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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

******* गरु मन्न कु उमाल ********
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अब्ब नि आन्दा रैबार किले ..??.. बल अब्ब मैसेज आन्दी !!
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अब्ब नि आन्दा ,जान्दा मेहमान किले ..??.. बल अब्ब फोन आन्दी !!
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अब्ब नि खुदेंन्दा लोग किले ..??.. बल अब्ब दिन्न माँ चार बार बात व्हेजान्दी फोन माँ !!
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अब्ब नि मनाये जान्दी सग्रांद अर्र बार त्यौहार किले ..??.. बल अब्ब जब्ब खिसाउन्द पैंसा तब्ब सग्रांद!!
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आन्दा जान्दा बाट बटोया अब्ब नि देखेंन्दा , बाटा आदिमों ते बिसरिगी , और आदिम बाटों ते बिसिरिगी आखिर किले ..??.. बल अब्ब गाड़ी मोटर व्हेगेँ , पैदल चालणा कु क्वी राजी नीच !!
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अब्ब नि लाग्दा खौला, मेला पैली जनं किले ..??.. बल अब्ब पैली जान्नु प्यार प्रेंम ही नि रैग्याई !!
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अब्ब नि बच्यान्दा परिवार ( कुटुमदारी) माँ लोग किले ..??.. बल अब्ब हर घर माँ फेसबुक और व्हाटसप व्हैग्याई !!
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अब्ब नि करदा लोग सुबेरलेकि उठणाम मुर्गा बसणाकु इंतजार किले ..??.. बल अब्ब फोन माँ आलार्म बज्दी !!
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अब्ब नि लाग्दा थड्या चौफला और झुमैला किले ..??.. ऐले की घर गौं माँ क्वी छेनीचा सब्ब लोग देशु प्रदेषु वाला व्हेगेँ !!
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अब्ब नि रैग्या पैली जान्नु धाडु दगड़ू किले ..??.. बल अब्ब हर घर माँ और हर मनखी माँ हंकार भोरेज्ञायी !!
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दोषी न ठैरेयाँ मेथयी की निबोली जाणु मिल , अब्ब तुमि बताओ की पैल्या कु जमानु भल्लू छायी या अब्बा कु जमानु भल्लू च !!
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शुभ दोफरा म्यारा दगड़्योँ ... लाल चन्द निराला ..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Nice Line

नारंगी की दाणी हो हो नारंगी की दाणी
क्या ले सूखी होलू बौ जी मुखूड़ी को पाणी हो हो हे बौ जी मुखूड़ी को पाणी हो
खोली का गणेशा हो हो खोली का गणेशा हो
जुग बीती गै नी द्यूरा स्वामी परदेशा हो हे द्यूरा स्वामी परदेशा हो हो..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तल्ली मल्ली सल्ली सब गुड़गांवाँ
लाचार बेकार सब पाड़ीगाँवां
हमरा गौ मा छुयीं गपसप
गुडगांवा इंडस्ट्रियल हब
पाड़ मा इन्नी तरक्की होली भै कब
हमरा पाड़ी गांवा
कब होला गुड़गांवां
हम सब पाड़ी बोल सक्कू
फक्र करी भै हम छा पाड़ीगाँवां।......शैलेंद्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Suresh Pant

रमदाक बल्द हराण,
चान चान भाँट पटाण।
रमदाक पड़िगे डाडाडाड़
यस अन्यो भै मैल के बिगाड़
बड़बाज्यूल समजै आब नि मार डाड़
हिम्मत कर समाल आपुण कारबार
त्यर बल्द हराण अन्यो के भै?
कास बड़बाज्यू छौ तसि बात कूँछा
मेरै बल्द हराण मईं समजूंछा
म्यर बल्द दगै ठुलदाक बल्द भै
एकै किल में दुये बादीं भै
उ जै नि हराण म्यर किलै हराण
यो भै अन्यौ तुम भया सयांण
फैसाल करौ बल्द किलै हराण?

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देखे ले अपरी ये रस्वड़
देखे ले अपरी ये रस्वड़
कै दिन ये भूक तिस बुझांदी छे
अंख्यों मा लेकि लाडा पियार अ
वा तेथे धैय लगे की बुलान्दी छे
देखे ले अपरी ये रस्वड़ .....
दिख जालु टूटीयूँ चुल्लू को दिवाल
जैमा ब्वै रुटी सागा भात दाल पकन्दी छे
देखिलियां कमरा कूड़ का बी हाल
जख हैंसी रुवै की दिस बितान्दी छ्या
देखे ले अपरी ये रस्वड़ .....
याद छे ते चौक गोठ् पुंगड़ा डोखरी बाटा
ये भगयान अब कब हुलु अब वख जाणा
रुड़ि ह्यून्द कू पसरयूं हुलु वख उज्यल
मेरा भागा मा निच वै स्वर्गा की रस्याण
देखे ले अपरी ये रस्वड़ .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की
ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की
अद बाट मां जो हम थे छोड़ी की अग्ने चली गयां
ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की
कख व्हाला वो अब क्या कण व्हाला वो
ईन सै की निर्जक सिन्कोली कण कै राला वो
ऊं की छुई अब हम थे ऊं की याद दिलांदी
कबी हैसंदी कबी खूब रुवैई की जांदी
दगड छोड़ी कि वो दगड्या मेरा
अचाणचक कख बौडी की कख चली गयाँ
सवय व्हैगे छे मि थे तेर अब ते बिगर करमत नि
खोज्नु छों मि ते थे गैल्या देख्णु छे कया तू मिथे
ऐ जांदी खुद ऊन बिछड्या गैल्यों की .................
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जिकुडी मा च खैरी मेरी
छौं मी दुर परदेश मा
यखुली छौं मी हौर क्वी नी
दीदों म्यार गैल मा
जिकुडी मा च खैरी मेरी
गौं गैलों की याद मीतै
आंदी रोज बड्युल्युं मां
जिकुडी रैंदी यख उदास
खुद लगीं च सांकी मा
जिकुडी मा च खैरी मेरी
दगडया गैल्यों तै मी अपण
खुजदु छौं मौबेल मा
लाईक कमेंट करदु तौंकु
फेसबुक की चैट मा
जिकुडी मा च खैरी मेरी
माटी कु च कर्ज दगडयों
कभी चुके नी सकदु मी
पौंछी जौं चै जुनी पर भी
गौं नी भूली सकदु मी
जिकुडी मा च खैरी मेरी
पट्टी उदयपुर मा मेरु
वाया भृगुखाल च
रौंत्यालु उलारु म्यारु
प्यारु गांव ब्वांग च
जिकुडी मा च खैरी मेरी
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भट्ट (दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 ( होरी गीत )*-*-*-*-*
होरी में गुलाल- हुई रे मोरी अँखियाँ,
अबीर को थाल हुई रे मोरी अँखियाँ ||
दिन- होरीं के न संभले ये जोवनवा,
छलके- उमंग रंग, मन के अंगनवा,
प्रीत जिया में जागी,धड़कें रे छतियाँ || होरी में.... .
अबीर घटा है छाई,और ये उमरिया,
छन छन छनके,निगोरि पायालिया,
कसक कसक जाए,तन पे ये अंगिया || होरी में ....
अंग अंग रंग डारी, तन मन रंग डारी,
पिया रंग भीजि मैं तो,सारी रंग सारी,
कर जाये क्या क्या,होरी की ये रतियाँ || होरी में ....
रंगाय दीन्ही चूनर,रंगाय दीन्ही चोली,
छैल छबीलो पिया, खेले ये कैसी होली,
हँस करे बरजोरि यूँ,कहे रे चल बगिया || होरी में.....
निपट अनारि सैंयाँ,मरोरि गोरि बैंया,
तन झकझोरि पडत रही मैं तो पैंयाँ,
रंग के बहाने,क्या क्या ये करे बतियाँ || होरी में......
(म०न० गौड़ *चन्द्रा*) सत्तीचौड़,कोटद्वार उत्तराखण्ड
,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

-( राग काफी )*-*-*-*-*
सब को मुबारक होली,
फागुन ऋतु शुभ अलबेली ||
घर घर,अंगना रंग अबीर हो.
खुशियों की रंगरेली,
तन रंग लो तुम,प्रभु के रंग में,
रंग लो मन की चोली || सब को मुबारक ....
( प्रिय श्री शैलेन्द्र जोशी को सस्नेह )
नोट- कुमाऊँ की बैठी होली के लिये होली गीतों के लेखन क्रम में भी यह प्रथम रचना है | इस गीत को HMV ने किसी प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक के स्वर में किसी कैसेट में रिकार्ड किया है |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाली गीत रचना )*-*-*-*-*
( गढ़वाली गीत रचना क्रम में प्रथम *चल रूपा * रचना के बाद दूसरी रचना *झुमलि झुमलि *)
झुमलि झुमलि झूमली,डांडी कांठी झूमली,
आयो -बसन्त- आज, डालि- डालि झूमली ||
पैंयाँ,-ग्वीराल, बाँज,- फूलिग्ये- बुराँस,
बेडू- कि - डाल्यूं- मा- बासदी- हिलाँस,
पुंगडियूँ कि मींडि मीडि फ्यूलिक फूल
घिडडियूँ कि जोड़ी कखि घूघति घूरली || आयो बसन्त....
कतना- निठुर- छे तु ,कनु तेरी प्रीत,
गदिन्यूं मा- घसियारि गाँदन- गीत,
धरति को आज द्याखो रंग बसन्ती,
हिंसर किनग्वाड कि डालि डालि फूलली || आयो बसन्त....
धक्- धक् मन म्यारु,-डबडब आँखी,
उडि- ऐई - जाँदू-, हूँन्दी - जू - पाँखी,
बाँसुरी का सरगम मा छलछल प्राण,
न बॉस- कफ्फु- मेरि जीकुड़ी झूरली || आयो बसन्त.....
जून्याली- रात -मा -मन- च उदास,
या तन काया मेरी पलपल निसास,
ऋतु -बौडि- ऐग्ये, बीति -ग्ये उमर,
कब व्हेलि देवी दैन्णी कब बात सूणली || आयो बसन्त....
(म०न० गौड़ *चंद्रा* राष्ट्रीय अनुशासन प्रशिक्षण केंद्र बडवाहा, इंदौर -१९६३ )
( प्रिय श्री शैलेन्द्र जोशी जी को आत्मिक स्नेह सहित ) ...समीक्षा तथा प्रतिकिया प्रतीक्षित