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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ---2
                         उत्तर प्रस्तर संस्कृति में मानव जीवन में क्रान्ति
                       

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


  ऊत्तर प्रस्तर युग में कृषि विकास के साथ मैदानों में स्थायी व्स्तियाँ बसने लगे  का विकास ने खेती को बढ़ावा दिया । नदी घाटियों में गाँव और नगर बसने लगे । किन्तु पहाड़ों में जहां पशु चारण  और कृषि का अन्वेषण हुआ वहां पहाड़ी निवासी चरागाहों , पशु पालन और ढलानों में कटील खेतों से चिपके रहे (डबराल , उ, का -इतिहास २ ) ।
नदी-घाटियों  के निवासियों ने लकड़ी , घास, आखेट हेतु पहाड़  निवासियों पर हमला करना शुरू किया और  प्रस्तर उपकरण युग से कलहों और युद्ध का जन्म हुआ ।
जहां वनों के कटान से मैदानी हिस्सों में खेती अधिक विकसित हुयी वहीं पहाड़ों में चिरकाल तक वनों पर   रहा और आज भी बगैर वनों के पहाड़ी जीवन की कल्पना नही की जा सकती है ।
मांस , मच्छली , और कंद मूल के साथ दूध मक्का , जौ धान की खेती भी इसी युग की देन  है
इतिहास कार डा डबराल व डा नौटियाल का कथन है कि अभीष्ट  अवशेषों के न मिलने से उत्तराखंड में कृषि इतिहास खोजने में दिक्कत आती हैं ।
ऐसा मना जाता है कि झेलम से यमुना हिमालय घाटी तक कोल मुंड की मूल जाती आ बसी थी और कोल मुंड मूल समाज ने हिमालय में उत्तर पत्थर  उपकरणों का विकास भी किया और प्रसार भी किया ।

   
                                उत्तराखंड में ताम्र उपकरण संस्कृति व कृषि -भोजन (3500-2500BC)

                 उपकरण स्वमेव ही कृषि विकास का इतिहास भी बताते हैं ।  बहादराबाद हरिद्वार में ताम्र उपकरण स्स्न्कृति के औजार मिले हैं जैसे फरुशा , भाले , बरछे , छल्ले आदि और गढ़वाल में हरिद्वार से 70 मील दूर धनपुर, डोबरी , पोखरी और कुमाऊं में गंगोली , सीरा  अदि जगहों में ताम्बे की खाने होने से सिद्ध होता है कि पहाड़ों में ताम्बा बनाने व औजार /हथियार बने होंगे ।
औजार याने कृषि में विकास या युद्ध विकास और फिर अंदाजा लगा जाता है कि किस तरह कृषि में विकास हुआ होगा ।
डा नौटियाल गढ़वाल -कुमाऊं में Pale -red -grey ware संस्कृति पाए जाने और जंगली बैलों , पालतू सुअर और पालतू घोड़ों के अवशेष मिलने से यह पता लगता है कि कई जानवरों का पालतू करण हो चुका होगा। इस युग में उत्तराखंड में भी अन्न भंडारीकरण , कृषि उपकरण में सुधार से कृषि को नई शक्ति मिली होगी ।
शायद इस युग या इससे पहले के युग में पत्थर का पयाळु (पथर की गहरी थाली )  व लकड़ी के वर्तन अधिक बने होंगे ।
मौर्य और गुप्त काल में उत्तराखंड से घोड़े निर्यात होते थे जिससे पता चलता है कि घोड़ो की नस्ल के बारे में मनुष्य समझने लगा होगा ।
पेड़ों से औषधि का ज्ञान भी इसी युग में अधिक हुआ होगा
मोहनजो दाडो सभ्यता हरियाणा -सहारनपुर में विकसित हो चुकी तो इस सभ्यता के कई उपकरण व कृषि विज्ञानं ज्ञान हिमालय में भी पंहुचा ही होगा ।


शेष  -- उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास भाग ... 3  में
Copyright @ Bhishma  Kukreti  23/8 /2013

Reference-

Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170


( उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )   

Bhishma Kukreti

 गढ़वाली-कुमाउंनी  व राजस्थानी धार्मिक लोकगीतों और संस्कृति पर इस्लामी धर्म प्रभाव

                       राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग-7 


                                           भीष्म कुकरेती


                   भारत बहुदेव पूजक देस है । भारत में मुसलमान संतों  विभिन्न तरह से भी करता है और  परिचय धार्मिक लोक गीतों में मिलता है ।

                                  राजस्थानी धार्मिक लोकगीतों और संस्कृति पर इस्लामी धर्म प्रभाव


राजस्थानी समाज ने भी अन्य   तरह विदेसी आकारंताओं , शासकों की सभ्यता , संस्कृति , दार्शनिकता और आध्यात्म को अपने में समाया ।  का निम्न पीर जी के  श्रद्धायुक्त , भक्ति भावना भरा से सरोवर लोक गीत इस बात का उदाहरण है कि हिन्दू  धर्म  निरप्रेक्ष धर्म है और इस धर्म में पर्याप्त लचीलापन है -
पांचू हीरां का हाथ में गुलाब की छड़ी ।
पीरां दो न रुजगार मूं तो काल की खड़ी ।।
सातूं  पीरां हाथ में गुलाब की छड़ी ।
पीरां दो न रुजगार बंदी रात की खड़ी ।।
इस राजस्थानी लोग गीत में  पीर बाबा के लक्षण के अलावा उनसे -सुख समृद्धि की प्रार्थना की गयी है  ।
                       गढ़वाली-कुमाउंनी धार्मिक लोकगीतों और संस्कृति पर इस्लामी धर्म प्रभाव

   यद्यपि   का कुछ भाग छोड़ कर गढ़वाल और कुमाऊं पर मुसलमानी बादशाहों का राज किन्तु इस्लामी सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव गढ़वाली -कुमाउंनी समाज व संस्कृति पर पड़ा ।
निम्न सैद लोक गीत इस बात का प्रतीक है कि हिंदू धर्म कई  संस्कृतियों  का महासागर है ।
गढ़वाल कुमाऊं में मुसलमान पीरों या सैयदों को भुत के रूप में पूजा जाता है और  तम्बाकू भेंट दिया जाता है ।  प्रकार के सैयद गीत गढ़वाल -कुमाउंनी में प्रचलित हैं । एक सैद्वाळी लोक गीत की झांकी इस प्रकार है । यह एक  गीत है जिसे मुख्या जागरी गाता है व साथ में  जागरी भौण पूजते हैं । डमरू और थाली के संगीत में सैयद पश्वा  (जिस पर सैयद अत है ) नाचता है ।
                       सैद्वाळी लोक गीत

मुख्य गायक ----------------------------------------------सहयोगी गायक

सल्लाम  वाले कुम -------------------------------------------सल्लाम वाले कुम
त्यारा वै गौड़ गाजिना ---------------------------------------सल्लाम वाले कुम
म्यारा मिंयाँ रतनागाजी ------------------------------------सल्लाम वाले कुम
तेरी वो बीबी फातिमा ----------------------------------------सल्लाम वाले कुम
तेरो वो कलमा कुरान ---------------------------------------सल्लाम वाले कुम ।
नर्तन व गीत समाप्ति के बाद जागरी या झाड़खंडी उस आत्मा से कहता है कि तुम्हारे  तुम्हारी पूजा दी गयी है , तुम्हारी इच्छानुसार भोजन व तंबाकू दिया गया है अत:  से बाहर चले जावो ।
इस तरह कहा जा सकता है की राजस्थानी , गढ़वाली -कुमाउंनी समाज पर मुसलमानी संस्कृति का पर्याप्त प्रभाव पड़ा जो कि लोक गीतों में भी उभर कर आया है ।




Copyright@ Bhishma  Kukreti 23/8/2013



सन्दर्भ

डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली
डा।  शिवा नन्द नौटियाल , 1981 , गढ़वाली लोकनृत्य-गीत
केशव अनुरागी , नाद नन्दिनी (अप्रकाशित )

Bhishma Kukreti

                      सन्  2113 मा हिंवल-गंगा संगम फूल चट्टी मा अग्यौ अर उपद्रव

                                   चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती           

         
              सन्  2114  सालम  भारतम आम चुनाव होला त इंडिया की हरेक स्ट्रीट 2113 में गृह युद्ध मैदान बणि जालो । चूंकि आन्दोलनकारी , आन्दोलन विरोधी अर आम जनता तैं अयोध्या मुद्दा से बिखळाण पोड़ि जाल तो राजनैतिक लोग  धर्म का नाम पर नया नया जगौं पर   धार्मिक विवाद खड़ा करि द्याला अर इनि एक निसुऴजण्या विवाद फूल चट्टी मा पैदा खड़ा कर दिए जालु । उन त बकै समय पर कुत्ता बि फूलचट्टी  तैं पुछणो नि आंदो पण जनि चुनाव नजीक आंदन हरेक रानीतिक दल पूंछ उठैक फूलचट्टी  तैं गृह  युद्ध का मैदान बणै दींदन। अब फूलचट्टी  भारत का राजनैतिक दलों कारण इथगा  प्रसिद्ध   ह्वे ग्यायि कि अमेरिका , अफ्रीका का पाठ्यपुस्तकों मा बि फूलचट्टी  विषय 'फूलचट्टी  एक आधुनिक युद्ध स्थल ' नाम से पढ़ाये जांद अब यूँ देसूं मा कुरुक्षेत्र का बारा मा नि पढ़ाये जांद किलैकि हिन्दुस्तान की साख गिराणो बान फूलचट्टी  जि ऐ गे ।

              अब जन कि सन् 2114 चुनावों साल होलु  त अवश्य ही 2113 उपद्रवों साल होलु । हमेशा की तरह अब फूलचट्टी  मा बि युद्ध का डंका बजि गेन । इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन तैं याद आयि कि अबि बि फूलचट्टी  को विवाद तो सुऴजि नी च तो यीं संस्थान फूलचट्टीम बिखोती समौ पर जो फूलचट्टी  मादेव की परिक्रमा होंदी छे वीं परिक्रमा तैं सरादुं  बगत करणों निर्णय ल्यायि अर राज्य सरकार तैं बतै द्यायि कि हमन सरादुं टैम पर फूलपुर मादेव की परिक्रमा करण अर इन बि बथाइ बल या परिक्रमा हिंवल उद्गम स्थान चैलुसैण से  पौखाल, बगुड्या, गड़बड़ेथ, कटघर ह्वेक फूलचट्टी  पौंछलि  । उत्तराखंड मा समाजवादी पार्टी को राज च त मुख्य मंत्री विनोद बडथ्वाल  इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन की परिक्रमा से बितकि गेन । बडथ्वालन घोषणा कार कि ईं परिक्रमा से उत्तराखंड का त ना पण हौर प्रदेश का मुसलमान भड़की जाल तो सरकार यीं परिक्रमा तै नि होण देलि ।
  सरा दुन्या का हिन्दू परेशान छन  कि फूलचट्टी  मा सरादुं मा क्यांक परिक्रमा ? अर हिन्दुस्तान का मुसलमान परेशान कि कैन ब्वाल कि हिन्दुस्तान का मुसलमान फूलचट्टी  मादेव की परिक्रमा से भड़की जाल ? मुसलमानों नेताओंन बयांन  बि देन कि पौड़ी गढ़वाल की ढांगू -उदयपुर , अजमेर , डबराल स्यूं , लंगूर पट्टीयूं  मा क्वी बि मुसलमान नि रौंद त हिन्दू लोग जु चावन सि कारन । पण समाजवादी पार्टी का विनोद बडथ्वाल तैं धार्मिक विवाद बढ़णो खतरा लग तो ऊंन सबि इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन का नेताओं तैं जेलम बंद करि दे   अर अब वास्तव मा माहौल तनावपूर्ण ह्वे ग्यायि । इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन का नेता त चांदा हि इ छा कि समाजवादी पार्टी की सरकार वूंकी परिक्रमा रोकन अर समाजवादी पार्टी बि चांदी छे कि इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन परिक्रमा अर फूलचट्टी  की बात उठावन जां से समाजवादी पार्टी मुसलमानों खैरख्वाव पार्टी माने जावो । सब तैं पता च अब ऐ साल फूल चट्टी का नाम पर बहुत सा जगा धर्म का नाम पर अग्यौ अर उपद्रव जरूर होला ।
       पण ढांगु -उदयपुर का लोग आहत  छन कि वूंकी ज्वा  समस्या च वा तो पिछला पचास  साल से जख्या -क तखी च ।  असल मा जब बिटेन मोटर सड़क बणिन त  ढांगू -उदयपुर , अजमीर  , डबरालस्यूं , लंगूर पट्टीयूं  लोग अपण मुर्दा जळाणो फूलचट्टी आण बिसे गेन । पण फूलचट्टीम हमेशा से लखडु कमी रौंद त लोगुंन निर्णय ले कि इलेक्ट्रिक चिता दहन कक्ष बणये जावो । यूं पट्टीयूं  लोगुंन अपण गेडिन रूप्या देकि इलेक्ट्रिक चिता दहन कक्ष की पौ (आधार ) खोदि दे । यांकि  खबर इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन अजमीर पट्टी  शाखा प्रभारी ऋषि कंडवाल तैं लग तो ऊँन घोषणा करी दे कि एलेइक्ट्रिक  दहन कक्ष याने हिन्दू धर्म को नाश ! अयोध्या आन्दोलन अब चलदो नि  छौ अर कृष्ण जन्म भूमि या बाबा विश्वनाथ मंदिर आन्दोलन मा कबि बि गर्मी नि आयि तो इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन निराश बैठ्या छा ।  ये ऑर्गेनाइजेशन तैं फूल चट्टी माँ संभावना नजर आयि अर वूंन घोषणा कौरि दे कि वो औंसी रात इलेक्ट्रिक चिता दहन कक्ष की पौ (आधार ) तै ध्वस्त कौरि देला अर वै बगता मुख्य मंत्री सचिदा नन्द बडथ्वाल (विनोद  बडथ्वाल का बुबा जी ) न घोषणा करी दे कि इलेक्ट्रिक चिता दहन कक्ष की पौ (आधार ) तै ध्वस्त करणों अर्थ च कि अल्प संख्यकों की धार्मिक भावना को ठेस ! अर सचिदा नन्द बडथ्वाल की सरकारन इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन का आन्दोलन कार्युं पर गोली चलवाइ दे । बस हिन्दू अर अल्प संख्यक समाज का मध्य तनाव पैदा ह्वे ग्यायि । तनाव न अंतर्राष्ट्रीय रूप ले ल्यायि अर पाकिस्तान का चार हिंदू परिवार पकिस्तान छोड़ि भारत ऐ गेन । अब फूल चट्टी राजनैतिक अर धार्मिक अखाड़ा बौणि गे ।

            जब बि आम चुनाव नजीक आंद इन्टरनशनल हिन्दू ओर्गेनाइजेसन फूल चट्टी मा कुछ ना कुछ आन्दोलन करद अर  विरोध मा इन्टरनशनल अल्प संख्यक ओर्गेनाइजेसन हैदराबाद , अलीगढ आदि जगा सरकारी बस फुकण मिसे जांदन ।
        बाइसवीं सदी मा असंख्य बदलाव ऐ गेन पण स्वार्थी राजनैतिक अर धार्मिक नेताओं को कुचक्र , कुचाल, कागरी (हीन ) रस्ता , कुराही , कुजंत्र , कुचर्या , नि बदल अर जनता यूँका जाळ मा फंसणि रौंद ।

Copyright@ Bhishma Kukreti 24/8/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]   

Bhishma Kukreti

Oriental Middle Age History Characteristics of Katyuri King – Tribhuwan Pal Dev   

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 125

    Oriental Middle Age History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath (Uttarakhand, India) - 6
          (Oriental Middle Age History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))- (740-12500 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

                  Though, the major Katyuri Kingdom disintegrated after Vir Dev Katyuri, yet, other Katyuri families ruled over Doti Nepal, Askot, and other places as Manilashikhar. The Manral caste is definitely Katyuri caste.

       Katyuri King – Tribhuwan Pal Dev   and his Successors in Context Oriental Middle Age History
Tribhuvanpaldev donated land for Bageshwar temple 
   There was one rock inscription in Baidnath , Kumaon about  Tribhuvanpaldev. The Doti and Askot inscriptions provide the name as Trilokpal the successor of Brahmdev. Kumaon historians Ram Datt Tripathi and Badri Datt Pandey refer the name as Tribhuvanraj Dev.

              Family Tree of Tribhuvanpal Dev or Tribhuvanraj Dev

Dr. Dabral state the following kings were after Vri Dev Katyuri Tribhuvanpal Dev or Tribhuvanraj Dev
SN.---------King Name ------------------Base for Information ---------------------------App Date
1-----------Tribhuvanpaldev----------------Unpublished inscription ---------------------?
2----------?---------------------------------------Ram Dev Tirpathi -----------------------------?
3---------?---------------------------------------Ram Dev Tripathi  -------------------------------?
4------------Udaypaldev--------------------Unp. Inscriptions ------------------------------------- 1152
5------------ Anantpaldev------------------ Unp. Inscriptions-------------------------------------1181
6------------- Indradev ------------------------Unpb . Copper Inscription------------------------1202
7-------------- Vijaypaldev-----------------------Rahul, Kumaon ----------------------------------1214
8--------------Lakshmanpaldev  -------------------- Unp. Inscriptions --------------------------?
9--------------Ballaldev ------------------------------Krachaldev inscription ---------------------1223
It seems that son and grandson of Tribhuvanpaldev were weak rulers and the regional army chiefs would have captured the territory as kings.

Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 24/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -126
South Asian Middle Age History of Baijnath/Baidyanath Katyuri to be continued...
  (Oriental Middle Age History (740-1200 AD to be continued...)
Xx                 xxx                xxxx
Notes on History Characteristics of Katyuri King – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Pali Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Askot Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Dwarhat Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of  Katyuri King of Manshikhar Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King ofDoti Nepal – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age;  History Characteristics of Katyuri King of Palipachhaun Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Chaukat Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Sainmapur Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Almora Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Champawat Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Nainital Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age; History Characteristics of Katyuri King of Udham Singh Pur Kumaon – Tribhuwan Pal Dev in context Oriental Middle Age;     

Bhishma Kukreti

 उत्तराखंड में लौह संस्कृति में कृषि , कृषि  भोजन (1700 -300BC )


                                       उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ---3

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


             उत्तराखंड के पूर्वी भागों में महा समाधियाँ मिली हैं जो इंगित  कि लौह हथियार का प्रयोग लौह कल में शुरू हो गया याने  कि लौह उपकरण के कई उपयोग व कृषि विकसित ह रही थी ।
उत्तराखंड महाभारत युग में लौह उपकरणों का मुख्य निर्यातकर्ता था ।  निकलता है कि जंगली जौ , जंगली गहथ आदि की कृषि सुगम होने लगी थी ।
कोल जाती ने कृषि विकसित की हुई थी और कुदाल फावड़े से कृषि की शुरवात हो चुकी थी । इसके अतिरिक्त हल -लान्गुल जैसे उपकरण बना लिए थे ।
घास , फूस , मिटटी -पत्थर की झोपड़ियां बनने भी शुरू हो चुकी थी । और शायद इसी वक्त उत्तराखंड में छन्न संस्कृति की शुरुवात भी इसी काल में हो चुकी थी ।
भारत में बाण , लकुट , धनुष , बरछे , खुकरी, तलवार, घोड़े की लगाम , छेनी   उपलब्ध थे जो  लिए सुभीते वाले उपकरण थे । इसके अतिरिक्त कुल्हाड़ी , हंसिया (दाथी ), छेनी  भी विकसित हो चुकी थी ।

पहाड़ी ढालों  पर दीवाल (पगार ) चिनने के प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी और गद -गदन या नदियों के किनारे क्यारी बनाने की संस्कृति भी विकसित हो चुकी थी ।
जहां तक भारत का प्रश्न है उस समयज जौ , गेंहू , धान , जंगली भिन्डी , बाजरा, ज्वार, सरसों , दालें  मुख्य भोज्य पदार्थ थे अत : उत्तराखंड में गेंहू को छोड़ बाकी सभी खाद्य पदर्थ प्रयोग होते थे ।
इस तरह उत्तराखंड में जौ , जंगली भिन्डी , बाजरा, ज्वार, सरसों , दालें भोजन थे और गेंहू धान मैदानी भाग में रहे होंगे ।
अनाज का उपयोग आग में भूनकर अधिक होता रहा होगा ।
इस युग तक नीम्बू , केला, सेमल, कद्दू के खेती भी सीख चुका था ।
पक्षियों में कुक्कुट , मोर, हाथी , घोड़ों  , बैल , भैंसों को पालतू बनाना सीख चुका था ।
मछली  व शहद भोजन के अंग बन चुके थे ।
मृग , जंगली चकोर , गौरया आदि भी भोज्य पशु -पक्षी  थे ।
जंगल से औषधियों का ज्ञान भी यहाँ हो चुका था और विशेस्य्गाता हासिल कर चुके थे ।
बीसवीं सदी से पहले गढवाल -कुमाऊं में कई वनस्पतियों का उपयोग भोज्य पदार्थ रूप में होता था जो ब्रिटिश काल में समाप्त भी हो गया जैसे सेमल के कच्चे घोघाओं की सब्जी । ऐसी वनस्पतियों का उपयोग आग आने के बाद या धातु युग में शुरू हुआ

Reference-

Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)

Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India

Bhishma Kukreti

    गढ़वाली-कुमाउंनी  व राजस्थानी  लोकगीतों में ढोल /ढोलक विषय

              राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग-8   


                                           भीष्म कुकरेती


                   एशिया में ढोल , ढोलक लोक  संगीत का मुख्य अंग हैं । इसीलिए लोक  ढोल या ढोलक   विषयी गीत बहुतायत से मिलते हैं । यहाँ तक कि फिल्मों में भी ढोल /ढोल विषयी गीत मिलते हैं ।



                                  राजस्थानी  लोकगीतों में ढोलक विषय


   राजस्थानी लोक गीत तन और मन से सुन्दर नारी में सौन्दर्य की मधुर अभिव्यक्ति करने कला  प्रति स्वाभाविक आकर्षण का उक सुन्दर उदाहरण है । राजस्थानी लोक गीत इंगित करता है कि गीत , संगीत और नृत्य का मानसिक प्रवृति के साथ घनिष्ठ संबंध है। एक सौन्दर्य   उपासक नारी अपने प्रिय से ढोलक बजाने का  करती है । ढोलक  बजाने के आग्रह में स्वाभाविक समर्थन भरा है । नारी कहती है कि हे प्रिय तू ढोलक ढमका और मै  तरह के श्रृंगार कर साथ चलूंगी ।



थे ढोलक्ड़़ी ढमका दयो
मै वारी जाऊं सा। मै वारी जाऊं सा।
बलिहारी जाऊं सा । थे ढोलक्ड़़ी ढमका दयो
बादल म्हारो लंहगा जी , किरण है मारी मगजी ।
मै तारागण रा झुमकां झुमकती चलूंसा ।।थे ढोलक्ड़़ी ढमका दयो
चालूं तो कहियाँ चालूँ चंद्रमा म्हारे लारे,
मै कोयल कूक सुनाती चलूंसा । थे ढोलक्ड़़ी ढमका दयो
मैं  निर्मल पानी थे म्हारो छो किनारा
मैं कामणजारी नैनों मिलाती चलूंसा  ।।
थे ढोलक्ड़़ी ढमका दयो ,मै वारी जाऊं सा।



                       गढ़वाली   लोकगीतों में ढोल /ढोलक विषय


               
             कुमाऊं- गढ़वाल में संगीत वाद्य यंत्र बजाने वाले औजी /दास, हुडक्या   व बादी व्यावसायिक जाती के होते थे । दास या औजी ढोल -दमाऊ के विशेषज्ञ होते हैं , हुडक्या हुडकी व बादी ढोलक के ज्ञाता होते थे। ढोल धार्मिक अनुष्ठानो में एक आवश्यक वाद्य यंत्र है ।
निम्न गढ़वाली लोक गीत साक्षी है कि ढोल की थाप पर हिमालय थिरकता है ।

ढोल बाजी , त धिम्म त धिम्म ।
ढोल बाजी , त छन्न त छन्न ।
ढोल बाजी , त धम्म धम्म ।
ढोल बाजी , त थर्रा  त थर्रा ।
ढोल बाजी , त आजी बजै द्ये ।
ढोल बाजी , भलु प्यारु मान्यन ।
ढोल बाजी , म्येरा कान खुलीग्या ।
ढोल बाजी , म्यरा मन हरीग्यो ...... ....

-------अनुवाद ------
ढोल बजा,  त  घिम्मा त घिम्मा ।
ढोल बजा,  त छन्ना त छन्ना ।
ढोल बजा,  त  घिम्मा त घिम्मा ।
ढोल बजा,  त थर्रा त थर्रा ।
ढोल बजा,  त फिर बजा दे ।
ढोल बजा,  त अच्छा प्यारा प्रतीत होता ।
ढोल बजा,  त मेरे कान खुल गए ।
ढोल बजा,  त मेरे मन का हरण हो गया । ......


कुमाउंनी  लोकगीतों में ढोल /ढोलक विषय
इसी तरह एक कुमाउंनी लोक गीत भी ढोल के बारे में इस प्रकार कहता है -

बिजैसार ढोल क्या बाजो ,
यो घूम -घूमा ढोल क्या बाजो
ढोल की शबद जो सुन ,
खोली को गणेश जो नाचे
बिजौ सार ढोल क्या बाजो ,
अनुवाद --

बिजैसार ढोल क्या बजा
घूम घूमा ढोल क्या बजा
ढोल के शब्द सुनकर खोली का गणेश नाचा


संगीत में वाद्य यंत्र व उनकी धुनों का उपयोग और प्रभाव पर  राजस्थानी , गढवाली -कुमाउंनी क्षेत्रों में लोक गीत  हैं ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 24/8/2013


सन्दर्भ - लीलावती बंसल , 2007 , लोक गीत :पंजाबी , मारवाड़ी और हिंदी के त्यौहारों पर गाये जाने वाले लोक प्रिय गीत
डा नन्द किशोर हटवाल , 2009 उत्तराखंड हिमालय के चांचड़ी  गीत एवं नृत्य ,विनसर पब क. देहरादून
डा शेर सिंह पांगती , जोहार के स्वर

Bhishma Kukreti

साहित्यकारुं कलम की  आग कख झौड़ धौं !

                                     चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती


         
                            सबि भारतीय असमंजसम छन , दुविधा मा  भैर -भितर कारण खुजणा  छन , क्वी अफु तैं इ टटोळणा छन,  संदेह मा इना उना हजारों लोगुं तैं पुच्छणा छन ,  संशय मा रौंका धौंकी करणा छन, भौत सा सोची -सोचिक सुन्नताल मा बा काटणा छन -गोता लगाणा छन । फिर बि ये प्रश्नौ जबाब दुरत्यय (निजबाबी) ह्वे ग्यायि बल भारतम साहित्यकारों कलमै आग ठंडी किलै ह्वै, कवियों फ़ौज लाखों मा च पण कैक  बि  कविताम आग नि दिख्याणि च अर जु बुलणा बि छन कि उंकी कविता मा आग च त वा आग नौणि-घ्यू नि जळै  सकणि च वा आग बखरूं तैं क्या भड़्याली ? वीं आगै तैंची -तपन-गरमी  भारतबास्युं बरफन  ढक्यूँ   जिकुड़-ह्रदय  क्या गरम कारलि ? कथगा ही लोगुं मानण च बल बल फलणा लेखनी बरछा , भाला तलवार च , खुंकरीक नोक जन नोकीली च । ठीक च पण ज्वा कलम कांड गाडणम हि खुंडे जावो वा कलम भारतवास्युं तैं क्या घचकालि ? तथगा विचारक  बुल्दन बल तैकि कलम मा न्यूक्लियर बम भर्युं च पण खारु  इन जम्युं च बल ज्वा कलम पटाखा आवाज नि दबै साकलि वा कलम भारतवास्युं  कुम्भकरणी निंद क्या बिजाळली !

                  अजकाल भारतं प्रजातंत्र का नाम पर जु बेराजि  हुयुं च , प्रजा तन्त्र का नाम पर भारतीय उद्यम पर बड्रा जन बिचौलियों कब्जा हुयूं च , सी बी आई  प्रजा तन्त्र का नाम पर कोयला खदान आबंटन की काळी -गोरी -लाल-हरी फाइल हरचणि छन । कॉमन  वेल्थ खेलुं नाम पर रिशवतखोरि चौपड़ खिल्याणि छन । कोलेसन सरकार  की मजबूर्युं नाम पर टू जी घोटाला तै सही ठहरै जांद।  विरोध का नाम पर संसद हि नि चलण दिए जांद । रिफार्म  का नाम पर धरती फ़ोकट मा धनियों तैं दिए जांद । रिफौर्म करद दै  भारतीय भूगोल , इतिहास अर संस्कृति को क्वी ख्याल नि रखे जांद कि रिफौर्म से फैदा ह्वावो । इन स्थिति मा  आज भारत तैं एक कलम चयाणि च , एक आवाज चयाणि च ।
            भारत मा समौ समौ पर कलमी आवाज ह्वेन जौन भारत मा भारतीयों को मन ही बदल द्यायि अर सामजिक -सांस्कृतिक क्रान्ति लैन ।
          दूर क्या जाणै जरा गोस्वामी तुलसी दास तैं हि देखि ल्यावो । तुलसीदास की सबि रामचरित मानस का बान याद करदन पण तुलसीदास को क्रांतिकारी साहित्य रामचरित मानस नि छौ. राम चरित्र तो महाभारत का बगत से ही भारतम प्रचलित छौ तो राम चरित मानस क्रांति कारी साहित्य ह्वेइ नि सकेंद । बलकणम तुलसिदासौ क्रांतिकारी साहित्य 'हनुमान चालीसा ' ही छे  (यद्यपि हनुमान का बारा मा माधवा चार्यन बि लेखी छौ ) । आज अवधि मा लिखीं 'हनुमान चालीसा ' ही हरेक भारितीय भाषाओं मा ही पढ़े जांद ।  तमिल -तेलगू की हनुमान चालीसा वास्तव मा अवधी हनुमान चालीसा ही च । तुलसी दासक  हनुमान चालीसा से पैल हनुमान का अकेला  मन्दिर भारत मा तकरीबन नि छ पण 'हनुमान चालीसा '  भारत मा एक सांस्कृतिक क्रांति लायी अर भारतं हनुमान मन्दिरों स्थापना शुरू ह्वाइ । तबि त हनुमान मन्दिरों पर इस्लामी स्थाप्य कला को भरपूर प्रभाव च (एक उदहारण -गोल गुम्बद ) । हनुमान चालीसा अफिक भारत का प्रत्येक हिस्सा मा प्रसिद्ध ह्वाइ ।
                पण अब भारतम भारत लैक कलम जनम नि लीणा छन । जब कि आज भारतम एक क्रांतिकारी कलम की जरूरत च तख पलायनवादी साहित्य , तिकड़मी साहित्य ही जादा रच्याणु च । चाहे सवर्ण  या चाहे दलित साहित्यकारुं साहित्य ह्वावो यदि भ्रष्ट समाज या नीति विरोध को साहित्य लिख्याणु बि च तो वो केवल विरोध तैं उद्येश्य से लिख्याणु च अर जब विरोध उद्येश्य ह्वावो तो विरोध ही पैदा होलु । आज समाज लैक साहित्य गुम  ह्वे ग्यायी तभी तो साहित्यकारों साहित्य क्वी मन्दिर नि बणवै सकणु च जन हनुमान चालिसान भारत मा हनुमान मन्दिर बणाणो शक्ति लायि छौ । आज साहित्यकार अपण विचारूं  बान लड़णु च अर समाज को बान नी लड़णु च । आज का साहित्यकारूं कुण अपण विचार महत्वपूर्ण ह्वे गेन अर समाज गौण तो समाज साहित्य से मनोरंजन जरुर प्राप्त करणु च , मजा जरुर लीणु च पण समाज भारत की तकदीर बदलणों बान खड़ो नि होणु च किलैकि जो साहित्य वो बंचणु च , पढ़णु च वो क्वी ख़ास विचार पढ़णु च जखमा विचार समाज पर भारी पड़णु च, जखमा विचार महत्वपूर्ण च अर समाज पैथर च। इन परिस्थिति मा साहित्यकारों साहित्य से सम्पूर्ण क्रांति -बदलाव की संभावना छैंइ नी च ।
'समाज सर्वोपरी'च दिखणाइ त हनुमान चालीसा बांचो अर तुम पैल्या कि इखमा समाज को भय दूर करणै बात महत्वपूर्ण च ना की हनुमान तै दिवता बणाणो विचारधारा । जब कि आज का साहित्यकार अपण विचारधरा तैं पैल दिवता बणाण चाणु च अर समाज की भलाई वांक बाद । अरे समाज तैं अग्वाड़ि लैल्या त तुमर विचार अफिक दिवता बणि जाला ।
  साहित्यकारों का बीच लड़ाई यांक नी च कि समाज  मा बदलाव  लाये जावो बलकणम लडै यांक च कि कैका  विचार क्रांतिकारी छन। साहित्यकारों बीच अपण विचारों तैं दिवता बणाणो झगड़ा चलणु च, प्रतियोगिता चलणि च । धार्मिक साहित्यकार त विचारूं गुलाम इन छन कि क्या बुल हिंदु धार्मिक साहित्यकार बद्रीनाथ इलाका का बुगुल-कुणज समोदरा छल पर उगाणो बात करद अर मुसलमान धार्मिक साहित्यकार बद्रीनाथ इलाका मा रोज तुड़णो बान बद्रीनाथ इलाका मा खजूर वृक्षारोपण करणु च । साहित्य मा केवल अपण विचार महत्वपूर्ण ह्वे गै अर समाज धरातल तौळ दबाये जाणु च ।
अर इनमा अपण विचारों का प्रति लगाव से ही कलम कुंद ह्वे गेन । अपण विचार ही सर्वोपरी की भावना से लेखनी परमाणु बम नि बणना छन । केवल म्यार विचार ही दुन्या बदल सकदी का विचार ही परिवर्तन गामी कलम पैदा नि होण दीणि च ।


Copyright@ Bhishma Kukreti 25/8/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...] 

Bhishma Kukreti

Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 126

    Himalayan Middle Age History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath (Uttarakhand, India) - 7
          (Himalayan Middle Age History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))- (740-1250 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

                 There are no folk sayings or records available for son and grandson of Tribhuvanpal Katyuri king. However, inscription provides name of Uday Pal the great grandson of Tribhuvanpal Katyuri.  Rahul Sankritayan guessed crowning of Uday Pal Katyuri in 1152 AD.
                The two important historical events are very crucial in the period of Uday Pal Katyuri rule. The first important event is a person named as Jaytung Singh becoming King of Kumau (Kumaon) and visit by Madhvacharya in Uttarakhand. Jaytung Singh was the first Kumaoni king whose last name ends by Singh. The kingdom of Jaytung Singh was new dynasty in Kumaon. The rock inscription provides the knowledge of three kings of Jaytung Singh dynasty.




Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 24/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -127
Himalayan Middle Age History of Baijnath/Baidyanath Katyuri to be continued...
  (Himalayan Middle Age History (740-1200 AD to be continued...)
Xx                 xxx                xxxx
Notes on Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Askot Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Johri Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Pithoragarh Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Dwarhat Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Bageshwar Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Champawat Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Almora Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Nainital Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Udham Singh Nagar Kumaon; Himalayan Middle Age History Characteristics of Katyuri King –Uday Pal of Kumaon   

Bhishma Kukreti

गढ़वाली-कुमाउंनी  व राजस्थानी  लोकगीतों में  नारियों का आभूषण -वस्त्र आकर्षण   

                                    राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग-9   


                                           भीष्म कुकरेती

   सौन्दर्य नारी का प्रदत्त गुण है । सुंदर नारी में सौन्दर्य  प्रति सजकता एक स्वाभाविक गुण है । सौन्दर्य  वाले साधन आभूषण व वस्त्र प्रति आकर्षण लाजमी है । यही कारण है कि गढ़वाली -कुमाउंनी और राजस्थानी लोक गीतों में सौन्दर्य प्रसाधन माध्यमों  की मांग के गीत मिलते हैं । आभूषण  अपने व दुसरे के मन मोहित करते हैं । आभूषणो को अंग-भाग  ही मान कर चला जाता है अत: लोक में आभूषणो के प्रति आकर्षण  गीत स्वाभाविक हैं ।

                                          राजस्थानी  लोकगीतों में  नारियों का आभूषण -वस्त्र आकर्षण       

निम्न रास्थानी लोक गीत में पति से एक नवविवाहिता सौन्दर्य साधनों की मांग करती है और बदले में समपर्ण देने की सौगंध भी खाती है ।

म्हाने , चूंदण मंगा दे ओ,  ओ ननदी के वीरा
थाने यूँ थाने यूँ
थाने यूँ घूंघट पै राखूँगी , ओ ननदी के वीरा
म्हाने बोर लो घड़ा दे ओ ,ओ ननदी के वीरा
थाने यूँ थाने यूँ
थाने यूँ माथे पै राखूँगी ओ ननदी के वीरा
म्हाने हंसूली घड़ा दे ओ ,ओ ननदी के वीरा
थाने यूँ थाने यूँ
थाने यूँ छाती पै राखूँगी ओ ननदी के वीरा
म्हाने चूड़लो पहरा देओ , ओ ननदी के वीरा
थाने यूँ थाने यूँ
थाने यूँ हाथां पै राखूंगी ओ ननदी के वीरा
म्हाने घाघरो सीमा दे ओ ननदी के वीरा
थाने यूँ थाने यूँ, थाने यूँ थाने यूँ
चाली पै राखूँगी ओ ननदी के वीरा

( ननदी = नणद, वीरा = भाई ,थाने =-तुम्हें, सीमा =सिलवा, हंसुली = गले का जेवर )

इस राजस्थानी  लोक गीत में  प्रमाणित भी होता है कि प्रत्येक प्राणी अपने आकर्षण विन्दु-चिन्ह भी विकरणित करता जाता है ।


                गढ़वाली-कुमाउंनी  में नारियों का आभूषण -वस्त्र आकर्षण


  कुमाउंनी-गढ़वाली लोक गीतों ,इ आभूषण -वस्त्र आकर्षण संबंधी कई प्राचीन गीत आज भी प्रचलित हैं ।
  ----------------- चल बिंदा साइ मेरी पधानि ---------------


चल बिंदा साइ मेरी पधानि ।
जब ल्यालै नाक की नथुली ।
चल बिंदा साइ मेरी पधानि ।
जब ल्यालै आंग की अंगिया ।
तब भिना मै तेरि पधानि
चल बिंदा साइ मेरी पधानि ।
जब ल्यालै कान मुनाड़ा ।
तब भिना मै तेरि पधानि।
चल बिंदा साइ मेरी पधानि ।
जब ल्यालै गाळ की सूतिया ।
तब भिना मै तेरि पधानि।
चल बिंदा साइ मेरी पधानि ।
जब ल्यालै हाथुं की चूड़ियाँ ।
तब भिना मै तेरि पधानि।

---------------------अनुवाद --------------------
चल बिंदा  साली मेरी पधानि ।
जब नाक की नाथ लाओगे
तब जीजा मैं तेरी पधानि ।
चल बिंदा  साली मेरी पधानि ।
जब शरीर की अंगिया लाओगे।
तब जीजा मैं तेरी पधानि ।
चल बिंदा  साली मेरी पधानि ।
जब कान के मूंदड़े लाओगे।
तब जीजा मैं तेरी पधानि ।
चल बिंदा  साली मेरी पधानि ।
जब गले की सुतिया लाओगे।
तब जीजा मैं तेरी पधानि ।
चल बिंदा  साली मेरी पधानि ।
जब हाथ की चूड़ियाँ लाओगे
तब जीजा मैं तेरी पधानि ।
इस  हैं कि राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी लोक गीतों में मानवीय मनोविज्ञान जैसे सौन्दर्य वृद्धि में आभूषण व वस्त्रों का योगदान , मानवीय  जन्य आभूषण आकर्षण आदि का पूरा ख़याल रखा गया है।




Copyright@ Bhishma  Kukreti 25/8/2013
सन्दर्भ -
लीलावती बंसल , 2007 , लोक गीत :पंजाबी , मारवाड़ी और हिंदी के त्यौहारों पर गाये जाने वाले लोक प्रिय गीत
डा नन्द किशोर हटवाल , 2009 उत्तराखंड हिमालय के चांचड़ी  गीत एवं नृत्य ,विनसर पब क. देहरादून

Bhishma Kukreti


                              स्कुलौ सिलेबस अर असलियत

                               चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती


इख शहरम प्याज अब प्रागैतिहासिक चीज ह्वे ग्याइ अर इनि हाल राल त कुछ दिनुं मा इतियासौ किताबुं मा लिखे जालु बल कबि भारतीय प्याज बि खांद छा ।
सुन्दर काका ड्यार जायुं छ्यायि अर बौन कुछ ना कुछ भेजणि छौ जन चूड़ा -भट आदि । त मीन स्वाच बौ कुण बोलुं बल भट उट नि भिजण बलकणम द्वी चार दाणि प्याजक भेजि द्याओ ।
मि -समनैन बौ !
बौ -चिरंजी रौ !  ये कन बत्वार आइ तुम तिन्युं कुण ! ज्यु बुल्याणु च तुम तैं जिंदि खड्यार द्यूं ! 
मि -हैं ! क्या बुनी छे ?
बौ -अरे तेकुण नि बुलणु छौं । यी तीन काल छन जो ! द्वी नाती अर एक नातण ! युंकुंण बुलणु छौं ।
मि -क्या कार तौन ? उज्याड़ खलैक ऐ गेन क्या ?
बौ -उज्याड़ खलाणौ चिंता अब कख च ? उज्याड़ तब होंद जब खेती ह्वावो !
मि -त बच्चों तैं बीच दुफरा मा गाळी ?
बौ -अरे तिनि स्कूल बिटेन अबि ऐन । आज यूंक छ्मै परीक्षा का  परिक्षा पत्र लेक ऐन।परीक्षा मा अंट-संट लेखिक ऐ गैन !
मि - हैं ! अंट संट ?
बौ -हाँ । सवाल छौ "प्रतिपक्ष राजनैतिक दल की भूमिका पर अपने विचार लिखें  "। त स्यु बड़ लेखिक ऐ ग्यायि " प्रतिपक्ष की केवल एक ही जुम्मेवारी होती है कि संसद ना चले और हमारे देश का प्रतिपक्ष यह भूमिका भली भाँती निभा रहा है ।"
मि -ल्याख त वैन सही च !
बौ - क्यांक सै ल्याख ! किताबुं सिलेबस मा त कुछ हौरि लिख्युं च ।
मि -हैंकान क्या कार ?
बौ -प्रश्न छौ " भारत का राष्टीय खेल क्या है और  उसका हमारे देश में क्या महत्व है ?"
मि -त हैंक नातिक  जबाब क्या छौ ?
बौ -वैन लेखि दे "बल  हमारा राष्ट्रीय खेल इन्डियन प्रीमियर क्रिकेट लीग है ।जिसमें क्रिकेट के अतिरिक्त सट्टा (बेटिंग )   खेल भी साथ में खेला जाता है जिसमे जनता , लीग मालिक, फ़िल्मी हस्तियाँ और खिलाड़ी बड़े मनोयोग से भाग लेते हैं ।
मि - बात  त सै च !
बौ -ह्यां पण किताबुं सिलेबस मा त लिख्युं च बल हॉकी राष्ट्रीय खेल च ।
मि -अर नातणन क्या ल्याख ? 
बौ - प्रश्न छौ " संयुक्त परिवार के लक्षण बताइए " ।
मि -नातणन क्या जबाब दे ?
बौ -वीं नर्भागणन लेखी दे कि पत्येक सयुंक्त परिवार मा एक बुडड़ि हूंद जैं तैं 'बा' बुलदन , एक  तीन बड़ा बच्चों की माँ होंदी ज्वा पन्दरा सोळा  से बड़ी नि दिख्यांदी । संयुक्त परिवार का प्रत्येक सदस्य एक दुसरौ पीठ पर छुर्रा भोंकण म लग्युं रौंद ।
मि -हैं ?
बौ -हाँ अर ईं निर्भागणन उदाहरण बि देंन। जथगा बि टीवी सीरियल चलणा छन वूंक उदाहरण देकि ईन सिद्ध कौरि  बल संयुक्त परिवार मा  हर समौ हल्दी घाटी की लड़ाई या महाभारत हि चलणु रौंद ।
मि -पण यी बात कखन लेखि यूं बच्चों न ?
बौ -टीवी देखिक अर क्या !
मि -ये मेरी ब्वे !
बौ -चुप रावो ! बिंडी उदाहरण देल्या त गुदुल फ़ोड़ि द्योल हाँ !
मि -क्या ह्वाइ ?
बौ -अरे गां का हौरि स्कुल्योंन क्या ल्याख वांक बात बथाणा छन !
मि -क्या हौर बच्चोंन बि इनि कुछ उत्तर दे ?
बौ -हाँ इनि जन अजीब अजीब उत्तर !
मि -जन कि ?
बौ -जन कि सवाल छौ बल भारत मा प्रधान मंत्रीक  चुनाव कन हूंद त एकान लेखि दे बल कौंग्रेस का प्रधान मंत्री सोनिया गांधी क मर्जी से बणद अर बीजेपी क प्रधान मंत्री राष्ट्रिय स्वयं संघ निर्धारित करद अर बकै टॉस पद्धति से  !
मि -पण इखमा गलत क्या च ?
बौ -अरे पण किताबुं मा इन नि लिख्युं च । स्कूलूं सिलेबस को हिसाब अर असलियत मा अंतर हूंद अर बच्चों तैं असलियत छोड़ि सिलेबस का हिसाब से ही उत्तर दीण जरुरी च ।
मि -अब क्या करलि तू ?
बौ -जन हर दफां करदु अर क्या !
मि -क्या ?
बौ -मास्टरों तैं प्रति स्कुल्या हजार रूप्या देलु अर बच्चों मार्क्स ठीक करौलु !
अब जब  शिक्षा की गंध -बॉस की छ्वीं लगणि ह्वावो  त प्याज को छौंका मरणो तुक नि होंद अर मीन फोन काटी दे ।

Copyright@ Bhishma Kukreti 26/8/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]