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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

                                                  मि तैं त पूरी आस च ऐतवार  च !


                                                         आस करदारो : भीष्म कुकरेती
                       

अचकाल भौत सालुं से कै भारतियौ कुण ब्वालो बल "गुड इंडिपेंडेन्स डे " तो वै भारतीयू जबाब हूंद बल "व्हट इज दियर तो बि  गुड ".
बुलणो  मतबल या च बल अजकाल भारतीयों कु  निरासण्या  चश्मा से ऊं तैं निरासा को अगास इ  दिखेंद I
इनि उत्तरखंड्युं हाल छन जौन निरासा ब्रैंड को गौग्ल्स  पैर्यां छन अर हर जगाम निरासा को बद्दळ दिख्यांद।
बिचारा उत्तराखंडी ! जब घौर बिटेन नौकरी की आस  मा भैर आंदो तो दगड़म निरस्यांद बि च बल यीं धरती से अब म्यरो नाता सद्यानो टूटी गे.
पण मि आशावान छौं बल ये पन्दरा अगस्त का बाद कौंग्रेस अर भाजापा आयातित मुख्यमंत्री उत्तराखंड तैं नि द्याला ।
अजकाल पहाड़ी जु नौकरी खोज मा भैर जांदो ओ भैर जोग ह्वे जान्ड़ो। मि तैं आस च कि जल्दी ही दिन बदल्याल अर हरेक प्रवासी रिटायरमेंटो उपरान्त गाँ मा बसण चालो किलैकि जवा सुविधा वै तै शहरो मा दिख्यांदी वो गाँ मा बि मिलण जालि।
उत्तराखंडी चिंतित छन क्या निरास छन बल उत्तराखंड का पहाड़ों मा कृषि उद्यम मा आमूल -चूल बदलौ नी होणु च।स्वतन्त्रता दिवसौ दिन मि आसा करदो कि उत्तराखंडौ पाख -पख्यड़ो खेती मा आमूल -चूल रदोबद्दल होलु कि प्रवास्युं बि तक अपण खेती से कमायां रुप्यों पर राली। मि तै सोळ आनो भरवस च बल निकट भविष्य मा पहाड़ी क्षेत्रुं माँ कृषि क्रान्ति होलि अर बरकती  खुशहाली बर्खली ।
चकबंदी पर बि मि तैं विश्वास  च बल एक दिन हम चकबंदी की जरूरत समझी जौंला ।
मि आश्वस्त  छौं बल शीघ्र ही उत्तराखंड मा फारेस्ट रिफौर्म होलु जांसे उत्तराखंड वासी अर प्रवासी जंगळु रक्षा बि कारल अर दगड़म  जंगळु से आर्थिक अर पर्यावरण्या लाभ भि ल्याला ।
मि तैं बरोबर भरवस च बल भूमिहीनों तैं भूमि मीलल अर क्वी बि उत्तराखंड मा बगैर अपण मकान को नि रालो ।
मी आशावान छौं बल गावों मा मूल भूत  सुविधा जन कि पाणि , पाखाना अदि की सबि सुविधा शीघ्र ही उपलब्ध ह्वे जाली ।
म्यरो पक्को विश्वास च बल गाँव गाँव मा शिक्षा मा इन क्रान्ति आलि कि उत्तम  शिक्षा बान बच्चों तैं शहर आणै जरोरात कतै नि रालि किलैकि सबि जगा इकसनी शिक्षा की आस छैं च।
लोग ग्रामीण चिकित्सा का मामला मा नाउम्मीद हुयां छन जब कि मि तैं पूरी उम्मीद च बल भौत जल्दी सरकार ,  डाक्टर अर समाज मीलिक ग्रामीण चिकित्सा मा जरुरता मुताबिक़ बदलाव लाला अर ग्रामीण चिकित्सा सुल्भ्य्ता मा अर शहरी चिकत्सा सुविधौं मा रती भरो फरक -भेद नि रालो ।
जख लोग औरतों पर अत्याचार -भेदभाव का मामला मा  नाउम्मीदी की कुर्सी मा बैठि रूणा छन किन्तु  मि आसरा मा छौं कि हमर इख शीघ्र ही औरत तैं पूरो हक - अधिकार -सम्मान मीलल ।
आम लोग डरणा छन कि उत्तराखंड मा बि पुलिस केवल शाशन को स्वार्थपूरक   सिद्ध होणि च जब कि मि तैं पूरा यकीन च बल हमारी पुलिस समाज सुधारक ही सिद्ध होलि ना कि अपराध हूणों बाद की डंडा बाज पुलिस ।
सबि परेशान छन बल स्वतन्त्रता का छसठ साल बाद बि  भेद भाव ख़तम नि कौर सकवां पण मि तैं ऐतवार च बल कि समाज मा वर्ग -भेद -भाव खतम जल्दी ही होलु ।
आज आपदा बाद सबि घबरायां छन कि पर्यटन को क्या होलु मि विश्वस्त छौं कि उत्तराखंड पर्यटन मा भरी वृद्धि होलि अर पर्यावरण -पर्यटन उद्यम मा एक सामजस्य होलु ।
मी तैं पूरो यकीन च बल अब हमारा प्रशासन अर राजनीतिज्ञोंन आपदा प्रबन्धन की अहमियत समझी याल होलि अर आण वळ दिनों मा उत्तराखंड आपदा प्रबन्धन की प्रशंसा अवश्य होली ।
मेरो पुरो विश्वास च कि उत्तराखंड मा वैज्ञानिक अनुसन्धान अर वूं वैज्ञानिक अनुसन्धानो तैं व्यवहारिक बणाणम क्रान्ति आलि अर एक नई तरां की औद्योगिक क्रान्ति आलि ।
म्यरो विश्वास च बल हमर प्रदेस  प्रोडक्टिविटी /उत्पादनशीलता तैं सबसे जादा अहमियत द्यालो।
एक सही सुपिन छौ कि उत्तराखंड ऊर्जा प्रदेस बौणो मी तैं पक्को उम्मीद च, यकीन च बल  हमारो उत्तराखंड शीघ्र ही ऊर्जा प्रदेस बौणल ।
मी तैं आस च , विश्वास च , यकीन च , ऐतवार च , भरवस च बल आप बि स्वतन्त्रता दिवस प़र आशावान होल्या, हमेशा ही आस की जोत जळैऴया अर सदा ही आपक इख आशा  का द्यू -बती जगीं राली !


Copyright@ Bhishma Kukreti 15/8/2013

Bhishma Kukreti

ब इतिहासकार डा.  शिव प्रसाद डबराल को "कुमाऊं का  इतिहास" प्रकाशन हेतु  भूमि बेचनी पड़ी



                  भीष्म कुकरेती

आज स्वतन्त्रता दिवस है तो आज हमारे मनीषियों के योगदान -बलिदान स्मरण होना भी आवश्यक है।
अपनी जन्म भूमि के आत्माभिमान के लिए त्याग भी स्वतंत्रता आन्दोलन जैसा ही ही है। अपने इतिहास को अक्षुण रखना भी एक सामजिक उत्तरदायित्व है । डा शिव प्रसाद डबराल का उत्तराखंड के इतिहास को लिखने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है ।
डा शिव प्रसाद डबराल ने उत्तराखंड के सभी क्षेत्रों का इतिहास पर अन्वेषण किया और उसे लिपिबद्ध  किया । इन कार्यों के लिए उन्हें कई कष्ट भी सहने पड़े ।

कुमाऊँ का  इतिहास (1000 -1790 ई ) की भूमिका में डा शिव प्रसाद डबराल इस प्रकार लिखते हैं -
" छै वर्षों तक सूरदास बने रहने के कारण लेखन कार्य रुक गया था ।प्रकाशन कार्य में निरंतर घाटा पड़ने से प्रेस (वीर गाथा प्रेस ) बेच देना पड़ा ।ओप्रेसन से ज्योति पुन: आने पर  चला कि दरजनो फाइलें , जिसमें महत्वपूर्ण नोट्स थे , शायद रद्दी कागजों के साथ फेंक दी गईं हैं । कुमाऊँ का इतिहास भी गढ़वाल के इतिहास के समान ही छै सौ पृष्ठों में छपने वाला था ।इस बीच कागज़ का मूल्य  छै गुना और छपाई का व्यय १६ गुना बढ़ गया था ।छै सौ पृष्ठों का ग्रन्थ छपने के लिए 35000 रुपयों की आवश्यकता थी ।इतनी अधिक राशि जुटाना सम्भव नही था । 76 की आयु में मनुष्य को जो भी करना हो तुरंत कर लेना चाहिए ।दो ही साधन थे ।भूमि बेच देना और पांडू लिपि को संक्षिप्त करना ।अस्तु मैंने कुछ राशि भूमि बेचकर जुटाई तथा कलम कुठार लेकर पांडुलिपि के बक्कल उतारते उतारते उसे आधा , भीतरी , 'टोर' मात्र बना दिया । किसी 'चिपको वाले 'मित्र ने मुझे इस क्रूर कार्य से नही रोका ! "

डा शिव प्रसाद डबराल की  'कुमाऊँ का इतिहास '  (1987 ) पुस्तक में कुल 272 पृष्ठ हैं और पुनीत प्रेस मेरठ से मुद्रित  हुयी है
डा डबराल को कोटि कोटि नमन


Bhishma Kukreti

सन 2100 ई . मा सम्पादकीय टिप्पणी


                                             भोळ दिख्वा : भीष्म कुकरेती
  ब्याळि सुपिनम मीन सन 2100 को एक क्षेत्रीय अखबारौ सम्पादकीय पौढ़ -

                       आज गढ़वाळि-कुमाऊंनी  समाज एक संक्रमण काल से गुजरणु च। समाज मा अर संस्कृति मा नई नई कुरीति ऐ गेन अर सरकार अर हमारा बुद्धिजीवी तमाशा दिखणा छन ।
                      क्या सुंदर हमर गढ़वाळि लोक हजारो की तादातम पलायन करदा छा , दीं दुनिया दिखदा छा अर रूप्या कमांदा छा । आर्थिक दृष्टि से हम सम्पनता की तरफां चली गे छया । पण अब बिजोग पड़ी गे कि गढ़वाल से पलायन ही नि होणु च उल्टां प्रवासी अपण अपण गाऊं मा बसणा छन । यो प्रवास्युं अपण गाऊं मा पुनर्वास से हमारी लोक संस्कृति पर बडो धक्का लगणु च । हम सरा दुनिया से संस्कृति उधार लीण गीजि गे छा अब पलायन नि होण अर प्रवास्युं अपण अपण गाऊं मा बसण से हमारी संस्कृति मा बदलाव हूण कम ह्वे ग्यायी जो हमारी लोक संस्कृति बान एक बडो खतरा च । संस्कृति मा यदि तेजी से बदलाव नि होलु तो दुनिया हम तैं कूप-मंडूपी लोक बुलणा छन। हरम संस्कृति उधान लीण बंद करण पर नेता लोग  संवेदनहीन हवे गेन अर हमारा विचारक मूक दर्शक ह्वे  गेन ।
               लोक गीत  हमेशा ही संस्कृति का प्रतीक होंदन अर संस्कृति संवाहक होन्दन । हमारी फुर्की बांद , लालू रुमाल जन श्रंगारिक लोक गीत रच्याण बंद ह्वे गेन अर अब स्वदेश प्रेम , समाज सुधारक विषय का भोंडा गीतुंन  फुर्की बांद , लालू रुमाल जन श्रंगारिक लोक गीतुं जगा लहे आल । देव रूप गजेन्द्र राणा की लगायीं डाळी बनि बनि श्रृंगारिक गीत बजार मा लाणि छे अर अचकाल राक्षसनुमा नरेंद्र सिंह नेगी का समर्थक फिर से स्वदेश प्रेम , समाज सुधारक विषयी गीत गाण बिसे गेन । गजेन्द्र सिंह राणा  का गीत हमारी संस्कृति का परिचायक छा अर अब हम अपणी संस्कृति छोड़ि दुसर संस्कृति नकल करणा छंवाँ । कुज्याण नई संस्कृति को क्या हाल होलु ? नेता सियां छन , बुद्धिजीवी बौंहड़ पड़्याँ छन ।
           परिधान हमारि पछ्याणक हूंदी । क्या सुन्दर हम लोग अपण लोक परिधान जन कि जींस -पैंट  -बरमुदा पैरदा छा अर अब नई साखी , नई जनरेसन धोती -कुर्ता अर मॉडर्न  जनानी -बेटी -ब्वारि साडी -बिलौज पैरण गीजि गेन । परिधान का मामला मा गढ़वाऴयूँ मध्य जो ह्रास ये दशक मा दिखे ग्यायि वो ह्रास आज तलक इतिहास मा नि दिखे ग्यायि । हमर समाज एक ब्लंडर करणम मशगूल च  अर हमार नेता अर विचारक , समाज सुधारक चुपचाप संस्कृति विनाश दिखणा छन ।
   
                 खाणा मामला मा हमारो लोक भोजन जन कि  चाऊ -माऊ , भौं भौं किस्मौ सैंडविच, बर्गर, पिजा, आदि लोक भोजन प्रचलित छौ अर यु खाणा हमर संस्कृति को अभिन्न अंग छौ पण काण्ड लगिन नै जमानो अपर कि हमर लोग अब  चुनै रुट्टी , फाणु -बाड़ी -झंग्वर, कपिलो -कंडाळी जन भोजन पर ढबी गेन । कुनगस त या होणु च कि होटलूंम अब ढुंगळ -उड़दौ दाळ उपलब्ध ह्वे ग्यायि ।  लोग अपण लोक भोजन चाऊ -माऊ , भौं भौं किस्मौ सैंडविच, बर्गर, पिजा, आदिकी बेज्जती से आतंकित छन उख हमारा राजनेता अर जणगरा भोजन संस्कृति मा बदलाव का मामला मा सर्वथा उदासीन छन ।
            पैल हम लोगुंन हिंदी तैं मातृभाषा अर अंग्रेजी तैं पितृभाषा घोषित करी आल छौ। हमन हिंदी अर अंग्रेजी की पूजा करिक   ग्लोबलाइजेसन का हिसाब से  हमन गढ़वाळि -कुमाऊंनी भाषा तैं ख़तम ही करी दे छौ पण कुछ उछद्यूं कुकर्मो से अब हर मैना दस बारा गढ़वाळि किताब छप्याणि छन , गाऊं अर शहरुं  माँ गढ़वाळि -कुमाऊंनी सिखाणौ कोचिंग क्लास खुली गेन अर नै पीढ़ी गढ़वाळि -कुमाऊंनी भाषा सिखणम  अभिमान महसूस करणी च । हमारी मांग च  कि  राष्ट्रीय भाव -विरोधी यूँ गति विध्युं जन कि गढ़वाळि -कुमाऊंनी सिखाणौ कोचिंग क्लासुं  तैं तुरंत बंद करे जावो । अचकाल गढ़वाळि -कुमाऊंनी फिलम अर वीडिओ कसेट धड़ले से बिकणा छन अर इन बुल्याणु च बल गढ़वाळि -कुमाऊंनी फिलम उद्योग भौति लाभ कमाणु च । हमारी मांग च बल गढ़वाळि -कुमाऊंनी फिल्मो पर दस गुना जादा टैक्स लगाए जावो जां से गढ़वाळि -कुमाऊंनी फ़िल्म उद्यम बंद हवे जावो ।
इंटरनेट पर अब गढ़वाळि -कुमाऊंनी लोग हिंदी अर अंग्रेजी छोड़िक अपणी बोली तैं प्रमोट करणा छन । या भावना हिंदी अर अंग्रेजी प्रसार का वास्ता एक जघन्य अपराध च पण भारत सरकार ये जघन्य अपराध तैं रुकणौ कुछ नी करणी च ।
               
          इनि भौत त सि बात छन जो हमारी संस्कृति तैं खतम करणा छन अर सरकार कु कर्तव्य च कि संस्कृति -विध्वंसक माध्यमों पर तुरंत रोक लगाए  जावो । बुद्धिजीवी -चिंतकों को कर्तव्य च कि संस्कृति -विध्वंसक चिंगारी तैं रुकणो बान आन्दोलन की तैयारी कारन ।





Copyright@ Bhishma Kukreti 16/8/2013

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...] 

Bhishma Kukreti

Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule


History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 120

   Early Medieval   Asian History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath Kumaon, Garhwal and Haridwar (Uttarakhand, India) -
          (Early Asian Medieval History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))
                          (Early Asian Medieval History (740-1100 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti
 
                   There were many historical ups and downs in Easter part of Middle East, North India, Central India and Uttarakhand at the time of last kings of Katyuris of Kartikeyapur. 

                                          Sarsava (North India) Kingdom
             Around the time of successors of Subhiskhraj Katyuri period after 908Ad, the Katyuri kingdom started disintegrating.
  The western block of Yamuna valley came under Trigart –Jalandhar kings.
The Sarsava king Naresh Chandra captured Ambala, Bbhabar of Saharanpur, Foothills of Dehradun and Sirmaur (Himachal) territories. Sarsava or Sarva was the capital of Sarsava kingdom at Yamuna bank.

                                       Shahi or Shahiya King Jaypal
           Jaypal King was ruling Shahiya kingdom was in western part of Sarsava kingdom till Kabul. Jaypal had two capitals –Lahor and Udmand (near Indus River bank).  The Amir of Ghazani Sabuktigin and his son Mahmud started looting in Jaypal kingdom. Jaypal twice attacked with force on Ghazani Amir at Lamghan.  Both time Jaypal got defeated. In 1001, Mahmud captured the territory from Udmand to Kabul.  Mahmud captured four lakh people and took them to Ghazani.
  Jaypal expired due to defeat shock.
       
                         Shahi Naresh Anand Pal

                From 1001, Mahmud strengthens his kingdom and in 1008, attacked on Shahi kingdom ruled by Anand Pal.  The Parmar king Bhoj and other north India kings helped Shahi Naresh Anand Pal by sending their armies for Anand pal the Shahi King. There was bllod bathed war in Udmand. Anandpal was just to win that his elephant got mad and Shahi Naresh Anand Pal had to run away. Mahmud ran behind Shahi Naresh Anand Pal till Nagarkot of Vyas valley. Mahmud and his army looted countless wealth from the territory. Anand Pal was defeated by Mahmud and Anand Pal took shelter of Mahmud.
 

                Mahmud got the taste of wealth and made strategy to loot other Indian cities.
             Mahmud attacked Thaneshwar in 1011 and looted there. Thanshwar king Ram was defeated by Mahmud.

                           Shahi Naresh Trilochan Pal

                    The son of Shahi Naresh Anand Pal got the kingdom after his father death. Bhim Pal the son of Shahi King Trilochan pal was not in mood to accept the rule of Mahmud. Mahmud captured the two third region of Trilochan Pal.

                War between Shahi Naresh Trilochan Pal and Sarsava King 

            The Sarsava and Shahi kingdoms were adjoining to each other and both kingdoms did have disputes over Kingdom boundaries.  Trilochan and Naresh Chandra of Sarsava fought each others.
                Due to fear of Mahmud they came on talking terms. Trilochan Pal engaged his son Bhim Pal with daughter of Naresh Chandra.  Trilochan Pal reached to Sarsava to take his daughter in law. However, Naresh Chandra arrested Trilochan Pal.
   Mahmud was on campaigning to looting north Indian kingdoms –Ganga valley, Kannauj, Mathura etc.
Trilochan Pal was not ready to accept the over ruling of Mahmud and he did not have power to stop Mahmud. Trilochan Pal took asylum in Bhoj kingdom.
    Mahmud looted Baran (Bulandshahar and Mathura. The king Kokkal Kalchuri resisted but was defeated and Kokkal Kalchuri had to opt for suicide.
Mahmud looted Mathura, Kannauj. Mahmud also captured lakhs of people for slaving.

                                Sarsava King Chandra

      When Mahmud looted Ganga-Yamuna Doab, he started his campaign towards north.  The foothills were easier way for taking the looted wealth to Ghazani.
The Sarsava king Chandra wanted to resist Mahmud but due to advice of Bhim Pal he reached to higher Himalayan altitude. Mahmud reached and to Chandra camp. Mahmud defeated Chandra.
Mahmud captured millions of Indians and made them slaves in Ghazani.

                          Shahi Prince Bhim Pal

                      Probably with the help of Bhoj and Vidyadhar Chandel, after Mahmud return to Ghazani, Trilochan Pal and his son Bhim Pal recaptured territory of east Shahi kingdom.
     
                            Kannauj king Pratihar Rajyapal came under Mahmud and became governor for Mahmud. Chandel king Vidyadhar killed Rajyapal for his coward behavior before Mahmud. Mahmud attacked (1012) North India to take revenge.
             Mahmud started campaign from Himalayan foot hills.  Trilochan Pal and Bhim Pal shoed resistance but were defeated by Mahmud.
  Trilochan Pal was killed while running to Vidyadhar.
          Bhim Pal took asylum in Ajmer Kingdom. 
Shahi Kings resisted stopping invasion of Mahmud for twenty five years.  Shahi kings were religious and with noble characters.  Great poet Kalhan describes about Shahi kings in details.
  Mahmud looted Somnath temple (1025-26).
Mahmud started looting culture and died in 1030. His successors ruled India thereafter.


                   Kalchuri Kings

   Kalcharu king Gangeydev captured Kerdesh (Kangda) from Muslim invaders. Howver, Masud captured Hasi in 1036
Kalchuri king Karna defeated Muslim king in 1037 at Kangda. North Indian kings –Tomar of Delhi, Parmar King Bhoj supported Karna.

                       Parmar King Bhoj (1000-1055)
  Parmar king sent his army for helping Shahi king Anand Pal for stopping Mahmud invasion. Bhoj also provided asylum to Trilochan Pal.

                Struggle against Mahmud and Muslim invasion

The north and Central Indian kings did struggle for freeing Muslim invasion from India. These kings were Tomar King of Delhi, Bhoj, Kalchuri king Karn, Annhill Chahman.

               Bhoj Rule over Uttarakhand


             According to Udaypur inscriptions, Bhoj kingdom was extended up to Kailas and Rudrahimal of Uttarakhand.
  Bhoj also built temple in Kedarnath too.
  It is said that Garhwali kings were Parmar of Bhoj family.
   Bhoj was great donor and scholar. He used to provide shelters to scholars.

               Invasion by Muslim Kings

                 From 1051-57, Muslim kings recaptured Nagarkot, Ajudhan, Rupal, Darah, Jalandhar, Sarhind, Dhangan and Srughan. By 1075, Agara, Kanauj, Ujjain and Kalijar were under Muslim rules.

                                        Chahman King Vgrahraj fourth


    The rule of Ajmer king Vgrahraj fourth (1151-1167) was Delhi, Hansi, and eastern Punjab. He freed many Muslim territories.
               According to Shivalik inscriptions, His rule was on Shivalik region too. It seems his rule wa s also on some part of Hill foothills of Uttarakhand.

             Prithviraj Chauhman Third
  Prithvirah got kAjmer kingdom from his father in 1177. He was killed by Mahmud Gori,  Muhmad Gori attacked Gujrat and other territories.
Mahmud Gori attacked Sarhind in 1191. Prithvi Raj Chauhman defeated Gori and captured Sarhind fort.
In 1192, Mahmud Gori again attacked Chauhman kingdom and captured Prithviraj. Prithviraj was killed by Gori.

                             Start of Slavery Era

  This era was the era of slavery in India >
                            Asylums by Hindus in Himalayan Hills

The suppressions of Muslim invaders compelled Indians to take shelters in Himalayan hills in mass.
The priests, Siddh, Mantriks, Tantriks , scholars, ascetics, Nath, Saints took asylum in Himalayan hills.
Katyuris provided shelters to these Hindus who did not accept the Muslim rules of converting into Islam.


Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 16/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -121
Early Asian Medieval History of Baijnath/Baidyanath Katyuri Dynasty in Kumaon, Garhwal and Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued...     
  (Oriental Early Medieval History (740-1100 AD to be continued...)
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           Notes on Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rulein Pithoragarh ; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects in Bageshwar around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Champawat ; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Almora ; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule In Nainital; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule In Udham Singh Nagar; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Pauri Garhwal; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Tehri Garhwal; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Pauri Garhwal; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Chamoli Garhwal; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule in Uttarkashi; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects in Dehradun around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule ; Asian and North Indian Medieval Historical Aspects in Haridwar around Baidyanath/Baijnath Katyuri Rule

Bhishma Kukreti

                                               राजस्थानी  लोक गीत में बहू भेदभाव पीड़ा
और सहेलिया माँ झूलण जाय, खेलण जाय ।
म्हने मण रो माँ पीसणो ।
पीसत -पीसत दुख्याँ मां मोर  ।
पीवत दुखिया माँ पैरवा  । ।
औरों ने दिया माँ बुल्का च्यार
म्हने बटल्यो मां एकलो
औरों ने मां घप्सां घप्सां खांड
म्हने घप्सों मां लूण रो
औरों माँ  पली  पली घी
मने मोरियों मां तेल रो
औरों ने मां बाटकिया बाटकिया खीर ,
म्हने बाटकी मां राब की

(गीत संकलन - श्रीमती रानी लक्ष्मी कुमारी 'चूड़ावत ' राजस्थानी लोक गीत )


उपरोक्त राजस्थानी लोक गीत में एक लडकी अपनी माँ से अपने ससुराल में उस के साथ किये गये भेदभाव, दुराव छुपाव और अन्य कष्टों की कहानी बताती है कि
हे मां ! अन्य सहेलियां तो झूलने जाती हैं , खेलने जाती हैं किन्तु मुझे मन भर अनाज पीसने और मन भर आता रोटी पकाने दिया जाता है । अनाज पीसते पीसते मेरा मोर (पृष्ठ भाग ) दर्द करने लगा है । रोटी पकाते पकाते मेरी अंगुलियाँ दर्द करने लगी हैं ।  हे मां ! ससुराल में औरों को चार चार फुल्के दिए जाते हैं जबकि मुझे छोटा फुल्का दिया जाता है । दूसरों को भर भर कर शक्कर  दिया जाता है तो मुझे केवल नमक । औरों को कटोरी भर कर घी दिया जाता है तो मुझे बूंद भर तेल । औरों को कटोरे भर भर कर खीर दी जाती है और मुझे केवल कटोरी में दलिया दिया जाता है ।
   
                          गढवाली -कुमाउंनी लोक गीतों में  बहू पीड़ा


            गढ़वाली और कुमाउंनी लोक गीतों में भी नारी खाशकर बहू पीड़ा को दर्शाने वाले दर्जनों गीत हैं और कई क्षेत्रीय गीतों का संकलन अभी बाकी है ।
निम्न गढ़वाली लोक गीत में नारी पीड़ा के कई  पक्ष दर्शाए गए हैं ।

केकु बाबाजीन मिडिल पढायो
केकु बाबाजीन मिडिल पढायो
केकु बाबाजीन राठ  बिवायो
बाबाजीन देनी सैंडल बूट
भागन बोली झंगोरा कूट ।
बाबाजीन दे छई मखमली साड़ी
सासू नी देंदी पेट भर बाड़ी ।
जौं बैण्योंन साड़ी रौल्यों क पाणी
वा बैणि ह्वे गए राजों क राणी ।
जौं बैण्योंन काटे रौल्यों को घास
वा भूली गै राजों का पास ।
मै छंऊ बाबा राजों का लेख
तब मी पाए सौंजड्या बैख ।
दगड्या भग्यानो की जोड़ी सौंज्यड़ी
मेरी किस्मत मा बुड्या कोढ़ी ।
बांठा पुंगड़ा लड़बड़ी तोर
नी जैन बुड्या संगरादी पोर ।
बाबाजीन दे छई सोना की कांघी
सासू ना राखी छै मैना राखी ।
(गीत संकलन : डा कुसुम नौटियाल , गढ़वाली नारी : एक लोकगीतात्मक पहचान)


इस लोक गीत में दिखाया गया है कि एक आठवीं पास (जिस युग में  लडकियाँ स्कूल भी नही जाती थीं )लडकी की शादी उसके पिताजी ने लोभ में एक बुद्धे के साथ कर दी । फिर वह लडकी कह  रही है कि पिताजी ने भेंट में सैंडल दी हैं किन्तु उसके भाग्य में झंगोरा कूटना  लिखा है । द्यपि उसने आठ पास किया है किन्तु उसकी शादी अविकसित देस में हुआ है । उसके पिता  जी ने मखमली साडी दी किन्तु उसकी सास उसे पेट भर बाड़ी भी नही देती है ।
पिताजी ने भेंट में सैंडल दी हैं किन्तु उसके भाग्य में झंगोरा कुटना लिखा है । जो  बहिन दूर नदी से  पानी लाती थी उसे राजा दुल्हा मिला । जो बहिन घास लाती थी वह राजमहल में वास करती है । मेरे हाथ में राजयोग लिखा था तो मुझे बुड्ढा पति मिला । मेरी सहेलियों को जवान पति मिले तो मुझे कोढ़ी जैसा पति । मई चाहती हूँ यह बुड्ढा मर ही जाय । पिताजी ने मुझे सोने की कंघी दी किन्तु मेरी सास ने मुझे छह माह तक नंगा ही रखा
इस तरह हम पाते हैं की राजस्थानी व गढवाली  भाषाओं के लोक गीतों में स्त्री पीड़ा या नारी के साथ दुराव -भेदभाव एक समान दर्शाए गए हैं । ऐआ लगता है कि नारी पीड़ा सभी जगह एक जैसी ही है ।
दोनों लोक गीतों में करुण रस उभर कर आया है । दोनों ही भाषाओं के लोक गीत स्त्री विमर्श पर ह्रदय विदारक चित्र उभारने में सफल हैं ।राजस्थानी और गढ़वाली के लोक गीत नारी व्यथा चित्रित करने में यथार्थ को सामने लाते हैं और ये लोक गीत अपने युग का आयना सिद्ध होते हैं ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 16 /8/2013


सन्दर्भ
डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली
डा शिवा नन्द नौटियाल , 1981 ,गढवाली लोकनृत्य -गीत , हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग
डा नन्द किशोर हटवाल , 2009 उत्तराखंड हिमालय के चांचड़ी  गीत एवं नृत्य ,विनसर पब क. देहरादून
(राजस्थानी लोक गीतों में स्त्री पहचान ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्री पहचान ; राजस्थानी लोक गीतों में  बहू पीड़ा ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में बहू पीड़ा ;राजस्थानी लोक गीतों में करुण रस ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में करुण रस   ;राजस्थानी लोक गीतों में स्त्री दुःख ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्री दुःख ; राजस्थानी लोक गीतों में नारी पीड़ा ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी पीड़ा ; राजस्थानी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ दुराव ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ दुराव ; राजस्थानी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ भेदभाव ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ भेदभाव ;राजस्थानी लोक गीतों में नारी वेदना ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी बेदना ;राजस्थानी लोक गीतों में नारी कष्ट ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी कष्ट ;राजस्थानी लोक गीतों में नारी विषयक हृदय विदारक चित्र ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी विषयक ह्रदय विदारक चित्र - राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन श्रृखला भाग 3 में जारी ... )

Bhishma Kukreti

Yatyendra Prasad Gaur: A Modern Garhwali Lyricist famous for his various Poetic Images of Garhwal 

                                Bhishma Kukreti

                         Yatyendra Prasad gaur is modern lyricist of Garhwali poetry. The modern Garhwali Rhymester Gaur is well-known for his creating images of Garhwal.
              Yatyendra Prasad Gaur was born in village Bichhal Simal, Ajmir of Pauri Garhwal on 27th April 1967. His mother name is Shrimati Pyari Devi and father name was late Shri Govind Prasad Gaur.
              Yatyendra Guar got his B.Ed. degree after passing M.A in English and Economics. From his childhood age, Yatyendra had attraction for music. Yatyendra Gaur is diploma holder in Music form Allahabad; Gaur took singing training from Manohar Singh Rawat of Kotdwara and Mohan Singh Rawat of Pauri. Yatyendra Gaur took training of Tabla playing from Mohmmad Kayum Khan of Nazibabad . 
            Yatyendra got inspiration from great Indian singer Narendra Singh Negi to write lyric in Garhwali.
  Yatyendra Gaur released Garhwali song album as ' Barkhwalun Chaumas'. The aid album was praised by common men and was appreciated by literature critics too.
      Gaud had been writing Garhwali poetries for magazines-newsletters as  Ghughati, Khabar Sar, Shailvani Siddhvani, Chitthi Patri, Garh Gaurav.
  Akashvani (Radio Station) Nazibabad have relayed songs and folk songs by Yatyendra Gaur.
           Recently (2009) published his first modern Garhwali lyric collection 'Garhwali Bhaun' from Samay Sakshya Dehradun.   
             The great Indian singer Narendra Singh appreciated very much the style and structure of lyrics of Yatyendra gaur.
  Famous Garhwali and Hindi critic and literature historian Dr. Nand Kishor Dhoundiyal praised the poems of Yatyendra Gaur. Yatyendra would be remembered for his lyrics creating the various images and mood of Garhwal.
Gaur created marvelous images of Ajmir region and Gangasalan regionin his various Garhwali poems as Gadh –Mabgarh ; Malini Pandu ki Bala he Shakuntala, Gendu Khyalela Ho aaaa 
The following poem is about Malini emerging from upper Chandakhal
माळू  का जौड़यूंद बौगदी ठंड़ू पाणी मालिणी
गंगा सि  पवित्र प्यारी छाळू पाणी मालिणी 
मल्या चंडाखाळम बटी अवतरित ह्वै तू मालिणी
अद्बाट अकौशानी हूणी , तेरी सौज्ड्या मालिणी   
xxx
Gaur perfectly created another poem about Mabgarh temple and the region
गढ़ माsब गढ़

ऊंची धार शिवलिंगी अन्वार।
ऐंच आगास माया नीलू छतर
जौ जस देंद हे भूमि भूम्याळ
हे इष्ट माsब गढ़ , माsब गढ़



             Yatyendra Gaur is teacher in Lal Dhang.
He may be contacted on 09411585692

Copyright@ Bhishma Kukreti, 16/8/2013
Notes on Garhwali poet creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Simal creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Kandakhal region creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Ajmir creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Gangasalan creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Lainsdowne Tehsil creating Images of Garhwal; Garhwali poet residing in Kotdwara creating Images of Garhwal;Garhwali poet from Pauri Garhwal creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Uttarakhand creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Himalaya creating Images of Garhwal; Garhwali poet from North India creating Images of Garhwal; Garhwali poet from Asia creating Images of Garhwal

Bhishma Kukreti


                          तंबाकू ब्यापार्युं हड़ताल

                     चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती


प्रजातंत्र मा सरीफ मनिख जैकि  जमीन जायजाद लुठे जावो वो रावो या नि रावो पण धुर्या मनिख को गलत सलत कामौ अधिकार पर जरा ठेस लगदी तो वो इन तड़कद जन बुल्यां ऐटम बम फुटि गे हो धौं ।
ब्याळि महाराष्ट्र का तमsखु   बिचण व़ाळुन हड़ताल त्यौहार मनायि अर मोर्चा लोक -नृत्य-गीत मा भाग ले । कै दिन मोर्चा लोक -नृत्य-गीत सामजिक अधिकार बचाणो   अर सामाजिक चेतना वास्ता प्रयोग हूंदा छा अब मोर्चा लोक -नृत्य-गीत अपण धौंस दिखाणो, अपण ताकत दिखाणो, हैंको अधिकार लुठणो, हैंको  मौतौ इंतजाम करणों, हम कथगा कमीना छंवां -या म्यरो ये क्षेत्र पर क्या रौब च यु दिखाणो बान प्रयोग करे जांद । वो दिन अब इतिहास का हिस्सा ह्वे गेन जब मोर्चा लोक -नृत्य-गीत एक पूज्य नृत्य -गीत माने जांद छौ अब त मोर्चा लोक -नृत्य-गीत एक स्वार्थ पूरक नृत्य -गीत माने जांद ।
अब बताओ महाराष्ट्र सरकारन तमाखु बिक्री कम ह्वावो को इंतजाम करणों बान खुले आम तमाखु बिचणो बाण कुछ नियम स्वीकृत करेन तो तम्बाकू विक्रेता सरकार से चिरड़े गेन , टोबेको सेलर्स सरकार से नराज ह्वे गेन कि लोगुं तैं कैंसर से मारणो लाइसेंस हम से सरकार  नि लूठि सकदी । तम्बाकू विक्रेता संघन मोर्चा घड्यळ उर्यायि कि स्वास  रोग से लोगुं तैं ज़िंदा लाश बणाणो  हमर संवैधानिक अधिकार नि छिने जावन । मोर्चा दिवता जात्रा, घड्यळम  अर भंडारोम जागरी इन जागर लगाणा छया -
जो तम्बाकु से लोगुं तैं मारणो  हमर मूल भूत अधिकार लूठल वै तै हम विधयाक जोग नि रखला । वीं सरकार तैं हम गिराए द्योला ।
जो तम्बाकू से लोगुं मा कैंसर फैलाणो हमर अधिकार पर ठेस लगालो वैकी गद्दी पर हम ढसका लगौला ।
लोगों को मारने का हमारा जन्म सिद्ध अधिकार हमें वापस कारो -वापस कारो ।
क्या ह्वाइ जो तम्बाकू सेवन से राज्य मा लाखों लोग मरणा छन पण तम्बाकू विक्री से राज्य को GDP तो बढ़णि च कि ना ? तो GDP क नाम पर - लोगो की हत्या का अधिकार हम तैं वापस कारो-वापस कारो ।
तम्बाकू विक्री समर्थक जागर्युं दलील छे कि हम हर साल कैंसर अस्पताल अर स्वास रोग चिकत्सालय तैं भीख दींदा हि छंवाँ तो फिर तम्बाकू से जन -हत्या रोकणै क्या जरुरत च ?
  प्रजातंत्र मा अब हम खुले आम हत्या करण तैं बि जन्म सिद्ध अधिकार माणदवाँ ।
प्रजातंत्र मा गैर सामाजिक कार्यों तै बि हम संवैधानिक अधिकार बथाण मा नि शर्मांदा ! उल्टां जो हम तैं गैर सामाजिक काम करण से रुकद वै तैं हर तरां से पिटण -चुटणो तयार रौंदा ।
जम्हूरियत पर एक दाग च कि संख्या का बल पर जबरन जम्हूरियत का जनाजा बि निकाळ सकदवां  ।
प्रजातंत्र की एक परेशानी  या बि च बल व्यक्ति हित का वास्ता प्रजासत्तात्मक रास्ता का बल पर   प्रजाहित , जनहित की हत्या बि कराये जांद ।
यो सबि माणदन बल शराब अर तम्बाकू समाज का वास्ता नुकसानकारी च पण राज्य मालगुजारी , राजस्व का नाम पर हम सब खुलेआम मनुष्य -बूचड़खाना बचाणा रौंदा उल्टां मनिखौं तैं काटणौ  बूचड़खानौ याने शराब अर तम्बाकू की फैक्ट्रियों तैं बनि बनिक इमदाद अर कर लाभ बि दींदा जाँ से तम्बाकू अर शराब की फैक्ट्रियां जादा से जादा सामजिक नुकसान कौर साकन । इथगा भयंकर विरोधाभास जनतंत्र मा इ दिखे सकद ।
पण जै प्रजातन्त्र मा संसद या विधान सभा तैं नि चलण  दीण अपण  मौलिक अधिकार ह्वावो अर संसद या विधान सभा चलाण दुसरौ कर्तव्य माने जांद उख खुलेआम , सब्युं समिण  जनसंघार करणों बान सत्याग्रह, मोर्चा बंदी , घेरा बंदी , हड़ताल तो   होलु ही । जै देस मा संसद मा सांसद द्वारा 'भ्रष्टाचार रोकणो  लोकपाल बिल' फाड़े जालो उख मनुष्य हन्ता, जनहत्यारा  तंबाकू निर्माता -तम्बाकू विक्रेता हड़ताल त कारल ही कि -हे सरकार ! तू हमारो मनुष्य हत्या को मौलिक अधिकार तैं नि छीनि सकदी , हे सरकार प्राणी -हत्या हमारो जन्म सिद्ध अधिकार च अर तू हमारो ये हत्या को अधिकार नि लूठी सकदी ।



Copyright@ Bhishma Kukreti 17/8/2013

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]

Bhishma Kukreti






                  राजस्थानी गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतोंमें पूर्बज पूजा लोक गीत

                     राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 3


                                           भीष्म कुकरेती

                   राजस्थानी लोकगीतों में पूर्बज पूजा लोक गीत


           राजस्थानी लोक गीत मर्मग्य डा जगमल सिंह लिखते हैं कि लोक जीवन में मृत व्यक्तियों की पूजा की जाती है ।  झुंझार जी की पूजा भी इसी परंपरा में आती है ।  राजस्थानी लोक गीतों के दूसरे  विद्वान व्याख्याकार मोहन लाल व्यास शास्त्री ने भी राह्स्थान में  पूर्वजों की पूजा संम्बन्धी लोक  गीतों का संकलन किया और इन लोक गीतों की व्याख्या व्याख्या भी की ।
पूर्वजों की आत्मा का पूजन लोक परम्परा में रत जगा किया जाता है और रात्रि जागरण में पूर्वजों अथवा पितरों की गीत गाये जाते हैं ।
राजस्थानी जन मानस  विश्वास होता है कि पूर्वज पुन्ह उसी घर में जन्म लेते हैं । निम्न लोक गीत जो की पितृ  पूजा में गाया जाता है उस लोक गीत में में पूर्वज द्वारा पुनर्जनम लेने की बात की गयी है
धरम दवारे ओ रूड़ी पीपला जी
जठे पूरवज करे विचार
    xxx                 xx

जास्यां -जास्यां शंकर  पेट
तो वांरी बहु लाड्यां की खुंखां हुलस्यां जी

यह गीत रात्रि जागरण में गाया जाता है  ।
गीत का मंतव्य है कि पीपल वृक्ष के नीचे खड़े पूर्वज विचार विमर्श  करते हैं कि वे शंकर जी की पत्नी के गर्भ में जाने की बात करते हैं और कहते हैं कि उनकी पत्नी की कोख में जन्म लेकर हुलसेंगे ।

     पूर्वजों की पूजा हेतु राजस्थान या पौराणिक वीर पुरुषों या वीरांगनाओं के गीत भी गाये जाते हैं । इन्हें झुंझार जी गीत भी कहा जाता है (J . Kamphrst , 2008 )। पाबू जी झुंझार लोक गीतों में चौदहवीं सदी  के वीर नायक पाबू जी लक्ष्मण के अवतार माने गए हैं याने कि पाबू जी लोक कथाओं में भी पुनर्जन्म का समावेश है ।
मेवाड़ में झुंझार देवता उसे कहा जाता है जिसने गाँव की रक्षा या गाँव के पशु रक्षा हेतु बलिदान दिया हो और मृत्यु को प्राप्त हुआ हो । जैसलमेर में झुंझार देव्ताअप्ने समय में समाज हेतु संघर्ष करता है और संघर्ष रत मृत्यु प्राप्त होता है । राजस्थान में झुंझार , भूमियो , भूमिपाल और क्षेत्रपाल या खेत्रपाल एक ही श्रेणी के देवता हैं याने ये सभी ग्राम रक्षक देवता है ।

पाबू जी  लोक गाथा की  निम्न पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि वीर पुरषों की याद में पूर्वज पूजा सम्पन होती है जैसे गढ़वाल -कुमाऊँ में 'हंत्या घडेला -  जागर' में समाज या उत्तराखंड के वीर पुरुषो को याद कर र पूजा अनुष्ठान सम्पन होता है ।


जिमदा पाला विमनाई जगजीती जुद्ध जैवमाता जगजीति
याने कि तुम दोनों (जिमदा और पाबू जी ) वीर हो , नायक हो और युद्ध जीतने में माहिर हो !
राजस्थान में भी पूर्वज पूजा का एक उदेश्य पूर्वजों की भटकती आत्माओं या अतृप्त आत्माओं को परम स्थान हेतु अनुष्ठान किये जाते हैं और वे अनुष्ठान लोक गीत शैली में होते हैं ।


                      गढ़वाली -कुमाऊनी लोक गीतों में पूर्वज पूजा


गढ़वाल -कुमाऊँ में पुव्जों का पूजन एक विशेष धार्मिक , अनुष्ठान और आयोजन होता है जिसे हंत्या घड्यळ कहते हैं। हंत्या घड़ेला अनुष्ठान  पूर्वज की भटकती आत्मा की शान्ति या अतृप्त आत्मा को यथोचित संतोष हेतु होता है । घडेला में जो लोक गीत गाये जाते हैं उन्हें जागर कहते हैं । घडेला का अर्थ है देवता को नचाना । जागरी डमरू और थाली बजाने के साथ जागर (धार्मिक लोक गीत ) गाते हैं और एक या कई मनुषों के शरीर पर मृतक की आत्मा घुस आती है और वह (पश्वा ) नाचता है
इन जागरों में जागर किसी ख़ास पौराणिक व्यक्ति जैसे अभिमन्यु मरण जैसी लोक गाथाओं के गायन , संगीत व नृत्य होते हैं होता है ।
मृत पूर्वजों की आत्मा शान्ति हेतु   लोक गीत रणभुत भी होते हैं जैसे कि राजस्थानी मे पाबू गीत पूजा होती है । रणभुत लोक गीतों  में क्षेत्रीय वीर पुरषों का गान होता है जैसे जीतू बगड्वाल जागर या रणरौत अथवा कैंतुरा जागर  आदि ।


   रवाईं में हंत्या  जागर -भाग

मामी तेरी छुटी पड़ी चाखोल्युं की टोल।
तेरो होलो केसों मामी इजा को पराण।
तेरो होलो केसों मामी इजा को पराण।
त्वेको आयो पड़ी मामी काल सी ओ बाण।
काल सी छिपदो मामी रीट दो सी ओ बाण।
सोची होलो मामी तै हरस देखऊं।
यख मं बैठी रो तेरो बांको माणिस।
के कालन डालि मामी जोड़ी मां बिछाऊँ।
भैर  भीतर मामी देखी ज तू अ क्वैक।
देखी भाळी जाई मामी आपड़ो बागीचा।

इस लोक गीत में एक औरत की अकाल मृत्यु  हुयी है और उस  मृतक आत्मा की शांति हेतु घड़ेला रखा जाता है । जागरी मृतक के बारे में हृदय विदारक  गाथा इस प्रकार सुनाता है -
हे प्रिय (मामी -प्रिय सूचक शब्द ) ! पक्षियों का झुण्ड अब तेरे से छूट  गया है । हे प्रिय ! तेरा माँ का ममत्व युक्त प्राण कैसा होगा  । तेरे लिए वह काल बाण कैसे आया  । यह काल छिपकर और घूम घूम कर कैसे आया होगा  । यह काल तुझे ढूंढता रहा  । तूने सोचा होगा मै अपने परिवार में सबका हर्ष देखूंगी  । यहाँ तेरा सुन्दर पति बैठा है  । किस काल ने तेरी जोड़ी में बिछोह डाला  । हे प्रिय ! तू बाहर भीतर सुदर तरह से सब जगह देख जा और भाव से अपने बगीचे (परिवार ) को देख जा  ।
इस तरह हम पाते हैं कि राजस्थानी , गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में पूर्वजों की पूजा के कई प्रकार के गीत हैं। कुछ गीत पौराणिक हैं , कुछ गीत लोक इतिहास पर आधारित है,कुछ गीत स्थानीय वीरों-नायक -नायिकाओं जो  देव तुल्य हो गये हैं या लोक देव बन गए हैं पर आधारित है और कुछ गीत अत्यंत स्थानीय  होते हैं। अतृप्त परियों आदि के गीत भी पूर्वज गीतों में आ जाते हैं ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 19/8/2013


सन्दर्भ

डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली
डा शिवा नन्द नौटियाल , 1981 ,गढवाली लोकनृत्य -गीत , हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग
मोहन लाल व्यास 'शास्त्री '  (सम्पादन ) राजस्थानी लोक गीत
डा जगदीश नौडियाल उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर

Bhishma Kukreti

                                                  तेरा हजार की मौज अर तेरा सौ कु फटका

                                                    चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती

                             सि महेन्दर जब बि गाँ या कखि जात्रा मा जावो त  नि बि ह्वावू त साल भर तक अपण जात्रौ समळौण सब्युं तैं सुणाणु  रौंद । अर अपण जात्रा दगड़  विज्ञापनों जन एक स्लोगन या एक नारा चिपटांद नि बिसरद । जन कि गढ़वाळम   कूड़ि -पुंगड़ी उजड़ी गेन , गूणी -बांदर दिन मा गीत लगांदन अर सुंगर रात हंत्या जागर  सुणांदन या गढ़वाळ जाण ह्वावों तो शिमला -मनाली दिखणि चयेंद जना शब्द ।
         याने महेन्दर जब मुंबई से उत्तरी भारतै  की सैर सपाटा कु जावो तो हम तैं साल भर तलक एक स्लोगन सुणण ही पोड़द  ।
              अबैं दै महेन्दर ड़्यार क्या ग्यायि कि दगड़म एक कनफणि सि आण -पखाण बणैक लायि । अब हमन साल भर तलक यो इ आण -पखाण बार -बार सुणण । अबै दै महेन्दर को बुलण च बल ' तेरा हजार की मौज अर तेरा सौ कु फटका' क्या हूंद मि जाणदु !

                                                           किस्सा -ए - तेरा हजार की मौज
     
                     यां अब सि बुबाजीक पैलि बरखी  छे त बुबा बोलिक ड्यार जाणि पोड़ । अब इथगा दूर जाण ह्वावो त रिश्तेदारी निभाणि पोड़द  । अब म्यार सबि स्याळ -सडु भाई ड्यारा डूण रौंदन त  गाँ मा द्वी दिन से जादा रौण बेवकूफी अलावा कुछ नी च । त मि ड्याराडूणम छौ त सबि स्याळि अर सडु भायुंन एक दै क्या ब्वाल कि बुबाक बरखी से फारिक हूणै पार्टी हूण चयेंद । उंकी बात बि सै च अब साल भर की बरजात टुटणम झ्सका -फ़स्का -पार्टी -सार्टी हूणि चयेंद।   मीन सब्युं तै पार्टी दे । हम सौब मसूरी गेवां अर उख होटलम खूब मौज मस्ती कार । तेरा हजार मा इथगा मौज मस्ती कार कि मेरि सबि स्याळि बुलणा छा कि इथगा मटन -मच्छी ऊंन कबि नि खायि अर सबि सडु भायुंक बुलण छौ बल इथगा दारु वूंन यीं जिंदगी मा नि पे ।
   
                     पार्टी मा  स्याऴ-स्याऴयूं अर  सडु भाइयुंक मौज मस्ती से गाँ मा लग्युं  तेरा सौ रूप्या फटका तैं बि बिसरि ग्यों । मेरी वाइफ़ त ये तेरा सौ रुपया फटका तैं भुलण इ नि चांदी अर बुलणि रौंद कि - वा अपण बुबा की बेटी नी च जब तलक वा अपण द्यूराण -जिठाण से  तेरा सौ रूप्या नि उगालि । यू तेरा सौ रूप्या हमर जिकुड़ि पर इन करकणु च जन बुल्यां छै इंचौ  खुब्या पुड्युं ह्वावो । 

                                             अफ़साना -ए -तेरा सौ रूप्या फटका
                                   
               अरे साबि जाणदन कि भाइ बांट क्या हूंद । भायुं बीच पाई-पाई अर रति-रति क हिसाब करे जांद पण अबै दै म्यार भयुंन  धोका दे द्यायि ।
  अरे मि तै पता हूंद बल म्यार तेरा सौ रूप्या डूबि जाला त मि कबि कबि कीसा उंद हात नि घऴदू ! ह्वाइ क्या च हम सबि भायुंन बुबाजीक बरखि कुण पैलि हिसाब लगाई आल छौ अर सब्युंन अपण अपण हिस्सा को नौ हजार एक सौ तिरासी रूप्या अर उनतालीस पैसा गां मा रौण वाळ भाइकुण भेजि आल छौ । अर फिर हम तैं बरखि  मा कुछ नि करण छौ बस मेमान जन शामिल हूण छौ । पण ऐन बरखि सूबेर पता चौल कि बामणु अर बैण भणजुं  बान एकै साफा अर एकै गिलास लाण त बिसरि गेंवां । अर ना हि यांक बान पैसा कट्ठा करे गे छौ । अब जगता सगती मा मि तै बजार जाण पोड़ अर ठीक सतरा सौ अड़तालीस रूप्या मा साफा अर गिलास लाण पोड़़ेन अर ये हिसाब से म्यार भायुं तैं मि तैं तेरा सौ रूप्या दीण छौ । बरखि स्याम तलक सही  हिसाबन निपडि गे । फिर रात जब मीन सब्युं से तेरा सौ रूप्या मांगीं तो सबि इना उनाक बात करण बिसे गेन । सबि बुलणा रैन बल सुबेर दे द्योला -सुबेर दे द्योला ।
सुबेर मी तैं ड्याराड़ूण आण छौ अर म्यार बुलण पर बि कैन बि पैसा नि देन ।
              में से जादा मेरि वाइफ़ तै बुरु लगणु च बल खां -मा -खां तेरा सौ रुपया फटका लगी गे ।

Copyright@ Bhishma Kukreti 20 /8/2013






[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]   

Bhishma Kukreti

Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 121

    Medieval   Asian History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath (Uttarakhand, India) - 2
          (Asian Medieval History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))
                          (Asian Medieval History (740-1200 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

Lack of History Records about Katyuri Imperialism of Baidyanath/Baijnath (Asian Medieval History)

                 Around 1000AD, Narsinghdev Katyuri shifted his capital from Karikeyapur to Baijnath/Baidyanath. Ashokchall captured Katyuri kingdom in 1191AD. The Katyuri kings tried to become free at end of Asokchall kingdom but Krachaldev defused the attack of Katyuri. However, after some years the Katyuris got some territories back.
There are no sound history records available for Katyuri of Baijnath/Baidyanath. The details of Katyuri kings of different principalities were recorded at later stages of Baijnath Katyuri Kingdom.
The folklores and available records suggest the Katyuri kings data.

                            Narsinghdev Katyuri king of Asian medieval Period


   The last Katyuri king of Kartikeyapur Narsinghdev shifted his capital from Kartikeyapur to Baidyanath/Baijnath (Kumaon). Most probably, Narsinghdev provided the name for new capital as Baidyanath/Baijnath Kartikeyapur.  The capital is at Gomati River bank, near to Almora and the roads from Someshwar, Bageshwar and Nand Prayag meet here.
  Okley and Gairola suggest that Narsinghdev used the materials from Karvipur for his capital building. Karvipur is supposed to be capital of Paurav kingdom.
  The Katyuri king of Kartikeyapur shifted the capital for a few reasons. However, the seasonal was different here from Joshimath.
         After shifting the capital from Joshimath to Baijnath, the rule over Garhwal became loosened. 
  Rahul suggests 9though less of logic base) that the Tibet king Yeshe-od of Shung-Shung captured parts of Joshimath region but Dr Dabral disagrees at all.
There is less record available for history features about Baijnath Katyuri king Narsinghdev.

Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 20/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -122
Asian Medieval History of Baijnath/Baidyanath Katyuri to be continued...
  (Oriental Medieval History (740-1200 AD to be continued...)
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Notes on Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Pithoragarh Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Askot Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Doti Nepal; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Sui or Kali Kumaon, Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Barahmandal Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Baijnath Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Dwarhat Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Lakhanpur Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Almora Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Nainital Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Udham Singh Nagar Kumaon; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Garhwal ; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Haridwar ; Asian Medieval History Features of King Narsinghdev Katyuri Kingdom in Dehradun;