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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बल जी वे कया काम का
फुर्र उडी की जांद जी
बौडी की नि आंदा जी
सुप्निया मेरा आँख का
बल जी वे कया काम का
अपरा अपरा करदा जी
गैरों का वो नि सोचदा जी
विकास मेर पहड़ा का
बल जी वे कया काम का
नशा नशा करदा जी
वै थे देखिक लोक हसदा जी
अब दारू रोका थाम की
बल जी वे कया काम की
आँखा का अंधा हुंया जी
काला चस्मा आंख्युं चढ़ा जी
देखणा छण बस नामा का
बल जी वे कया काम का
नत व्हैकि आच खड़ा छन
बल जी क्या आच काम पड्या छन
चुनवा ऐगे अब पहड़ा का
बल जी वे कया काम का
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

विंकी मुखडी
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी ..... २
मि थे बुलाणी चा माया लगाणी चा
धैयै लगाणी चा आंख्युं आंख्युं बचाणी चा
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
विं मुखडी को जादू रैई ना में परी काबू
भैर भितर ऐथर पैथर अग्ने पिछने
वा मि थे ले जाणी चा बौल्या बनाणी चा
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
क्या करो मि थे कुच बी समझ ना ऐई
विंकी रूपा को मै पे जबै झौल पौड़ी ग्याई
ग्याई ग्याई मि तब मैसे ग्याई
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
रैंदु ना मि अब अपरा अपरुँ मां
ना गैल्युं मा ना कै अब बिरणु मां
नि जणदू मि मि थे ये कया रोग लगि ग्याई
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हा कुच बात च छे भैजी मा
हा कुच बात च छे भैजी मा
इन दौड़ी नि जांदू जी मि कैमा
हा कुच बात च छे भैजी मा
खिंची ले जांदी उंकी वो अदा
बल ऊ कलाकार व्हैकि छन जन्मा
हा कुच बात च छे भैजी मा
टॉपलु पैरी की वो पहड़ी बन
देखणा कु ऊँ को अगलू चलन
हा कुच बात च छे भैजी मा
कबि हैंसदरा छन कबि चुप
कबि गुसैल छन कबि मिसैल
हा कुच बात च छे भैजी मा
माटु छे ऊ मेरो ये पहाड़ा को
वै बाना तपरणु रैंदु सदनी ऊं को मन
हा कुच बात च छे भैजी मा
ओंकार सिंह नेगी भाई जी प्रणाम
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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क्वी नि रुंदो रे
क्वी नि रुंदो रे अब कैका बाना
रीत हैगे ये पहाड़ ईं लदोड़ी का बाना
क्वी नि रुंदो रे ...............
बल इतगा च ये उकाली को रैबार
उन्दरु का बाटा मा बल रौड़ीगे मेर ब्यार
क्वी नि रुंदो रे ...............
कैल देखण तेथे अब पैथर बौड़ी की
छोड़ीगे तेथे तेर ढुंगा गारो मा खेली की
क्वी नि रुंदो रे ...............
धैरी ले आंसूं अब अपरा आंख्युं पाख्युं मा
क्वी नि आलू अब वैथे मैट ना कुन
क्वी नि रुंदो रे ...............
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बल जी वे कया काम का
फुर्र उडी की जांद जी
बौडी की नि आंदा जी
सुप्निया मेरा आँख का
बल जी वे कया काम का
अपरा अपरा करदा जी
गैरों का वो नि सोचदा जी
विकास मेर पहड़ा का
बल जी वे कया काम का
नशा नशा करदा जी
वै थे देखिक लोक हसदा जी
अब दारू रोका थाम की
बल जी वे कया काम की
आँखा का अंधा हुंया जी
काला चस्मा आंख्युं चढ़ा जी
देखणा छण बस नामा का
बल जी वे कया काम का
नत व्हैकि आच खड़ा छन
बल जी क्या आच काम पड्या छन
चुनवा ऐगे अब पहड़ा का
बल जी वे कया काम का
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विंकी मुखडी
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी ..... २
मि थे बुलाणी चा माया लगाणी चा
धैयै लगाणी चा आंख्युं आंख्युं बचाणी चा
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
विं मुखडी को जादू रैई ना में परी काबू
भैर भितर ऐथर पैथर अग्ने पिछने
वा मि थे ले जाणी चा बौल्या बनाणी चा
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
क्या करो मि थे कुच बी समझ ना ऐई
विंकी रूपा को मै पे जबै झौल पौड़ी ग्याई
ग्याई ग्याई मि तब मैसे ग्याई
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
रैंदु ना मि अब अपरा अपरुँ मां
ना गैल्युं मा ना कै अब बिरणु मां
नि जणदू मि मि थे ये कया रोग लगि ग्याई
मुखडी मुखडी विंकी मुखडी .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

समाज सेवी अनिल कुमार पंत जी और UEMD समर्पित मेरा लिखा उत्तराखण्डी कौमी तराना
जै भारत जै उत्तराखण्ड
बीर पाड़ी छा हम
सीमाओ का पैरी छा
जंग का भारी भड़ छा हम
जै भारत जै उत्तराखण्ड
गंगा गंगोत्री सी पावन हमरु मन
देस का वास्ता सदानी
समर्पित चा हमरु
तन मन धन
जै भारत जै ऊत्तराखण्ड
बीरु भडू कु बलिदानो कु
गाला गीत अर गान
त्वे कु मेरा देस ज्यु जान
भि चा कुर्बान
जै भारत जै उत्तराखण्ड
एक चा रंग एक चा जात
हम छा सब्बी
भारत माँ की संतान
जै भारत जै उत्तराखण्ड ।.......शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ढोल!
ढोल !/आग्गी मा
पैली हमुन
खूब हौड़-हौड़ /तपै च.
जथगा बजौण छौ वे
बजै च
जथगा मजा
चखौण छौ वे/ चखै च.
ढोला बोल
क्वी बींगी हो
चा नी बींगी हो
हमुन हर क्वी
नचै - कूदै च.
बिचारा ढोलन बि
जथगा पिड़ा /पचौण छै
वेन वा
पचै च.
अब बजौण वळा
अर
मजा चखौण वळों कि
आपस मा/ लड़ै च.
किलड़ी उंद
टंग्या ढोलो तैं
स्या बि/ एक
सजै च।
दमौं
हैं ! क्य पूछी?
कि मी कु छौं?
अरे मी दमौं!
ढोल दगड़ा / ढौळ मिलौणू
अयूंूं छौं.
औंदि बिथेक बि
यी अढ़ाये गेे छौ
कि चा
कुछ बि ह्वे जौ / म्यरि ढौळ
ढोल दगड़ा मिलीं रौ.
बस्स!
स्यू दिन छौ
अर आजौ
पर ये बंधन मा बि / मी कबि
दुखी नी रयों.
किलैकि
हमारा बीच
न कबि
झगड़ा ह्वे / न क्वी
भेद -भौ छौ .
मी चांदू
म्यरु ढोल
दुन्या मा खूब नौ कमौ
अर वेका पैथर /म्यरि ढौळ बि
मिलणी रौ ।

by Shailendra Joshi

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Uttarakhand -पतरौल

दर्द भी नी छोड़दु मेरा हाल
मैं कै मुंग क्या बोलूँ
काँडा प्रेम का चुभे चुभे
दिवानु अपणु बणाई
सुख का दिनो माँ
दुःख कु लोण बगाई
मैं कै मुंग क्या बोलूँ
‪#‎दाणी‬

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
Yesterday at 10:07am

आओ पीछे मुड़कर देखें क्या खोया है
आगे मुड़कर देखे क्या पाना है
शायद पहाड़ को खोया है, खोये हुए पहाड़ को पाना है
बस एक ही बिकल्प, चकबंदी को अपनाना है
बंजर हुये खेतों में अगर हरियाली लानी है
खंडर होते घरों में अगर खुशहाली लानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
गूंजेंगी किलकारियां फिर उन स्कूलों में
जो अभी सूनें पड़े है
खनकेगी चूड़ियाँ फिर उन घरों में
जो अभी बिरान खड़े है
मिलकर हमें एक नयी सुबह लानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
मेरे खेत बंजर हो जायेंगे
इस दर से मुझे माँ को निजात दिलानी है
पहाड़ का पानी और जवानी
पहाड़ में नहीं रूकती इस दाग से निजात भी दिलानी है
बस एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
खुद का खेत, खुद की रखवाली
हर दिन बग्वाल, हर दिन दीवाली
मेनहत कम लागत ज्यादा
ऐ है चकवन्दी का वादा
बस एक निति हमें बनानी है
एक ही बिकल्प चकबंदी अपनानी है
प्रदीप सिंह रावत खुदेड़
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