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Tribute To Movement Martyrs - उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि

Started by Anubhav / अनुभव उपाध्याय, October 03, 2007, 02:14:22 PM

पंकज सिंह महर

साथियो,
    कल यानि कि ८ अगस्त को उत्तराखण्ड आन्दोलन के नायक और अमर शहीद बाबा मोहन उत्तराखण्डी जी की पांचवी पुण्य तिथि है, गैरसैंण को राजधानी घोषित करने की मांग को लेकर ३९ दिन के आमरण अनशन के बाद उनकी शहादत हो गई थी। इस अवसर पर मेरा पहाड़ परिवार उन्हें याद करते हुये अपनी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
साथ ही यह संकल्प लेते हैं कि आपकी जलाई अलख को हम बुझने ना देंगे और गैरसैंण राजधानी के लिये अपना आन्दोलन जारी रखेंगे।


अमर शहीद- बाबा मोहन उत्तराखण्डी

१९४९ में श्री मनबर सिंह रावत के घर में जन्मे श्री मोहन सिंह रावत को उत्तराखण्ड आन्दोलन में सक्रिय योगदान और संघर्षमय जीवन के  कारण उन्हें बाबा मोहन उत्तराखण्डी कहा जाता था। वे जल, जंगल, जमीन और उत्तराखण्ड से संबंधित कई जनपक्षीय मुद्दों को लेकर जीवन भर संघर्षमय रहे। बाबा बचपन से ही संघर्षशील और जुझारु प्रवृत्ति के थे। वे पर्वतीय जनता के हितों के लिये सदैव ही चिंतित रहते थे। इण्टर तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सेना में भर्ती हो गये थे। किंतु पर्वतीय जनता के जल, जंगल, जमीन के सवालों पर उद्वेलित होकर उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से समाजसेवा के लिये समर्पित हो गये। १९८६ से १९९१ तक वे ग्राम सभा बंठाली के ग्राम प्रधान रहे और इस पद पर रहते हुये उन्होंने जनसेवा और ईमानदारी की उत्कृष्ट मिसाल कायम की।
       अलग उत्तराखण्ड राज्य की प्राप्ति और गैरसैंण राजधानी को लेकर उन्होंने अपने जीवन काल में १३ बार आमरण अनशन किया। अंतिम बार जनपद चमोली के वेणीताल स्थित "टोपरी उडयार" पर गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाये जाने, स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिये नीति बनाने और राज्य के समग्र विकास की मांग को लेकर उन्होंने २ जुलाई, २००४ से अपना आमरण अनशन शुरु किया और अंततः ३९ दिन के अनशन के बाद ८ अगस्त, २००४ को राज्य हित में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

Devbhoomi,Uttarakhand

टिहरी: आजादी को लडऩा पड़ा अपनों से

अंग्रेजी हुकूमत तो थी ही, राजशाही के भी सहे जुल्म -अंग्रेजों व राजशाही के खिलाफ एक साथ लगते थे नारे -देश की आजादी के करीब पांच माह बाद आजाद हुआ था टिहरी , नई टिहरी: 15 अगस्त, भले ही देश भर में यह दिन आजादी के दिन के रूप में जाना जाता है, लेकिन गढ़वाल का टिहरी ऐसा इलाका है, जहां 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाने वाले लोगों को जेलों में ठूंसा जा रहा था। दरअसल, उस समय टिहरी रियासत हुआ करती थी। ऐसे में यहां अंग्रेजों के साथ राजसत्ता का भी प्रभाव था। इसके चलते यहां के बाशिंदों को आजादी के लिए दोहरी लड़ाई लडऩी पड़ी। यही वजह है कि बाकी देश के करीब छह माह बाद टिहरी में आजादी की किरन पहुंच सकी। सर्वविदित है कि स्वतंत्रता के पूर्व देश सैकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था।
इन्हीं में से एक थी टिहरी रियासत। यहां के बाशिंदे को एक ओर तो अंग्रेजी दासता की बेडिय़ों में जकड़े हुए थे, वहीं रियासत की ओर से लागू किए गए नियम, कायदे और प्रतिबंधों का पालन करने को भी वे मजबूर थे। यही वजह थी कि यहां के लोगों को आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के साथ राजसत्ता से भी संघर्ष करना पड़ा। टिहरी के 244 लोग स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। 15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होने के बाद टिहरी रिसासत के राजा ने अपना शासन जारी रखने की घोषणा की थी। इस दौरान जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने परिपूर्णानंद पैन्यूली के नेतृत्व में आजादी का जश्न मनाते हुए टिहरी बाजार में जुलूस निकाला, तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। दर्जनों सत्याग्रहियों को जेल में बंद करने से आम जनता का आक्रोश फूट पड़ा और राजशाही के खिलाफ आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। राजशाही के खात्मे के लिए दादा दौलतराम, नागेंद्र सकलानी, वीरेंद्र दत्त सकलानी व परिपूर्णानंद पैन्यूली ने नेतृत्व संभाला। सिंतबर-अक्टूबर 1947 में आंदोलनकारियों ने सकलाना क्षेत्र को आजाद घोषित कर पंचायत शासन स्थापित कर दिया। इसी बीच कीर्तिनगर के कड़ाकोट क्षेत्र में आंदोलन के नेता नागेंद्र सकलानी व मोलू भरदारी 11 जनवरी 1948 को राजशाही पुलिस की ओर से हुई गोलीबारी में शहीद हो गए, जबकि एक सत्याग्रही तेगा सिंह घायल हुए। इस गोली कांड के विरोध में पूरी रियासत (टिहरी-उत्तरकाशी) में अभूतपूर्व विद्रोह शुरू हो गया।
टिहरी में हजारों लोग उमड़ पड़े, जनता ने पुलिस अधिकारियों को जेल में डाल दिया और राजा को टिहरी से खदेड़ दिया गया। इसके बाद 14 जनवरी 1948 को टिहरी रियासत की आजादी की घोषणा की गई। इस प्रकार देश की आजादी के पूरे पांच माह बाद टिहरी के लोग आजाद हो पाए। उल्लेखनीय है कि टिहरी पर पंवार वंश के राजाओं का शासन सदियों से था।
राजा के ऊपर पहले इस्ट इंडिया कंपनी और फिर सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप रहा। ब्रिटिश सरकार की इच्छा के बिना राजा कोई भी कदम नहीं उठाता था। यही वजह थी कि रियासत में अंग्रेजों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को राजशाही दमनपूर्वक दबा देती थी। --------- एजेंसी चौक गवाह है अमानवीय प्रथा के अंत का -पौड़ी स्थित एजेंसी चौक में खत्म हुई थी कुली बेगार प्रथा -अंग्रेजी अधिकारी बरपाते थे भोली-भाली जनता पर कहर -बगैर मेहनताना जबर्दस्ती कराई जाती थी मजदूरी, विरोध पर मिलता था दंड पौड़ी: पौड़ी का एजेंसी चौक आज नगर के सुंदरतम चौराहों में गिना जाता है, लेकिन इसकी पहचान सिर्फ यही नहीं है। यह चौराहा खास ऐतिहासिक पहचान भी रखता है।
वर्ष 1908 में यह चौराहा अंग्रेजी हुकूमत की एक अमानवीय प्रथा 'कुली-बेगार' के खात्मे का गवाह बना था। यहीं से जिले में आजादी की लड़ाई की शुरुआत भी हुई थी। मंडल मुख्यालय स्थित एजेंसी चौक पर वर्ष 1908 में अंग्रेजों के जुल्मों की कहानी का अंत हुआ था। गढ़वाल में कुली बेगार प्रथा यहीं पर समाप्त हुई थी।
तब यह स्थल गढ़वाल के कामगारों की शरण स्थली था। इस कारण इसे कुली चौक भी कहा जाता था। अंग्रेजों के शासनकाल में कुली बेगार प्रथा उन दिनों प्रचलित थी। इसके तहत अंग्रेज अफसरों की सेवा में कुलियों, मजदूरों को नि:शुल्क उपयोग में लाया जाता था। अंग्रेज अफसर लाव-लश्कर के साथ जब यहां भ्रमण पर आते थे, तो आवागमन के साधन न होने के कारण उनके सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोने का काम कूली करते थे। इसके लिए स्थानीय अधिकारी कुलियों की सूची बना लेते थे।

http://pahar1.blogspot.com/2009/08/blog-post_17.html

पंकज सिंह महर

आज खटीमा गोली कांड की १५ वीं बरसी है, इस गोलीकांड में उत्तराखण्ड के ८ क्रांतिकारी पुलिस की गोली का शिकार बने थे।

१ सितम्बर, १९९४ - खटीमा

अमर शहीद स्व० श्री प्रताप सिंह
अमर शहीद स्व० श्री भुवन सिंह
अमर शहीद स्व० श्री सलीम
अमर शहीद स्व० श्री भगवान सिंह
अमर शहीद स्व० श्री धर्मानन्द भट्ट
अमर शहीद स्व० श्री गोपी चंद
अमर शहीद स्व० श्री परमजीत सिंह
अमर शहीद स्व० श्री रामपाल

धन्य हैं आप लोग, आपने हमारे सुरक्षित भविष्य के लिये अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया।

मेरा पहाड़ परिवार की ओर से इन अमर शहीदों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि एवं शत-शत नमन।

जय उत्तराखण्ड!
आज लोग अवगत हों कि इन आठ लोगों में से अमर शहीद स्व० श्री भगवान सिंह सिरोला, सात बहनों के अकेले भाई थे और अमर शहीद स्व० श्री परमजीत सिंह अपने मां-बाप की इकलौती संतान....इन लोगों ने इस बात को अनदेखा कर हमारे स्वर्णिम भविष्य के लिये अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।

धन्य है उस मां की कोख, जिसने ऎसे वीर सपूतों को जन्म दिया,

शत-शत नमन एवं अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।
आप निम्न लिंक पर जाकर भी श्रद्धासुमन  अर्पित कर सकते हैं-


http://www.merapahad.com/15th-anniversary-of-khatima-martyrs/

अड़्याट

खटीमा गोलीकांड के शहीदों को शत-शत नमन,
हम आपकी शहादत को भूले नहीं है, और किसी को भूलने भी नहीं देंगे।
जो मशाल आपने अपने लहू से जलाई है, उसे जलाये रखने के लिये हम भी अपना लहू और पसीना बहाने के लिये हमेशा तत्पर रहेंगे।

सलाम है शहीदों को....।
जय उत्तराखण्ड!!

हुक्का बू

उत्तराखण्ड के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुये हमारे जनकवि गिरीश तिवारी "गिर्दा" की कविता के अंश प्रस्तुत करना चाहता हूं-

थातिकै नौ ल्हिन्यू हम बलिदानीन को, धन मयेड़ी त्यरा उं बांका लाल।
धन उनरी छाती, झेलि गै जो गोली, मरी बेर ल्वै कैं जो करी गै निहाल॥
पर यौं बलि नी जाणी चैनिन बिरथा, न्है गयी तो नाति-प्वाथन कैं पिड़ाल।
तर्पण करणी तो भौते हुंनी, पर अर्पण ज्यान करनी कुछै लाल॥
याद धरो अगास बै नी हुलरौ क्वे, थै रण, रणकैंणी अघिल बड़ाल।
भूड़ फानी उंण सितुल नी हुनो, जो जालो भूड़ में वीं फानी पाल।।
आज हिमाल तुमन के धत्यूछौ, जागो-जागो हो म्यरा लाल....!

हिन्दी भावार्थ-

नामयहीं पर लेते हैं उन अमर शहीदों का साथी, कर प्राण निछावर हुये धन्य जो मां के रण-बांकुरे लाल।
हैं धन्य जो कि सीना ताने हंस-हंस कर झेल गये गोली, हैं धन्य चढ़ाकर बलि कर गये लहू को जो निहाल॥
इसलिए ध्यान यह रहे कि बलि बेकार ना जाये उन सबकी, यदि चला गया बलिदान व्यर्थ युगों-युगों पड़ेगा पहचान।
तर्पण करने वाले तो अपने मिल जायेंगे बहुत, मगर अर्पित कर दें जो प्राण, कठिन हैं ऎसे अपने मिल पाना॥
ये याद रहे आकाश नहीं टपकता है रणवीर कभी, ये याद रहे पाताल फोड़ नहीं प्रकट हुआ रणधीर कभी।
ये धरती है, धरती में रण ही रण को राह दिखाता है, जो समर भूमि में उतरेगा, वही रणवीर कहाता है॥
इसलिए, हिमालय जगा रहा है तुम्हें कि जागो-जागो मेरे लाल........!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




Merapahad pays tribute the Real Heros of Uttarakhand State Struggle who sacrified their lives for us. However, the state of their dream has not been made so far. They had wished that the Capital to be Gairsain which has still not been done.

They had wished that there would be like flood of development. Nothing is there.

I am sure they must be watching the condition of Uk and their soul might not be in peace ! People must feel shy who are plying with dream and sacrification of these martyrs.     

Rajen

खटीमा काण्ड के अमर शहीदों को हार्दिक श्रधांजलि |  आपका बलिदान उत्तराखंड की भावी पीडी के लिए सदैव प्रेरणा का श्रोत रहेगा.  ॐ......

हलिया

खटीमा गोली काण्ड के सभी शहीदों की याद हमेशा ही हमारे दिल में रहेगी.   

खटीमा गोली कांड के शहीदों को कभी नहीं भुला जायेगा और उनको श्रधांजलि अर्पित करते है और ओ हमेशा हमारे दिलो मे रहेंगे...

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

खटीमा गोलीकांड के अमर शहीदों को मेरा पहाड़ परिवार का शत शत नमन.