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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चिंतन मंथन उत्तराखंड कु
हुंणा दिल्ली बंबई मा
गडवाल कु बल माटु बी बिकणा
राजनिति की टेबल मा
कुई भुना बंबई बिटी की
पहाड बचौला हम
दिल्ली वालु की रट लगयीं
डयारदूण गैरसैंण लीजोला हम
अंगरेजी क गांणा लग्यां छन
देशी बच्यांणा छन घर मा
अपण नौन छन कानवेंट स्कुल
भाषंण सुंणा भग्यानु क
प्राईमरी जयीं च धार मा..
बाडी पल्यो तै घींणै घींणै की
कीटी कीटी की खांणु छ्या
पहाड प्रेम 17 कु दादा
मी भी त्यार चितांणु छ्या
पलायन की चिंता दीदा
मार मार कैकी त्वै खांणी च
बंबई मा तेरी कोठी लगयीं
दिल्ली मा डी.डी.ए की मुलयीं च
अपणी कुडी खंद्वार हुंयी
किलै हैंक कुन रुणी छै
पलायन की तेरी नकली पीडा
2017 बिंगाणी छै
चिंतन मंथन उतराखंड कु
हुंणा बंबई दि.........
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भट्ट (दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दगडया छे तु दगड्या रै
सुख दुख कु दगड्या रे
जैकु नी सारु कुई
वै भग्यान क सारु छै
दगडया छे तु दगडया रै
गरीब असहाय भयुं कुन तु
छैलु वाल डालु छे
दुख बिपदा मा भै बंदु कुन
भौत बडु सारु छै
दगड्या छे तु दगडया रै
अपर काम छोडी तुम
जनसेवा मां लग्यां छ्या
सेवा सम्मान सदभाव सहयोग
भलु कैकी निभांणा छ्या
दगड्या छे तु दगड्या रै
बुये क दुधी क सौं लियां छन
सौं खयां छन माटी क
अपंण भै बंधु कुन रौला
जिकुडी यैथर तांणी क
दगड्या छे तु दगड्या रै
रक्तदान दगड्या तेरी
सबसे बडी पछ्यांण च
हरचदी रीती रीवाज
दगड्या तीन बचीयांण च
दगडया छे तु दगडया रे
अपंण गौं तक सीमित नी तु
सरा मुल्क क लाडु छै
दुख दर्द मा दगड्या तु
सबसे यैथर रांदु छै
दगड्या छे तु दगड्या रै
दगड्या छे तु दगड्या.......
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भट्ट (दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बसंत पंचमी
किरण नई उल्हास कि
छोड़ा उसने दिल बेराग का
बसंत अपनी पंचमी साथ
छा गयी इस धरा पर
मिटे प्रतीक्षा के अब क्षण
गीत गया उसने मल्हार का
रंग बिरंगी रंग खिले हैं
फूलों संग भौंरें मिले हैं
ऋतु कि यह कुसुमाकर
आयी वो लेके यौवन बहार
विरह मिलन के खुले क्षण
चहुँ और हर्षित खिले मन
नवल युगागम शारदे माँ
स्वर्ग धरा सफलम् सुफलम्
रचित हो मेरे ह्रद्य सदा माँ
सुंगधित कविता प्रति पल
किरण नई उल्हास कि
छोड़ा उसने दिल बेराग का
बसंत अपनी पंचमी साथ
छा गयी इस धरा पर
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्या बोलूं में अब तेथे
क्या बोलूं में अब तेथे
ये जीकोडी का भेद कन के तैसे उघडू मि
एक तरी जरा .. ...कख भागी जानि छे
रोक जा सुण जा तो ये मेर जियू की बात
ये मेरी शर्म्याली ये मेरी लजयाळी
सेब की जनि ये तेर च मुखडी लाल
वै पर सुनहर सुना का छै ये तै मा बाळ
बिरला की आँखी तेर क्या बोलानि च
देनी रैंदी छे वा रोज मि थे किलै कि हाक
ये मेरी शर्म्याली ये मेरी लजयाळी
प्रेम की मेर तू पैली पैली ऋतू छे
अलगद ऐगे तू सुरुक ये जिकोडीमा
इनि बरसी तेर मै पर प्रेम की बरखा
ये जिकोड़ो मेरो जनि पैल बारी धड़की
ये मेरी शर्म्याली ये मेरी लजयाळी
एक तरी जरा .. ...कख भागी जानि छे
रोक जा सुण जा तो ये मेर जियू की बात
ये मेरी शर्म्याली ये मेरी लजयाळी
क्या बोलूं में अब तेथे
ये जीकोडी का भेद कन के तैसे उघडू मि
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

एक इनि बी परित हुंदी
एक इनि बी परित हुंदी
यूँ डंडीयूँ कंडीयूँ का बाणों दगडी
ये ऊंचा हिमाला का चलूँ दगडी
ये भूमि का भूम्याला का मूल दगडी
एक इनि बी परित हुंदी .........
रंग बिरंगा का यख बिरला फूल खिल्दी
यूँ घटियूं बोग्यालों मा पसरया डलियूँ मां
भांति भांति का चखुला -पाखा उड़ादिन
यख ये निळू विराट सरगा को छाति मां
एक इनि बी परित हुंदी .........
बल मिथे च बस इतगा तुम दगडी बोलणु
रयां तुम अब कख बी पर भूली ना जयां अपरो थे
तुमरो सब कुच यख ही च ये बिणा तुम बी अपुरा छन
ये माटी घाटी डंडी कंडी चलूँ चांटी तुम बिणा जण अपुरा छन
एक इनि बी परित हुंदी .........
अपरी परित तुम बिसरी ना जयां
ये अंख्यों ये जीकोडी और्री गिची से बोल्दी रयां
हम पहाड़ी छों हम थे अपरो उत्तराखंड से परित च
देख इनि बी एक गेड़ी परित की अजाण रीत च
एक इनि बी परित हुंदी .........
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये किले की हुँदु
ये किले की हुँदु
क्वी वैथे जणदू ना क्वी वैथे गणदू ना
अपरा अपरी मां लग्यां छन सबी
आँखा छन पर क्वी देख्दू ना
ये किले की हुँदु .....
दुःख पीड़ा जबै अप्डी हुंदी
झट कैकी वा किले कि देखे जांदी जी
दूजै की दुःख पीड़ा देखे की बी हम थे
किले कि वा हम थे देखेंदी ना
ये किले की हुँदु .....
अपरी माता का हम सब लाल छन
विंका आँखूं मा हम आंसूं देख सकदा नि
एक औरि बी माँ छन माता जल्म भूमि
विंका का आँखों का हम आंसूं किले पुस्दा नि
ये किले की हुँदु .....
देख बुरो ना मान्या मेरा दीदों
धैरी की अपरा जीकोडी मां अपरो हाथ सोचा
क्या कैनी च तेर जीकोडी तैसे मैसे
विंकी सुणा वे करम थे ही अपरा पूरा करा
ये किले की हुँदु .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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‎राजेन्द्र ढैला 'दआदि'‎ 

November 27, 2015 ·
मायाक़् मरी भई मैं,
पाछ्‍ वीक़ पङी भई मैं,
वील विकल्प में धरी भई मैं,
जांणि को नम्बर छी म्यर
पुछण तलकैकि बात नि भै,
सारी रात ब्यूँजै रयूं मैं,
पर ऊ दगङि बात नि भै।
पर ऊ दगङि बात नि भै।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Gyan Pant
November 27, 2015
जिम कार्बेट पार्काक् शेर .......
पत्त न
के बात भै
दूध जस्
उमांव ऐ पड़ौ
कल्ज में ....
हिकुरि - हिकुरि (हिकुरि - हिकुरि माने सिंसक सिंसक कर )
डाढ़ ऐ पड़ी
आँखन् बटी
छो फुटि पड़ौ छो - पानी का सोता
हिसालु त्वाप् जास्
भौतै भल् लागीं
आज मैं कैं
त्यार्
कनमड़ खैयी गिज् ... गिज -- होंठ
एक स्वैंण छी सब स्वैंण -- सपना
जो मैलि ले देखीं !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

म्येरा सुरों मा बसी
सरसुती भगबती
ज्यू भि रयेकी गयेकी
होली गौला मा म्येरा
गीत गै गैकी
करलू माँ सरसुती
त्येरी इस्तुती
कृपा रखी सरसुती
कंठ गौला मा म्येरा
त्येरी किरपान सुणदा
लुग गीत म्येरा
गौला मा बिराजी रै तू
यी जलम आखिर साँस तक
साधना सुरों बिटी करदु रालु
सरसुती माँ भगबती
गंगा सुरों कि जमुना गीतू कि
बगदी रा समोदर दुन्या मा
बसी रै तू बस म्येरा गौला मा
सरसुती भगबती
ज्यू भि रयेकी गयेकी
होली गौला मा म्येरा
गीत गै गैकी
करलू माँ सरसुती
त्येरी इस्तुती
रचना .........शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सैरी दुन्या लगणी
मटेला डांडा सी
तू छोरी चमकणी
मटमैला डाँडो मुंड ऐंच.
तू बांद चमकणी हिमालय सि
सैरी दुन्या लगणी
घर कूडो भीड़ सि
तू छोरा पावन लगणु
ऐंच डांडा मंदिर शिवालय सि
सैरी दुन्या लगणी
उपरि बिराणी सि
तू लगणी बांद अपणी सि
सैरी दुन्या लगणी
जंगल बांज सि
तू छोरा बांज जंगल
खिल्यु बुरांस सि....................शैलेन्द्र जोशी
फोटोक्लिक ......शैलेन्द्र जोशी