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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों  स्त्रैण्य शहर भ्रमण  इच्छा

                          राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 4 


                                           भीष्म कुकरेती

                      गाँव सुंदर होते हैं । गाँव का हवा पानी साफ़ कहा जाता है । शहर  रहस्यमय  करता है । तकरीबन हरेक ग्रामवासी शहर देखने की इच्छा रखता ही है । एक स्त्री की भी इच्छा शहर घुमने की इच्छा होती ही है । राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी ग्रामीण समाज में भी शहर भ्रमण  की इच्छा अवश्य रहती है । लोक साहित्य रचयिता तो समाज को देखता रहता है । लोक गीत रचयिता की नजरें हर समय समाज की आकांक्षाओं , , इच्छाओं , दमित इच्छाओं , प्रेम , क्रोध , आदि पर हर समय आँखें लगाये होता है और लिक गीत रचयिता की नजरों से कोई भी इच्छा छुप नही सकती हैं ।
                                 राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में स्त्रियों की शहर भ्रमण इच्छाओं का सुन्दर वर्णन हुआ है ।

                              राजस्थानी   लोकगीतों में स्त्रैण्य  शहर भ्रमण इच्छा गीत

           घर के काम काज से विवाहिता स्त्री के हाथों पर छाले पड़  गए हैं और वह अपने पति से शहर घुमने की इच्छा  व्यक्त करती है । निम्न गीत में नारी मानसिकता का पक्ष उभर कर आया है -


                 
म्हारे हाथड़िया रे बीच,
छाला पड़ गया म्हारे जी ।
मैं पालो कईयां काटूँगी ?
राखडी तो म्हारे बाप के सूंआई
तो जुठणारी गाड़ी   आवे म्हारा मारू जी । मैं पालो कईयां काटूँगी ?
जयपुर भी दिखायियो मैंने दिल्ली भी दिखायियो,
म्हाने आगरे की सैर करायियो म्हारा महारु जी । मैं ...
लाडू नही भावे , मैंने बरफी नहीं भावे,
घेवरिया रे गेरी मन में आवे म्हारा मारू जी । मैं पालो कईयां काटूँगी ?
गाडी नही बैठूं मै तो मोटर नहीं बैठूं ,
मैंने फिटफिटया की सैर करायियो । मैं पालो कईयां काटूँगी ?
(पाल = खेतों में खडी  फसल या पुआल ; मारू =पति )
इस प्रचलित  राजस्थानी लोक गीत में नायिका द्वारा पाल काटने से हाथों पर छाले पड़ गए हैं और वह अपने पति से जयपुर, दिल्ली , आगरा घुमने की इच्छा व्यक्त करती है साथ में घेवरिया खाने की इच्छा व्यक्त करती है । साथ में आग्रह करती है कि उसे मोटर या गाडी से भ्रमण नही करना है अपितु फिटफिटया से शहर घूमना है । इस राजस्थानी लोक गीत में स्त्री इच्छा का सामयिक वर्णन हुआ है ।


                         गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों  स्त्रैण्य शहर भ्रमण  इच्छा

गढवाली -कुमाऊंनी समाज में भी कृषि कार्य स्त्रियों के हाथ में ही होता है । मंगसिर और पूष महीने ही  स्त्रियों के लिए थोड़ा राहत के महीने होते हैं और इस किंचित विश्राम के समय में स्त्री अपने दिल्ली में रह रहे पति के साथ घूमना चाहती और अपना निर्णय सभी रिश्ते के सासुओं को इस प्रकार सुनाती है
कब आलो ह्यूंद  मंगसिर मैना ,
हे ज्योरू ! हे ज्योरू घुमणा कु  मीन दिल्ली जाण ।
प्यायी सिगरेट फींकि चिल्ला, घुमणा कु जाण मीन  लाल किल्ला
हे बड्या सासू , हे कक्या सासू ! घुमणा कु  मिन दिल्ली जाण ।
आलु प्याजो कु बणा इ साग आलु प्याजो कु बणाइ साग
घुमणा कु जाण मीन करोल बाग़ घुमणा कु जाण मीन करोल बाग़ ।
हे ज्योरू ! हे ज्योरू घुमणा कु  मीन दिल्ली जाण
होटल की रुटि खाण , होटल की रुटि खाण।
हे ज्योरू घुमणा कु  मीन दिल्ली जाण ।


इस गीत में भी मंगसिर  महीने में फुर्सत के दिनों चर्चा है   और दिल्ली शहर का चित्र उभारा गया है साथ में होटल में खाना खाने की बात बड़े आनन्द के साथ कही गयी है ।
वास्तव में दोनों भाषाओं के इन लोक गीतों में मानवीय मनोविज्ञान का परिपूर्ण चित्रं मिलता है । किसी भी उस ग्रामीण जिसने शहर नही देखा हो उस ग्रामीण के मन में शहर के प्रति मन में जो चित्र उभरते हैं उन चित्रों और मुख्य बिम्बों को इन लोक गीतों में उभारा गया है ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 20/8/2013

सन्दर्भ - लीलावती बंसल , 2007 , लोक गीत :पंजाबी , मारवाड़ी और हिंदी के त्यौहारों पर गाये जाने वाले लोक प्रिय गीत
गढवाली गीत संकलन - भीष्म कुकरेती

( राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन; राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों  स्त्रैण्य शहर भ्रमण  इच्छा; राजस्थानी लोकगीतों में स्त्री सुलभ इच्छाएं ;गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में स्त्री सुलभ इच्छाएं ; राजस्थानी  लोकगीतों में दिल्ली भ्रमण इच्छा ; गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में दिल्ली भ्रमण इच्छा )


Bhishma Kukreti

Woman wishing her Husband Death in British English and Garhwali Folk Song

Comparative Studies in British English and Garhwali-Kumaoni Folks Songs -1

                     Bhishma Kukreti

         The geography may differ, the color will be different in each region, the season may differ but human nature is same all across the world.
The folk poem creators are genius in finding the inner views of their society and its members.  The following folk songs from British English and Garhwali-Kumaoni languages prove that human wishes are same.
In following British English folk song is about a woman explaining as –
Every Night when I goes to bed
I lie and throw my leg o'er his him
And my hand I clap between his thighs
But I can't put any courage on him
I wish my husband he was dead
And in the grave I'd quickly lay him
And then I'd try another one
That's got a little courage in him
(From The Female Frolic, 1968)

Though, the situation is different but the same psychology comes out from a Garhwali folk song as under –
केकु बाबाजीन मिडिल पढायो
केकु बाबाजीन मिडिल पढायो
केकु बाबाजीन राठ  बिवायो
बाबाजीन देनी सैंडल बूट
भागन बोली झंगोरा कूट ।
बाबाजीन दे छई मखमली साड़ी
सासू नी देंदी पेट भर बाड़ी ।
जौं बैण्योंन साड़ी रौल्यों क पाणी
वा बैणि ह्वे गए राजों क राणी ।
जौं बैण्योंन काटे रौल्यों को घास
वा भूली गै राजों का पास ।
मै छंऊ बाबा राजों का लेख
तब मी पाए सौंजड्या बैख ।
दगड्या भग्यानो की जोड़ी सौंज्यड़ी
मेरी किस्मत मा बुड्या कोढ़ी ।
बांठा पुंगड़ा लड़बड़ी तोर
नी जैन बुड्या संगरादी पोर ।
बाबाजीन दे छई सोना की कांघी
सासू ना राखी छै मैना राखी ।
(गीत संकलन : डा कुसुम नौटियाल , गढ़वाली नारी : एक लोकगीतात्मक पहचान)

The folk song states as –
O Father! Why did you make me study eighth class?
O Father! Why did you marry me to Rath region (undeveloped region) ?
My father gifted me Sandal
But my luck forced me for pounding cereal   
My father gifted me in marriage a silk Sari
But my in mother law offered me just course food
The sisters were uneducated and were busy in labor works
Those sisters are queen
The sisters did cut grass from jungle
Those sisters are queens
I was father's darling
My husband is aged old man
My other friends got compatible husband
My husband is Old and weak as leprosy man 
I am sure my husband would not cross first of coming month
My father gifted me golden comb
My mother in law do not offer me clothing

                          Conclusion

Both the British-English folk song and Garhwali folk song are hyperbolic.
When played as drama or sung the above British-English folk song and Garhwali Traditional Song are hilarious and entertaining.
The British-English Traditional song and Garhwali folk song suggest an unhappy marriage.
The British-English Folk Song discusses bodily pleasure directly but Garhwali traditional song does not talk directly the bodily pleasure from mismatched marriage.
Wishing death for husband is just for creating witty situation in British-English Traditional Song and Garhwali folk song.

Reference for British English Folk Song
Kerry Firth, 2012 In Search of a Voice: Women in British Folk Music 1880-2011
Copyright@ Bhishma Kukreti  bckukreti@gmail.com   20/8/2013
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Bhishma Kukreti

South Asian Medieval History Features of King Pritam Dev Katyuri 

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 122

    Medieval   Asian History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath (Uttarakhand, India) - 3
          (Asian Medieval History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))
                          (Asian Medieval History (740-1200 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

  There is no mention of Narsinghdev in any inscription or dynasty record.  The Doti, Askot, and Pali Dynasty record or Family tree (Vanshavali) has similarities but there are no similarities in other dynasty records (Vanshavali)

                                      PritamDev: The Katyuri King of Baijnath

                 The Jagar or folk literature describe about PritamDev as Katyuri king. The folk literature provides his ten predecessors but folk songs do not mention Narsinghdev and Kartikeyapur. That shows that Pritam Dev was not direct heir of Nar Singh Dev family.  The Katyuri kings of Kartikeyapur used to get title of ' Param Bhattarak Maharajadhiraj Parmeshwar'.

                 In Katyuri kings of Kartikeyapur period, the army chiefs or other higher cadre authorities were called 'Raja'. However, folk sayings call Pritam as 'Raja'. That shows or suggests that the forefathers of Pritamdev were high cadre authorities of Katyuri kings of Kartikeyapur. There is not record available about the forefathers or Pritam Dev or Pritam Dev getting crown ship of Katyuri kingdom.
  There is no history record for Pundir kingdom. However, the folk saying describes that Amardev Pundir used to rule over Mayapur Hat.

                         Queen Moladei   
According to folk saying, Pritam Dev had many queens but did not have child. Childless and quite old aged Pritam Dev married with Moladei the daughter of Amardev Pundir. Amardev married his seven year old daughter with Pritamdev by fear and not by choice. 
            Moladei travelled Badrinath. She performed religious ritual of Narsingh deity at Joshimath and got son as blessing from Narsingh deity. This son was called Dula Dhamdev






Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 21/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -123
South Asian Medieval History of Baijnath/Baidyanath Katyuri to be continued...
  (Oriental Medieval History (740-1200 AD to be continued...)
Xx                 xxx                xxxx
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Bhishma Kukreti

 गढ़वाली-कुमाउंनी  और राजस्थानी लोकगीतों में  देवी देवताओं का  आम मानवीय आचरण
                      राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग-5 


                                           भीष्म कुकरेती

   भारत में सभी देवताओं को महा नायक  प्राप्त है । फिर भी लोक साहित्य में देवताओं को मानवीय व्यवहार करते दिखाया जाता है । राजस्थानी और गढवाली लोक गीतों में  देवताओं को मानव भूमिका निभाते  दिखाया जाता है । लोक गीतों में देवता अपनी अलौकिकता छोड़  में क्षेत्रीय भौगोलिक और सामाजिक हिसाब से में मिल गये हैं । लोक गीतों में शिवजी -पार्वती , ब्रह्मा , विष्णु सभी देवगण साधारण मानव  हो जाते है । लोक साहित्य विद्वान् श्री विद्या निवास मिश्र का कथन सटीक है कि "शिव , राम , कृष्ण , सीता , कौशल्या या देवकी जैसे चरित्र भी लोक साहित्य के चौरस  उतरते ही अपनी गौरव गरिमा भूल   कर लोक बाना धारण करके लोक में ही मिल जाते हैं । यहाँ तक कि लोक का सुख -दुःख भी वे अपने ऊपर ओढ़ने लगते  हैं । उसी से लोक साहित्य की देव सृष्ठि भी , अमानवीय और अपार्थिव नहीं लगती "

                                    राजस्थानी लोकगीत  में गणेश की मानवीय भूमिका
राजस्थान में  हैं जिसमें भगवान, देवी -देवता मनुष्य की तरह  दिखाए गए हैं । शिवजी -पार्वती प्रकरण हो या कृष्ण जीवनी संबंधित गीत हों अधिसंख्य  गीतों  में  देवी -देवताओं द्वारा मानवीय भूमिका निभाई जाती है ।
निम्न राजस्थानी  लोक गीत मांगल्य गीत है और गीत लग्न लिखवाने के वक्त का समय वर्णन करता है। गीत में गणेश जी से अच्छा सा लगन लिखवाने से लेकर विवाह सामग्री खरीदने के लिए आग्रह किया गया है । ऐसा लगता है जैसे गणेश एक आम बराती या घराती हों -
हालो विनायक , आयां जोसी है हालां
चोखा सा लगन लिखासां ,  म्हारो बिड़द विनायक
चालो विनायक , आयां बजाज रै हालां
चोखा सा सालूड़ा मोलावसां  बिड़द विनायक



'हल हांको महादेव हल हांको ईसर '... राजस्थानी लोक गीत ( रानी चूड़ावत द्वारा सम्पादित ) में पार्वती -शिव कृषि कार्यरत हैं।

डा 'जगमल सिंह द्वारा संकलित जीमो जीमो म्हारा कान्हा   ..." लोक गीत में कृष्ण का मानवीय रूप निखर कर आया है।
विवाह के अवसर पर कई राजस्थानी लोक गीतों में कई देवी देवताओं को मानव रूप में आने का न्योता दिया जाता है और  अनुष्ठान युक्त कृत्य जाता है जो साधारण मनुष्य करता है ।

                              गढ़वाली -कुमाउंनी लोकगीत  में देवताओं  की मानवीय भूमिका


गढ़वाली -कुमाउंनी लोक गीतों में भी देवी -देवता साधारण मनुष्यों जैसे वर्ताव करते दीखते हैं ।
निम्न गीतों में देवताओं को मनुष्य जैसा ही माना गया है और उत्तराखंड में बसने का सुभाव दिया गया है ।
चला मेरा देवतों भै जै मै को ।
उत्तराखंड जौलां भै ।
बद्री केदार , हरी हरिद्वार ।
धौळी देवप्रयाग भै जै मै को ।
देश की धरती , मलीच ह्वे गये ।
दिल्ली का तख्त रुइलो पैदा ह्वेगे।
    अनुवाद
चलो मेरे देवताओं भै जै मै को ।
उत्तराखंड जायेंगे
बद्री केदार , हरी हरिद्वार ।
धौळी देवप्रयाग
देश की धरती अपवित्र हो गयी है ।
दिल्ली के तख्त पर रुहिले पैदा हो गये हैं ।
गढ़वाली -कुमाउंनी लोक गीतों में अधिसंख्य लोक गीतों में भगवान और देवी -देवता मानवीय आचरण निभाते हैं जैसे - खेल गिंदवा ... ' जागर लोक गीत में कृष्ण का चरवाहा वाला रूप या नंदा जात जागर लोक गीतों में नंदा और शिव आम मनुष्यों की तरह वर्ताव करते हैं ।
          इस  प्रकार के गढ़वाली -कुमाउंनी व राजस्थानी  लोक गीत दर्शाते हैं कि भक्ति का अर्थ है मिल जाना और इन लोक गीतों में भक्त व भगवान में अंतर मिट जाता है । भगवान व देवियों को भी लोक जीवन की  पर आना पड़ता है ।
विवाह के अवसर पर कई गढ़वाली -कुमाउंनी और राजस्थानी लोक गीतों में कई देवी देवताओं को मानव रूप में आने का न्योता दिया जाता है और  अनुष्ठान युक्त कृत्य जाता है जो साधारण मनुष्य करता है ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 21/8/2013



सन्दर्भ

डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली
डा -नंद किशोर हटवाल , 2009 , विनसर पब्लिशिंग कं . देहरादून (गीत अनुवाद सहित -आभार )
राजस्थानी लोक गीत में इश्वर का  मानव रूप; राजस्थानी लोक गीत में देवी देवताओं का आम मानव रूप;राजस्थानी लोक गीत में शिव  का आम मानव रूप; राजस्थानी लोक गीत में पार्वती  का आम मानव रूप; राजस्थानी लोक गीत में राम  का आम मानव रूप;राजस्थानी लोक गीत में सीता का  आम मानव रूप;राजस्थानी लोक गीत में कृष्ण का मानव रूप; राजस्थानी लोक गीत में कृष्ण का आम मानव रूप; राजस्थानी लोक गीत में गणेश का आम मानव रूप; कुमाउंनी , गढ़वाली लोक गीत में  इश्वर का आम मानव रूप; गढ़वाली लोक गीत में  शिव का आम मानव रूप; गढ़वाली लोक गीत में  पार्वती का आम मानव रूप; गढ़वाली लोक गीत में  कृष्ण का आम मानव रूप; गढ़वाली लोक गीत में राम का  आम मानव रूप; गढ़वाली लोक गीत में देवी देवताओं का आम मानव रूप; गढ़वाली लोक गीत में सीता का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में देवी देवताओं का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में देवी का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में शिव का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में नंदा देवी का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में राम का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में सीता का आम मानव रूप; कुमाउंनी  लोक गीत में कृष्ण का  आम मानव रूप श्रृंखला ......

Bhishma Kukreti


                                     प्याज ! त्यार कथगा रूप ?

                               चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती


   इतिहास बतांदो बल मनिख  पांच हजार साल पैल प्याज खाण सीखि गे छौ ।  इतियासकार बुल्दन बल सबसे पैल पाकिस्तान अर इरान मा प्याजै खेती पवाण लग ।  चीन मा पांच  हजार साल पैल प्याजौ सग्वड़ हॊन्दा  छा । पुरण जमन मा यूनानी (ग्रीक ) बि प्याज तैं दवा माणदा  छा ।
                     कबि प्याज गरीब -गुरबों खाणो छौ बल  एक जखेली प्याज मा चार रुटि खै ल्यावो ! इजिप्ट /मिश्र मा पिरामिड बणाण वाळ मजदुर कच्चो  प्याज अर मूळी मा रुटि खांद छया । मिश्र मा प्याज तैं पुजद बि छा ।
आज प्याज का भौत सा रूप ह्वे गेन अब प्याज गरीबुं से भौत दूर ह्वे ग्यायि । जु प्रेम भाव कबि छौ, प्याजौ वो प्रेम भाव अब गरीबों पर नि रै गे  ।
अब प्याज अमीरुं जीमणु   पंगत मा दिखेंद या काळो बजार्युं क्वा ठों या गोदानुं मा । प्याज अब एक रत्न ह्वे ग्यायि जै पर अब केवल धनी लोगुं कब्जा च ।
हाँ अब धनी लोग पंचकवल का रूप मा दीन -दुखी -कोढियूँ तैं प्याज दान /भीख दीन्दन ।
आजाद भारत का रानीतिक इतिहास मा प्याजकथा अब  पंचगीत कथाओं मा से एक कथा च - इमरजेंसी , दिल्ली मा जनता राज , एच डी देव गौड़ा प्रधान मंत्री बणण, बोफोर्स कांड अर मैंगु प्याज से भाजापा राज्य सरकारूं  पतन। प्याज वोट मापक यंत्र ह्वे ग्यायि। प्याज की कीमतुं  से पता   चलदो बल लोग कैं पार्टी वोट द्याला ।
              प्याज कमाण वाळ (पैदा करण वाळ ) प्रदेस खासकर महाराष्ट्र का प्याज ब्यापारी प्याज की कीमत उंद -उब कौरिक राज्य सरकारूं निंद खराब करणा रौंदन । प्याज अब एक खेल बि ह्वे गे जैमा गरीब लोग बगैर मौत का ही  मरणा रौंदन ।
              प्याज रुलांद च गरीबों तैं अर जैं पार्टी तैं प्याजौ कारण बोट नि मिल्दन । किसानुं तैं जो दिखदन बल हम तैं त पांच रुपया कीलो ही मिल्दन पण बजार मा साठ रूप्या कीलो प्याज बिकणु च ।
           प्याज हंसांद च केवल काळुबजार वाळु तैं अर बीचवाळ बणियों तैं ।
             हमार उदार आर्थिक नीति का यि कुहाल छन बल पैल हम एक रूप्या लेक थैला भर प्याज लांद छया अब थैला भौरिक रूप्या मा एक दाणि प्याज आंद  ।
            प्याज अब राजनैतिक -आर्थिक तांत्रिक विद्या  मा पंचचक्र च -प्याज राज चक्र, प्याज भंडारीकरण  चक्र , प्याज बिचौलिया चक्र , प्याज निर्यात चक्र , प्याज मंडी चक्र । हरेक चक्र मा कथगा इ चक्रव्यूह छन जै तै आम जनता पार नि करी सकदी । प्याज का भीतर उथगा परत (छुक्यल) नि होंदन जथगा  कृषक से आम जनता तक प्याज पौंछाणो बीच मा परत (बिचौलिया ) होंदन । हरेक छुक्यल इथगा मुनाफ़ा कमांदु कि जनता की टक अर कमर ही टुटि जांद ।
   प्याज अब केवल प्याज नि रै ग्यायी बलकणम प्याज अब संसद अर विधान सभा मा व्यवधान पैदा करण को माहामारी हथियार ह्वे ग्यायि प्याज अब संसद अर विधान सभा की कार्यवाही स्थगित करणों एक विध्वंसक आयुध ह्वे ग्यायि । राजनैतिक पार्ट्यु बान प्याज हुंकार च डुंकरताळ च । प्याजै कीमत आम जनता का बान हुंडन (सुन्न ) होणै  एक जहर च, जहरीला  अनेस्थिया च ।
         प्याज अब सामाजिक रुतबा पाणों एक आभूषण ह्वे ग्यायि जो प्याज खांदो वो ही मातबर माने जांद ।
          प्याज अब गरीबों बान हीण,छ्वाड़ -तीरौ  , दीन, तुच्छ , नाचीज , हूणो निसाणी च। प्याज आम मनिखों बान  कमजोर हूणो  सूचक च ।
               प्याज की बेलगाम बढ़दी  कीमत बथांद बल भारतंम  कुरज्या फ़ैलि गे । प्याज की कीमतों मा असामयिक वृद्धि सिद्ध करदी कि भारतम अधेरगर्दी को राज च । प्याज की अंदादुंद मूल्यवृद्धि बथांदि की हिन्दुस्तान मा काणा -अंधा -बहरा -संज्ञाशून्य  राज करणा  छन  ।
              जु प्याज की कीमतों तैं स्थिर नि कौर सकणा छन वु बेशरम , बेहया लोग खाद्य सुरक्षा की बात कौरिक आम लोगुं बीच बजार मा बेज्जती करणा छन ।
               जु प्याज जन आम खाद्य पदार्थ तैं आम खाद्य पदार्थ नि राख साकल वु क्या भारत तैं खाद्य सुरक्षा द्याल ?


Copyright@ Bhishma Kukreti 22  /8/2013






[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...]   

Bhishma Kukreti

Asian Middle Age History Characteristics of Katyuri Kings -Dhamdev and Brahmadev

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 123

    Asian Middle Age History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath (Uttarakhand, India) - 4
          (Asian Middle Age History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))- (740-1200 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

                            The Katyuri King Dhamdev
                     Various folk sayings state that Dhamdev was brave person with strength and vigorous courage. Once, in jealousy, his step mother advised his father PritamDev to send Dhamdev for fighting with very brave and dangerous rebellion Jagas (Yaksha) Samva in Patlidun. Dhamdev reached Patlidun. As per advice of Samva, Dhamdev killed his father Pritamdev and became Katyuri King.

                         The Katyuri King Brahmadev

            The three Katyuri family trees suggest that Brahmadev was heir of Dhamdev. There is no literature available about Brahmadev Katyuri. The guess is that Patlidun-Bhabar region were under his Katyuri rule.
   
Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 22/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -124
Asian Middle Age History of Baijnath/Baidyanath Katyuri to be continued...
  (Oriental Middle Age History (740-1200 AD to be continued...)
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Notes on Asian Middle Age History Characteristics of Katyuri Kings Dhamdev and Brahmadev;
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Bhishma Kukreti

                                 उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


                                      प्रस्तर  युग में   उत्तराखंड में कृषि व भोजन (Food and Agriculture in Stone Age)


                                                      आदि प्रस्तर युग में भोज्य पदार्थ भोजन विधि

                        प्रस्तर युग के उपकरणों से पता चलता है कि हिम युग अंत के पश्चात उत्तराखंड में मानव विचरण शुरू हो गया था । गंगाद्वार (हरिद्वार ) के समीप आदि प्रस्तर युग के फ्लेक , स्क्रैपर्स , चौप्र्स आदि के निसान मिले हैं । यह सिद्ध होता है कि सोन -मानव टोली हिमालय की कम ऊँची पहाड़ियों (जम्मू से नेपाल तक ) विचरण करती थीं ।
              इस युग में मांस , कंद -मूल -फल भोज्य पदार्थ थे
   अनुमान है कि सोन मानव युग में मनुष्य ने शिला -चौपर्स या गंडासा जैसा उपकरण बनाना सीख लिया था  । वर्तमान गंडासे जैसा शिला उपकरण से मांस , कंद -मूल -फल काटा जा सकता था । मांस या कंद-मूल की  छोटी छोटी बोटियाँ काटने के लिए शिला गंडासे पर दांत नुमा शिला दराती भी थीं ।
  आखेट हेतु इस युग का मानव एक जगह नही रुकता था । उत्तराखंड में सोन मानव कौन से पशुओं और वनस्पतियाँ को खाता था  यह पूर्णत: नही पता है ।
डा के . पी . नौटियाल , सकलानी व विनोद नौटियाल का लेख

                                                   मध्य प्रस्तर  युग में भोज्य पदार्थ भोजन विधि
१५००० साल पहले के इस युग में कास्ट , अस्थि व पत्थर उपकरण प्रयोग में थे और इन उपकरणों में निखार आ गया था । अब ये उपकरण अधिक हल्के, कलापूर्ण  व सुडौल बनने लगे थे जो कि उस समय के भोजन खाने की विधि पर प्रकाश डालते हैं ।
  चकमक पत्थर की समझ से मानव को आग के लाभ मिलने लगे थे । यही समय था जब मांस को भुनकर खाने की शुरुवात हुयी ।

                                              उत्तराखंड में प्रस्तर छुरिका -संस्कृति और मानव भोजन
      इतिहास कार डा शिव प्रसाद डबराल लिखते हैं कि हरिद्वार के पास डा यज्ञ दत्त शर्मा को प्रस्तर उपकरनो के साथ ऐसी शिलाएं भी मिली   जो  उत्तराखंड में प्रस्तर छुरिका -संस्कृति होने के संकेत देते हैं ।  इस संस्कृति युग में भी आखेट व पशु भक्षण आदि मानव भोजन था   । गुफाओं व पर्ण कुटीरों में रहने का अर्थ है कि मनुष्य भोजन भंडारीकरण भी करता होगा । 
          इस समय का मानव आखेट संस्कृति से आगे नही बढ़ पाया  था   ।
                    प्रस्तर छुरिका -संस्कृति में यहाँ के मनुष्य का भोजन वनैले गाय , बैल , भैस , घोड़े , भेद -बकरियां , हिरन चूहे , मछली व घड़ियाल का मांस था ।
  कंद मूल फल जो पाच जाता हो  होगा ।

                                                  उत्तराखंड में उत्तर प्रस्तर संस्कृति और मानव भोजन


                     उत्तर प्रस्तर संस्कृति याने १५०००-से ५५०० वर्ष पूर्व के संस्कृति में मानव सभ्यता में कई परिवर्तन आये ।

                                     उत्तर प्रस्तर संस्कृति में पशु पालन का श्रीगणेश


                   उत्तर प्रस्तर संस्कृति में पशु पक्षियों का पालन शुरू हुआ । कुत्ते को पालतू बनाने का कार्य इसी युग में हुआ इसी युग में पशु पालन विकास उत्तराखंड में हुआ । डा मजूमदार व पुसलकर का मानना है कि उत्तराखंड  भूभाग उन थोड़े से भूभागों में से एक है जन्होने जंगली जानवरों को पालतू बनाया ।
  शिवालिक की पहाड़ियों व मैदानी हिस्सों में तोते , चकोर आदि पक्षियों को पालने के प्रक्रिया भी शुरू हुयी ।
           
                                                             कृषि प्राम्भ
                                     उत्तराखंड में इसी युग में कृषि शुरू हुई ।
गेंहू , जाऊ, चना, फाफड़ , ओगल , कोदू , उड़द व मूंग की जंगली जाती पाए जाने से इतिहास कार सिद्ध करते हैं कि यहाँ इस युग में कृषि करते थे और आग में भूनते थे । जंगली प्याज , बथुआ, हल्दी , कचालू , चंचीडा, नाशपाती , अंजीर , अंगूर , केला, दाडिम , चोलू,आडू  आदि के जंगली प्रजातियाँ भी संकेत देती है की यहाँ इन वनस्पतियों का प्रयोग भली भांति भोज्य पदार्थ क एरुप में होता था (मजूमदार ) ।
  उस समय में भी औरतें कृषि कार्य में लिप होती थीं । औरतें बाढ़ की गीली मिटटी में बीज बिखेरकर  कृषि करती थीं । औरतें गुफा में आग बचाने का भी कम संभालतीं थीं । औरतें पत्तों व मिटटी के पात्र बनाती थीं . नारी ही हड्डी , पत्थर या लकड़ी की कुदाल से कंद मूल खोद कर लती थी । पुरुषों का कम उस समय आखेट,  अन्य वस्तियों से अपनी वस्ती के रक्षा करना व अन्य वस्तियों पर आक्रमण में संलग्न रहता था ।

शेष  -- उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास भाग ... २ में
                   
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( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )                                   



Bhishma Kukreti

गढ़वाली-कुमाउंनी  व राजस्थानी लोकगीतों में नैवेद्य चढ़ावा व पशु बलि

                       राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग-6 


                                           भीष्म कुकरेती

         बहुदेव वाद भारतीय धर्म के अपनी विशेष विशेषता है । हिन्दुओं के देवी -देवताओं की अपने अपने  प्रिय भोज्य भी हैं और भक्त उसी भाँती नैवेद्य , फूल और पत्तियाँ क्म्न्दिर में चढाते हैं ।कुछ देवता निरामिष हैं तो जुछ देवता -देवियाँ मान्शाहारी हैं ।


                                         
                                       राजस्थानी लोक भक्ति गीतों में नैवेद्य चढ़ावा व पशु बलि


राजस्थान में कुछ  देवी -देवता यथा भैरूं जी , माता जी ऐसे देव हैं  जो सामिष भोगी हैं और उन्हें पशु बलि चढ़ाई जाती है । निम्न लोक गीत माता जी की अर्चना संबंधित गीत है । इस राजस्थानी लोक गीत में पशु बलि याने बकरियां व पशु बलि चढ़ावा की बात लोक गीत में कही गयी है ।
थारा तो मंदरिया में कोई बाजे ए ! धोला में' लारी धारणी !
थारा तो मन्दिर में काईं बाजे ए गढ़ दांता री धारणी !
xxx                          xx
बूटिया तो कानों रे बकरियों , काला तो माथा रो भैंसों चाढूँ !
  थारे तो शरण आयोड़ो ने होरा राखि ए ! धोला में' लारी धारणी !

माता जी के ही नही भैरूं जी  बकरे लेकर भक्तों की मनोवांछा पूर्ण करते हैं और बकरे के साथ मदिरा भी नैवेद्य में चढ़ाया जाता है -
एक झडूल्या रे कारणै म्हारो जी बोले म्हाने बोल
सरतालों भैरूं अणवट नूतिया
भैरूं दूध पीजै न मदड़ो (मदिरा ) छोड़ दे
xxx
भैरूं बोकड़िया रा देवूं थानै भोग
चरतालो ओ भैरूं अणवट नूतिया ।
उपरोक्त लोक गीत में एक बंध्या स्त्री पुत्र प्राप्ति कामना से भैरव के पास गयी और मदिरा व बकरे का भोग देने को तैयार है ।

                                     गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में नैवेद्य चढ़ावा व पशु बलि


गढ़वाली संस्कृति में कई देवी -देवताओं को सामिष व शाकाहारी नैवेद्य चढाने का रिवाज है । अठ्वाड़ में तो आठ तरह के जानवरों की बलि चढ़ाई जाती है ।
निम्न लोक भक्ति गीत में देवताओं को शाकाहारी नैवद्य चढाने की बात कही गयी है ।
रे नरु फरस्वाण, मै घुघती । 
कै देवु जातरा ? मै घुघती ।
केदार जातरा ,  मैं घुघती ।
भेंटुला  क्या पांजी ? मै घुघती । 
मोरी को कंळदार , मै घुघती ।
कलेऊ क्या पांजी ? मै घुघती । 
वो च्यूड़ा -भुजला , मै घुघती । 
सामल क्या पांजी ? मै घुघती ।
कै देवू जातरा ? मै घुघती । 
भुम्याले जातरा , मै घुघती । 

...
रे  नरु फरस्वाण, मै घुघती ।
किस देवता की यात्रा ?मै घुघती ।
केदार की यात्रा , मै घुघती ।
भेंट क्या रखी ? मै घुघती ।
मोरी का कंलदार (पैसे ), मै घुघती ।
कलेवा क्या रखा ? मै घुघती ।
भूजे हुए चूड़े ,मै घुघती । 
सामग्री क्या रखी ? मै घुघती ।
किस देवता की यात्रा ? मै घुघती ।
भूमिपाल की यात्रा , मै घुघती । 
  रवाई क्षेत्र में प्रचलित दुर्योधन जागर में दुर्योधन देवता को बकरा और भेड़ चढ़ाने की बात इस प्रकार कही गयी है -

                  दुर्योधन पूजा लोक गीत



तू लाइ सच्ची हामू, देव दुर्योधन

हामू देई ताई भेड़ी, देव दुर्योधन

चार सिंगा खाडू ,देव दुर्योधन

बात रीत लाणी , देव दुर्योधन

भेड़ी देऊ भौत ,देव दुर्योधन

रवाइं क्षेत्र में दुर्योधन एक देव की तरह पूजा जाता है और उपरोक्त  भक्ति गीत इस बात का परिचायक है -

तू सच्ची बात बताना,  हे देव दुर्योधन

हम तुम्हे भेड़  देंगे , हे देव दुर्योधन

हम तुम्हे चार सीग वाला खाडू -मेढ़ा देंगे , हे देव दुर्योधन

तेरे मन्दिर में लाऊंगा ,हे देव दुर्योधन

तुम हमारे बारे में बताना , हे देव दुर्योधन

मई तुम्हे बहुत सारी भेद दूंगा , हे देव दुर्योधन

मेरी कुशलता के बारे में मालूम करते रहना  , हे देव दुर्योधन

इस प्रकार हम पाते हैं कि क्षेत्र के भक्ति लोक गीतों में शाकाहारी व मान्शाहारी नैवेद्य व बलि के गीत पाए जाते हैं



Copyright@ Bhishma  Kukreti 22/8/2013



सन्दर्भ

डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली
डा -नंद किशोर हटवाल , 2009 , विनसर पब्लिशिंग कं . देहरादून (गीत अनुवाद सहित -आभार )
सन्दर्भ: डा जगदीश नौडियाल , 2011 उत्तराखंड कि सांस्कृतिक धरोहर,विनसर पब्लिशिंग कं . देहरादून

(राजस्थानी भैरूं जी पूजा लोक गीत  पशु बलि ; राजस्थानी माता जी पूजा लोक गीत में पशु बलि ; राजस्थानी माता जी पूजा लोक गीत में नैवेद्य विषय ;राजस्थानी भैरूं जी पूजा लोक गीत में नैवेद्य ; गढ़वाली कुमाऊँ लोक गीत में नैवेद्य ;गढ़वाली कुमाऊँ लोक गीत में पशु बलि ; रवाइं -गढ़वाली लोक गीत में पशु बलि; रवाइं -गढ़वाली दुर्योधन पूजा लोक गीत में पशु बलि; गढ़वाली कुमाऊँ केदार जातरा लोक गीत में नैवेद्य ; गढ़वाली कुमाऊँ क्षेत्रपाल पूजा लोक गीत में नैवेद्य।; उत्तराखंडी पूजा लोक गीत में नैवेद्य; उत्तराखंडी पूजा लोक गीत में पशु बलि, हिमालयी पूजा लोक गीत में नैवेद्य; हिमालयी पूजा लोक गीत में पशु बलि , उत्तर भारतीय पूजा लोक गीत में पशु बलि, उत्तर भारतीय पूजा लोक गीत में नैवेद्य )


Bhishma Kukreti

                             सन्  2113 मा ब्यौ छ्वीं कन लगलि !

                                चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती

                सन्  2113 तक आंद आंद विवाह संस्था या मैरिज इंस्टीट्युसन प्रथा इन नि रालि जन आज च । अंतरजातीय ब्यौ ,  जब नि निभो या जब मर्जी आवो तब तलाक दे द्यावो प्रथा से जाति -पांतों भेदभाव ख़तम ह्वे जालो । हाँ नाम मातरो नामौ आखिरम पिता  की जाति लगाणो रिवाज जरुर रालो ।
  तब शहरों मा अधिकाँशत: ब्वे-बाबुं तैं अपण बच्चों बान वर -ब्योलि खुज्याणो जरुरत कमि पोड़लि , पण नई जाति व्यवस्था अवश्य ऐ जालि किलैकि वर्ग , वर्गी करण, जाति व्यवस्था कबि खतम नि ह्वे सकदी।
एक नौनु ऑफिस जांद जांद अपण बुबा जी  मा ब्वालल - डैड मि परस्यूं ब्यौ करणु छौं जऱा कै पंडितौ कुंण बोलि दियां कि अधा घंटा कुण होटल मी लार्ड मा सवा छै बजि ऐ जावो ।
बुबा - ओ त ठीक च पण नौनी खानदान (इंटरनेट कु सोसल मीडिया या फेस बुक को ग्रुप ) क्वा च ?
नौनु -डैड शी बिलौंग्स टु वीमेन लेबर क्लास सोसल ग्रुप ।
बाबु -अरे शरम नि आणि त्वे तैं लेबर क्लास ग्रुप की नौनि से ब्यौ करद ? अरे आखिर म्यार सोसल ग्रुप च -प्रोबेसनरी ऑफिसर ग्रुप , तेरि ब्वेक सोसल ग्रुप च 'खांद पींद घौरौ जनानी ग्रुप ' अर तू बि त 'प्रोमिसिंग ग्रुप' कु छे । फिर क्या जरुरत छे लेबर ग्रुप की नौनि दगड़ ब्यौ करणों ?
नौनु - डैड बेकार होलि त तिसर दिन तलाक दे द्योलु । क्या च ?
बुबा - अबे तलाक दीण क्वी मजाक बात च क्या ? तेरि पैलि मौस्याण ब्वे याने तेरो बड़ो भाइक ब्वे छे । दिख्याणम बांद छे ।  डेटिंग मा त वीन बोलि दे कि वा 'पतिव्रता नारी सोसल ग्रुप' की सदस्य च । अर ब्यौ बाद पता चौल कि असल मा वा 'घुमन्तु आत्मा ' सोसल ग्रुप की सदस्य च । तलाक लीणो बाद मि आज तक   दस लाख रूप्या मैना वींको डांड भरणु छौ अर त्यार  बड़ो भाई तैं पाळ स्यु अलग । डेटिंग कैको बि दगड़ कारो पण ब्यौ करण त नौनिक सोसल ग्रुप थोक बजैक , देखि भाळिक करण । निथर म्यार तरां पछ्तैलि अर सरा जिंदगी तलाको पैसा भरणि रैलि !
नौनु - नो डैड ! मि तैं भरवस च कि वा ठीक रालि । छ्वट सोसल ग्रुप की नौनि बड़ो सोसल ग्रुप का घौर आवो त वा जरा डरीं बि रौन्दि !
ब्वे - पण तीन दिन पैल त तू कैं हैंकि दगड़ डेट पर गै छौ ।
नौनु - हाँ मॉम ! वा 'इलिट वीमेन' सोसल ग्रुप जातिक छे अर  जब वीं तैं पता चौल कि मि 'प्रोविंसियल   क्लरिकल' सोसल ग्रुप कु सदस्य छौ त वींन होटलम डिसाणम ( बिस्तरा मा)  इ   ब्यौ करण से मना करि दे ।
ब्वै - बुबा अंक्वैक हां । इन नि ह्वावो जु लीणो -दीण पोड़ी जावन हाँ !
नौनु - अच्छा डैड -मॉम ! मि अब ऑफिस चलदो, उखि नेट वीडिओ कौनफ्रेंसिंग से हम  बात कौरि ल्योला ! हाँ ब्वे तू अपण तरफांन छै आदिम अर बुबा जी अपण तरफांन तुम सात आदिम ब्यौ मा बुलै देन । म्यार बजेट जादा नी  च । सी यू ऐट  नाईट ।
  तब सोसल ग्रुप से मनिख़ -मनिख्याणि औकात , सक्यात, पछ्याणक , आचार -विचार का   पता चौललि अर ब्यौ करणों आधार इन्टरनेट सोसल ग्रुप ह्वे जालो पण सरकारी कर्मचारी इन्टरनेट सोसल ग्रुपुं से अलग फैदा उठाला । जन कि -
नौनि - डैड -मौम ! मि श्याम दै ब्यौ करणु छौं !
ब्वे - कैक दगड़ ? सुभाशौ दगड़ ? जैक दगड़  नितरसि डेटिंग पर गे छे ? सोसल ग्रुप तो वैक भलो छौ -'हाई क्लास ऑफिसर ग्रुप' ?
नौनि - हाँ सोसल ग्रुप तो वैक  में से बड़ो छौ पण मॉम सरकारी अधिकारी ह्वेक बि वो घूस नि लींद ।  मि तैं जब पता चौल कि वू घूस नि लींद त मीन बेड  मा जाण से पैलि ब्यौव कुण ना बोलि दे।
बुबा - ठीक कार जु ना बोलि दे । अरे ! सरकारी नौकरी मा ह्वेक बि घूस नि ल्यावो तो वै से बेकार मनिख ईं दुन्याम ह्वे इ नि सकदन । रोज यूंक ट्रांसफर हूणु रौंद अर गली का कुत्ता जन जिंदगी कबि  ये शहर या कबि वै शहर डबकणा रौंदन ।
ब्वै -अच्छा ! इन बथादि कि यु नौनु कै सोसल ग्रुपौ च ?
नौनि -  'लेफ्ट विंग राइटर संघ' सोसल ग्रुप को मेम्बर  च ।
ब्वै - ये निर्भागण ! क्या करणि छे तू ? एक त लेखक अर फिर लेफ्ट विंग ! एक त करेला कु दगड्या गींठी अर फिर नीमौ डाळम  । तेरी कमाई खाण वै लेखकन । अबि बि बगत च , ना बोलि दे तै निक्कजो लेखक तैं ।
नौनि - ओ मॉम ! 'लेफ्ट विंग राइटर संघ' सोसल ग्रुप तो सिरफ एक कवर अप सोसल ग्रुप च ।
बुबा -कवर अप सोसल ग्रुप ?
नौनि - हां डैड ! असल मा उ त सेल्स टैक्स विभाग मा क्लर्क च अर वैकि अंडर द टेबल कि बेहंत कमाई च त असलियत  छुपाणो बाण वो 'लेफ्ट विंग राइटर संघ' सोसल ग्रुप को मेम्बर बण्यु च । यीं उम्र मा वैक द्वी फ़ार्म हाउस छन अर कोर्ट मैरिज करदा करदा वो एक फ़ार्म हॉउस म्यार नाम कौरि द्यालो । फिर तलाक ह्वे बि ग्यायि तो क्या ह्वाइ !
बुबा - हाँ फिर ठीक च । उन होशियार त तू अपणि ब्वेक तरां छे हाँ !
नौनि - ओ डैड ! थैंक्स फॉर कंप्लिमेंट्स  । अच्छा आइ  ऐम ग्रेटली सौरि मि तुम तैं ब्यौकुण न्यूत नि दे सकणु छौं । किलैकि ब्यौ मा केवल सेल्स टैक्स क्लर्क अर टैक्स चोर कंपन्यूं मालिक  बुलायां छन । एक फ्रॉड मा फंस्युं व्यापारी शादी स्पोंसर करणु च। रिस्तेदारुं वास्ता अगला हफ्ता फार्म हॉउस मा पार्टी च ।
बुबा - डार्लिंग चिंता नी च । हम तै याही ख़ुशी भौत च कि तीन एक कमाऊ बकरा फंसाइ ! एक बात बथादि तीन यु कमाउ बुगठ्या कनै फ़ंसाइ ?
नौनि - एक्सचेंज मा ।
ब्वै -अदला बदली मा ?
नौनि -हाँ ! वा मरी सहेली नी च गबरेली !
बुबा - जैंमा अपण नाना की करोड़ो की जायजाद च ?
नौनि - हाँ ! वीं तैं सत्यवादी सरकारी अधिकारी चयाणु छौ अर मि तैं कमाउ सरकारी अधिकारी । बस हमन अपण अपण डेटिंग  दोस्त बदली देन । अब हम द्वी खुस छंवां
बुबा -ब्वै - वी आर प्राउड ऑफ़ यू !


      Copyright@ Bhishma Kukreti 23  /8/2013



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक मसखरी  दृष्टि से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  के  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वाले के  पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले के  भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले के  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले के वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  के पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक के विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक के पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक के सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखक का सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक के राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य श्रृंखला जारी ...] 


Bhishma Kukreti

South Asian Middle Age History Characteristics of Baijnath Katyuri King – Vir Dev /Beer Dev 

History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon, Haridwar) - Part 124

    South Asian Middle Age History of Katyuri Imperialism of Baijnath/Baidyanath (Uttarakhand, India) - 5
          (South Asian Middle Age History of Garhwal, Kumaon, Haridwar, Doti Nepal (Uttarakhand, India))- (740-1200 AD)

                                              By: Bhishma Kukreti

             According to legend and analysis by historians suggest that Veer Dev was last Emperor of great Katyuri Kingdom.
     There was disintegration of Katyuri Kingdom after death of Veer Dev Katyuri. No records or inscriptions are found about Veer Dev. Birdev/Beer Dev/Veer Dev/ Virdev/Vir Dev was cruelest Kings in the history of Uttarakhand as cruel as Gorkha rulers. Still, Uttarakhand perform rituals for  Veer Dev as cruel village deity or Ragas.
                       Title of Veer Dev Katyuri in South Asian Middle Age History Context
'Maharajadhiraj' was the title of Veer Dev Katyuri in folk legends as 'Maharajan ke raja! pedon par fal-ful ni rahond dina' . That shows that the major part of Baijnath Katyuri kingdom was intact in Virdev period.

                  Character of Katyuri King Virdev in South Asian Middle Age History Context

               Jagar legends suggest that Veer Dev Katyuri was brave, courageous, active, and obstinate/determined.  Once he decided he would not leave the work half done and used to complete the decided job.  In rage, Katyuri king Beerdev destroyed the high altitude fortes of his chiefs and founded them at low altitude.  It is said in legend that he also grounded hills to change hills into plain. Definitely exaggeration is there in those points.  The folk song is as-
Hankaro tumaro baba ! jis unchaa gadh neechaa banaya
Neecha gadh uncha banaya , mar gadh maidan bnaya
Hankaro tumara baba ..
Tarni tiriya rhon ni dina
Baruni baakri rhon ni dina
        Virdev Katyuri was greedy and used to snatch whatever he liked from his subject. He used to kidnap the girls or women he liked. He used to snatch goats, caws from his subject.
             The Jagar criticized Veer Dev Katyuri for his marrying with maternal aunt Teela as-
'Mami tile Dhari bola ...'

          Revenue and Taxation in Vir Dev Katyuri Period in South Asian Middle Age History Context

The tax was collected in kind as there is no proof of coins. The government emplyess were strict in collecting taxes in kind. They never provided relaxation even in worst time of drought or flood. The following folk saying provides the taxation custom in South Asian Middle Age Katyuri King Virdev –
Banja ghat ki bhag ugauni , banji gai ki doodh chheenee
The people had to provide tax of flour. The king employees used to filter the flour by seven mats. The tax was given by finest flour sieved through seven mats.
In case of shortage of tax, the king used to seize sons and daughters as slaves.
The king was passionate to get fresh water from Hatchhina spring. People used to stand in line from Hatchhina spring near Kasuani to palace for twelve miles. Then water vassal form spring was transferred from person to person.

                    Death of Veer Dev Katyuri King in South Asian Middle Age History Context


           The king used to fasten iron rings on the shoulders of the litter bearers and pass through them with poles of Dandi or Pinas so that the bearers would not throw him into down valley or precipice. However, the bearers threw him down and also sacrificed their lives for good to all people
This way the dynasty of this Katyuri branch also ended. However, other branches of Katyuri flourished in Kumaon and parts of present Nepal.
Period of Baidnath Katyuri Kingdom –
Narsingh Dev, PritmaDev, Dhamdev, Brahmadev and Veer Dev Katyuri – 1000-to 1090 or 1100 AD


Copyright@ Bhishma Kukreti -bckukreti@gmail.com 23/8/2013

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
   
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand) to be continued... Part -125
South Asian Middle Age History of Baijnath/Baidyanath Katyuri to be continued...
  (Oriental Middle Age History (740-1200 AD to be continued...)
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