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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
November 23, 2015 · New Delhi

आजकल अक्सर देखा है कि बच्चे फेस बुक पर अपडेट रहते है ! और किसी लड़के ने कोई खूबसूरत लड़की देख ली तो उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज कर मन में ख्यालाती पलाऊ पकाने लग जाते है और पता नही क्या क्या सोचने लगते है उन्ही में से एक ख्याल को मैंने इस कविता के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया है। ......................
फेस बुक पर भेजी मिल एक रिक्वेस्ट
वैन भी चट करी मी एडजेस्ट
फोटो मा दिखनी च व् स्वाणी
म्योरो भी एगी वें पर प्राण
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
कख च त्योरो गांव देश
मिल भी बदल्यां फेस बुक पर कई भेष
तू भी बनी च बस छुयाल
दयोंदी न क्वे क्लू न सवाल
समझा अब कुछ म्यारा दिलो गो हाल
त्यै दगडी अब च मिल अपनी जिंदगी सजौण
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
अब रात दिन आंख्युं मा च व् रिटनी
स्योणी खाणी अब हर्ची
चिफली गिच्ची आँख च बादामी
घुंगरयाला बाल अर वूं से टपकणु च पाणी
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
ए भैजी ए भुला तेन भी देखि
जू लगदी फूल बुरांस
दिखदी जन हिसोले की दाणी
ग्युंगी बालड़ा जन द्योन्दी झसक
कंडाली सी दयोंदी झपाक
मेरी अटकी च अब वें पर जान
मी त चली अब वें खुज्याण वें खुज्याण
DWARIKA CHAMOL

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dwarika Chamoli Intolerant
October 26, 2015 · New Delhi
गौं का मन्ख्यु दर्द
कै मु लगौण छुवीं
कख मु लगौण छुवीं
काका बौड़ा नौना सब उन्द चली
म्वौर द्वार चौक सब सुन पड़ी
घौर माँ नु अब क्वी
कै मु लगौणा छुवीं
कख मु लगौणा छुवीं !!!
घौर माँ रयां च अब चार द्वी
क्वे फेसबुक, क्वे व्हाट्स ऎप
ता क्वे लैपटॉप पर बिजी
घास बौण ग्वोर बाछुर
अब कुछ भी नी
कै माँ लगौण छुवीं
कख मु लगौण छुवीं !!!
खेती बाड़ी का काज
गिनती को हओनु च आज
बंदर सुवरों का ही च राज
दादा दादी , बौड़ा बौडी
टेलीविजन माँ लगीँ
खौला माँ नि दिखिन अब क्वी
कै माँ लगौण छुवीं
कख मु लगौण छुवीं !!!
गाड़ गदरा सुन च पड़ी
घौरुं माँ च ताला पड़ी
रूंगत पड़ी डौर च लगदी बड़ी
देर सबेर उठदु च मी
रंत रैबार भी अब नि ल्यांदु क्वी
कै माँ लगौण छुवीं
कख मु लगौण छुवीं !!!
@सर्वाधिकार
DWARIKA CHAMOLI

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bharat Rawat
October 1, 2015 · New Delhi
नि बिसरलो नि बिसरलो

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

कन बिसरलो कन बिसरलो
मातृ जननी को लाज मेरु खंड

कैल बिसरण देन कैल बिसरण देन
निर्दोष मनखी पर ये अत्त्याचार

ऐग्याई ऐग्याई फिर कलो दिन
जिकडो च सबकु खिन -भिन

नई चेनु हम थे तुमरी शोक सभा
मुलायम मायवती थे तू दिला सजा

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

कविता: बालकृष्ण डी ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आँखी नी बोली
कनुडी नी सुणी
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली...२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

माया संभाली
धेरी बस तै थै ही
ऐ मेरा गेल्या
तू ना जा मै छोडी...२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

बिंदी दमकैली
चूड़ी खनकैली
खुठी की पैजनी
जब तू छमकैली...२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

बैठ्युंच यख
हेरादा बाटों का फेरा
ऐ मेरा गेल्या
तू ऐजा दोउड़ी....२
जिकोडी का भेद
गिचोडी ना खोली.........२

साभार: अज्ञात

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उदास घिंडुडु
ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।
सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Navin Dabral
September 10, 2015
लमफसारिक स्यूणो गिजै गयुं मी
मेरा चुफला खैचदारी भग्यान नि रै अब
मेरा कंड्यूड मरोड़दरी दुद्या बोए तै
जमणु व्हेगी सरग सिधारयां
म्यार बूब्बान कबि नि बिजई हमुते
फ़जलेकि गैणा दिख्यांदा
नौनौ तै देर तक स्यूणो
म्यार बूब्बा तै भलो लगदु छाई
सच त याच क़ि चैन क़ि निन्द
बूब्बा जी का जमौनु माँ
जू हमते मिली
उन चैन आज तक नि मिली
बिजण मां अर सेणु मां अब
क्वि फर्ख नि रैगी
सीण क़ि ढब दारु जनि होंदी
ढबै गयां त छुटदि नी छ
लम फसारिक स्यूण मां
जू मज़ा मिल्दु छ
भौत कम का नसीब मां होंद
निस्फ़िकरि क़ि निन्द
लिखरदू ( नवीन डबराल )
१०/ ९/ २०१५/ .....वड़ोदरा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dinesh Dhyani
September 10, 2015
गौं-गळया
दिनेश ध्यानी।
भिण्डया दिनौं बाद
गौं जाणु ह~वै
मिन गौं कु गळ~यौ थै
सेवा लगौ
वो भक्वैरिकि रूण लगि गे।
मिन बोलि हे! क्य ह~वै?
बल, निरसा त्वै थैं बि
मेरि याद नि एै?
अरै बाळपन त त्यारू
मी दगडि हि बीति
यों ही बाटा-घाटौं म
तिन ग्वाय लगैं
यौं ही गाळ~यौ का रस्ता हिटी
इस्गोल आंदु जादु रै।
इनां सूणि परदे"ा जैकि
कतग बदलेग्यां तुम सब्बि
सच्ची पक्का ब्यौपारि ह~वै ग्यो
जै से मतलब वैका वोरा-धोरा
अर जैसे मतलब नीं वै तन्नि फूका।
मिन बोलि न-न सिनि बात नी
बल, चुपरै, म्यारू गिच्चु नि खुलौ
साख्यों बिटि द~यखणौं छौं
जो उंदै गै वो कब्बि बौडिकि नि ऐ
किलै कि ये पाड म
सदानि खैरि-अखरि हि रै,
हूण खाणा बान
सब्यौंन अपणु मुक्क लुकै,
पण यखौ विकास कनौ
कैन बि सांस नि कै।
बल इनी सूणी
वै छिप्वडू का क्य हाल छन?
मिन बोलि भैजी त रिटैर ह~वैगेन
बल, अरै वैकि कि कविता, स्याणि-गाणि बि
मंचौं अर ल्वखौं तकी सुणौण खुणि रैगेन
वैन बि कबि ये पाड़ कि सुध नि ल्हे,
सच्चु जि होंदु त रिटैर होणां बाद
अपणु गौं ता आंदु।
मिन बोलि ह~वैलि क्वी मजबूरी,
बल चुपरै, पक्ष नि ल्हे,
तु बि उन्नि छै
तुमरि कैकि क्वी मजबूरि नी
तुम सब्बि गुणा, घटाणु, नफा, नुकसान
की कला म पारंगत छां
गमलौं म सज्यां मनखि
बनावटी जिन्दगी जीणां छां।
बल
अरै वै वीरेन्दz पवारं भैन
सब्या धाणि देरादूण, होणि खाणि देरादूण
छोडा पाड~यौ घर गांैउ मारा ताणि देरादूण
गीत क्य लेखि तुम जना चकडैतौंन
अपणा घर गौं छोडिकि
सची देरादूण पौछी सांस सै,
हौरि त हौरि जब नरू भै बि
देरादूण वळु हि ह~वैगे त फिर
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।।
दिनेश ध्यानी। 10/09/15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बस यों ही ....

पहाड़ी ढलानों से
उतरते हुए
सीढ़ी दर सीढी
बन गई पगडंडियों में
चीड़ के वृक्षों ने
स्वागत में (पिरूड़ )
.... भूरी सींक नुमा
पत्तियाँ फैलायीं हैं
जिन पर
पैर फिसलना
स्वाभाविक है और
मैं कई बार
सरका हूँ ....
पहाड़ी ढलानों में
दोनों ओर खड़े
आदमकद चीड़
कुछ नहीं बोलते
शायद पहचानते होंगे
लेकिन
हरे बालों वाले उनके
बड़े हो रहे बच्चे
अक्सर सवाल करते हैं
हर किसी से ...
पथिक
बहुत दिनों बाद
खबर ली इधर ...?
यह सवाल
आज भी
" सवाल " बना हुआ है । ज्ञान पंत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दिन इनि ही अब बिती जांदू
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....
कबी इनि मिथे भास् हूंद
मेर नजरि कि च ई भाषा जी
झुरु झुरु ये अब जिकोड़ी बोंदी
नि कैनु कैकु अब आसा जी
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....
जियु टूटण च अब ये बोलणा कुण
हर हर लगींच ऐथे एक बारी तेथे बस देखणा कुण
तेर पास ऐथे इन अणा कुण
तेर आंख्युं मा बस जी अब बस जणा कुण
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....
बडुळि लागि तेरा मेर ये सांकी मा
ये श्वास रोकी की धर्युंच बस जी तेरा भेटि को
हुणि च जिकोड़ी ते थोड़ी मेर पीड़ा
कबी हुली अब तेर मेर से भेंट जी
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....
नि राई अब मैथे कैकि बी परवा
जणा दे मिथे तू अब पीड़ा का पास जी
दूर भेजी की वो तैसे मिथे
अब लगणू लगे मिथे तेर पास आणे की तिस जी
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ल मि थे हाक दे छ
विंल मि थे हाक दे छ
अपरा डंडा कांठ्यूं मा
ईन पुंगडु सारियूं मा
विंल मि थे हाक दे छ
हाक मा वा बात बणिगे
मेरी विंकी अब साथ बणिगे
ईन रौलों खोल्यों मा
विंल मि थे हाक दे छ
इन मेरी विंकी बात छे
जनि कंडली भुजी रूटों साग छे
ईन चौक तिबारी मा
विंल मि थे हाक दे छ
बात बात मा बात बणिगे
दिन मेरो विंकी रात बणिगे
ईन पहड़ा मा गौं गोठ्यार मा
विंल मि थे हाक दे छ
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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