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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 अटगा भटगा....

    अटगा भटगा....
    भाग की भताग भुलौं,
    कख कख डबखणा छैं,
    मन मा उदौळि सी ऊठदि,...
    दिन दोफरी भगणा छैं.....
    क्‍या जी होलु भाग मा,
    केकि छौं हम जाग मा,
    पापी पोटगि रण नि देंदि,
    द्वी घड़ी कब्‍बि चैन मा....
    ज्‍युंदा ज्‍यु की स्‍याणि हे,
    मन मनखि तैं भट्कौन्‍दि,
    रण नि देन्‍दि चैन सी,
    सदानि स्‍या अट्कौन्‍दि....
    अटगा भटगा मेरा भुलौं,
    भाग मा छन द्वी नाळी,
    चलि जौला एक दिन,
    क्‍या मिललु हे दिदौ ,
    यी़ं पोटगि सनै पाळी......
    -कवि "जिज्ञासु" का मन का ऊमाळ
    30.10.2014, सर्वाधिकार सुरक्षित

Posted by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 ऐंसु भी.....

    ऐंसु भी.....
    रगड़ा भगड़ि,
    तैं केदार घाटी मा,
    रड़दा झड़दा पाखा डरौणा,...
    मंदाकिनी का धोरा बस्‍यां,
    उत्‍तराखंडी भै बंधु तैं,
    मंदाकिनी का छाला डरौणा,
    पिछल्‍या साल की तरौं,
    मन सी ऊदास होणा,
    सोचा दौं यनु किलै,
    होणु ऐंसु भी......
    कवि जिज्ञासु की कलम सी
    सर्वाधिकार सुरक्षित, 17.7.14

Posted by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" at 2:16 AM No comments:

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 मधुर मिलन हमारु...

    मधुर मिलन हमारु...
    समीर भैजिन,
    हमतैं नौएडा बुलाई,
    "विद्रोही" जी सी,...
    मुलाकात कराई,
    "आजाद" भैजिन,
    जू आजाद निथा,
    अपणु अमूल्‍य समय,
    हमारा खातिर,
    जुगाड़ करिक,
    एक मुलकात करि,
    मन सी खुश ह्वैन भारी,
    रै होलि किस्‍मत हमारी,
    अतं मा मिल्‍यन,
    मित्र पंचम सिंह कठैत जी,
    अर प्रिय कवि "फरियादि",
    चर्चा ह्वै पहाड़ फर,
    कनुकै गौं बसला,
    हमारा पहाड़ का,
    किलै होणी बरबादी.....
    -जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
    द्वी अगस्‍त-2014 कू हमारी नौएडा मा एक यादगार मुलकात ह्वै।
    समय बलवान होंदु, छंद हि यनु ऐगि वे दिन।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 नंदा सैसर छ जाणी......

    नंदा सैसर छ जाणी......
    मैतुड़ा छोड़िक नंदा,
    सैसर छ जाणी,
    रोणा छन मैति सब्‍बि,...
    आंख्‍यौं मा छ पाणी.....
    ऊदास छ होयिं नंदा,
    ठंडु मठु जाण्‍ाी,
    मैति मन मा सोचणा,
    भांगल्‍या जवैं यींकू,
    कनि होलि खाणी बाणी......
    खुदेलि लाडी हमारी,
    तैं ऊंचा कैलाश,
    होणी खाणी हो लाडी की,
    सब्‍यौं किछ आस.....
    -जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
    की कलम से मन की बात...21.8.14


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 बग्वाळ....

    दिपावली: झिलमिल-झिलमिल दिवा जगि गैना....
    देहरादून। गढ़वाली में जगमोहन सिंह जयाड़ा " जिज्ञासु"की कविता है,
    'जै दिन बानी-बानी का,
    पकवान बणदा छन,...
    वे दिन कु बोल्दा छन,
    रे छोरों आज पड़िगी,
    बल तुमारी बग्वाल।'
    सचमुच ऐसा ही रूप रहा है पहाड़ में बग्वाल का। 'बग्वाल' व 'इगास' संभवत: गढ़वाली में दीपावली के ही पर्यायवाची हैं।
    http://www.jagran.com/spiritual/religion-dipavli-blind-blind-diva-jagi-gaina-10831361.html


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 समधणि का खोज.....

    समधणि का खोज थौ जयुं,
    भेळ पड़िगि,
    हे दिदौं, हे भुलौं, सोचा दौं,
    भरीं ज्‍वानि मा, स्‍यू बिचारु,
    ज्‍यूंदा ज्‍यु क्‍या करिगि.....
    ...
    -जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
    हे कविमन कू कबलाट, 2.9.14


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 दिदा मेरा.....

    दिदा मेरा, आज कुजाणि,
    तेरी याद क्यौकु औणि छ,
    खाई थै काखड़ि चोरी,
    वे बसगाळ प्यारा दिदा,
    अंजनीसैण था जबरि,...
    ऐंसु का बसगाळ देखि,
    पापी परदेश मा दिदा,
    बित्यां दिनु की मैकु आज,
    भारी याद औणि छ,
    सेाचणु छौं आज मन मा,
    ऊ दिन कख चलिग्यन .....
    जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
    कविमन कू कबलाट ये बसगाळ
    4.9.2014


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 निर्भागि होंदि दिदा दारु....

    निर्भागि होंदि दिदा दारु,
    मनखि खुजौंदा,
    पेण का खातिर,
    लोण कू गारु,
    नि छुटदि कतै ना,...
    क्‍वी थेंचु या मारु....
    कवि जिज्ञासु की अनुभूति
    4.9.14


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हँसुड़ि , हँसिकाएँ ,Jokes

संकलन - भीष्म कुकरेती

हे भगवान !
हे भगवान सब्युं भलो करी।
पण शुरुवात में से हाँ।

हरिद्वार मा त मिलला ही

ज्यूंद रौला त बार बार मिलला
निथर हरिद्वार मा त मिलला

कूड़ माँ जैक भूक
- ये ब्वे ! भूक लगीं च.
-त जा कूड़ों मुंडळ माँ जैक भूक

गाळी
- ये ब्वे मीन गाळि नि खै
-जा बुबा बीच बाट मा हौग आदि। त्यार पड़ददा जी बि गाळि खाला

जनानीक तीन रूप
एक शादी शुदा औरत का जिन्दगी माँ तीन पड़ाव हूंदन
पैल रूप -चन्द्र मुखी
दुसर रूप - सूरज मुखी
तिसर रूप -ज्वाला मुखी

पारस्युं माँ प्रसिद्ध चबोड़
सवाल -दारू पेक मर्युं मनिख तैं क्या बुल्दन ?
जबाब - बेजान दारूवाला
सवाल -पारसी लोग वैश्याक दलालौ कुणि क्या बुल्दन ?
जबाब - नारी कौंट्क्टर
सवाल -पारसी समाज माँ टेस्ट ट्यूब बेबी कुण क्या बुल्दन ?
जबाब - बाटलीबॉय


CLEAN INDIA , स्वच्छ भारत !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुछ हँसौण्या-सिखौण्या कैपणि बोल (कहावतें )

गढ़वाळि हास्य -व्यंग्यकोष -भाग -29

Garhwali Humorous and Satirical Dictionary part -29

संकलन ::: भीष्म कुकरेती

घर आयुं कज्याणिन हरायुं , बौण गयूं बाघन डरायुं।

जु बि घ्वीड़ जिबळ (जाल ) से भागी जावो वु महान घ्वीड़ हि होलु !

तीन दिन बाद माछ अर मेमान से बास (दुर्गन्ध ) आण बिसे जांद !

स्याळो असली यार अळगसि ग्वेर !

बच्चा पैदा करण बच्चा की चिंता करण से सरल हूंद !

धन सब कुछ त नि कौर सकद पर नौन्याळु तैं न्याड़ ध्वार रख सकद !

मि सबि चीजुं प्रतिरोध कौर सकुद बस लालच -ल्हाळसा म्यार बस मा नि आंद !

गन्ना ब्वेली त हाथी मीलल अर मूंगफळी दिखैल त गूणी -बांदर ही आल !

भोळ सबसे व्यस्ततम दिन हूंद !

बंद मुखक भितर माख नि छिरदन !

नाव जबतक किनारो पर बँधीं च सुरक्षित च पर नाव बंधणो थुका बणाइ !

जिंदगी मा कुछ बि निर्धारित नी च किंतु मृत्यु व इन्सुरेंस पर टैक्स अवश्य ही निश्चित च

सबसे म्यारु मोती ढांगु , सौ रुपया कु सींगु

अच्छी चीज वैमा इ आंदन जु प्रतीक्षा करद किंतु समय अर ज्वारभाटा कैक बि प्रतीक्षा नि करदन

सही कारो निथर नि कारो पर यि बि त बुल्यांद बल निछौंद ममा से काणो ममा भलो !

सिखणै क्वी उमर नि हूंदी पर इन बि बुल्दन बल तुम पुरण कुत्ता तैं नै तरकीब नि सिखै सकदा।

तलवार से कलम बड़ी पर दगड़म कैपणी बोल बि च बल बुलण से भलो कर्युं काज /कार्य

क्वी बि खबर नि हो ................ ....................................असंभव

सब्युं तैं प्यार कारो , विश्वास ........................................ मि पर ही कारो

ढम मारो ................................. जब सरसु (खटमल ) समिण दिखे जावु

एक धेला बचैक ........................ ........................खन्नु हूण ?

वा ही ब्योलि खुस हूंद .......................................जैं तैं जादा भेंट मिलद

वूं नंग दांतुन नि काटो .......................................जु गंदा ह्वावन

जख बि धुंवा च ................................................तख प्रदूषण च

कलम बड़ी च ................................................सुंगरुँ से

सीण (सोना ) तैं .............................................भोळ तक नि टाळो

कबि बि धिवड़ (दीमक ) की ताकत ........................कम नि अंक्याण

जोर जोर से हंसिल्या तो संसार हौंसल पर ............ रोल्या (रोओगे ) त नाक साफ़ करण पोड़द

यदि कुत्ता दगड़ सेल्या तो ........................ तो कुत्ता पर सुबेर तुमर गंध बि आली

मुर्ख उखी दौड़दन ........................ जख पैल मूर्ख दौड़ ह्वावन

आणा -भ्वीणा बोलिक घ्वीड़ -काखड़ नि मारे जांदन !

व्यंग्य शब्दकोश जारी रहेगा ......।

Bhishma Kukreti 6/11/2014

CLEAN INDIA , स्वच्छ भारत !