद थे और सम्राट अशोक उन्हें मंगाते थे।

         इससे साफ़ पता चलता है कि अशोक काल में उत्तराखंड से औषधि निर्माण  औषधि अवयव निर्यात आदि प्रचलित था।

       

         आखेट व मांश निर्यात


   जातक कथाओं में उत्तराखंड के आखेट हेत वनों व उनमे मिलने वाले जंतुओं का वर्णन मिलता है।  उत्तराखंड के भुने हुए मांश के लिए वाराणसी वासी तड़फते थे और आखेट हेतु उत्तराखंड पंहुचते थे। दास भी खरीदते थे।  (भल्लाटिय व चंदकिन्नर जातक )

                व्यापार

 भाभर क्षेत्र में अन्न का व्यापार अधिक था।


       विद्यापीठ और ऐजुकेसन टूरिज्म


  तक्षशिला , नालंदा के अतिरिक्त  उत्तराखंड में भी कई विद्यापीठ थे।  जहां बाहर से छात्र विद्याध्ययन हेतु आते थे। छात्र व गुरु अपने लिए पर्ण शालाएं निर्माण करते थे। एक कथा में एक अध्यापक पांच सौ छात्र लेकर उत्तराखंड आये और विद्यापीठ स्थापित किया (तितिरि जातक )।  छात्रों के भोजन हेतु माता पिता तंडूल आदि भेजते रहते थे।  निकट निवासी भी विद्यार्थियों की सहायता करते थे।


   आश्रम व नॉलेज  टूरिज्म


  उत्तर वैदिक काल में भी उत्तराखंड में गंगा द्वार से लेकर बद्रिका आश्रम तक गंगा किनारे तपस्वियों दवा आश्रम स्थापित करने व विद्यार्थियों को ज्ञान देने की प्रथा चली आ रही थी।  जातक कथाओं में आश्रम संस्कृति पर भी साहित्य मिलता है।

 

                विद्या निर्यात व औषधि निर्यात


    जातक कथाओं में वर्णित उत्तराखंड वृत्तांत से पता चलता है कि बुद्ध काल से पहले व पश्चात उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन, आखेट पर्यटन , विद्या पर्यटन व निर्यात , वनस्पति निर्यात व औषधि निर्यात के लिए प्रसिद्ध था।  जहां निर्यात वहां पर्यटन , जहां कच्चा माल  सुलभ हो वहां पर्यटन विकसित होता ही है।

     प्रत्येक पर्यटन मेडिकल व्यापार व मेडिकल पर्यटन को भी साथ में ले ही आता है।  यदि आखेटक आखेट हेतु भाभर प्रदेश आते थो अवश्य ही उन्हें स्थानीय मेडिकल सुविधा की आवश्यकता पड़ती ही होगी जो तभी संभव हो सकता था जब उत्तराखंड में औषधि ग्यानी रहे होंगे। 

     

       


Copyright @ Bhishma Kukreti   20 /2 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
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Bhishma Kukreti

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सलाण  गढ़वाल में बौद्ध मत प्रचार से  उत्तराखंड पर्यटन विकास

Medical Tourism in Uttarakhand through Buddhism Popularization
(  बौद्ध मत प्रचार से  उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म  विकास )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -20

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  20                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--125 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 125   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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   महात्मा बुद्ध के समय ही बिहार व पूर्वी उत्तरप्रदेश में लाखों बुद्ध अनुयायी बन चुके थे।
  परवर्ती बौद्ध साहित्य अनुसार महात्मा बुद्ध कनखल के पास उशीरनगर तक पंहुचे थे।  दिव्यावदान अनुसार बुद्ध उत्तराखंड के श्रुघ्न नगर पहुंचकर  उन्होंने एक ब्राह्मण का अभिमान चूर किया था।  युवान चांग ने भी उल्लेख किया है।
      बुद्ध निर्वाण पश्चात दक्षिण उत्तराखंड में बौद्ध चिंतकों का प्रमुख चिंतन स्थल रहा है। बौद्ध धर्म में उतपन कई उलझनों को सुलझाने में उत्तराखंड के स्थाविरों का प्रमुख हाथ रहा है।  हरिद्वार के पासजिन आश्रमों में जहां पहले वेदों , संहिताओं , उपनिषदों , ब्राह्मणों का पठन पाठन होता था वहां बौद्ध धर्म संबंधी साहित्य का पठन पठान व चर्चाएं शुरू हो गए ।  उत्तराखंड के स्थावीरों ने बौद्ध धर्म संबंधी समस्याओं का निराकरण में अन्य क्षेत्र के स्थावीरों के मुकाबले अधिक भूमिका निभायी।
                    बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद हुए थे।  आनंद के दो शिष्य थे - यश और साणवासी सम्भूत स्थविर।  साणवासी संभूत कनखल के पास अहोगंगपर्वत पर निवास करते थे।  बुद्ध नर्वाण के सौ साल बाद कालाशोक के राज्य काल में साणवासी के जीवनकाल में बौद्धों के मध्य भीषण फूट पड़ गयी थी। साणवासी संभूत ने अहोगंग से मगध  पंहुचक कर द्वितीय बौद्ध सङ्गीति (कॉनफेरेन्स ) आयोजित की। (महाबंश पृष्ठ 17 -19 )
              अशोक के समय बौद्ध मतावलम्बियों की तीसरी सङ्गीति आयोजित हुयी जिसकी अध्यक्षता अहोगंग के स्थविर मोग्गलि पुत्त  ने किया।
            गंगाद्वार (हरिद्वार से गोविषाण (काशीपुर क्षेत्र ) बौद्ध मतावलम्बियों हेतु चिंतन का केंद्र बन चुका था और बौद्ध प्रचारकों , चिंतकों व जनता का आना जाना बढ़ गया था।  उत्तराखंड का एक पर्वत बौद्धाचल कहलाया जाने लगा (केदारखंड ४० /२८ -२९ ) . बौद्ध मतावलम्बियों के लिए गंगा उतनी ही पवित्र थी जितना सनातनियों  के लिए।

                बौद्ध स्थविर शिष्य चिकित्सा विशेषज्ञ भी होते थे

            अधिकतर बुद्ध व बौद्ध साहित्य को दर्शन , आध्यात्म व मनोविज्ञान तक ही सीमित किया जाता है।  किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि बौद्ध धर्म के उन्नायकों ने भारत ही नहीं चिकित्सा शास्त्र में भी योगदान दिया है। बुद्ध का उद्देश्य ही दुःख हान था।   यदि बौद्ध चिंतक चिकित्सा के प्रति संवेदनशील न होते तो सम्राट अशोक को  ससर्वजनिक जनता हेतु चिकित्सालय व पशुओं हेतु सार्वजनिक चिकित्सालय विचार आते ही नहीं ।
  सातवीं सदी से पहले , गुप्त लिपि में  रचित 'भेषज गुरु -वैदुर्य -प्रभा राजा सूत्र' सिद्ध करता है कि बौद्ध चिंतक शरीर चिकित्सा में भी ध्यान देते थे।

          उत्तराखंड में बौद्ध स्थविरों का वास याने पर्यटन विकास


  गंगाद्वार में मुख्य बौद्ध धर्म प्रचार केंद्र होने से उत्तराखंड में भारत से विद्वानों का आना जाना बढ़ा और उत्तराखंड पर्यटन में निरंतरता रही व नए पर्यटक ग्राहक भी मिले।  मेडिकल पर्यटन वास्तव में सामन्य पर्यटन के साथ स्वयं ही विकसित होता जाता है।  विपासा चिकित्सा पद्धति व अन्य चिकित्सा पद्धति भी उत्तराखंड में प्रसारित  हुयी ही होगी।


        सलाण गढ़वाल में कुछ गाँव


 सलाण के मल्ला ढांगू में पाली ,  डबरालस्यूं में पाली गाँव व लंगूर में पाली गाँव इंगित करते हैं कि गढ़वाल में बौद्ध मत का प्रभाव तो था ही पर्यटक भी उत्तराखंड आते जाते रहते थे।



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -भाग २, पृष्ठ ४११ से ४१७
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 Buddhism ,  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;    Buddhism , Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Buddhism ,  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Buddhism ,  Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

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कुलिंद -उशीनगर जनपद  (400 -300 BC ) में चिकित्सा व अन्य पर्यटन

( कुलिंद -उशीनगर जनपद काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -21

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  21                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--126 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 126   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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           कुलिंद -उशीनगर जनपद का राजयकाल 400 -300 ईशा पूर्व माना जाता है। उशीनगर चंडीघाट का नाम है। कुलिंद के कई नाम सामने आते हैं जैसे -कुलइंद्राइन , कुलिंद , कुणिंद।  पाणिनि के अष्टाध्यायी में सीमा रेखा स्पष्ट नहीं है किन्तु ताल्मी ने सतलज से कालीनदी के पर्वतीय क्षेत्र को कुलिंद बताया व इन क्षेत्रों से कुलिंद मुद्राएं भी मिली हैं।
    कुलिंद का दुसरा नाम उशीनगर भी था। इस जनपद में कालकूट (कालसी ), तंगण (उत्तरकाशी से चमोली ); भारद्वाज (टिहरी  व पौड़ी गढ़वाल ); रंक (पिथौरागढ़ ); आत्रे या गोविषाण (दक्षिण कुमाऊं ) आते थे।
 
                 महात्मा बुद्ध द्वारा अनुचरों को उत्तराखंड में जाने की अनुज्ञा

 महात्मा बुद्ध के समय उशीनगर  (चंडी घाट ) में कम प्रचार के कारण बुद्ध ने विनयधर सहित पांच शिष्यों को उशीनगर में प्रचार की अनुज्ञा  दी थी (विनय -पिटक ५/३/२/पृ -२१३ )

        कालकूट से अंजन का निर्यात
     कालकूट महाभारत से ही चक्षु अंजन याने सुरमा के लिए प्रसिद्ध था और कुलिंद -उशीनगर जनपद काल में   सुरमा निर्यात होता था।  निर्यात स्वतः ही टूरिज्म को विकसित करता है। अंजनदानी व सलाई  का भी निर्यात होता था।

        शहद निर्यात

     उत्तराखंड सदियों से पहाड़ी शहद हेतु प्रसिद्ध था और कुलिंद -उशीनगर जनपद में भी शहद निर्यात होता था।

          बौद्ध भिक्षुओं का उत्तराखंड में भ्रमण

    पाणनि के अष्टाध्यायी व बौद्ध साहित्य महाबग्ग में गुरुकुल व भिक्षुओं का जिक्र है जिन्हे यहां का भोजन ही नहीं मांश , मदिरा व धूम्रपान भी पसंद था।  भिक्षु -भिक्षुणीयां उशीनगर के आभूषण पसंद करते थे (चुल्ल्बग पृ -419 )।

       रोग और चिकित्सा व जड़ी बूटी निर्यात

       बौद्ध साहित्य जैसे विनय -पिटक  (पृ -२३० ) से पता चलता है कि कुलिंद -उशीनगर के महाहिमालय श्रेणियां  प्रभावशाली जड़ी -बूटियों व बहुत से विषों हेतु प्रसिद्ध था व इन औषधियों का निर्यता होता था।  जड़ी बूटियों -विषों की खोज में भी अतिथि उत्तराखंड भ्रमण करते थे।  विनय पिटक  में हिमालयी जड़ी बूटियों वर्णन से जाहिर होता है कि चिकित्सा जानकार उत्तराखंड में भ्रमण करते थे।

             कुलिंद -उशीनगर को अन्य  राष्ट्रों से जोड़ने वाले मार्ग

भरत सिंह (बुद्ध कालीन भारतीय भूगोल ) अनुसार बुद्धकालीन जनपद जैसे लिच्छिवी , मल्ल , कोलिय , भग्ग , कलाम , बुलिय व शाक्य जनपदों से जोड़ने हेतु  गढ़वाल भाभर -गोविषाण (कुमाऊं तराई ) से अहोगंग , कालकूट , श्रुघ्न (सहारनपुर क्षेत्र ), साकल जाने हेतु सुपथ (अच्छे मार्ग ) थे. इन मार्गों पर विश्राम स्थल भी थे जहां  जल , भोजन , घास , ईंधन मिल जाता था।  नदी पार करने की व पशु रथ चलाने की भी व्यवस्था थी।  चोर डाकुओं  से रक्षा हेतु किराये के सैनिक भी उपलब्ध थे।
पहाड़ों में कुपथ याने दुर्गम पथ थे। दुर्गम पथ वास्तव में उत्तराखंड की सुरक्षा की गारंटी ही साबित हुए हैं क्योंकि बाह्य आक्रमणकारी सेना भाभर से आगे बढ़ ही नहीं सकी और आज कुपथ भी रोमांचकारी पर्यटन को बढ़ावा देता है।
      उपरोक्त संदर्भ सिद्ध करते हैं कि निर्यात व आयात हेतु परिवहन की पूरी व्यवस्था थी। 

               निर्यात सामग्री व भाभर में व्यापार

 पाणनि के अष्टाध्यायी से पता चलता है कि भाभर में निम्न सामग्रियों का व्यापार (निर्यात ) चलता था (अग्रवाल , पाणनि कालीन भारतवर्ष पृ 19 से 48 , 237 )
अंजन, लवण , उशीर , मूँज , बाबड़ घास , देवदारु फूल , वनस्पति मसाले , ऊन व ऊनी वस्त्र , भांग व भांग वस्त्र , कंबल , मृग चर्म , लाख , चमड़े के थैले व अन्य सामग्री , चमड़ा , वनस्पति थैले , दूध -दही , घी , धोएं सुहागा , अनेक प्रकार की वनस्पति व औषधियां , बिष , बांस व बांस से बनी वस्तुएं , मधु,  गंगाजल, चमर , कई प्रकार के पशु -घोड़े आदि व पक्षी आदि  निर्यात  होते थे।
      निर्यात स्वयमेव पर्यटन का उत्प्रेरक अवयव है।
 
               विशिष्ठ सामग्री याने विशिष्ठ पर्यटन

   अष्टाध्यायी , बौद्ध साहित्य से पता चलता है की उत्तराखंड से अन्यन वस्तुओं का निर्माण , प्रजनन , व ट्रेडिंग होती थीं जो कि एक विशिष्ठ पर्यटन को विकसित करने में सक्षम थी। 

   


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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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नंद व मौर्य युग (350  -184  BC ) में उत्तराखंड में पलायन पर्यटन व अन्य पर्यटन


 Medical tourism in Maurya Era
(  मौर्य काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -22

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  22                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--127 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 127   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  मौर्य काल को 321 BC से 184 या 148 BC तक माना जाता है। उससे पहले नंद युग था।

         नंद या अन्य द्वारा सैनिक बन कर  पलयान
 मौर्य शासन से पहले नंद साम्राज्य था।  नंद कौन था इस विषय पर एकमत नहीं है किन्तु एक सिद्धांत कहता है कि नंद वंश का संस्थापक उग्रसेन -महापद्म गोविषाण  (कुमाऊं तराई ) का था या उसका संबंध उत्तराखंड से था।
    रैपसन की धरना है कि शिशुनाग व नंद वंश की स्थापना करने वाले पर्वतवासी थे (कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया पृ -280 ) . महापद्म क राज्य हिमालय से नीलगिरि व गोदावरी तक फैला था। महापद्म के एक पुत्र नाम गोविषाण भी था  समय शाशन किया ।
   चन्द्रगुप्त या अशोक द्वारा उत्तराखंड विजय की कोई सूचना नहीं मिलती किन्तु गोविषाण (काशीपुर) , कालकूट (कालसी ) व श्रुघ्न में अशोक की लाट  सिद्ध करती हैं कि उत्तराखंड नंद वंश के अंतर्गत ा चूका था और मौर्य शाशन में पुराने शाशक मौर्यों के प्रतिनिधि बन चुके थे।
   मुद्राराक्षस नाटक में पर्वतेश्वर चरित्र से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का पर्वतेश्वर से रक्त संबंध था।

       युद्ध नौकरी पर्यटन

   नंद वंश स्थापना के  विभिन्न सिद्धांतों से सिद्ध होता है कि मैदानी राष्ट्रों को उत्तराखंड से सैनिक बुलाने पड़ते थे। चन्द्रगुप्त के राजमहल में किरात सैनिक थे जिन्हे विश्वासी सैनिक माना जाता था।
 इतिहासकार राय चौधरी के अनुसार मौर्य साम्राज्य में पहाड़ी सैनिकों की बड़ी मांग थी।  हट्ठे कट्ठे खश , कनैत मौर्य सेना में भर्ती होते थे। चन्द्रगुप्त को मगध सिंहासन दिलाने में पहाड़ी सैनिको का प्रमुख हाथ था। सेनाओं की अग्रिम दल इकाई पहाड़ी खशों द्वारा ही संचालित होती थी।
  युद्ध नौकरी कई प्रकार के अन्य पर्यटनों को विकसित करता है।  नौकरी करने बाहर जाना याने ज्ञान -विज्ञान का आदान प्रदान को प्राथमिकता।
      मौर्य काल में पहाड़ों से आम आदमियों हेतु मैदानों ही नहीं पाटलिपुत्र तक घोड़े निर्यात होते थे। सैनकों के लिए उबड़ खाबड़ स्थानों में परिवहन हेतु भारद्वाज व टंगण अश्वों की मांग पूर्ववत थी।

        वनस्पति निर्यात
 कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में जिन वनस्पतियों व वस्तुओं का वर्णन मिलता है उनमे से कई वनस्पति उत्तराखंड से निर्यात होती लगतीं हैं।

    शिल्प विशेषज्ञ
  कालसी के अशोक शिलालेख से स्पष्ट है कि शिल्प विज्ञान का आदान प्रदान हुआ।  स्थानीय शिल्पकारों के कार्य भी महत्वपूर्ण रहा होगा।  शिल्प कला विज्ञान के आदान प्रदान में अवश्य ही विशेष पर्यटन विकसित होता है।  यदि अशोक ने कालसी  में शिलालेख , गोविषाण (स्तूप ) व श्रुघ्न (स्तूप निर्माण ) को शिलालेखों आदि के लिए चुना था तो अवश्य ही भूगोल शास्त्री , भूगर्भशास्त्री, खनिज शास्त्री , लेखक ,शिला काटने वाले , शिला कोरने  वाले विशेषज्ञों ने पहले ही नहीं शिलालेख आदि निर्माण के बाद भी पर्यटन किया होगा।  गोविषाण , कालसी व श्रुघ्न -सहारनपुर बड़ी मंडी तो थी हीं , सम्राट अशोक द्वारा यहां शिलालेख स्थापित करवाने के बाद इन स्थानों की छवि अधिक संवरी होगी।  आज भी सम्राट अशोक के शिलालेखों के कारण ये स्थान विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल हैं।

     चिकत्सा पर्यटन
  महावंश (पृ 25 ) से पता चलता है कि सम्राट अशोक की गंगाजल में असीम श्रद्धा थी। अशोक हेतु प्रतिदिन देवता मानसरोवर से आठ बहंगी गंगाजल लाते थे व चार बहंगी जल संघ , एक स्थविरों को , एक असंघमित्रा को व शेष अशोक हेतु दी जातीं थीं।
    महावंश (पृ 21 ) से पता चलता है कि उत्तराखंड वासी नागलता के दातुन , आंवला , हरितिका  जड़ी बूटी , आमों को लेकर रोज पाटलिपुत्र पंहुचते थे।  यदि विक्रेता पाटलिपुत्र पंहुचते थे तो साथ में अन्य सामग्री भी बेचने हेतु ले जाते होंगे।
 
         बौद्ध प्रचारकों का उत्तराखंड आगमन याने विशिष्ठ पर्यटन

     भरत सिंह अनुसार महात्मा बुद्ध उशीरध्वज पर्वत तक  पंहुचे थे।  इसके बाद गोविषाण (काशीपुर ) से लेकर सहारनपुर तक कई बुद्ध आश्रम खुले।  अशोक के समय व पश्चात निम्न स्थविर उत्तराखंड पंहुचे -

 मोग्गलिपुत्त तिस्स
कास्सपगोत्त  के नेतृत्व  में ंव अलक देव , दुंद भिसार , महावीर  अथवा मञ्झिम स्थविर के नेतृत्व में कास्सपगोत्त , दन्दुभिसार , सहदेव व मूलकदेव।
  इससे साफ़ जाहिर है कि मौर्य काल में बौद्ध मुनियों का उत्तराखंड के भाभर -तराई भाग में अधिक आना जाना था।

 
 




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                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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