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Tribute To Movement Martyrs - उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि

Started by Anubhav / अनुभव उपाध्याय, October 03, 2007, 02:14:22 PM

पंकज सिंह महर



देहरादून स्थित शहीद स्मारक

पंकज सिंह महर

Quote from: पंकज सिंह महर on September 01, 2008, 04:06:36 PM
आज खटीमा गोली कांड की १४ वीं बरसी है, इस गोलीकांड में उत्तराखण्ड के ८ क्रांतिकारी पुलिस की गोली का शिकार बने थे।

१ सितम्बर, १९९४ - खटीमा

अमर शहीद स्व० श्री प्रताप सिंह
अमर शहीद स्व० श्री भुवन सिंह
अमर शहीद स्व० श्री सलीम
अमर शहीद स्व० श्री भगवान सिंह
अमर शहीद स्व० श्री धर्मानन्द भट्ट
अमर शहीद स्व० श्री गोपी चंद
अमर शहीद स्व० श्री परमजीत सिंह
अमर शहीद स्व० श्री रामपाल

धन्य हैं आप लोग, आपने हमारे सुरक्षित भविष्य के लिये अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया।

मेरा पहाड़ परिवार की ओर से इन अमर शहीदों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

जय उत्तराखण्ड!

आज लोग अवगत हों कि इन आठ लोगों में से अमर शहीद स्व० श्री भगवान सिंह सिरोला, सात बहनों के अकेले भाई थे और अमर शहीद स्व० श्री परमजीत सिंह अपने मां-बाप की इकलौती संतान....इन लोगों ने इस बात को अनदेखा कर हमारे स्वर्णिम भविष्य के लिये अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।

धन्य है उस मां की कोख, जिसने ऎसे वीर सपूतों को जन्म दिया,

शत-शत नमन एवं अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।

पंकज सिंह महर

खटीमा में नगर पालिका द्वारा शहीदों की याद में एक शहीद स्मारक का निर्माण किया है, वहां पर लगा शहीदों का शिला पट


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

HAVILDAR BAHADUR SINGH BOHRA10TH BATTALION THE PARACHUTE REGIMENT
(SPECIAL FORCES) (POSTHUMOUS)

Havildar Bahadur Singh Bohra was the squad commander of an assault
team deployed for a search operation in General Area Lawanz of Jammu
and Kashmir.

On 25th September 2008, at 6:15 PM, he observed a group of
terrorists and moved quickly to intercept them. In the process, he
came under heavy hostile fire. Undaunted, he charged at the
terrorists and killed one of them. However, he suffered severe gun
shot wounds. Refusing evacuation, he continued with the assault and
killed two more terrorists at extremely close range.

Havildar Bahadur Singh Bohra, thus, displayed most conspicuous
bravery and made the supreme sacrifice for the nation in fighting the
terrorists.

4073611 HAVILDAR GAJENDER SINGH PARACHUTE REGIMENT / 51 SPECIAL ACTION
GROUP (POSTHUMOUS)

In the night of 27th November 2008, Havildar Gajender Singh
was leading his squad in the operation to rescue hostages from the
terrorists at Nariman House, Mumbai.

After clearing the top floor of the terrorists, he reached the
place where the terrorists had taken position. As he closed in, the
terrorists hurled a grenade injuring him. Undeterred, he kept firing
and closing in on the terrorists by exposing himself to the hostile
fire. In the act, he injured one of the terrorists and forced the
others to retreat inside a room. He continued the encounter till he
succumbed to his injuries.

Havildar Gajender Singh displayed most conspicuous courage
against grave odds and made the supreme sacrifice for the nation in
combating the terrorists.

SHRI MOHAN CHAND SHARMA INSPECTOR, DELHI POLICE (POSTHUMOUS)

On 19th September 2008, Shri Mohan Chand Sharma, Inspector, Delhi
Police received specific information that a suspected person wanted in
connection with the serial bomb blasts in Delhi was hiding in a flat
in Batla House area of Jamia Nagar, New Delhi.

Shri Sharma leading a seven member team quickly reached the
identified flat. As soon as he entered the flat he received the first
burst of fire from the terrorists holed up inside the flat.
Undaunted, he returned the fire. In the ensuing exchange of fire, two
terrorists were killed and one captured.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

खटीमा का जांबाज मनोज कुपवाड़ा में शहीदMar 25, 01:40 am

खटीमा(ऊधमसिंहनगर)। फ‌र्स्ट पैरा के जांबाज कमांडो मनोज सिंह जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। परिजनों को उनकी शहादत की सूचना सोमवार की रात मिली। यह दुखद समाचार मिलते ही परिजनों में कोहराम मच गया। समूचा क्षेत्र शोक में डूबा हुआ है। शहीद का शव देर रात तक यहां पहुंचने की संभावना है।

नगरा तराई सूखापुल गांव का मनोज (27) पुत्र मोहन सिंह मार्च 2003 में सेना के फ‌र्स्ट पैरा में भर्ती हुआ। वर्तमान में वह जम्मू कश्मीर के पुंछ राजौरी सेक्टर में तैनात थे। शुक्रवार की रात से कुपवाड़ा जिले के अलग-अलग हिस्सों में सेना की आतंकवादियों से मुठभेड़ शुरू हो गई। रविवार की रात जाबांज मनोज ने अपनी यूनिट के साथियों के साथ आतंकियो का डटकर मुकाबला किया। दोनों ओर से हुई भीषण गोलाबारी में मनोज शहीद हो गया। सोमवार की रात करीब दस बजे बनबसा सैनिक छावनी से आए गढ़वाल राईफल्स के नायब सूबेदार ने परिजनों को मनोज की शहादत की खबर दी। यह दुखद समाचार मिलते ही परिजन होश खो बैठे। शहीद की मां सरस्वती देवी, पत्‍‌नी आशा देवी, छोटा भाई हरि सिंह व पिता मोहन सिंह इस समाचार से गहरे सदमे में है। शहीद की मां व पत्‍‌नी मनोज को याद कर बिलख रही है। परिजनों ने बताया कि मनोज का विवाह वर्ष 2006 में हुआ था। उसका डेढ़ वर्ष का मासूम बेटा आदि अभी तक पिता की मौत की बात से बेखबर है। मनोज के पिता मोहन सिंह आसाम राईफल्स से सेवानिवृत्त हैं। पूरा गांव मनोज की शहादत के बाद शोक में डूबा हुआ

Lalit Mohan Pandey

Mehta ji, Shaheed Nirmal Pandit ji ke bare mai jankari de kar apne bahut achha kiya, he is actually a forgotten hero of Uttarakhand. Wo sache Arthu mai ek krantikari the, unke rang rang mai Josh or Utsah tha. Jab mai pithoragarh collage ka student tha, usi period mai mera bhi unse sampark hua, Pithoragarh Area mai jitna bhi andolan hua uska jyadatar credit unko hi jata hai, Unki hi awaj thi jisne pithoragarh ki yuvau ko andolan mai koodne ki prerana diyi thi...

Unke kuch nare mujhe yaad ate hai
1) "Hai Agar baju mai dam to Parsasan ki hila ke dekh,
     Warna Do Ghoot pee and Khud ko hilta dekh"
2) "Mai Shabnam nahi, Shola hu,
     Pani ka bulbula na samjho, AAg ka Gola hu"
Agar mai jankari galat nahi hu to wo poore uttarakhand ke ek matra aese andolankari the,l jine liye UP sarkar ne "Shoot at site" (dekhate hi goli marne) ka adesh diya tha. Lekin aaj Durbhagy se Nirmal Ji ka nam kahi bhi nahi hai or bahut kam log unko jante hai.
Mai Pankaj Da se or Hem bhai se request karunga ki Pandit Ji ke bare mai kuch or jankaru de. I am sure they know lot more about him than me.
Aese Kraniveeru ko Sat Sat Naman.



Quote from: एम् एस मेहता /M S Mehta on November 08, 2008, 04:28:39 PM

निर्मल पण्डित : चिंगारी उत्तराखण्ड आन्दोलन की

उत्तराखण्ड के जनसरोकारों से जुडे क्रान्तिकारी छात्र नेता स्वर्गीय निर्मल जोशी "पण्डित" छोटी उम्र में ही जन-आन्दोलनों की बुलन्द आवाज बन कर उभरे थे. शराब माफिया,खनन माफिया के खिलाफ संघर्ष तो वह पहले से ही कर रहे थे लेकिन 1994 के राज्य आन्दोलन में जब वह सिर पर कफन बांधकर कूदे तो आन्दोलन में नयी क्रान्ति का संचार होने लगा. गंगोलीहाट, पिथौरागढ के पोखरी गांव में श्री ईश्वरी प्रसाद जोशी व श्रीमती प्रेमा जोशी के घर 1970 में जन्मे निर्मल 1991-92 में पहली बार पिथौरागढ महाविद्यालय में छात्रसंघ महासचिव चुने गये. छात्रहितों के प्रति उनके समर्पण का ही परिणाम था कि वह लगातार 3 बार इस पद पर चुनाव जीते. इसके बाद वह पिथौरागढ महाविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष भी चुने गये. 1993 में नशामुक्ति अभियान के तहत उन्होने एक सेमिनार का आयोजन किया. 1994 में उन्हें मिले जनसमर्थन को देखकर प्रशासन व राजनीतिक दल सन्न रह गये. उनके आह्वान पर पिथौरागढ के ही नहीं उत्तराखण्ड के अन्य जिलों की छात्रशक्ति व आम जनता आन्दोलन में कूद पङे. मैने पण्डित को इस दौर में स्वयं देखा है. छोटी कद काठी व सामान्य डील-डौल के निर्मल दा का पिथौरागढ में इतना प्रभाव था कि प्रशासन के आला अधिकारी उनके सामने आने को कतराते थे. कई बार तो आम जनता की उपेक्षा करने पर सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक तौर पर निर्मल दा के क्रोध का सामना भी करना पङा था. राज्य आन्दोलन के समय पिथौरागढ में भी उत्तराखण्ड के अन्य भागों की तरह एक समानान्तर सरकार का गठन किया गया था, जिसका नेतृत्व निर्मल दा के हाथों मे था. उस समय पिथौरागढ के हर हिस्से में निर्मल दा को कफन के रंग के वस्त्र पहने देखकर बच्चों से लेकर वृद्धों को आन्दोलन में कूदने का नया जोश मिला. इस दौरान उन्हें गिरफ्तार करके फतेहपुर जेल भी भेजा गया. आन्दोलन समाप्त होने पर भी आम लोगों के हितों के लिये पण्डित का यह जुनून कम नहीं हुआ. अगले जिला पंचायत चुनावों में वह जिला पंचायत सदस्य चुने गये. शराब माफिया और खनन माफिया के खिलाफ उन्होने अपनी मुहिम को ढीला नहीं पडने दिया.27 मार्च 1998 को शराब के ठेकों के खिलाफ अपने पूर्व घोषित आन्दोलन के अनुसार उन्होने आत्मदाह किया. बुरी तरह झुलसने पर पिथौरागढ में कुछ दिनों के इलाज के बाद उन्हें दिल्ली लाया गया.16 मई 1998 को जिन्दगी मौत के बीच झूलते हुए अन्ततः उनकी मृत्यु हो गयी. निर्भीकता और जुझारुपन निर्मल दा की पहचान थी. उन्होने अपना जीवन माफिया के खिलाफ पूर्णरूप से समर्पित कर दिया और इनकी धमकियों के आगे कभी भी झुकने को तैयार नहीं हुए. अन्ततः उनका यही स्वभाव उनकी शहीद होने का कारण बना. इस समय जब शराब और खनन माफिया उत्तराखण्ड सरकार पर हावी होकर पहाङ को लूट रहे हैं, तो पण्डित की कमी खलती है.उनका जीवन उन युवाओं के लिये प्रेरणा स्रोत है जो निस्वार्थ भाव से उत्तराखण्ड के हित के लिये


पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर

मसूरी कांड-लाशों को बो कर उत्तराखण्ड के फूल उगाओ-विक्टर बनर्जी
(मसूरी हत्याकांड का यह विवरण ४ सितम्बर, १९९४ के टाईम्स आफ इण्डिया, दिल्ली में छपा था, यहां पर उसका अनुवाद प्रस्तुत है। लेखक विक्टर बनर्जी प्रख्यात अभिनेता हैं)
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मीलों दूर से पैदल दूध और सब्जी लाकर बेचने और गरीबी में निर्वाह करने वाले काश्तकारों की सेवाओं पर निर्भर, सीधे-सादे लोगों की बसासत वाला पहाड़ी शहर मसूरी शुक्रवार २ सितम्बर, १९९४ को स्तब्ध रह गया।
       सिर्फ एक कमरे के लिये! पहाड़ी पर बना एक छोटा सा कमरा, जिसमें उत्तराखण्ड राज्य संघर्ष समिति वाले रह रहे थे। इन विशाल उपमहाद्वीप के मैदानी क्षेत्र के निवासियों को यह समझा पाना मुश्किल होगा कि यह सेवानिवृत्त कर्मचारियों, घरेलू महिलाओं और छात्रों का समूह था। महिलायें, जो यह समझती हैं कि चाय के कप के साथ सहानुभूति भी बांटी जा सकती है। दिन-प्रतिदिन भविष्यहीन होते जाते वे छात्र, जिनके लिये बालीवुड का मायावी संसार ही रामराज्य है, जहां कलफदार वर्दी वाली पुलिस हवाई फायर करती, अश्रु गैस या पानी के गुब्बारे फेंकती, विदूषकों जैसा बर्ताव करती है। क्या मजा है! और वे सरयू को लाल कर देने वाली और अल्पसंख्यकों पर बाज सी तत्परता से झपटने वाली उत्तर प्रदेश की पुलिस की असलियत से बहुत दूर थे।
      भाड़ में जाये संयोग! कैसी विडम्बना है? किसका साहस है कि हमारे नेताओं की जोड़-तोड़ के पीछे असली मकसद ढूंढ सकें। ३० अगस्त की रात मसूरी के थानेदार को एकाएक बगैर पूर्व सूचना के स्थानान्तरित कर दिया गया तथा बदले में एक ऎसे व्यक्ति को ले आया गया, जो स्थानीय जनता के बारे में बिल्कुल नहीं जानता था। उसी रात एस०डी०एम० जसोला, जो एक सम्मानित और ईमानदार गढ़वाली हैं, से कहा गया कि वे अपने आप को मामले से अलग रखें। देहरादून से आये एक एस०डी०एम० ने कमान संभाल ली।
      अगली सुबह हफ्तों की अनवरत वर्षा के बाद सूरज ने बादलों के बीच से झांका तो पहाड़ी जनता के सीले मनोबल में भी उत्साह और उल्लास भर गया। तभी पुलिस उस छोटे से कमरे में घुस आई और वहां बैठे मुट्ठी भर अनशनकारियों को बाहर धकेल कर वहां कब्जा कर लिया।
       लोग घबराकर इधर-उधर बिखर गये, कोई सम्मोहक राजनेता उनके बीच नहीं था। चाय की दुकानों और पहाड़ियों में बैठे वे सोचने लगे कि अब क्या करें? बहुत छोटा सा उत्तराखण्ड उनके पास था और वह भी उनसे छीन लिया गया था। उन अबोध बच्चों की तरह, जिन्हें उनके घर और सुरक्षा से वंचित कर दिया गया हो। टूटे दिलों के साथ वे अपनी चीज वापिस मांगने चले।
       २ सितम्बर की सुबह ग्यारह बजे, जब पाच गाडि़यां भर कर छात्र पौड़ी में हो रही रैली में भाग लेने चले गये, उनके परिवारों ने तय किया कि एक जूलूस के रुप में जाकर पुलिस से निवेदन करें कि उनका कमारा उन्हें वापस कर दिया जाय। औरतें, लड़कियां, बच्चे, सेवानिवृत्त अभिभावक तथा अन्य, जिन्होंने अपनी जिन्दगी में घास काटने वाली दरांती के अतिरिक्त कोई हथियार नहीं देखा था (मगर जिनके लोग देश के लिये वीर चक्र और परमवीर चक्र जीतने का हौंसला रखते थे) हिम्मत के साथ आगे बढ़े।
       कमरे के एकमात्र दरवाजे के आगे जुलूस रुका, अगुवाई कर रहे ७० वर्षीय वृद्धों ने भीड़ से कहा कि जबरन भीतर न घुसें, अन्ततः एक गृहिणी और एक अध्यापिका को पुलिस से बातचीत करने के लिये अन्दर भेजा गया, दुर्भाग्यवश, अपनी बात सुनाने के उत्साह में पांच-छः छात्र भी उस संकरे दरवाजे से घुस गये।
       बन्दूकें गरज उठीं, एक औरत की खोपड़ी फट गई और वह ठंडे फर्श में मुर्दा गिर गई। उसके तीन छोटे बच्चे उस पल पास ही "झूला घर" में झूलों का आनन्द ले रहे थे। दूसरी गृहिणी की आंख में गोली मारी गई और उसे वापस भीड़ के बीच फेंक दिया गया। उस छोटे से कमरे में भगदड़ मच गई, भय और आतंक में चलाई गई गोलियों में एक पुलिस अफसर को भी लगी।
       फिर पुलिस चली गई, सदमे (काश! निर्दोष दिल व दिमागों के साथ की गई बर्बर हिंसा के लिये कोई बेहतर शब्द होता।) में डूबे कस्बाई लोग खून की धाराओं में पड़े मृतकों को लेकर बिलखने लगे। घायलों को अस्पताल पहुंचा दिया गया, उनकी हताशा अद्भूत ढंग से प्रकट हुई, उन्होंने पुलिस के सिपाहियों द्वारा छोड़े गये हथियारों का ढेर बनाया और उसमें आग लगा दी।
        जो रह गये, वे भौंचक्के थे। उनके शांत पहाड़ी समाज में ऎसी घटनायें कभी नहीं घटी थीं, वे समझ नहीं पा रहे थे कि गलती कहां हुई।
       दस मिनट बाद पुलिस कमरे पर दोबारा कब्जा करने लौटी, बाहर खड़े लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गई, इस सबका आतंक मानवीय समझ से परे था। क्या राजनीतिग्यों के अपने परिवार नहीं होते?
         मगर प्यार से भरपूर पहाड़ी लोगों का दिल वहशियत और हृदयहीन शत्रु से तो नहीं बदल सकता! चन्द घंटों के भीतर रक्तदान करने और अपने मित्रों को सांत्वना देने के लिये लोग अस्पताल में एकत्र हो गये। विवेकहीन नारेबाजी की एक भी आवाज नहीं उठी।
       मुहब्बत के बाग में लाशें रोप दी जायेंगी और तब वे एक ऎसे उत्तराखण्ड के रुप में खिलेंगी, जो इसके चाहने वालों को अपनेपन ला एहसास दे सकें। लेकिन हम राजनीतिक दलों को दूर ही रखें, कहीं वे अपने गन्दे नाखूनों से लाशों को खोदकर घृणा न फैलायें- इस भावना का हमारे हिमालयी अंचल में कोई स्थान नहीं है।


नैनीताल समाचार (१५ सितम्बर, १९९४ से साभार टंकित

Devbhoomi,Uttarakhand

दोस्तों उत्तराखंड के अमर सहिदों को हम बार बार सर झुका कर नामा करते हैं,हम उनकी मेहनत और उनके जीवन दान को बेकार नहीं जाने देना चाहिए लेकिन आज कास हर उत्तराखंडी उन अमर सहिदों की तरह सोचता तो सायद आज ये देवभूमि कहा होती लेकिन क्या करें उत्तराखंड की सरकार और रेस्पत्खौरों ने उनकी जीवन और बलिदान का गलत फायदा उठाया है और अपने जेबों को गरम करने मैं देवभूमि को बर्बाद कर दिया!
आज नौ साल होने जा रहे हैं उत्तराखंड बने हुए और आज भी आप लोग देख रहे हैं की क्या हो रहा है हमारे इस पूर्वजों की इस देवभूमि मैं , आज इस उत्तराखंड की चौर सरकार ने अपना एक टीवी चेनल नहीं बना सका, तो फिर और क्या कर सकते है ये सरकार आज भी लोग गांवों मैं बिजली की जगह लकडी जलाकर अपने बचों को पड़ने के लिए उजाला का सहारा लेते हैं और जहाँ बिजली है भी वहां क्या बिजली महीने मैं १० दिन रहती हैं

Devbhoomi,Uttarakhand

मुख्यमंत्री ने किया शहीदों को नमन्

खटीमा(ऊधमसिंह नगर): मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने खटीमा गोलीकांड के शहीद राज्य आंदोलनकारियों का भावपूर्ण स्मरण करते हुए उन्हे श्रद्धांजलि अर्पित की। जनसभा खत्म होने के तत्काल बाद सीएम शहीद स्थल पर पहुंचे। उन्होंने शहीद स्थल पर पुष्प चक्र चढ़ाया। उनका कहना था कि शहीदों के बलिदान के लिए राज्यवासी उनके ऋणी है। शहीदों के परिजनों को पूरा सम्मान दिया जाएगा। इससे पहले खंडूरी ने जनसभा के दौरान मंच पर राज्य आंदोलन के शहीद परमजीत सिंह के पिता नानक सिंह एवं माता का माल्यार्पण कर सम्मान किया।