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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
February 6 at 10:07am
आओ पीछे मुड़कर देखें क्या खोया है
आगे मुड़कर देखे क्या पाना है
शायद पहाड़ को खोया है, खोये हुए पहाड़ को पाना है
बस एक ही बिकल्प, चकबंदी को अपनाना है
बंजर हुये खेतों में अगर हरियाली लानी है
खंडर होते घरों में अगर खुशहाली लानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
गूंजेंगी किलकारियां फिर उन स्कूलों में
जो अभी सूनें पड़े है
खनकेगी चूड़ियाँ फिर उन घरों में
जो अभी बिरान खड़े है
मिलकर हमें एक नयी सुबह लानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
मेरे खेत बंजर हो जायेंगे
इस दर से मुझे माँ को निजात दिलानी है
पहाड़ का पानी और जवानी
पहाड़ में नहीं रूकती इस दाग से निजात भी दिलानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
खुद का खेत, खुद की रखवाली
हर दिन बग्वाल, हर दिन दीवाली
मेनहत कम लागत ज्यादा
ऐ है चकवन्दी का वादा
बस एक निति हमें बनानी है
एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
संयोजक सदस्य प्रचार प्रसार
मो. न. 9971989090

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भोर दूर हिमगिरी श्रृंखला की अनुपम छटा देख,
मन मुग्द होकर पूछ बैठा
क्या कभी मेरा धीर तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
ईमान मेरा तेरे जैसे अडिग रह पायेगा,
हिमगिरि बोला
इस प्रश्न का उत्तर मेरे संग बारह मास तठ्स्त सैनिक के पास है
विषम परिस्थिति पर भी जिसका राज है
तभी हिमगिरी का एक खंड भरभरा विखंडित हो जाता है
वह अडिग सैनिक स्वेत खंडो में समा जाता है।
फिर उस हिमगिरि से सवाल करता हूँ
यह अकाल मृत्यु इस लाल को अभिशाप में मिली
या माँ - माटी के कर्ज के लिए फर्ज में मिली
वह गिरिवर मूक मंद मुश्कान से सहमति जताता है
मेरा निष्कर्ष कर्मबीर के कर्म को नियति मान आगे बढ़ता है
जीवन के अनगिनित यक्ष प्रश्नो को तन्हाई में खोजता हूँ
फिर गिरिराज जैसे युधिष्ठारों की ढूंढ में निकलता हूँ
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
क्रमश: .....
रचना : बलबीर राणा 'अडिग'
बैरासकुण्ड चमोली उत्तराखंड

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुर्सी प्रधान की

कुर्सी प्रधान की तो मिल गयी
कार्यों को कितना निभाएगा
कहीं भूक से निर्लज इसे तू भी बेच कर तो नहीं खायेगा
वैसे कुर्सी भूक नहीं मगर दोनों में कोई बैर नहीं
कहीं भूक बेताब हुयी तो कुर्सी की खैर नहीं।

----- राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की आजादी से सभार समतुल्य सामयिक परिवर्तन
@ बलबीर राणा "अडिग"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा हिम प्रवास
जाने कैसे कटते दिन कैसी गुजरती है रातें
ठिठुरता रोम रोम और क्रन्दन कराती है हवाएँ
तुझसे क्यों खपा होने लगा मैं गिरिवर
रचने वाले ने खिलोने में दी तेरी ये फिजायें।

दूर से जितना मोहक लगता है तू हिम शिखर
तेरा आँगन निर्जीवटता बिष पुष्पों से भरा है
डरता है सजीव जीवन तेरे आशियाने से
इस लिए मंद मूक मुश्कान लिए तु निश्चल खड़ा है।

क्यों नहीं पूछता उन नराधम इन्शानो से
जिन्होंने तुझ ऋषि पर भी हक़ की रेखा खींच दी।
क्या खोएगा क्या पायेगा वो तेरे शैल खंडो से
स्वेत मृत आवरण पर भी जिन्होंने मुठ्ठी भींच दी।

कितनी भी खीज उतार तू शीत बबडंरों के झोंको से
डगमगाउँगा नहीं पला हूँ मैं भी माँ भारती की ढूध् की धार से
क्यों ना कट जाए सर, निकल जाए सांस इस जेहन से
पहरा करेगी रूह अडिग की, घूम घूम तेरी इन चोटियों से।

रचना-: बलबीर राणा 'अडिग'

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

झुकुडी मा उमाल ऐ जान्दू

झुकुडी मा उमाल ऐ जान्दू
त्वे देखी मन कंयारू ह्वे जान्दु
बिराण हुय्यां युं थोला खोला
किले उजडा होला युं रोला
सूनी डांडी रीती गाढ गदनियों मा
उदास हिलांस कु विलाप
घसियारियों ते बुलोण लगी
रोंतेली धारों की रंगत
नयां जमाना का बथों मा उडिगे
बांजा पुंगडी रूणी लगी
हल्य्या बल्दों ते तरसोणी लगी
........ बलबीर राणा भैजी
24 Dec 2012

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब दिनो का दिनोण ह्वेगे बाबू
हमारा पुराणा दिन चलीगे
तुम मार्डन ह्वेगे बाबू
ब्वे बाब की सेवा इतिहास बणी रैगे बाबू
नी टिकणी खुटी तुम्हारी ये देली मा
अब घोर आण तुम बिसिरेगे बाबू

पट निरपट हुंय्यु नौकरी का बाना
दुनियां की भीड मां तुम भटकण लग्य्यां बाबू
अब दिनो का दिनोण ह्वेगे बाबू
तुम मार्डन ह्वेगे बाबू

क्या पायी मिल दिन राती खैर खैकी
ढुंगा डोली एक कैरी बाबू
अपणा भोल मा तुमतें संवारी बाबू
अब दिनो का दिनोण ह्वेगे बाबू
तुम मार्डन ह्वेगे बाबू

हमारी भी आशा छयी
ब्वारी कु हाथ एक गिलास चाय की अभिलाशा छयी
द्ववार बाटा का दिन ही पंख लगी जाला
यु मैन नी जाणी बाबू
अब दिनो का दिनोण ह्वेगे बाबू
तुम मार्डन ह्वेगे बाबू

गौं ख्वालों मा उठण बैठण
तुमल क्या जाणी बाबू
भै बन्दों नाते रश्तों कु सुख दुख
तुमल क्या पच्छियाणी बाबू
अपणी संस्कृति संस्कार तुमल कनै सिखण बाबू
अब दिनो का दिनोण ह्वेगे बाबू
तुम मार्डन ह्वेगे बाबू

तुम्हारा नौनियालों ना अपणी बोली भाषा
कख बटी बिंगण बाबू
पराया मुलुक की भाषा सीख
हमतें तुम अजाण ह्वगे बाबू
लोगों की रीति रिवाजों अपणे
बिदेशी ह्वगे बाबू
तुम मार्डन ह्वेगे बाबू
...............बलबीर राणा "भैजी"
18 Dec 2012 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वों का गीतों मा समयुं उत्तराखंड
वों की अभिवक्ति निर्विकार पहाडियों जीवन
हर शब्द मा उत्तराखंडे संस्कृति, संस्कार
सुर मा पहाड़े वेदना
ताल मा पीड़ा
पीड़ा बेटी- ब्वारियों की
पीड़ा ब्वे-बाबा की
ददा-दादीयों की रौंस
धै पहाड़ पहाड़ियों की   
धै भैजी-भूलों की
धै कुटुम, गौं, ख्वालों की
हे हिमालय पुत्र
अडिग तेरु सन्देश
अडिग उत्तराखंडी संस्कृति कु प्रहरी
तेरी धै सूणी
भिभ्डाट मची जांन्दू राज सत्ता मा
कुशासने कुर्शी हिल्दी
कुणा लुकी जांदा चोर-बिराला
कु बाटू नि देखी तेरी अंखियों न
कु भोंण नि पुरियायी तेरा कंठ न
उत्तराखंड की स्वाणी मुखडी
तेरा ज्यू की किताब मा दिखेंदी
तेरी नजर
कख नि जांदा
तेरु पराण
कख नि होन्दू 
रोंत्यला डांडियों मा
गंगा जमुना का निर्मल पाणी मा
बिपुल घर-कूड़ी, गौं-गुठियार मा
घुमणु रैन्दु वा भोंण
ते भोंण से फूल खिल्दा बांजा ज्यू मा
काब्लाट ह्वे जान्दु बुडडया पराण मा,
रूठी ब्वे की ममता नाचण बैठ जांदी
हे गढ़रत्न, गढ़पुरुष उत्तराखंडी शिरमोर
त्वेतें कोटि कोटि प्रणाम, प्रणाम,

२.
सबुं की अन्वार त्वे मां
सरु उत्तराखण्ड त्वे मा
सुखीयों कु सुख त्वे मां
दुखीयों कु दुख त्वे मां
डाडियों की रौनक त्वे मा
कांठीयों की चमक त्वे मां
पलायन की पीडा त्वे मां
बेरोजगार की संवेदना त्वे मां
गौं कु दर्द त्वे मां
दाना सयोणु की लाचारी त्वे मा
ब्वे की ममता मां
पिता कु दुलार मां
ध्याणी की पीडा मां
भैजीयेां  कु प्यार मां
ज्वान खुदेड ब्वारी माया मां
फौजी भुला की ज्वानी मा
मायादारों की माया मां
नयुं ब्यौ कु उलार मां
बुडिडयों की रस्यांण मां
जख देख तख तुम
उत्तराखण्डियों दिल मा तुम
मन मां तुम
हे गढ रत्न
जतगा बोला उतगा कम
अब शब्द नी बलबीर भैजी  मा
इत्गा शाल बटि तेरी जगेयीं यु जोत
जै का उज्याला मां
उत्तराखण्ड की सस्कृति चमकणी चा
जुग - जुग जियां जुगराज रय्यां


आपकू -: भुला
बलबीर राणा "अडिग" 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भोऽळक सवाल

ब्वेल फोन पर बोली
बेटा नातिक खुद लगीं
अज्क्याल गर्मी छुटी मा
तों द्वि दिन  घोर ल्येदे
जरा मी भी हरीश देखुला
अपणा पोथी-पंछियोंक घ्यू दूध खळोला
ऐरां! तख बजारुं खाण-प्योंण च
अजी!!
नि जाणा बल हमें उन पहाड़ों में
म्यार लड़के काळा ह्वे जायेंगे वहां
उनको समर कैंप में हिल स्टेशन जाणा बल
द्वि  हजार फीस दे रखी है
अर!!
मी चुप.............
ब्वेतें बाणु बणे समझे भुझे,
ब्वे'त माणी,
अपणो खातिर माया मारी,
पर!!
मेरु ज्यू अपणा भोऽळक सवाल छोड़ी ??
इनी कैरी हम अपणी ये पीडी तें
कखी?
इत्गा दूर त् नि लि जाणा च ??
जखक बाटा, माया-ममता,
संस्कृति-संस्कार हर्चीक
वापस ओंण
मुश्किल क्या नामुमकिन ह्वे जावो, 
चलो?
मुछ्यालूऽ जगी पिछने आन्दु।

© सर्वाधिकार सुरक्षित
बलबीर राणा "अडिग"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कूड़ी जग्वाल

खोळ बटिन भैर क्या चल्गे 
लठियाळा अपणेस नि रेगे
पैली कभी-कभार,
तू धार-काँठों बटिन
तीजे जन जून दिखे भी जांदू छै,
अब निजाण,
कख हर्चिन
तु क्या हर्चे सबी हर्चेणा च,
दुन्या आज उन्दारे लंगी
उकाल क्वी नि आणु,
संसारे सदानी रीती रे
उग्दा सूरज तेन सब प्रणाम करदा
डूब्दा थें क्वी नि करदू,
यूँ पाड आज डूबणा च,
उड़्दा सबुं देखी
बैठी कैन नि देखी
तुम उडिग्यां 
मी कूड़ी  जग्वालम बैठीं
बल! 
अलंगी जालू-पलंगी जालू
ऐलू जड़े पऽर।   

जून २००३ डैरी पन्ना बटिन
रचना – बलबीर राणा "अडिग"
© सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डाळे माया

यूँ अंखियों तें कु समझालू
खुलण त
औंशुन टबरान्दा
लगण त
स्वपनिल स्वेणा देख्दा
मनऽकी बोला ना?
कबि तिरवाल कबि ढ़िस्वाल
कबि उकाल कबि उन्दार
अर दिलऽक !
एऽक कप्त्याट्, कब्ळाट्,
होऽर घबग्याट् ।
यु पराणी
माया बिगेर रे नि सकदी
मथि वाळा
लोभ दिखायीं मोत लुकयीं
लोभ मायाक सिक्का द्वी पहलु
बिगेर दौं-किल्वाडा बंधियों
मन-पराण, ज्यू-जागा
सबी बंध्याँ
यु अगासमात्री लग्लू दिनप्रिती
म्यार चौं तरफां घेरण लग्युं,
खैरी औन्दी,
हैंसी-हैंसिक जलणम
रुवे-रुवेक हैंसणम्
होर पीड़ाक छैलाऽम्
ये सुख्याँ होंठड़ियों पर
मुल-मूल्याट!
अरे! डाळा तू किले छे
ये बुडापम मायाक पिछ्वाडी पडि्यों
नया बीज ये बण नि जमी त्
कखी ना कखी त जमोण लग्याँ
सुधि छन वोंतें रुवोणु
जोन पिछवाडी मुड़ी नि देखण,
अवाज पच्छ्याणी त
वर्तमान छे भितर बटिन भट्याणु।

१५ मई २०१४
© सर्वाधिकार सुरक्षित
रचना – बलबीर राणा "अडिग"