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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
about an hour ago
जरूर आप अध्यापक ही ह्वेल्या यदि ....

इना उना बिटेन ::: भीष्म कुकरेती

यदि आप सुबेर सुबेर , श्याम दैं या कखिम बि अपण घरवळि समिण गप मारदा कि तुमकुण इथगा ज्यादा छ्वारों ब्वे -बुबाऊं रोज फोन आंदन।
यदि तुमर रिस्तेदार आपकी जीमण मा शामिल नि हूंदन किलैकि वीं जीमण मां तुमर मित्र मास्टर ट्रांसफर , डीए , टीए की ही छ्वीं लगांदन।
आप अपण बिल्डिंग मा या गाँ मा जुपुक जुपुक इन हिटदा /घुमदा जन बुल्यां तुम परीक्षा हाल मा छंवां अर परीक्षार्थी द्वारा नकल करण रुकणा छंवां।
तुम ऊँ सब्युं से चिढ़दां जु चुइंगम खाणा रौंदन।
यदि तुम अपण दिन भरौ दिनचर्या सुणाणो हुवाँ अर तुमर घरवळि अखबार पढ़ण मा व्यस्त हो।
आप अपण चाबी , नेम प्लेट , कुर्सी , किताबुं मा सलीका से अपण नाम लिखदाँ तो अवश्य ही आप अध्यापक छन।
जब क्वी कोचिंग या ट्युसन की काट कारो तो आप वै तैं भद्र या अभद्र गाळी दीण शुरू कौर दींदा।
यदि आप अपण घरवळि बणयीं रुटि मा दोष ढूँडदा कि रुटि गोळ नी च तो आप कला अध्यापक ही ह्वेल्या।
यदि आप ब्यौ -बरातिक जीमण की प्रतिक्रिया मा ब्वालो कि पूरी आयताकार , त्रिभुजाकार छन या छे तो आप अवश्य ही ज्यामिति अध्यापक छन।
आप तैं क्वी पूछो कि आजौ हाल क्या छन या आपक हाल क्या छन अर आपक जबाब हो कि आज सूरज तीन मिनट जल्दी आई , अदा सेंटीमीटर बरखा ह्वे तो आप भूगोल अध्यापक ही ह्वेल्या।
यदि आपन अपण समाज मा सही जबाबुं तैं बदतमीजी मा दियां टिप्पणी मानो तो।
यदि आपक हथ खड़िया से भर्यां ह्वावन तो आप प्राइमरी अध्यापक छन अर यदि प्राइमरी अध्यापक ह्वेक बि चौक से हथ नि भर्यां ह्वावन तो आप गढ़वाल का कै स्कूलम मास्टर छंवां याने एक छात्र द्वी मास्टर !
आपक पैंट पर खड़िया , धूळ लगीं हो तो आप प्राइमरी टीचर छन।
आप नरेंद्र मोदीक भाषणो मादे व्याकरणीय गलती खुज्यांदा
जब आप सोनिया गांधीक भाषण सुणदा अर बुल्दा जैन सीं तैं हिंदी सिखाई उ/वा अवश्य मद्रासी होलु या ह्वेलि
Bhishma Kukreti 1 /11 /2014

*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।

CLEAN INDIA , स्वच्छ भारत !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
Yesterday
जरूर आप अध्यापक ही ह्वेल्या यदि ....

इना उना बिटेन ::: भीष्म कुकरेती

यदि आप सुबेर सुबेर , श्याम दैं या कखिम बि अपण घरवळि समिण गप मारदा कि तुमकुण इथगा ज्यादा छ्वारों ब्वे -बुबाऊं रोज फोन आंदन।
यदि तुमर रिस्तेदार आपकी जीमण मा शामिल नि हूंदन किलैकि वीं जीमण मां तुमर मित्र मास्टर ट्रांसफर , डीए , टीए की ही छ्वीं लगांदन।
आप अपण बिल्डिंग मा या गाँ मा जुपुक जुपुक इन हिटदा /घुमदा जन बुल्यां तुम परीक्षा हाल मा छंवां अर परीक्षार्थी द्वारा नकल करण रुकणा छंवां।
तुम ऊँ सब्युं से चिढ़दां जु चुइंगम खाणा रौंदन।
यदि तुम अपण दिन भरौ दिनचर्या सुणाणो हुवाँ अर तुमर घरवळि अखबार पढ़ण मा व्यस्त हो।
आप अपण चाबी , नेम प्लेट , कुर्सी , किताबुं मा सलीका से अपण नाम लिखदाँ तो अवश्य ही आप अध्यापक छन।
जब क्वी कोचिंग या ट्युसन की काट कारो तो आप वै तैं भद्र या अभद्र गाळी दीण शुरू कौर दींदा।
यदि आप अपण घरवळि बणयीं रुटि मा दोष ढूँडदा कि रुटि गोळ नी च तो आप कला अध्यापक ही ह्वेल्या।
यदि आप ब्यौ -बरातिक जीमण की प्रतिक्रिया मा ब्वालो कि पूरी आयताकार , त्रिभुजाकार छन या छे तो आप अवश्य ही ज्यामिति अध्यापक छन।
आप तैं क्वी पूछो कि आजौ हाल क्या छन या आपक हाल क्या छन अर आपक जबाब हो कि आज सूरज तीन मिनट जल्दी आई , अदा सेंटीमीटर बरखा ह्वे तो आप भूगोल अध्यापक ही ह्वेल्या।
यदि आपन अपण समाज मा सही जबाबुं तैं बदतमीजी मा दियां टिप्पणी मानो तो।
यदि आपक हथ खड़िया से भर्यां ह्वावन तो आप प्राइमरी अध्यापक छन अर यदि प्राइमरी अध्यापक ह्वेक बि चौक से हथ नि भर्यां ह्वावन तो आप गढ़वाल का कै स्कूलम मास्टर छंवां याने एक छात्र द्वी मास्टर !
आपक पैंट पर खड़िया , धूळ लगीं हो तो आप प्राइमरी टीचर छन।
आप नरेंद्र मोदीक भाषणो मादे व्याकरणीय गलती खुज्यांदा
जब आप सोनिया गांधीक भाषण सुणदा अर बुल्दा जैन सीं तैं हिंदी सिखाई उ/वा अवश्य मद्रासी होलु या ह्वेलि
Bhishma Kukreti 1 /11 /2014

*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
October 31
दाळ इथगा ऐड़ाट -भुभ्याट किलै करणी च ?
चबोड़ इ चबोड़म खेल गिंदवा ::: भीष्म कुकरेती

ब्याळि दाळ जोरूं से रुणि छे , ऐड़ाट -भुभ्याट करणी छे अर भयंकर सोग मा छे।
मीन पूछ -ये दाळ क्या भंगुल जाम ? किलै इथगा जोरूं से रुणि छे ?
दाळ -ह्यां पैल यी ब्यापरिक अखबारुं भाषा से परेशान थौ अब सि तुम पहाड्यूंन बि दिक कर याल।
मि -व्यापारिक अखबारु भाषा से तू परेशान ?
दाळ -हाँ ! जब मेरी बुवै हुणि हो त व्यापरिक खबर हूंदी बल उड़द अधिक बिकवाली से उछली असमान में ; जब मेरी निरै -गुड़ै समौ ह्वावो त समाचार छपद बल - ग्राहकों की उदासीनता से उड़द नरम पड़ी अर जब कुटै हुणि हो तो खबर आंद बल अधिक आवक से उड़द लुढ़की।
मि -ओहो ! यी व्यापार्युं अपणी आपसै भाषा च। त्वे तैं यूँ शब्दों तैं गंभीरता से नि लीण चयेंद। देख शाही इमाम कु आमंत्रण तैं जन क्वी गंभीरता से नी लीणु च तनि तू यूँ मंडी का गुप्त शब्दों तैं गम्भीरतापूर्बक नि ले.
दाळ -यां इन शब्द त्वैकुण प्रयोग ह्वावन तब दिखुल मि कि त्वै पर कन्न चिर्री पोड़द धौं !
मि -ह्यां ! रुण बंद कौर यी कारोबारी हिंदी भाषा च। तू अंग्रेजी अखबार पढ़ा कर।
दाळ -अंग्रेजीम कम अन्याय हूंद जब मेरी फसल मंडी मा जांद तो अंग्रेजी अखबार छपदन कि उड़द इज ग्राउंडेड या उड़द इज नौट शाइनिंग।
मि -मीन ब्वालना तू कारोबारी भाषाक लंग-लफड़ा मा नि पोड। इन बता कि बिचारा पहाड्यूं से किलै रुसयीं छे , क्रोधित छे , पहाड्यूं पैथर हथ ध्वेक किलै पड़ीं छे ?
दाळ -अरे कारोबारी भाषा त सये बि जांदी किंतु तुम निकज्जों उत्तराखंडी पहाड्यूं करतूत त बिलकुल असह्य च।
मि -ह्यां अब त प्रवासी अर निवासी पहाड़ी कुछ करदा इ नि छंवां तो जब पहाड़ी ही परेशान नि छंवां त त्वै तैं क्यांक दुःख , क्यांक परेशानी , क्यांक अबजाळ (दुविधा ) ?
दाळ -अरे भारत तैं दाळ आयात करण पोड़द त मि तैं बुरु नि लगण ?
मि -इखमा बुरु लगणो बात क्या च जब हम दिवाळि मनाणो वास्ता द्यू -दिया, लक्ष्मी माटो मूर्ति आयत करिक बि नि शर्मांदा तो दाळ इम्पोर्ट करण मा क्यांक शरम , क्यांक लाज , क्यांकि बेज्जती ?
दाळ -तुम हिन्दुस्तान्यूं तैं शरम ल्याज नी च पर हम दाळु तैं त इन्सल्ट फील हूंद कि इण्डिया दाळ इम्पोर्ट करदो।
मि -ह्यां पर इखमा उत्तराखंड का पहाड्यूं क्या दोष ?
दाळ -पता च ? उत्तराखण्ड का पहाड़ों माँ कथगा धरती बांज पड़ीं च ?
मि -हाँ , तकरीबन तीन चौथाई खेती लैक पुंगड़ -पटळ बांज पड़ीं छन।
दाळ -यदि पहाड़ी बांज पड़ीं धरती मा फसल उगावन तो ?
मि -भाषण दीण सौंग हूंद , बुलण सरल हूंद किंतु करण कठण हूंद।
दाळ -क्यांक कठण ?
मि -अरे गांऊं मा गूणी -बांदर , सुंगर छन तो फसल पात कनै करे जावो ?
दाळ -वै प्रवासी गढ़वाळी कैतै छै बेबकूफ बणानि ?
मि -क्या मतबल ?
दाळ -निकज्जा झूठ भौत बुल्दन। उड़द , गहथ , तोर, मसूर तैं गूणी बांदर नि खांदन अर सुंगरुँ कामै चीज दाळ नि हूंद।
मि -तो ?
दाळ -निकज्जा की सोच हुँचि हूंद। तो क्या तुम पहाड़ी यदि पहाडुं मा दाळ की खेती करिल्या तो भारत तैं दाळ आयात करणै जरूरत बि नि होलि धौं !
मि -ह्यां पर दाळ उगाणो वास्ता आदिमुँ जरूरत नि पड़दी ?
दाळ -निकज्जों तैं बहाना चयेंद। जब तुम रोड , कूड़ बणानो वास्ता मजदूर आयात कौर सकदां तो पंजाब जन खेती वास्ता मजदूर इम्पोर्ट नि कर सकदां क्या ?
मि -हाँ पर तीन चौथाई लोग तो प्रवासी छन इनमा खेती कनकै ह्वे सकदी ?
दाळ -निकज्जा हमेशा रचनाधर्मिता से भागद। सहकारिता से खेती नि ह्वे सकदी क्या ?
मि -कनकै ?
दाळ -निकज्जों मा नकारत्मक सोच की भरमार हूंद। प्रवासी अर पहाड़ वासी सहकारिता से मजदूर बुलावो अर दाळ कि खेती कारो।
मि -पर ?
दाळ -नकज्जा किंतु, परन्तु , इन नि ह्वे सकुद आदि का गुलाम हूंदन। सहकारिता से या जमीन लीज पर द्यावो अर पहाड़ों मा दाळ उगाओ।
मि -पर एक समस्या च।
दाळ -निकज्जो हमेशा समस्याओं बोझ उठैक चलणु रौंद अर समाधानो बड़ो दुसमन हूंद।
मि -देखो ! हमर इख एक बड़ी दुखदायी समस्या च। सूण त ले
दाळ - निकज्जा कहींका बोल !
मि -यदि प्रवासी पहाड़ वास्युं तैं क्वी सलाह मशबरा द्यावन तो पहाड़वासी बुल्दन बल अच्छा ! अब हम तैं मुंबईं -दिल्ली वाळ ज्ञान द्याल ?
दाळ -तो तुम प्रवासी पहाड़वास्युं की सूणो।
मि -यदि पहाड़वासी प्रवास्युं तैं राय द्यावन तो पता च प्रवासी क्या बुल्दन ?
दाळ -क्या ?
मि -प्रवासी बुल्दन बल अच्छा ! अब यूँ जयूँ -बित्युं आदिवास्युं बात सुणन हमन ?
दाळ -ठीक च। यदि तुम प्रवासी -वासी एक दुसर से सहकार नि करिल्या तो कुछ दिन बाद गढ़वाल गढ़वाल्युं नि रालो। गढ़वाल कै हौरुं ह्वे जाल !

Copyright@ Bhishma Kukreti 31 /10 /2014
*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।

CLEAN INDIA , स्वच्छ भारत !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"
October 30
सतपुली संबंधित लोकगीत

तु सतपुळि केकु ऐ छै प्रतिमा --सतपुली लोक गीत माला - ३
(इन्टरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती )

तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?
मि नाक कि नथुलि गड़ाणु
ऐ छौ जीजा ' हरसिंगा'
वै सुनार उखि बुलौलु
त्वेखुणि नथुलि गडौलु
घर जा स्याळी प्रतिमा
घर जा स्याळी प्रतिमा
त्वे बगैर मन णि मंद
अब जम्मा मी घर नि जांदु
मान जीजा' हरसिंगा '
मि नाक कि नथुलि गड़ाणु -2

ऐ छौ जीजा ' हरसिंगा'
तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?
तु सबकी समणि आँदी ,
इन्नि बात मी नि सुवांदी
घर जा स्याळी प्रतिमा
तेरी याद जब मी आन्द
अफ्वी मी थै खेंचि लांद
मिन क्या कन त्वी बतौ
मी गळा कि हंसुळि गड़ाणु
ऐ छौ जीजा ' हरसिंगा'
तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?
छ्क्वे ह्वेग्युं मि बदनाम
सर्या दुन्या मा मेरि हाम
घर जा स्याळी प्रतिमा
पैलू मीकु माया ज्वड़दि
फिर दुन्या से केकु डरदि
बोल जीजा हरसिंगा
मेरि बौ मारली मै घर जा स्याळी प्रतिमा
तेरी दीदि ह्व़े मेरि बौ स्याळी प्रतिमा
मि अफुखुणि साड़ी मूल्याणु ऐ छौ जिजा
हरसिंगा
तु सतपुळि केकु ऐ छै स्याळी प्रतिमा ?
आभार- तोताराम ढौंडियाल, धाद, जून १९९०

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सतपुळि बजार क्यों आंदि -- गढ़वाली लोक गीत
सतपुळि बजार क्यों आंदि
मेरि ब्वारी गौमती या ?मेरि ब्वारी गौमती या ?
सतपुळि बजारै आन्दु
मी तुमारा बान या, मी तुमारा बान या
काटी च जमणि ये ब्वारि , काटी च जमणि ये ब्वारि
मी तै नि मिलणो ए ब्वारि ,
सबुकी समणि , या सतपुळि
तमाखू का कोया ए जिवरो, तमाखू का कोया ए जिवरो,
डौर छाई तुमतै त पैलि
केकु ज्वाड़ माया या
सतपुळि बजार क्यों आंदि
बामणु कि पोथी ए ब्वारि , बामणु कि पोथी ए ब्वारि ,
भली बिराज दींदि ए ब्वारि
तेरी काळि धोति या
सतपुळि बजार क्यों आंदि
स्वैरि जाली सौँळि जिवरो , स्वैरि जाली सौँळि जिवरो ,
कन बिराज दींदि जिवरो ,
बुलबुलूं कि कौंळ या
सतपुळि बजार क्यों आंदि
मेरि ब्वारी गौमती या ?मेरि ब्वारी गौमती या ?

Curtsey _ Shri Totaram Dhoundiyal Dhad magazine june 1990

By Bhishma Kukreti.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाली बालक्रीडा सम्बन्धी लोक बालगीत
(Garhwali Children Folk Game Songs)
---1 ----
उरचन पुरचन (Urchan Purchan )

उरचन पुरचन दान दर्पण
लिया लाची पित्तल कांची
ओड मोड़ दैणी हत्थी
तू बि तोड़
---2 ---
इटकी पिट्की (Itki Pitki)
इटकी पिटकी दूध की छिटकी
लवा लाशी पीतल काशी
अरोड़ मरोड़ दैणी हथ्थी
तडक मोड़
--3 ---
काकड बेकड (Kakd Bekad)
काकड बेकड़ कलमी यान मून
सुन्दर कपड़ा त्वे पर दूध
---4-----
बूडा रांडा (Booda randa)
बूडा रांडा बाटु बथै दे
कंडाळी का जील
---5---
सुळबुळ संध्या (Sulbul Sandhya)
सुळबुळ संध्या
नौ चूळ पाणी
उतड़याँ छ्वोरों न
संगरांद नि खाण

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

-- इन्दा बिंदा गढ़वाली लोरी) ---

(एक गढ़वाली लोरी , हिमालयी लोरी, उत्तरभारतीय लोरी )



इन्दा बिंदा रावण झोली ,

घीय कमोळी

एक कपाळ पर ,

घ्यू दुधक पटक बिंदा

(inda binda raavn jholi, gheeyk kamoli

(ek kapal pr, ghyu doodhk patak binda)

(Source: Dr Nand Kishor , Dr Manoram Dhoundiya, Garhwali Balgeet)



Translation in English

Inda Binda Ravan jholi, Gheeyk Kamoli

There is a round mark of milk on his (sky) forehead

The song is Bajuband type of poetry, wherein first stanza is meant to create rhyme and there is no connection with the subject or second stanza of poem. The lullaby is having simile of Binda (a round mark on forehead) with the moon.

Usually, the child caregiver sings this lullaby when there is full moon, The caregiver shows the moon to child while singing. The child would be on the shoulder of roaming caregiver.

By Bhishma Kukreti.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
14 hrs · Edited ·

उत्‍तराखण्‍ड मेरु महान.....

तेरी भैंस्‍यौं कू अड़ाट,
गोरु बाखरौं कू भिभड़ाट,
देख रुम्‍क पड़िगी,
द्यू जगौं तू अब जख,
कुल देव्‍ता कू थान...

कोदु झंगौरु,
जख की शान,
मनखि भी छन महान,
कवि "जिज्ञासु" तैं गर्व,
उत्‍तराखण्‍ड मेरु महान.....

कवि "जिज्ञासु" की कल्‍पना कलम से।
3.11.2014, सर्वाधिकार सुरक्षति

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
October 31 at 12:53pm ·

कनु भग्‍यान,
बैठ्युं छैं,
कुळैं की डाळी का छैल,
टक्‍क सी मन मा,
लगिं छ मेरा,
कख भेंट होलि हे भुला,
पहाड़ मा तेरा गैल.....

कवि "जिज्ञासु" की कल्‍पना,
31.10.2014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 पर्वतराज हिमालय...

जिसे निहारा मैंने,
बचपन से,
जब जब गया,
चन्‍द्रकूट पर्वत शिखर पर,
मां चन्‍द्रबदनी मंदिर में,
अहसास किया,
हंसता हैं हिमालय,
हमें निहार कर....

आवाज उठ रही है,
हिमालय बचाओ,
ऐसा क्‍या हो गया?
संवेदनशील हिमालय को,
जो आज आशंकित हैं,
हिमालयी क्षेत्र के लोग....

सुनते हैं,
कीड़ा जड़ी के लिए,
लालची लोग,
ग्‍लेशियर को जबरदस्‍ती,
पिघला रहे हैं,
कहो तो,
संवेदनशील हिमालय को,
सता रहे हैं.....

हिमालयी क्षेत्र के लोग,
हिमालय को,
शिव पार्वती का,
निवास मानकर,
जो है भी,
पूजते हैं,
पास होते हुए भी,
नहीं सताते उसको.....

कौन जाता है,
हिमालय के पास,
पर्यटक बनकर,
मानते हैं,
सबका है हिमालय,
कूड़ा घर है क्‍या,
ऐसा क्‍यों करते हैं?
चिंतन करें,
हिमालय के पास,
एक पेड़ लगाते,
कूड़ा साथ लाते,
मूक हैं सभी,
हिसाब लगता है,
कितने आए,
कितने कमाए,
ये भी तो सोचो,
हंसने वाला हिमालय,
आंसू टपका रहा है.....

पर्वतजन का पहाड़,
सूना है आज,
सूने सूने गांव,
टूटते घर,
बंजर होते खेत,
ऐसा हो गया है,
हिमालयी क्षेत्र में,
कुछ मित्रों ने,
सैकड़ों मील पैदल चलकर,
जानने की कोशिश की,
हिमालय बचाओ,
अभियान के तहत,
पर्वतजन और हिमालय,
क्‍यों हैं संकट में?
भागीदार बनें,
संदेह न करें......

माधो सिंह भण्‍डारी जी के,
पुरातन गांव,
मलेथा  के लोग,
सजग हैं,
और दिखा दिया,
ऐसे ही तो बचाना है,
पहाड़ और हिमालय के,
अस्‍तित्‍व को......

पर्वतराज हिमालय,
अस्‍तित्‍व में रहेगा,
हंसता रहेगा,
हमारा भी,
अस्‍तित्‍व रहेगा,
जागो! जागो!
कहीं अबेर न हो जाए,
हिमालय से बहती,
सदानीरा नदियां,
कहां से दिखेगी्ं?
आने वाली पीढ़ी को......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
  "हिमालय बचाओ अभियान" को समर्पित  मेरी  ये स्‍वरचित कविता सप्रेम भेंट।
  दिनांक 3.10.2014.