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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

               सम्पूर्ण घटथापना  मन्त्र 

             
सन्दर्भ : डा. विष्णु दत्त कुकरेती की  पुस्तक नाथ पन्थ : गढवाल के परिपेक्ष  में

      इंटरनेट  प्रस्तुति : भीष्म कुकरेती






    १-  अतः घड थापना लेषीणते  . श्री गनेसाएंम : श्री जल बन्धनी : जल बंदनी जुग पंच पयाल : स्मपति  जुग रंची रे स्वामी   : जुग बार, : मन्स्यादेवी अर्दंगे : रुड माला पैरंती  जुग ते रं : नीवारनी , वर पैरन्ति, जुग सुल : जुग सौल : आसण बैसण प्राणमंत अंत काले कु जुग बीस : आसण बैसण जुग छतीस : ऊं उंकार ल़े  ल़े रे स्वामी स्वर्ग मंच पाताल : रात्री न दीन : समुद्र ना प्रर्थ में सूं तोला : विवर्जित : अंत का उद्पना
२- भेल रे स्वामी : श्री अप्रम प्रनाथ : मधे ल़े रे स्वामी : परम्सुन परमसून मधे रे स्वामी :परमहंस : परमहंस मधे रे स्वामी : चेतना चेतना मधे रे स्वामी  उद्पना : गोदर ब्रह्मा जोजनी तीन थानम : ॐ अं डं नं डं डं नं : प्रगारेत नंग सैत नंग : श्रीकृष्ण इजईती : उद्पना भैले रे स्वामी : श्री इश्वर  आदिनाथ    :कमनघट : नीरघट : षीरघट : रजघट : ब्रिजघट : वाईघट : ये पंच घट : थापंती जतीर सती : बाला ब्रह्मचारी : जटा
३- सौरी वळी ब्रह्मचारी : श्री गुरुगोरषजती    : कानन सुणि  वातन्ता : षोजंती   थावरे जक्र मेवा : एक ब्रह्मा न विश्णु इंद्र नंग : चन्द्र नंग वाई न श्रिश्थी : न दीपक : कोपालंक : कस्य ध्यानम मुरती :  वेद न  चारि होम न यग्य : दान न  :देते : जीत न काला : नाद न वेद : ये घट मेवा : ये घट औग्रा दंग : दीन दाई दीनचारी : नीना औरषवंग : करता पुर्क्म आकासंग आकासेघट  : ब्रह्मा पाताले घट ; वीषनुघट मदेघट ; महेसुर सोनाघट  :पारवती त्रीयोदेवा एक मुरती : ब्रह्मा विशनु महेसुर ; नाना भा :
४- बाती :मन हो रे जोगी : बसपति पातालम : सम्पति पातालं : ऊपरी सत : सत उपरी जत : जत उपरी धरम : धरम ऊपरी कुरम : कुरम उपरी बासुगी : बासुगी ऊपरी अगनि   : : अगनि उपरी क्रीती मही  : क्रीती मही उपरी मही क्रीती : मही क्रीती उपरी  राहू : राहू उपरी सम्पति गज : सम्पति गज उपरी धज : धज उपरी सम्पति समोदर : सम्पति समोदर उपरी : कमन कमन समोदर : बोली जै रे स्वामी : एक समोदर उपरी   सोल समोदर : सोर समोदर उपरी : तालुका समोदर : तालुका
५- समोद्र उपरी ; भालू का समोदर ; उपरी खारी समोद्र उपरी : रतनाग्री समोद्र रतनाग्री समोद्र उपरी : दुधा समोद्र : दुधा समोद्र ऊपरी डालु समोद्र ; डालु समोद्र उपरी मही दुधि समोद्र : मि समोद्र उपरी मही समोद्र ; मही समोद्र ये ससत समोद्र की वार्ता बोली जै रे स्वामी : कमन कमन दीप बोली जै रे स्वामी ; एक दीप : एक दीप उपरी सात दीप सास ; दीप उपरी सजवो दी :
६- प जवो दीप उपरी : जजणी  दीप : जजणी दीप उपरी : बासुकणी दीप  : बासुकणी दीप उपरी अहोड़ दीप : उपरी थमरी दीप उपरी नेपाली बासमती दीप  ; नेपाली भस्मती प उपरी : कणीक दीप : कणीक दीप उपरी : ये सात दीप बोली जै रे स्वामी : नौ खंड वार्ता बोली जै रे स्वामी : कमन कमन षंड वेक षंड : एक षंड : एक षंड उपरी हरी षंड ; हरी षंड उपरी भरत षंड : भरत षंड उपरी आला भरत षंड : भरत षंड उपरी बुद्धि का मंडल : बुद्धि का (षंड = खंड )
७- मंडल उपरी झैल षंड ब्र्न्हंड :झैलषंड :ब्रह्मंड उपरी :ब्रह्मापुरी ब्रह्मापुरी उपरी :सीवपुरी : सीवपुरी उपरी : आनन्द पुरी : आनन्द पुरी उपरी : उपरी ते ल  का तला  : तेल पी डा : ब्रह्म उपरी तत : अवुर जन वु त कु मारी जा :घातुक मारी जा : मही मंडल : सूरज घट मधे उद्पना वर राशी  का घट :मधे उद्पना वार मा से घट : मधे उद्पना त्र्यष्ठ षंड : ये नौ षंड :बोली जा रे स्वामी
८- ये नौ षंड उपरी : वाये मंडल वा ये मंडल उपरी छाया मंडल : छाया मंडल उपरी गगन मंडल : गगन मंडल उपरी मेघ मंडल : मेघ मंडल उपरी : सूरज मंडल : सूरज मंडल उपरी चंदर मंडल : चंदर मंडल उपरी :तारा मंडल : तारा मदनल उपरी :दूधी मंडल : छाय कोटि मेघ माला : वार मा  से घट : घट मधे उद्पना : वार रासी का घट :घट मधे उद्पना : अठार वार वणसापती  : घट मधे उद्पना ताल
९- बेताल : घट मधे उद्पना काल वे का ल : घट मधे उद्पना : नौ करोड़ घट : घट रहे थीर : घट थापंती : श्री अनादी नाथ बुद बीर भैरो : गौ हंडी पृथवी प्रथमे सोढ़ी कीया : जल अयिले : ऋष बाहन चढ़े : राजा हंस आई ल़े : गरुड वाहन चढ़े : राजा गणेष आयिले मुसा वा हान चढ़े : गंगा गौरिज्या आई ल़े मंगला पिंगोला वाहन चढ़े : अनं
१० - त सीधा : मिलकर कै बैठा ध्यान : घट थापन्ति : कमन कमन थान : श्री हं समती    म्समती माई : श्री घटथापंती  कमन कमन थानं : सती जुग मध्ये ल़े रे स्वामी : श्री यसुर आदिनाथ : आचार जगै : अरदगै गौरिजा देवी : षीर  ब्रिष गजा कटार : आसण बैसण सींगासण : छत्र : पत्र : डंडा ड़वौरु : सती जुग मधे ल़े रे स्वामी : कीतने ताल पुरषा : कीतने ताल अस्त्री : कीतने ब्रस की मणस्वात की औस्या बोली जै रे स्वामी सती जुग मध्ये ल़े रे स्वामी : बतीस ताल
११- पुरुष : येकीस ताल अस्त्री री : लाष बर्स की मणस्वात की औष्या बोले जै रे स्वामी : सती जग मध्ये रे स्वामी : अठार हात षटग : छै हात कटार : येकीस गज कमाण : सती जग मध्ये ले रे स्वामी : एक बेरी बोणों :दस बेरी लौणो : चावन पळ चौंळ : बावन पळ गीउ : तीन गज चौंळ तीन मुंडेता गीउ : दस मण को मणस्वात को हार : सती जग मध्ये ले रे स्वामी सोना घट : सोना कै पाट सोना कै आसण : वासण : सींगासण : छत्र पत्र I
१२ - डंडा डौरु :सेली सींगी : त्रीसुल मूँद रा : झोली मेषला : बडाण कछौटी फावड़ी : सोकंति : पोषंती : सुणती भणती : अकास घड़ा थापंती या तोरे बाबा सती जग की बारता : तीन औतार कन्च मंच का : तव दुवा पर मध्ये ले रे स्वामी : श्री चौरंगी आदी नाथ अचार जंगै अररदंगे :
मंगला देवी षीर वीर गजा कंट :दुवापर मध्ये ले रे स्वामी कीतने तला पुर्षा : कीतने ताल असतरी :कीतने  बरस की I
१३- मणसंत औष्या बोली जै रे स्वामी : द्वापर मध्ये ले रे स्वामी : सोल ताल पुरषा : ते रे ताल असतरी :लाष बर्स की मणस्वात की औष्या बोली जै रे स्वामी : :दुवापर मध्ये ले रे स्वामी : नौऊ हात षटग : तीन हात कटार : साढ़े दस गज कमाण ::दुवापर मध्ये ले रे स्वामी : एक बेरी बोणों पांच बेरी लौणो : सताईस पल चौंल : छबीस पल गीऊ ; डेड गज चौंल : डेढ़ मुंडेता गीऊ : पांच मण मणस्वात को हार : बोली रे स्वामी :दुवापर मध्ये ले रे स्वामी रूपा के घट : रूपा के पाट : रूपा के वारमती : रूपा के आसण :वैसण छ I
१४- त्र पत्र डंडा डौरू : सेली सींगी : त्रिसूल मुद्रा : झोली मेषला : उडाण क छोटी : फावड़ी : साकंती : पोकंती : सुणती भणती : आकाश : घटथापंती या तो रे बाबा दुवापर की वारता बोली जैरे स्वामी : तीन औतार कंच मंच का : त्रिथा जग मध्ये ले रे स्वामी श्री मछींद्र आदिनात :आचार जंगे अर्दंगे : फरसराम राम : महाराम करणी : भीमला  देवी : षीर बृष गजा कंठ : आसण त्रिथा युग मध्ये ले रे स्वामी : कीतने ताल पुरषा कीतने ताल अस्त्री : कितने वर्स I
१५- की मणस्वात की औष्या बोली जैरे स्वामी : आठ ताल पुरषा : साढ़े छै ताल अस्त्री : हजार बर्स की मणस्वात की औष्या बोली जै रे स्वामी : त्रिधा जुग मध्ये लेरे स्वामी : एक बैरि बोणों : तीन बैरी लौणो :आठ पल चौंल पांच पळ गीऊ : मणस्वात को तीन मण को हार : त्रिथा जुग मध्ये लेरे स्वामी : तामा को घट : तामा को पाट : तामा I
१६- के वारमती :तामा की आसण :वासण : सींगासण : छत्र पत्र डंडा डौंरु :सेली सींगी : त्रिसूल मुंद्रा : झोली मेषला :उड़ान कछोटी :फावड़ी :सूणती :भणंती :आकासं :घटथापन्ति : या तौ रे बाबा त्रिथा जुग  की बारता बोली जै रे स्वामी :  औतार कन्च मंच का : तब काली जुग  मध्ये के रे स्वामी :गुरु गोरषनाथ :आचार जंगे कालिका देवी "षीर ब्रिष गजा कटार :आसण I
१७- कली जग मध्ये रे स्वामी :कीतनेक ताल पुरषा :कीतनेक ताल अस्त्री : कीतने वरस मणस्वात की औष्या बोली रे स्वामी :कली जुग  मध्ये ले रे स्वामी : तीन हात पुरषा : तीन हात अस्त्री : सौ साट ब्रस की मणस्वात के औष्या बोली जै रे स्वामी : कलि जुग मध्ये ले रे स्वामी : दुई हात षटग :एक हात कटार ढाई गज कमाण : कली जुग मध्ये ले रे स्वामी :
१८- एक  बेरी बोणों : येक बेरी लौणो :चाणा प्रमाण चौंल राई प्रमाण झीऊ : मणस्वात को डेढ़ सेर को हार : बोली जै रे स्वामी :कली जुग  मध्ये ले रे स्वामी : लुवा के  घट : लुवा के पाट : लुवा के बारमती : लुवा के आसण : वासण : सींगासण : छत्र पत्र डंडा डौंरु :सेली सींगी : त्रिसूल मुंद्रा : झोली मेषला :उड़ान कछोटी :फावड़ी: सोकंति :पोषंती :भणंती :आकासं :घटथापन्ति : या तौरे बाबा कली  जुग  की बारता I
१९- बोली जै रे स्वामी : तीन औतार कन्च मंच का : कली जुग मध्ये ले रे स्वामी : श्री नीर निरंजन नाथ जोगी माहा की माटी :काहा कारा जा : और मैपाल थापी ले थुपी ले : क्रे उपरी चढ़ाई ले अंत्र उपरी में घट गड़ीले नाहीं ले : धोई ले : छीपी ले छिपाई ले : दृष्टि भया पात्र : आनन्द वनन्द गुरु गोसाई :जावे मैदनी :कुलदरसने : अत्र मध्ये सीष्टि संसार : मयेवीस्तर : चापि ले :चुपील :बंदी ले :बंधाई ले : मटी : फुरी  ले घोटी ले I
२०- उव्या भया : सन्बू निरंजन नाथ जोगी : काहा ते अमृत की तोमी उपरी उदीक : उदीक परी :ब्रीषपती उपरी उमपुरी नील मुरती :नील मुरती उपरी :उंकार :उंकार मध्ये नीरंकार :नीरंकार मध्ये तत :तत मध्ये सत : सत मध्ये ध्यान :ध्यान मध्ये नीरालभ : नीराल्भ मध्ये उपरी कुंड :कुंड मध्ये उदपना ना षंड : षंड मध्ये उदपना पौन : पौन मध्ये उदपना नाद :नाद मध्ये उद्पना वीद्या I
२१- वीद्या मध्ये उदपना जोती  :जोती मध्ये उदपना अंड  : अंड फूटे भया नवषंड उत्र दक्षिण पुरब पश्चिम : सत्र पंच वेद रघुवेद : की माया मात्रा :गायत्री कमन वरन :नील वरन जयो षेद की माया मातरा :गायत्री वेळ वरन स्याप्र वेड की माया मातरा :गायत्री :कमन वरन भगवती :अथर्वेद की माया मातरा : गायत्री :कमन वरन : नील वरन सरसुती अनेक परे वीर कामनी :संध्या गायत्री :मच्छीन्द्र नाथ की पीड़ा समाई ले :नीरघट :षीरघट  रजघट : वीरजघट :  वाई घट :संषव्या I
-
२२- पती घट :अकासे घट :पाताले घट अत्र उपाम घट :जो जाणंती घट की सुधी घटथापन्ती : श्री नीर नीरंजन गुरु गोर षनात वुधी थाप्या घट :पंथ औ दस्या मछीन्द्र का वचन : दुतरया नीर धुंद दीजै बाबा वारुणी भैरों :मद गोपाला नाचै भैरों :मद गोपाला नाचै भैरों : घट घट वाला नाचैं भैरों : घर घर वाला प्रथमें अनादिनाथ भैरों : जनु ने सोरग मंच पाताल उपाया :दुतीये महादेव नाथ भैरों :जनु ने नौ नात चौरासी सीधो कू सेवा लगाया :
२३-त्रीतेये मछीद्रनात भैरों जनु ने मच्छरूप औतार लनो : चतु ते चौरंगीनात भैरों : जनु ने काचा करचुड़ा बोलाया पंचमे ब्रह्मनाथ भैरों : जनु ने चार वेद  चौद सास्त्र त्र्यट प्रवाण नौऊ अव्यागत गीता गायत्री मुझ पाठ पढ़ लीना :षष्टमें गोरषनात भैरों जनु ने हीन्दु तुरकी दोई लड़ाया :सवतमे विष्नुनात भैरों : जनु ने हात काट गलीये दैत्र दोनों संघारी लीनां : अष्टमे बासुगीनाथ भैरों जनु ने सम्पती पातात जाई कुरम रचाया : नौउमे नौ नात भैरों ऊंकार आदिनात :उदयानात पार I

२४-वती सतनाथ ब्रह्मा संतोगीनाथ वेश्नु :गजनात खतड़ी अचल चलानात ज्ञान पाषीर जलरूपी मछीन्द्रनात :घाट घटे श्री गोरषनात :वाप वीर भैरों :प्रचंड कालमारी करौ :षंड वैषंड I पीले पहरा वैश्नु नाथ भैरों : पादुकाएनमोन्मसतुते :दूजा पहर सवाहर देवी :चन्द्र नात भैरों :पादुकायेनमोन्मस्तुते :चौथा पहर घंगोल  देवी   :घगर नात भैरों :पादुकायेनमोन्मस्तुते :पांचवा पहर : कालिंका देवी :कंकालना I
२५- त भैरों पादुकायेनमोन्मस्तुते : छटा पहरा छटीगीर देवी : रुद्रनात भैरों पादुकाये नमोन्मस्तुते : सातवाँ पहरा की सतेसुरी देवी सतनात भैरों पादुकायेनमोन्मस्तुते: आठवा पहरा की भुजावली देवी षप्रनात भैरों पादुकायेनमोन्मस्तुते : ऊँ जनम गत सुर कला रौ : रीध भैरों रीधी ल्यावो सीध भैरों :सीध ल्यावो :अंडड भैरों डंडी ल्यावो : अमुही भैरों अमोही ल्यावो : समरथ भैरों ससाणी गज मसाण तु  जाई ले डीगर भैरों मारो धाप कालिंका को पूत भैरों :पूजौ भैरों :तीन तीलोग नाथ बड़ी बड़ी I
२६- जटा  लमा केश आयो बाबा वीगट का मैच :गोगलिया भैरों :चंड भैरों प्रचंड भैरों : काल भैरों :कंकाल भैरों : विकराल भैरों :भटुग नाथ भैरों : सूरज नात भैरों :रुद्रनाथ भैरों : तीर होर नात भैरों : तीर घोर नात भैरों :तीर षप्रनाथ भैरों : तीर भवन नाथ भैरों : हमारे पिंडा प्राण रख बावरी के बेल वाल कासी के कोटवाल घड़ी घड़ी के वीघ्न टाल तू देइ त मैं षाऊँ :प्रथमे पूजा येकाइ की भई :दूजी पूजा दोई औतार की भई :तीजी पूजा त्रिभुवन की भई :चौथी पूजा चौदीसा की भई : पाँचों पूजा पांडपू का भई :छटी पूजा नारयेण की भई :साते पूजा सात वार का भई :आटों पूजा अष्ट भैरों की भई I                   

२७- नौवें पूजा नौ नात सीधो की भई :दसै पूजा दस औतार की भई :अग्यारै पूजा अग्यार रूद्र की भई :बारै पूजा बार कला सूरज की भई :तेरों पूजा तेर रतनु की की भई : चौदो पूजा चौद बिद्यान की भई : हाकी पूजा चामुंडा देवी की भई : पन्द्रो  पूजा पंद्र तिथियों की भई : सोलों पूजा सोल कला चंद्रमा की भई : सत्रों पूजा सतनाथ की भई : अट्ठारों पूजा अट्ठारा वार वणसापती की भई : उनीसे पूजा सीधों की भई : बीसों पूजा घटपाट की भई :  येकीसौ पूजा माता पीता गुरु देवता की भई : भरी भरी डंपे कँपे सम्पती पाताल :सोसंको साका वीवरजते :प्रथमे सती जग मध्ये बली पात्र : अरगला वली हीरदया सूधो वली पात्र : आगलो बली पात्र :

२८- पूरब की दीजै : सारदा माई की पूजा रंची जै : जो बली दीजै सो बली लीजै :वली सम्याचक्र उधौ भणीजे : पूज्यौ जौगणी सज्यानंद रीढ़ सीध :फुरो समया कंध : श्री गुरु गोरषवाला गुरु चरण पादुकाये न्मो न्मस्तु :दूजी बली पात्र अरगला वली पात्र : हीदया सुधौ वली पात्र : आगलो बली पात्र उत्र कौ दीजै : का वारु काम रक्ष्या माई की पूजा रन्ची दीजै : जौ बली दीजै सो बली लीजै : दैत्र दानो को संघारो कीजे :दाता दानपति कौ  राज दीजै : जैसो वली दीजै :सम्याचक्र उधौवणीजे :पूजा जौगणी सज्यांनन्द :रीधी सीधी फुरो सम्य कंद : श्री गोरष वाला : श्री चरणपादु I 
२९-कायेन्मोन्मस्तुते : तीजो बली पात्र अर्गला वली पात्र : आगलो बली पात्र हीदया सुधोवली पच्छिम को दीजै :संकरी माई की पूजा रची जे : जो वली दीजै सो वली लीजे I दैत्र दानो का संगारो कीजे : दाता दानपति कौ राज दीजै : पारजा जैसो वली दीजे :सम्याचक्र उधौवणीजे :पूजा जौगणी सज्यांनन्द :रीधी सीधी फुरो सम्य कंद : श्री गोरष वाला : श्री चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते   I  चौथो बली पात्र अर्गला बली पात्र : आगलो वली पात्र हीदया सुधौ वली पात्र दषीणा को दीजे : हिंगोला माई की पूजा I 
                               
३०- रची जे :जो वली दीजै सो बली लीज्ये : दैत्र दानो संघारो कीजै दानपति कौ राजा पारजा :जैसो बली दीजै :सम्या चक्र उधौ बणी जे पुज्यौ जौगणी सच्यानन्द : रीध  सीध फुरौ सम्या कंध : श्री गुरु गोरषवाला : शगुरु चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते : पांचो बली पात्र अर्गला बली पात्र :आगलो बली पात्र हीरदया सुधो बली पात्र दीलो को दीजै :चौसट्या गरामो की पूजा रंचीजे : जो बली दीजोसो बली लीज्यौ सम्याचक्र  उधौ बणीज्ये :पुज्यौ जौगणी सच्यानन्द : रीध  सीध फुरौ सम्या कंध : श्री गुरु गोरषवाला : शगुरु चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते :छटो बली पात्र अर्गला I
३१- बली पात्र हीरदया सुधो बली पात्र : नर्ग कोट कौ दीज्या :ज्वाल्पा माहामाई की पूजा रचीजै :जो वली दीजै सो बली दैत्र दानो संघारो कीजै दानपति कौ राजा पारजा जैसो बली दीजै :सम्या चक्र उधौ बणी जे : पुज्यौ जौगणी सच्यानन्द :रीध  सीध फुरौ सम्या कंध : श्री गुरु गोरषवाला : श्री गुरु चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते : सातौ बली पात्र अर्गला I आगलो बली पात्र हीरदया सुधो बली पात्र मही मंडल  को दीजै: भसमती माहा माई की पूजा रचींज्ये : देव दानो घारो कीजै :दानपति कौ राजा पारजा :  जो वली दीजै सो बली लीज्ये :सम्याचक्र  उधौ बणीज्ये :पुज्यौ जौगणी सच्यानन्द : रीध  सीध फुरौ सम्या कंध I
३२- श्री गुरु गोरषवाला : श्री गुरु चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते : आठो बली पात्र अर्गला बली पात्र :आगलो बली पात्र हिरदया बली पात्र सम्पति पाताल को दीजै : राजा बासुगी की पूजा रचीजे दैंत्र दानो संघारो कीजै दानपति कौ राजा पारजा जैसो बली दीजै :सम्या चक्र उधौ बणी जे : पुज्यौ जौगणी सच्यानन्द :रीध  सीध फुरौ सम्या कंध : श्री गुरु गोरषवाला : श्री गुरु चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते : नाऊ बली पात्र अर्गला : आगलो बली पात्र हीरदया सुधो बली पात्र : आसा को भणीजे : राजा इंद्र की पूजा रची जे :दैंत्र दानो संघारो कीजै दैंत्र दानो संघारो कीजै
33- डाटा दानपति को राजा पाराजा जैसो बली दीजै :सम्या चक्र उधौ बणी जे पुज्यौ जौगणी सच्यानन्द : रीध  सीध फुरौ सम्या कंध : श्री गुरु गोरषवाला : शगुरु चरणपादुकए न्मौन्मस्तुते : नीलपरी अनीलपरी पागलपरी गोरषनाथ पारी मछीन्द्र नाथ पारी अनंतपुरी  पाटण अलेक्पती राजा अभीक्त पधान : आकुल पारजा :अषंड निरंजन नाथ वैसला :कल्या वीर अचेति :अवली बैठा : अनादि : अन्येसुरा बाला बंधौ :मई परसूरी :घट ब्रह्मा : घट इंद्र : घट वैसे वाला गोवींद :पंच देवता कारू मुभाऊ माई : मास को बंधो उफ़ाऊ :अनादी पात्र लींऊं उपाया :सरभ  भूमि अगम भाऊ :वेड न शास्त्र पुस्तीक न परवाण :हिदू न मुसलमान :सूचि न क्रिया :भाऊ न प्रीती : उदीमन मध्याम I
३४- जाती न आण जाती :अनल सर्व भूमि उपाया सरब सींश्ठी कामुल वीनस गती : सींष्ठी  संसार :अत्रादी के अकीये न्मो जाणदा सुणदा कौ आदेस :घागनाथ गुरु को आदेस :फर मन्त्र येसुरोवाच्य :इति घटथापना मन्त्र विधि लेषीत :सम्पूर्ण सुभम I
             
सन्दर्भ : डा. विष्णु दत्त कुकरेती की  पुस्तक नाथ पन्थ : गढवाल के परिपेक्ष  में
   

मूल पाण्डुलिपि : पंडित मणि राम गोदाल कोठी वाले से प्राप्त

( पांडुलिपि 24 सेमी ० लम्बी और 23 . 5 सेमी ० चौड़ी है जो कि बाघ की खाल की जिल्द पर सुरक्षित है . कुल 88 पृष्ठ I कूर्माष्टक -  प्रथम 34 पृष्ठ I 35 से 70 पृष्ठों में घटथापना  मन्त्र हैं, अन्य  फुटकर मन्त्र व कलुवा की रखवाळी हैं I  75 वें पृष्ठ में लिखा है -
(यह पुस्तक लिखतंग पंडित टीकाराम गोदाल पाटली ग्रामे संवत १९९१ (१९३४ ई ) के बैशाख २३ गते शनिवारी -यह पुस्तक पंडित मणिराम गोदाल कोठीवाले की है . यह पुस्तक कुर्माष्ट्क , घटथापना सम्पूर्ण न्म शुम्भु )

उत्तराखंड  का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; चमोली गढ़वाल का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; रुद्रप्रयाग का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; टिहरी गढ़वाल का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; उत्तरकाशी गढ़वाल का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; देहरादून गढ़वाल का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; हरिद्वार का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; पिथोरागढ़ कुमाऊं का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; चम्पावत कुमाऊं का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; बागेश्वर कुमाऊं का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; नैनीताल कुमाऊं का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; अल्मोड़ा कुमाऊं का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; उधम सिंह नगर कुमाऊं का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ; उत्तरी भारत का तन्त्र मन्त्र , तांत्रिक -मान्त्रिक का लोक साहित्य  ;

Bhishma Kukreti

Papi Kaliyug: South Asian Folk Song Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era


Folk Songs from Kumaon-Garhwal, Haridwar, Uttarakhand (India)-313
(Asian, Himalayan Folk Song/Traditional Folktales/ Conventional Sayings Series)
                 कुमाऊं, गढ़वाल ,हरिद्वार के  लोक गीत  -313
                                      By: Bhishma Kukreti

                  Hindu Mythology divided era into four periods –Satyug, Dwapar, Treta and Kaliyug. Kaliyug means Iron Age or the era of machines or industrialization Age or Dark Period or the period of liars.
   The following Kumaoni-Garhwali folk song describes the negative features of Kaliyug means the era of machines or industrialization Age or Dark Period or the period of liars.

     पापी कळजुग

(सन्दर्भ :डा . नन्द किशोर हटवाल ,  उत्तराखंड हिमालय के चांचड़ी गीत एवं नृत्य )

(इंटरनेट प्रस्तुती व व्याख्या - भीष्म कुकरेती )


पापी कळजुग स्यु आंदु चा 
पाप पाखंड दिखांदु चा
झूटी गवाही विकांड चा
दीदी -द्योराण दगड़ा चा
दिन रात को झगड़ा चा
भाई  भायों को यो रोग च
मार्खु बल्दौ से लाग च
गौं गौं दुन्ख्या  णू चा
घरूं घरूं दुन्ख्या  णू चा
सासू ब्वार्युं क यो बात चा
भैरूं का थान  मा घात चा
कर्मचार्युं को यां शोर चा
घूस रिश्वत मा जोर च
बाबू बिशर्म बिलाज च
नानतिन शराबबाज च
पापी कळजुग स्यु आंदु चा 
पाप पाखंड दिखांदु चा

Sinful is   Iron Age
Sin and Hypocrisy are common seen in Iron Age
Suborn is feature of Iron Age
When a woman and her sister in law (husband's brother's wife) live together in Iron Age
The woman and her sister in law (husband's brother's wife) fight woman and her sister in law (husband's brother's wife) in Iron Age
Brothers quarrel in Iron Age
Brothers are enemies as rat and cat in Iron Age
There is quarrel in every village in Iron Age
In law and daughter in law quarrel every time in Iron Age
There is conspiracy planning in temples in Iron Age
The employees shout in Iron Age
The employees are corrupt and bribe takers in Iron Age
The corrupt employees are shameless in Iron Age
The children are alcoholic in Iron Age
Sinful is   Iron Age
Sin and Hypocrisy are common seen in Iron Age


Copyright (Interpretation) @ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com 12/8/2013
Folk Songs from Kumaon-Garhwal-Haridwar (Uttarakhand) to be continued...314 
   
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उत्तराखंड से  लोक गीत , दुसांत से बाल  गीत; चमोली  गढ़वाल से  लोक गीत ;गदकोत चमोली गढ़वाल से  लोक गीत ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल से  लोक गीत ; पौड़ी गढ़वाल से  लोक गीत ; टिहरी गढ़वाल से  लोक गीत ;उत्तरकाशी गढ़वाल से  लोक गीत ;केदार उत्यपका गढ़वाल से  लोक गीत ; बद्रीनाथ घाटी गढ़वाल से  लोक गीत ; लैंसडाउन गढ़वाल से  लोक गीत ; कोटद्वार गढ़वाल से  लोक गीत ;नरेंद्र नगर गढ़वाल से  लोक गीत ;प्रताप नगर गढ़वाल से  लोक गीत ; गौचर गढ़वाल से  लोक गीत ; पुरोला गढ़वाल से  लोक गीत ; राठ  क्षेत्र गढ़वाल से  लोक गीत ; गैरसैण  गढ़वाल से  लोक गीत ; दूधातोली गढ़वाल से  लोक गीत  श्रृंखला जारी ..
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Notes on South Asian Folk Song Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Chamoli Garhwal Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Rudraprayag Garhwal Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Tehri Garhwal Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Uttarkashi Garhwal Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Dehradun Garhwal Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Pauri Garhwal Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Haridwar Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Pithoragarh Kumaon  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Bageshwar Kumaon  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Champawat  Kumaon  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Almora Kumaon  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Nainital Kumaon  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Udham Singh Nagar Kumaon  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from Himalaya  Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era; South Asian Folk Song from North India   Illustrating Characteristics of Industrialization/Iron Age /Machine Era

Bhishma Kukreti

                                         असली डौर


                     चबोड़्या -चखन्योर्या -भीष्म कुकरेती


              अचकाल कखिम बि बाँचो भौं भौं किस्मुं डौरूं छ्वीं लगणा रौंदन I भौं भौं मीडिया - माध्यमुं मा बि दुनिया का वास्ता कु कु डौर जादा डरौण्या छन पर विस्तार से छ्वीं लगणा रौंदन I

               सबसे जादा बहस का मुद्दा च - ग्लोबल वार्मिंग याने धरती क अंदादुंद रूप से  तचण  या पृथ्वी मा बेहिसाब गर्मी हूण ! इख पर सबि  सहमत छन बल धरती बिंडी तचण मिसे गे I धरती गरम हूण से माहौल खराब हूणु च I लोग डरणा छन बल ग्लोबल वार्मिंग से समोदरो पाणि उंचाई बढी जाली , धरती जादा तचण से रेगिस्तान बढ़ी जाला, आइस ग्लेसियर पिगळ जाला आदि आदि I
         भै ग्लोबल वार्मिंग तैं त रुके सक्यांद अर जरुर हम धरती क तचण  द्योला I पण जब धर्म का नाम पर राजनीतिक -धार्मिक नेता रोज रोज लोगुं खून गरम करणा रौंदन , धार्मिक उन्माद से माहौल गरम करणा रौंदन वो धरती तचण या ग्लोबल वार्मिंग से जादा खतरनाक च I मि तैं ग्लोबल वार्मिंग से उथगा डर नि लगद जथगा भय जातीय अर धार्मिक उनमादी गर्मी से लगद I ग्लोबल वार्मिंग तैं त भौतिक रीतियों से कम या ठीक करे सक्यांद पण धार्मिक अर जातीय गर्मी तो एक दै  लगी तो फिर ठंडी होंदि ही नी च I धार्मिक अर जातीय गरमी त मड़घट जैक बि शांत नि हूंद I
        अब जब ग्लोबल वार्मिंग की बात होलि तो  की तेजाबी बारिश की भी छ्वीं लगल ही I लोग तेजाबी बारिश से डरणा छन  पर मि मनिखों जीब से निकऴयूँ तेजाबी  शब्दों से जादा डर्युं छौं I तेजाबी बरखा को तो इंतजाम ह्वे जालो पण मनुष्यौ मुख से तेज़ाब रूपी शब्दों अर जहरीला बचनो क्या ह्वालु ? अर अजकाल तो नेताओं मा तेज़ाब से बिंडी जहरीला बचन बुलणो प्रतियोगिता चलणि च I यूं  तेजाबी बोल बचन रुकणौ क्या ह्वालु ? ये तेजाबी बचन त तेजाबी बरखा से जादा डर्यौण्या छन I
     बहुत सा पर्यावरणवादी  डरणा छन बल  दुनिया से सैकड़ों जानवर अर पेढ़  पौंधों जाति  (Species ) ही ख़तम हूणा छन अर मि डरणु छौं कि मनख्यात से इमानदारी ही खतम हूणी च क्या ह्वालु ?
   सबि परेहान छन बल हमर प्राकृतिक ऊर्जा  ख़तम हूणा छन मि रूणु छौं कि हमर समाजौ अर राजनीति का ठेकेदार युवाओं की ऊर्जा तैं विध्वंसक कार्यों मा लगाणा छन वांक क्या करे जालु  ?
    चिंतक चिंतित छन बल वातावरण मा गिरावट याने इनवायरेंनमेंट डिग्रेडेसन  शुरू ह्वे गे I अर मि फिकरमंद छौं कि  हमर सामाजिक अर संगठनात्मक दुनिया मा तेजी से ज्वा गिरावट आणि च वीं गिरावट तैं रुकणो क्या करे जावो ?
   अनुभवी लोग अनुभव करणा छन कि रासायनिक अर न्यूक्लियर हथियार मनुष्यता का बान अति हानिकारक छन I अर मि परेशांन  छौं कि जु हमर ख्वाब झुळसणा छन  , हमर उम्मीद जळिक भसम हूणा छन वैको क्या तजबिज होलु ?
   जणगरा हम तैं चितळ करणा छन कि इलिक्ट्रीकल वेस्ट , फैक्ट्री वेस्ट , मल मूत्र वेस्ट , समुद्र मा कूड़ा करकट या अन्य हौरि जगों मा वेस्ट जमा हूणु च वो खतरनाक च अर जणगरा राय दींदन बल वेस्ट मैनेजमेंट पर ध्यान दीणो शक्त आवश्यकता च I मि दुखि छौं कि संसद अर विधान सभाओं मा  जो समय वेस्ट हूणु च वांकु क्या उपाय च ?
सरा दुनिया का चिंतक , बुद्धिजीवी शहरीकरण को ओवर पोपुलेसन से डरयाँ छन अर हरेक (मी बि ) छुट शहर से बड़ो शहर जाणो आस मा छन I

लोग कैंसर , एड्स से डर्यां छन अर मि मि ज़िंदा ह्वेक बि अपण भितर मरीं मनख्यात  से डर्युं छौं I

आपक क्या हाल छन ? आप के से डर्यां छंवाँ ?




Copyright @ Bhishma Kukreti  13/8/2013

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...] 

Bhishma Kukreti

Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period 

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 119

   Early Medieval   Asian History of Katyuri Imperialism of Kartikeyapur in Kumaon, Garhwal and Haridwar (Uttarakhand, India) -30

          (Early Asian Medieval History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))
                          (Early Asian Medieval History (740-1100 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

                                            Jagadguru   Adi Shankaracharya
                Shankaracharya was born in 788AD in Kalti, Kerala, South India. Shankaracharya left his body in 820 AD In Kedarnath. His father name was Shivguru Nambudari and mother's name was Vishistha or Sati.  His father expired in his childhood. Shankaracharya became ascetic in childhood. He was so brilliant that at the age of 12, he started promoting Vedanta. Shankar is famous for his philosophy of Adwaitvad.
          Shankar is also famous for writing comments on Geeta and other Sankhya philosophy. 
           Shankaracharya established four major Maths (Dham) in India –Jagannath Dhampuri (East), Dwarikadham, Rameshwardham and Badrikashram for Hindu reforming.


     Rivalry among Religious Sects in Shankaracharya Period of in Asian Medieval History Era   

                  There was rivalry among various religious sects in India for centuries. Buddhism grew with speed in Maurya period. However, later on the decline in Buddhism also started. The Kings used to be major patrons of any religious sect.  There was tradition of building temples or worshipping places where other sect's temples are built by all sects.  Building temples nearby temples of other sect is as today, brands put hoardings nearer by rival brand hording. At the time of Shankaracharya, Buddhism was on decline. Shankaracharya reformed Hindu or Sanatan sects. 

                     Arrival by Shankaracharya in Uttarakhand

               After establishing three Dhams or Maths in Kanyakumari, Jagannath and Dwarika, Shankaracharya came to Rishikesh. He heard in Rishikesh that the priests of Badrikashram threw Vishnu sculpture at Alaknanda River bank into Narad Kund because of fear from Tibetan looters. Shankaracharya came to Badrikashram, Shankaracharya brought back Vishnu  sculpture in Khandit avstha(broken state) and he reestablished the Vishnu sculpture in Badrikashram temple.
       In Shrinagar Garhwal, Shankaracharya came to know that there is animal sacrifice tradition at Shri Yantra (Sacred Instrument) Thau place (Today-Shriyantra Tapu).  Shankaracharya stopped the animal sacrifice at Shriyantra Thau.
          There is Vyas cave near Badrikashram (above Mana village). Shankar wrote commentaries on Brahmasutra, Geeta and major Upnishads in Vyas Gufa.
  After finishing commentaries, Shankar came to Gangotri. It is said that he met Vyasa there and Vyasa was pleased to see commentaries.
  At later stage of his life, Shankar came to Kedar Mountain. Shankar left his body at Kedarashram or Kedarnath. A hill shrine between Gangotri and Kedarnath is called 'Shankar Shikhar'.

                            Ritual Tradition in Badrikashram

          Badrikashram or commonly called Badrinath was a famous and most auspicious, sacred place in Mahabharata era too. The epic Mahabharata was edited long before Gupta Period. There are sizable descriptions of Badrikashram in Mahabharata.  There is mention of rituals in the sacred place or temple.  The Dev Prayag inscriptions and Harshacharit suggest that there were regular rituals in Badrikashram temple. The pilgrims from all corners of India used to visit Badrikashram.  There is no mention of Badrikashram in Paurav inscriptions but there is mention of Badrikashram in Katyuri inscriptions. That shows that the Tibetan looters used to loot the jewels etc from the temple. Yashovarman pushed back Tibetan invaders and Katyuris too protected Badrikashram from Tibetan invasion.

            According to local folk sayings and other sources as Baldev Upadhyaya , Shankaracharya reestablished ritual system in Badrikashram temple. Shankaracharya also established ritual system in Jyotirmath (Joshimath) and Pandukeshwar.
It is said that Shankaracharya established images of Nar, Narayan, Ganesh Shiva, and Shakti in the Badrinath temple and Jyotirmath.



       Trotkacharya Shishya Parampara or Priest System for Ritual Performance in Badrikashram

            Shankaracharya established certain norms for ritual performances and worshipping practices in Badrinath, Pandukeshwar and Joshimath.
         Shankaracharya handed over the ritual practices management of Badrikashram temple to his disciple Totakacharya. From Shankaracharya to 1220 AD, the disciples of Totakacharya were the priests of Badrinath temple and Jyotirmath.
तोटको विजय : कुमारो गरुड़ ध्वज :I
विन्ध्यो विशालो बकुलो वामन : सुन्दरोअरुण :II
श्री निवास : सुखानन्दो विद्यानंद : शिवो गिरी :I
विद्याधरो  गुणानन्दों  नारायण : उमापति :II
एते ज्योतिर्मठाधीस : आचार्याश्चिर्जीवन : 
The Totakacharya disciple priests were as follows
1-Totakacharya (820 or around)
2-Vijaya Acharya
3- Krishna Acharya
4-Kumar Acharya
5- Garuddhwaja Acharya
6-Vindhya Acharya
7-Vishal Acharya
8-Vakul Acharya
9-Vaman Acharya
10-Sundararun
11-Shri Nivas Acharya
12- Sukhanand Acharya
13- Viadyanand Acharya
14-Shiv Acharya
15-Giri Acharya
16-Vidyadhar Acharya
17- Gunanand Acharya
18- Narayan Acharya
19- Umapati Acharya (2120 AD)
Rawal as priests came in scene quite late.
          Shankaracharya accelerated Religious Tourism in Uttarakhand 

               Due to reestablishing Badrikashram, Kedarnath and Gangotri Dham, Shankaracharya brought back the religious tourism with bang in Uttarakhand.
Shankaracharya also wrote simple Prarthaneyen /prayers for many deities and goddesses.





Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 11/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -120
Early Asian Medieval History of Katyuri Dynasty in Kumaon, Garhwal and Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued...31
        (Oriental Early Medieval History (740-1100 AD to be continued...)
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Notes on Coming of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period of Himalaya; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Middle Age  History Period of Central Himalaya ; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period of North India; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period of India; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period of Indian subcontinent ; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Middle Age  History Period of SAARC countries; Arrival of Shankaracharya in Garhwal, Uttarakhand in Asian Medieval History Period

Bhishma Kukreti

Kulli Begara: Folk Song describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British

Folk Songs from Kumaon-Garhwal, Haridwar, Uttarakhand (India)-313

(Asian, Himalayan Folk Song/Traditional Folktales/ Conventional Sayings Series)

                 कुमाऊं, गढ़वाल ,हरिद्वार के  लोक गीत  -314
                                      By: Bhishma Kukreti
                  British rule had a policy that whenever their administrative officers used to visit villages for official works the villagers had to do free labor in transporting necessary items of officers. Besides free labor, the officers used to insult local people. 
  There was a mass movement against compulsory unpaid labor policy by British in Kumaon region led by Kumaon Kesari Badri Datt Pandey, Har Govind Pant, Victor Mohan and other freedom fighters. The movement was successful and British administration had to abolish Kuli-Begar policy.   The following folk song illustrates and remembers the Kuli Begar movement of Kumaon.


             कुल्ली बेगारा


(सन्दर्भ :डा त्रिलोचन पांडे :कुमाउनी  भाषा और  साहित्य )

(इंटरनेट प्रस्तुती व व्याख्या - भीष्म कुकरेती )


ओ झकूरी यों ह्रदय का तारा , याद ऊँ छ जब कुल्ली बेगारा ।  .
खै गया ख्वै गया बड़ी बेर सिरा , निमस्यारी डाली गया चौरासी फेरा ।
सुण रे पधाना यो सब पुजी गो , धान ल्या चौथाई घ्यू को ।
ह्यूंन चौमास , जेठ असाढ़ा नंग भुखै बाट लागा अलमोड़ी हाट।
बोजिया बाटा लागा यो छिन कानै धारा , पाछी पड़ी रै यो कोड़ो की मार ।
यो दीन दशा देखी दया को कुर्माचल केसरी बदरीदत्त नाम ।
यो विक्टर मोहना ,  हरगोविन्द नामा , ये पूजा तीन वीर।
सन इक्कीस उतरैणी मेला यो , ये पूजा तीन वीरा गंगा ज्यू का तीरा ।
सरजू बगड़ा बजायी लो डंका , अब नौ रौली यो कुल्ली बेगारा ।
क्रुक सन सैप यो चाये रैगो , कुमैया वीर को जब विजय है गो ।
सरयू गोमती जय बागनाथ , सांति लै सकीगे कुल्ली प्रथा ।


Whenever we remember Kuli –Begar, we shiver by pain.
The unpaid labor without clothing had to go for compulsory labor as bonded labor; people had to take heavy weight on their solders.
On top of it the officers used to beat by whip or whipping was common from officers.
The Kurmachal Kesary Badridatt Pandey felt the pain. Badridatt came ahead for movement
Victor Mohan and Hargovind also reached at Almora bazaar.
There was fair on Uttarayani (14th January) nineteen twenty one.
These three brave persons reached at poise river bank
The declared that people would refuse to take compulsory unpaid labor of British.
The British officer Crook could not anything or he declared freedom from compulsory unpaid labor policy.
By blessing of Sary-Gomati and Bagnath Kuli-Begar policy was stopped peacefully


Copyright (Interpretation) @ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com 13/8/2013
Folk Songs from Kumaon-Garhwal-Haridwar (Uttarakhand) to be continued...315 
   
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(स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी लोक गीत ; पिथौरागढ़  से स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; बागेश्वर से स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; चम्पावत सेस्वतन्त्रता   स्वतन्त्रता   स्वतन्त्रता स्वतन्त्रता स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; अल्मोड़ासे आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; से आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ;   से स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; नैनतालसे स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; उधम सिंह नगर से स्वतन्त्रतासे आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; से आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ;    आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ;से स्वतन्त्रतासे आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; से आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ;   पौड़ी गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ;टिहरीगढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ;   चमोली गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; उत्तरकाशी गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; देहरादून गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; हरिद्वार से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत श्रृंखला )

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Notes on Folk Song describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Kumaon Askot describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Johar Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Dwarhat Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Pithoragarh Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Champawat Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Sary Valley Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Kali Ganga valley Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Gomati valley Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Bageshwar Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Almora Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Nainital Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British; Folk Song from Udham Singh Nagar Kumaon describing Mass Movement against Compulsory Unpaid Labor Policy of British

Bhishma Kukreti

Uttarakhand ki Lok Bhashayen:  Serious Linguistic, Phonological Discussion on Kumauni, Garhwali and Jaunsari languages

                   Review by: Bhishma Kukreti

                        It is positive sign by formation of separate state Uttarakhand that common men, intellectuals, politicians, social activists and scholars raising the issues of local languages of Uttarakhand. These languages-Garhwali, Kumaoni and Jaunsari are one of the oldest Indian languages.
            Dr. Guna Nand Juyal started scientifically comparing Kumaoni and Garhwali languages by in his research and book- Madhya Pahadi Bhasha (Garhwali-Kumaoni) ka anushilan aur uska Hindi se smabdnh (1966).
            Dr. Bhavani Datt Upreti provided comparison of Garhwali- and Kumaoni languages in his book 'Kumaoni Bhasha ka Adhyayan' (1976). Bhavani Datt Upreti paid attention on grammar for comparison.
                           The people of Uttarakhand are conscious about three languages of Uttarakhand. This consciousness is compelling the scholars for studying these three languages together for many angles.
Bharti Pandey (2011) compared Kumauni and Garhwali languages in her article 'Uttarakhand ki Lok Bhashaon evam any Rajyon ki Bhashaon ka Tulnatmak Adhyan.Howvwer, less importance
              Recently, Bhishma Kukreti published grammatical exclusivity and differences of Kumauni, Garhwali and Nepali languages.
         Dr. Bihari Lal Jalandhari published a book Uttarakhandi Bhashaon ka Tulnatamak Adhyayan (Garhwali-Kumaoni par kendrit that shows the exclusivity and differences between Garhwali and Kumaoni languages.
      In the same line, the dictionary expert, prolific philologist and linguistic scholar Dr. Achala Nand Jakhmola (2013) published a book 'Uttarakhand ki Lok Bhashayen'. Dr. Achala Nand is expert on languages and dictionary.  His book Garhwali Hindi- Angreji Shabdkosh 'is ready for publishing.
     The said book 'Uttarakhand ki Lok Bhashayen' by Dr Achla Nand Jakhmola fills the gap of unawareness among Garhwalis, Kumaunis and Jaunsari about other local languages of Uttarakhand.   
Dr Sher Singh Bisht wrote the forwarding notes.
       In the chapter 'Garhwali Bhasha: Samrthya aur Pravriti', Jakhmola discusses the origin of word Garhwal; Epic and historical basis for originating Garhwali language; peculiarity of Garhwali words and strength of Garhwali words; different philological aspects of Garhwali words; development of Garhwali language; phonetics of Garhwali language,; challenges before Garhwali language.
             In the chapter Kumaoni Bhasha aur Boliyon ka Parikshetr , Achla Nand talks about Kumaoni language development; phonetically properties of Kumaoni language; exclusive characteristics of Kumaoni language and challenges before Kumaoni language.
Achla Nand discusses about the linguistic and cultural aspects of Jaunsari language. Jakhmola shows the special features of Jaunsari and Jaunsari facing various survival problems.   
         In the chapter Kumaoni and Garhwali Bhashayen, Dr Achla Nand illustrates the similarities and exclusivity between Garhwali and Kumaoni languages.
  Jakhmola shows his concern for endangered symptoms of Garhwali, Kumaoni and Jaunsari languages and culture too.
     In chapter 'Garhwali-Kumaoni ka Mankikaran', Dr Jakhmola describes historical background for works done in Standardization of Garhwali and Kumaoni languages separately and need for scientific standardization.
Dr. Jakhmola clears that Devnagari script is only way for these languages and he proposes that there shouldn't be any unnecessary discussion on the subject of script.
          Dr Jakhmola puts strong argument for getting constitutional recognition for Garhwali, Kumaoni and Jaunsari languages.

            Dr Jakhmola shows the difficulties and problems being faced by Garhwali, Kumaoni and Jaunsari languages. Along with telling difficulties and problems of these languages, Dr, Jakhmola shows the easy solutions too.
Dr Jakhmola provides references for his each statement.
The language of book is simple and understandable for common men too.
The book is important book for all three languages getting constitutional recognition.
Uttarakhand ki Lok Bhashayen: Garhwali: Kumaoni: Jaunsari
Year of Publication -2013
Writer- Dr. Achla Nand Jakhmola
Pages 160
Price-295
Winsar Publishing Co
K.C. City Centre
Dispensary Road
Dehradun, India

Copyright @ Bhishma Kukreti 13/8/2013

Bhishma Kukreti

                 गरीब -गुरबों-दलितों  रामायण मा बाल-कांड की जगा भेदभाव काण्ड

                                        चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती

मी सुचणु छौ बल रामायण या महाभारत मा जु बि मुख्य कथा छन वो राजा , राजकुमार या राजकुमार्युं मुतालिक ही छन अर बडो मिजाज , बड़ो हिसाब ही यूँ महाकाव्यों मा च  I
यदि वाल्मीकि कई गरीब पर या हरिजन आधारित कथा पर रामायण लिखदा त क्या हूंद ?

              वाल्मीकि या तुलसीदास कृत रामायण मा दशरथ राजा छौ त वैक इख वशिष्ठ , श्रृंगी , विशवामित्र जन बड़ा बड़ा ऋषि आंदा छा पण दलितों रामायण मा गरीब या दलित दाशरथौ इख बड़ा बामण त छवाड़ा मड़घटौ  भैड़ा बामण बि नि आंद किलैकि बामणु बि जजमानी बारा मा अपण स्टैण्डर्ड हूंद . जू बि  दक्षिणा   दीण लैक ह्वावो वो ही बामणु लैक जजमान हूंदो I तो दलित या श्रीहीन दशरथ का तिनि ब्यौ टकों ब्यौ (जख मा बर बरातम नि जांद ) ही हूंदा I
                 दलित दशरथ या तो बड़ा लोगुं गू फेड़दु या कैका पुंगड़ु मा मजदूरी करदो I इनि  कौंसिला (कौशल्या ), कैकेयी अर सुमित्रा बि मजदूरिन हि हूंदा I रामायण मा जब  राम पैदा हूणो  बगत आयि तो कौशल्या बान तरा तरांका  सुख साधन जुटाये गेन I गरीब -दलित चरित्रों आधारित रामायण मा कौशल्या बान बि दशरथ सुख अर साधन जुटांदो I जख कैकियी अर सुमित्रा माय दशरथ का चार बेऴयूँ मादे एकि दै खाणक़ खांदा उख कौंसिला (कौशल्या ) तैं द्वी बगत रूखा सूखा दिये जांदो . अर कौशल्या भगवान से प्रार्थना करदी बल क्या वा हर समय अशाबंद (गर्भवती ) रै सकदी क्या ? गर्भवती रौण मा दिन मा एक बार खाणक़ मिलण तो बड़ी बात ह्वे की ना ? उना कैकेयी अर सुमित्रा निरंकार से प्रार्थना करदी बल वूं तै बि गर्भवती बणाये जावो ! कैकेयी -सुमित्रा बच्चों बान गर्भवती नि बणन चांदा पण चार टैम मा द्वी टैम खाणकौ लोभ मा गर्भवती बणन चांदा I
                 जब वाल्मीकि का रामचंद्र पैदा ह्वेन तो दाई -आयायूं की भीड़ का बीच पैदा ह्वेन I दलितों को रामायण को रामचंद्र बि भीड़ का बीच ही पैदा होंदु पण वीं भीड़ अर वाल्मीकि रामयण की भीड़ मा जमीन असमानों अंतर हूँद I जख वाल्मीकि को रामचंद्र राजमहल मा पैदा होंद त दलितों रामायण को रामचन्द्र तब पैदा हूंद जब कौशल्या कै राजमहल की चिणै बगत मजदूरी करणि होलि I कौशल्या का मुंड मा पथर हूंद अर इनि मा रामचंद्र पैदा हूंद I जख वाल्मीकि रामायण मा रामचंद्र को पैदा हूण मा अयोध्या की जनता जोर जोर से 'बधाई हो ! बधाई हो ! राज्किमार पैदा हुए हैं ' को नारा लगांदी अर सरा अजोध्या मा हल्ला हूंदो त दलित रामयण मा कूड़ो ठेकेदार अर हौर बड़ा कारिंदा हल्ला करदा कि "तैं कौंसिला मजदूरिन को बहार कारा ". ठेकेदार मजदूरों तै डांटदो " क्या बै ! एक कुत्ते का पिल्ला जैसा ही तो पैदा हुआ है फिर तुमने काम बंद क्यों किया ? चलो काम करो I "
दलित रामायण माँ मजदूर रामचन्द्र जन्म पर खुसी नि मनै सकदा बल्कि बेबसी , कुंठा का शिकार ही होंदा कि हम मजदूरों क्या बेबसी च कि मजदूरी करद बच्चा पैदा हूंदन अर चैन से खुसी का इजहार बि नि करी सकदा !
कौंसिला नंगी बच्चा लेकि अपण अधछंयीं झुपडि मा इखुली आंदी I
               दशरथ का परिवार मा बच्चा का आण पर ख़ुशी जरूर होंदी पण दुःख बि उथगा ही जादा होंदु बल कि यु बच्चा रात पैदा होंद त कौन्सिला तै आज की मजदूरी त मिल्दि I सब्युं तैं एकि मलाल हूंद कि आज कौंसिला की मजदूरी मारे गे I दशरथ कौन्सिला तै गाळि बि दींदो " तै नौनु तैं जरा चार पांच घड़ी पैथर जनम नि दे सकदी छे ? साली तैं इथगा बि ज्ञान नी च कि गरीबों तैं दिन मा पैदा नि करण चएंद I "
दसरथ का घौर बुड्याँद दें नौनु ह्वाइ तो जशन मनाण बि जरूरी छौ अर खुसी -खुसी दशरथन अपण एकमेव गैबण बखरी बेचि दे अर वांसे चषक (शराब ) अर चखना खरीद अर दगड्या  मजदूरों तैं रात जीमण दे I
           ज्य्ख वाल्मीकि -तुलसी रामयणम रामचंद्र  को बचपन राजमहलम बीतद उख दलित आधारित रामायणम रामचन्द्र को बचपन कौन्सिला जख बि मजदूरी करणों जावो तखी रामचंद्र तै बि लिजांदी छे I जख बाल्मीकि -तुलसी रामायण मा रामचन्द्रन पांच  साल तक राजमहल का गद्दों सुख भ्वाग उख दलित रामायण का रामचंद्र का बचपन पुंगडुम, खल्याणम, बौणम , खंद्वारुंम ,  चिण्यान्द कूडो मा माटु -पथरों -कीच , धूल -गंदगी मा बितद I
जब बाल्मीकी का रामचन्द्र पांच साल को ह्वाइ तो संसार का लोग रामचंद्र तै पकड़णो बान  प्रतियोगिता मा खड़ा रौंदा छा पण दलित रामायण मा बिट्ठ ( स्वर्ण लोग ) ही ना बड़ी जाती का हरिजन बि रामचन्द्र की छाया से दूर रौणै कोशिस करदा I रामचन्द्र तैं दलित हूणों अहसास बचपन से ही ह्वे जांदो अर कबि कबि त बालक रामचंद्र अपण छाया से दूर भाजि जावो कि कखि या छाया सवर्णो नि ह्वावों I पांच साल की अवस्था आंद आंद दलित रामायण मा रामचंद्र पचास दै सवर्णों अर बड़ी जातिक हरिजनों गाळी -मार - उलाहना खैक डमडमो -ढीठ ह्वे जांदो I
               दलित रामायण मा पांच साल को रामचन्द्र तैं खाणको स्वाद तो पता नि चौलल पण दलित हूणो अनुभव पूरो ह्वे जालो I जख बाल्मीकि रामायण मा रामचंद्र तै अक्षर ज्ञान सिखाणो बान महर्षि ,ब्रह्मर्षि ग्यानी ऐन उख दलित आधारित रामायण का रामचन्द्र "अछूत कहींका, दलित की औलाद , तू हरिजन है दूर हट; हम पर नही लग, हम स्वर्ण हैं तू शूद्र है ; हम कुलीन हैं तू नीच है ; हम शिर से पैदा हुए हैं तुम लोग पैर के अंगूठे से पैदा हुए हो " जन ज्ञान पांच सालुं मा बगैर उपाध्याय का ही सीखि लींदु . बल्मीकि का रामचंद्र गुरु वशिष्ठ  से ब्रह्म ज्ञान सिखद त दलित रामयण का रामचन्द्र जाती -व्यवस्था को पूर्ण व्यवहारिक ज्ञान बगैर गुरु का ही सीखी लीन्दो I   
   दलित की रामयण मा बालकांड ना भेद -भाव का काण्ड-खुब्या हूंदा  I
दलित रामयण में रामचंद्र का बल कांड भाग -2 में जारी ....
Copyright@ Bhishma Kukreti 14/8/2013

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]   

Bhishma Kukreti

Dhanya –Dhanya Bhagat Singha: South Asian Folk Song Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh   

Folk Songs from Kumaon-Garhwal, Haridwar, Uttarakhand (India)-315

(Asian, Himalayan Folk Song/Traditional Folktales/ Conventional Sayings Series)

                 कुमाऊं, गढ़वाल ,हरिद्वार के  लोक गीत  -315
                                      By: Bhishma Kukreti

There are various subjects and colors in Garhwali-Kumaoni folk songs.
The folk literature creators have sharp eye on vey events happening here and there, news and views. The following folk song describes the hanging and sacrifice by myrtle Bhagat Singh 

            धन्य -धन्य भगत सिंहा
(सन्दर्भ :डा त्रिलोचन पांडे :कुमाउनी  भाषा और  साहित्य )

(इंटरनेट प्रस्तुती व व्याख्या - भीष्म कुकरेती )


धन्य -धन्य भगत सिंहा , धन्य तुम हणि I
पाणि को पिजिया बीरा , पाणि  को पिजिया I
फांसी हणि गयो वीरा , आजादी को लिजिया I
हल  हल आमाँ वीरा , हल  हल आमाँ I
आहा ते वीरा कैं फांसी है ,  सात बाजी शामा I
आबा न्है गया वीरा , बैकुंठ का धामा I
तै वीरा  आया हो वीरा , फूलों का विमाना I
खेली हाल तास वीरा, खेली हाल तासा I
भारत  माँ छ्पो वीरा , तेरो इतिहासा I
लसी पसी खीरा देशा , लसी पसी खीरा I
भारत जाहिर है गे , तेरी तसबीरा

O Bhagat Singh! We are obliged; we are obliged by your Sacrifice
O Bhagat Singh! For your fight for independence, you were hanged
O Bhagat Singh! At seven o clock evening, you were hanged
O Bhagat Singh! You reached to heaven
The flower airplane came to take brave Bhagat Singh 
O Bhagat Singh! Your history is published in India
O Bhagat Singh! Your photographs are seen all over India


Copyright (Interpretation) @ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com 14/8/2013
Folk Songs from Kumaon-Garhwal-Haridwar (Uttarakhand) to be continued...316 
   
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(स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी लोक गीत ; पिथौरागढ़  से स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; बागेश्वर से स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; चम्पावत से स्वतन्त्रता   आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; अल्मोड़ासे आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; से आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ;   से स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; नैनतालसे स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; उधम सिंह नगर से  आन्दोलन सबंधी कुमाऊंनी लोक गीत ; पौड़ी गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ;टिहरीगढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ;   चमोली गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; उत्तरकाशी गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; देहरादून गढ़वाल से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत ; हरिद्वार से  स्वतन्त्रता आन्दोलन सबंधी गढ़वाली लोक गीत श्रृंखला )

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Notes on South Asian Folk Song Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Pithoragarh Kumaon Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh;  South Asian Folk Song from Champawat Kumaon Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Bageshwar Kumaon Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Nainital  Kumaon Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Almora Kumaon Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Udham Singh Nagar Kumaon Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Chamoli Garhwal  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Rudraprayag Garhwal  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Pauri Garhwal  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Tehri Garhwal  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Uttarkashi Garhwal  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Dehradun  Garhwal  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Haridwar  Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from Himalaya Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; South Asian Folk Song from North India Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh; Oriental (South Asian ) Folk Song Remembering Sacrifice by Freedom Fighter, Martyr Bhagat Singh

Bhishma Kukreti

Great Uttarakhandi Personality from Malla Dhangu 
Dr. Achla Nand Jakhmola: A Prolific Linguistic Scholar

                       Bhishma Kukreti
                     Dr Achla Nand Jakhmola is one of the great linguistic scholars of Hindi and Garhwali. Dr. Achla Nand Jakhmola is said to be dictionary expert.
            Dr. Achla Nand Jakhmola was born in Gatkot village, Malla Dhangu, Pauri Garhwal in 1934. Gatkot village is famous for producing great teachers.
    Dr. Jakhmola got education from Gatkot, Silogi, Dehradun and Allahabad. After passing his MA degree he got D.Phil in 1961. Achla Nand is having diploma in Russian language and management. Dr Jakhmola has full knowledge of Sanskrit and Arabic languages.
Initially he joined teaching profession. Later on he was selected in Sales Tax department of Uttar Pradesh. Then he joined Army and retired as Lt Colonel from Indian Army.  He is well travelled personally and travelled Europe.
Dr. Jakhmola has credits for publishing tens of articles on languages and dictionary creation.  His books are published following book –

Madhyakalin Hindi Kosh Sahitya
Hindi Kosh Sahitya
Kosh Vidha evam Anya Shodh
Uttarakhand ki Lok Bhashayen
Under Publication
Garhwali-Hindi –Angreji Shabdkosh
English-Garhwali- Hindi shabdkosh
Garhwali Bhasha ke Analochit Paksh
Yayvar Sahitya
Great scholars as Dr. Dhirendra verma, Dr Hardev Bahari, Dr Mata Prasad Gupta, Prof D.dD.Sharma, Dr Sher Singh Bisht appreciated his works on languages and philology. 

Dr Jakhmola is busy in promoting Hindi and Garhwali languages in Dehradun.
Copyright@ Bhishma Kukreti 14/8/2013

Bhishma Kukreti

राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में  अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज

               राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 1


                                       भीष्म कुकरेती


लोक गीत लोकोन्मुखी होते हैं . लोक रचनाकार जो देखता उसे फोटोकॉपी जैसे चित्रित कर  देता है I हाँ रचना करते वक्त लोक धर्मी रचनाकार भौगोलिक , आर्थिक सामजिक व अपनी कल्पना और शब्द सामर्थ्य के हिसाब से रचना कर डालता है I
अंग्रेजी शासन में भारत पर कई तरह के अत्याचार व अनाचार हुए I ब्रिटिश  अत्याचारों का प्रभाव भारत के सभी वर्गों पर कुछ हिसाब से तकरीबन एक सा ही रहा है I
यही कारण है कि राजस्थानी और गढ़वाली लोक गीतों में अधिक साम्यता है I
निम्न राजस्थानी गीत में अंग्रेजी राज्य की अव्यवस्था और जनविरोधी कार्य की निंदा की गयी है


         देश में अंग्रेज राज आयो
         
   देश में अंग्रेज राज आयो , काईं काईं लायो रे I
  फूट नांकी भायाँ में , बेगार लायो रे
काली टोपी रे , हाँ हाँ काली टोपी रे
देश में घुत्यारो आयोरे भूरिया मुंडालो
अबु न अजमेर बच में डोडी हडकाँ नांकी रे
घोड़ी रोवे घास ने टावर रोवे दाणा ने
महलां ठुकराण्या रोवे , जामण जाया ने
इस राजस्थानी लोक गीत  में ब्रिटिश राज की बहाली की भर्त्सना की गयी है   की महगाई आदि व चीजों की कमी का रोना रोया गया है I घोड़े को घास नही दाणा नही मिलने की बात उठाई गयी है


ब्रिटिश राज में मंहगाई की मार

निम्न गढवाली गीत भी ब्रिटिश राज में रचा गया है और जनता की बदहाली को सामने रखता है



सूणा सूणा भाई बन्दों भारत को गीत जी
कना कना हाल ह्वेन कन ऐन अंग्रेजी रीत जी
हजार हजार का भैंसा ह्वेन दूध नी माणी जी
हौर चीज फंड फूका अंग्रेजी चा जरुर पीणा जी
डेरा मूं खंदेर आयूँ च खांद
सौदा  खाणकू रूप्या  नी कन आयो अकरी जी

इस गढ़वाली लोक गीत में गीत में भैस के दाम बढ़ गये हैं किन्तु दूध कम होता जा रहा है . और नई नई व्यसन घर कर गये हैं कि जिन्दगी जीना दूभर हो गया है


दोनों भाषाओं की गीत यथार्थ का पोर वृतांत बताने प्यूरी तरह समर्थ हैं .
दोनों भाषाओं के लोक गीत जन चेतना के लोक गीत हैं
दोनों भाषाओं के ये लोक गीत जो देखा गया , जो अनुभव किया गया उसे साफ़ साफ़ दर्शाने में समर्थ हैं I
दोनों लोक गीत दर्शाते हैं कि लोक रचनाकार को स्पस्ट कहने में कोई हिचकिचाहट बिलकुल भी नही है I
राजस्थानी और उत्त्रख्न्दी लोक गीत के रचनाकार निडर हैं और उन्हें बादशाहत का  कोई भय नही है किन्तु जन मानस की चिंता सता रही है और लोक रचनाकार अन्याय व अत्याचार को मौन स्वीकार नही करता है बल्कि वः किसी भी तरह मुखर हो उठता है I


Copyright@ Bhishma  Kukreti 14/8/2013


सन्दर्भ

डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली
डा शिवा नन्द नौटियाल , 1981 ,गढवाली लोकनृत्य -गीत , हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग
(राजस्थानी और  उत्तराखंडी के जन चेतना के लोक गीत;राजस्थानी और  गढवाली-कुमाउनी जन चेतना के लोक गीत; राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:;राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में  अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज; 
राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में सामयिक चेतना; राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में यथार्थ ; राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में निडरता के भाव ; राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में जनमानस  चिंता भाव ; राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में सामजिक चेतना के बोल ; राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में स्वतन्त्रता के भाव )