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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

माटु मा खत्यां दिन
कुई लौटे द्या म्यार
बौडी बौडी की जौं दिनु की
याद आंणी आज
खंदवार कुडी भीतर दबेगेन
द्याखो पाटी बुखल्या
कख गे ह्वाल कम्यडु क
उ बिंटा वाल डुखल्या
हरके फरके की छौं खुजणु
फांग्यु मा खत्युं बचपन
आंख्युं मा छुवाया सी आज
उदसी अयीं गिचपन
खुजणु छौं माटु मा
अपण कांच की गोली
पतनी कैं छानी दब्यां छन
दुवी गल्यों की दौंली
माटु मा खत्यां दिन
कुई लौटे .......
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आज फिर खैरी
पहाड की लगोणा छौंऊ
खुद लगीं गौं की
ब्यथा सुणाणा छौंऊ
जनि दस पास कैरी
मी दिल्ली क्या औऊं
नौकरी क्या लगी की
मी गौं कभी नी ग्योंऊ
मैट्रो की सीढीयुं मा मी
रुल्दी खुजणा छौंऊ
बहुमंजिला लिप्टु तै
ग्युड चितांणा छौंऊ
जगजगा प्रदर्शनियुं मा
क्वादु झंग्वरु खुजणा छौंऊ
जख जांदु यी दिल्ली मा
वखी पतड्याणा छौंऊ
गैल्या दगडयों तै ब्हाटसप
फेसबुक मा खुजणा छौंऊ
बांजी तिबारी डिंडयाली रोज
मोबेल मा दिखणा छौंऊ
खंद्वार हुंयीं कुडी तै हम
लाईक करना छ्याऊ
घर जांण क जु नी बुदु
कमेंट मा दुख जतांणा छ्याऊ
आज फिर खैरी
पहाड की.......
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भै बिमार पड्नु बी अब अपराध चा
हालात भंडया खराब च
जार चङयूं यु सौ को पार च
नकुडी बैहणी मेरी आज च
ये गलोड़ी खैंसनी दिन रात च
बरमंड को बारा बज्यूं चा
सरीर कंपकांपि को थारु लग्युं चा
कन हुंयुँ भुलूँ मेरो ये बुरु हाल च
रजै भीतर लिप्टयूं मि आज च
खैनीपानी छूटगे मेरो आज च
बिस्तर मां सिमटीगे मेरो राज च
दवैपानी को लग्युं दरबार चा
जद्ग गीच उत्गा ऊँका बिचार चा
जार थे जनि मिल ही न्यूत दे बोलैई
अपरा सरीर मां मिन वैथे प्रेवश कराई
लोकों कथा सुनी की मेरो अनुमान चा
भै बिमार पड्नु बी अब अपराध चा
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई
देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई
ये जिकोड़ी मेरी मिल तेरो नौ कैर द्याई
हर्ची हर्ची ग्याई मि मेसे हर्ची ग्याई ...... २
तेर आंख्युं न जबै मि थे प्रेम घुटी पिलै द्याई
देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई ...........
रौतेंली मुखडी तेरी बिगरैली आँखी
कन तेरो ये रूपन मिथे बौल्या बनेई
सुध बुध मेर हर्ची हर्ची ग्याई ...... २
अंदा जांदा मिथे जब तू अद बाटा मां दिखेग्याई
देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई ...........
मेरो मेरो अब मेरो पास मेरो कुच नि बी राई
कुच बी छ्या मेरो पास ऊ अब तेरो व्हैग्याई
ये मेर गैल्याणी तेर छुईं मां मि हर्ची हर्ची ग्याई ...... २
अब त ऐजा मेर ये जीबन मां देक देर ना व्है जाई
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिम कार्बेट पार्काक् शेर .......
पत्त न
के बात भै
दूध जस्
उमांव ऐ पड़ौ
कल्ज में ....
हिकुरि - हिकुरि (हिकुरि - हिकुरि माने सिंसक सिंसक कर )
डाढ़ ऐ पड़ी
आँखन् बटी
छो फुटि पड़ौ छो - पानी का सोता
हिसालु त्वाप् जास्
भौतै भल् लागीं
आज मैं कैं
त्यार्
कनमड़ खैयी गिज् ... गिज -- होंठ
एक स्वैंण छी सब स्वैंण -- सपना
जो मैलि ले देखीं !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Kirti Vallabh Shakta
January 3 at 8:34pm
कुमाँउनी कविता कुन्डली छन्द
ह्यून क् दिन लै खूब छन ठन्डी रौ छ पहाड़।
हवा चलै कसि तेज हो सूखि गौ छसब झाड़।।
सूखि गौ छ सब झाड़ सफेदी पड़नै याँ हो।
पालो और तुषार डरूनौ भौत अरेहो।।
नान्नाना दिन आज लम्बी राता का श्व्यून।
कष्ट सबौ कै खूब यां दिन्नौ राणौ ह्यून।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Kirti Vallabh Shakta
January 2 at 7:43pm
दो्हा
येआतंकौ नाश हो हे भगवान जरूर।
सब्बै जन रौं याँ सुखी पीड़ भगाया दूर।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई
देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई
ये जिकोड़ी मेरी मिल तेरो नौ कैर द्याई
हर्ची हर्ची ग्याई मि मेसे हर्ची ग्याई ...... २
तेर आंख्युं न जबै मि थे प्रेम घुटी पिलै द्याई
देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई ...........
रौतेंली मुखडी तेरी बिगरैली आँखी
कन तेरो ये रूपन मिथे बौल्या बनेई
सुध बुध मेर हर्ची हर्ची ग्याई ...... २
अंदा जांदा मिथे जब तू अद बाटा मां दिखेग्याई
देखदा ही ते थे मिथे पियार व्हैग्याई ...........
मेरो मेरो अब मेरो पास मेरो कुच नि बी राई
कुच बी छ्या मेरो पास ऊ अब तेरो व्हैग्याई
ये मेर गैल्याणी तेर छुईं मां मि हर्ची हर्ची ग्याई ...... २
अब त ऐजा मेर ये जीबन मां देक देर ना व्है जाई
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कब बसंत अलो बोई
कब बसंत अलो बोई
म्यार पहाड़ा मा बोई ये उजड़ा मा
हिरी हिरी पाखी उड़दा आला
रंग बिरंगी बल तब यख फूल खिलाला
बिरला रंगों तब भूमि सजगे ले हुली
म्यार पहाड़ा मा बोई ये उजाड़ा मा
ब्योलि रूप मा वा रूपमती रुपेनि ऊ हुली
शृंगार रसों दगडी दगड़्यूं दगड सजैनी ऊ हुली
कब कुद्गेली लगेली यूँ नंगी खुठ्यूँ मा
म्यार पहाड़ा मा बोई ये उजाड़ा मा
जख द्याख तख तब मेरी तिस नि बुझेली
मेरी धरती तब मिथे चौदिशा बाटा मा भरमेलि
कन कख ऊ कब मेर यूँ वा नजरि मा समेली
म्यार पहाड़ा मा बोई ये उजाड़ा मा
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दिल्ली वालोँ सुनि लिंवा ये बात
दिल्ली वालोँ सुनि लिंवा ये बात
अप्डी जिकोड़ी को झकझायट
वै को रागरायट मनि लिंवा वै की बात
ऐ जावा अब त अपरा पहाड़ों मा......
धुँआ ही धुँआ ई दिल्ली खाणु रे
हे भुल्हा गढ़ छोड़ी की कख अब तिल जानू रे
शुद्ध हवा अब म्यारा पहाड़ों मा ही मिळाली
मिल ये मा भी एक दिन टैक्स लगाणु रे
तिल भी वैथे चुकनु रे
फस फुस ऊ तेरो फेफड़ो करनु लग्युं च
उकाळ छोड़ी ऊ फिर बी उन्दरु मा जनि लग्युं च
चैती जावा अब तक ना बिगड़ी बात
तुमि त ऐल्या कैल्या पैल सुरवात
ऐ जावा अब त अपरा पहाड़ों मा......
ना तेरो फिर घार रहलो ना तेरो मुल्क रालो
ये हवा को टैक्स चुकणु ना तेरो टाक्को रलो
फिर ते थे अपरी भूल समजली
तब तक भांड्या देर व्है गे हुली ईं देर हुन से पैल
ऐ जावा अब त अपरा पहाड़ों मा......
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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