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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

     News about Garhwali Drama
दिल्ली में उत्तराखंड नाट्योत्सव-2015 का आयोजन ऐतिहासिक पहल!
-    सुरेश नौटियाल

देश की राजधानी दिल्ली और इसके आस-पास के इलाकों में उत्तराखंड की तीन प्रमुख भाषाओं -- गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी -- में से गढ़वाली नाटकों की परंपरा सबसे अग्रणी और महत्वपूर्ण रही है. पिछले डेढ़-दो दशक से लगभग नेपथ्य में जा चुकी इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास 2013 में द हाई हिलर्स ग्रुप ने किया पर उत्तराखंड के केदारनाथ और अन्य क्षेत्रों में आपदा आने के कारण यह प्रयास स्थगित रह गया. इसके बाद, फरवरी 2014 में विनोद रावत, सुरेश नौटियाल, दिनेश बिजल्वाण और प्रताप सिंह शाही ने ऐसा ही प्रयास किया. इन लोगों के साथ मिलकर इस संवाद को डॉ. सुवर्ण रावत,खुशहाल सिंह बिष्ट, हेम पंत, चारु तिवारी, भूपेन सिंह, लक्ष्मी रावत, चंद्रकांत नेगी, हेमा उनियाल, दयाल पांडे, देवेन्द्र बिष्ट, अनीता नौटियाल, सुनील नेगी, विनोद नौटियाल, राकेश गौड़, गणेश रौतेला, संयोगिता ध्यानी और किशोर शर्मा इत्यादि जैसे रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों ने आगे बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन बात तब भी बन नहीं पाई.

बहरहाल, अब 2015 में इस प्रयास को साकार किया विनोद रावत ने 2011 मेंस्थापित अपनी संस्था कालिंका चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम तथा सुरेश नौटियाल,दिनेश बिजल्वाण और सुनील नेगी के विशेष सहयोग से. हेम पंत, लक्ष्मी रावत,विनोद बड़थ्वाल और खुशहाल सिंह बिष्ट के अतिरिक्त उत्तराखंड नाट्योत्सव-2015 आयोजन समिति के सदस्यों और जूरी-सदस्यों का भी इस आयोजन में प्रत्यक्ष और परोक्ष योगदान रहा. अंतत:, उत्तराखंड नाट्योत्सव-2015 के नाम से यह आयोजन 5 से 8 नवंबर तक नयी दिल्ली स्थित पुरुषोत्तम हिंदी भवन आडिटोरियम में किया गया. इस काम को अंजाम देने के लिए नाट्योत्सव आयोजन समिति का गठन विनोद रावत की अध्यक्षता में किया गया था जिसमें सुरेश नौटियाल, दिनेश बिजल्वाण, सुनील नेगी, लक्ष्मी रावत, हेम पंत, प्रेम गोसाईं, प्रताप सिंह शाही, राजीव बडथ्वाल और शिवचरण मुंडेपी सदस्य थे. इसके साथ ही, वरिष्ठ नाट्य-समीक्षक दीवान सिंह बजेली की अध्यक्षता में जूरी का गठन किया गया जिसमें एनएसडी से रंगकर्म में प्रशिक्षित डॉ. सुवर्ण रावत के अतिरिक्त रंगकर्मी हेम पंत और लक्ष्मी रावत तथा गढ़वाली संस्कृति के विशेषज्ञ डॉ. सतीश कालेश्वरी सदस्य थे.

नाट्योत्सव के पहले दिन 5 नवंबर को हल्द्वानी के रंगमंडल शैलनट ने "अदपुर तिपुर" अर्थात आधा महल नामक कुमाऊंनी नाटक का मंचन किया. अगले दिन6 नवंबर को श्रीनगर-गढ़वाल की नाट्य-मंडली विद्याधर श्रीकला ने गढ़वाली नाटक "बुढ़देवा दिल्ली में" की प्रस्तुति दी और 7 नंवबर को दिल्ली की संस्था द हाई हिलर्स ग्रुप ने गढ़वाली नाटक "फुंद्या पदान अर चखुलि प्रधान" का मंचन किया. अंतिम दिन 8 नवंबर को सम्मानपत्र और पुरस्कार वितरण समारोह और सांस्क्रृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस अवसर पर स्मारिका का प्रकाशन भी किया गया.

शैलनट हल्द्वानी की प्रस्तुति कुमाऊंनी नाटक "अदपुर तिपुर" का मूल आधार कुमाऊं की एक पौराणिक गाथा का मुख्य पात्र कल्याण सिंह बिष्ट (कलबिष्ट) था, जो अपने गांव की भलाई के लिए एक दुष्ट व्यक्ति का सामना करते हुए अपने प्राण गंवा देता है. इस कथा को "अदपुर तिपुर" नाटक के रूप में ढाला शम्भुदत्त 'साहिल' ने और कुमाऊंनी भाषा में अनुवाद किया राजीव शर्मा ने.

कल्याण सिंह की भूमिका स्वयं शंभुदत्त 'साहिल' ने निभाई और दीवान पांडे की भूमिका मुकेश जोशी ने. कृष्ण पांडे की भूमिका में विवेक वर्मा, लक्ष्मण सिंह की भूमिका में देवेन्द्र तिवारी, कमला की भूमिका में दीपा भट्ट, जानकी की भूमिका में प्रियांशु जोशी, नागुलि और भागुलि की भूमिका में अनवर और अभिषेक, भराड़ी की भूमिका में विक्की जायसवाल, चनुवा की भूमिका में कैलाश तिवाड़ी, मनुवा की भूमिका में हर्षित पंत, बुबू की भूमिका में राजीव वर्मा, भौजी की भूमिका में ललिता अधिकारी, हरिया की भूमिका में अजय कुमार, गणेशदा की भूमिका में केदार पलडिया/मोहन जोशी और सूत्रधार की भूमिका में रोहित मलकानी थे. गीत एवं संगीत निर्देशन किया मोहन जोशी, रूप-सज्जा की राजीव शर्मा ने, वेशभूषा की दिनेश जोशी और दिनेश पांडे ने, मंच सामग्री की व्यवस्था की रोहित मलकानी और पल्लवी ने. नाटक का संयोजक डॉ. डीएन भट्ट ने और सह-संयोजक दीपक मेहता ने किया. कला एवं दृश्य संयोजन राजीव शर्मा ने किया. और नाट्यांतरण, परिकल्पना एवं निर्देशन शम्भुदत्त 'साहिल' ने किया.

विद्याधर श्रीकला श्रीनगर-गढ़वाल की मुखौटा नाट्य-प्रस्तुति "बुढ़देवा दिल्ली में" गढ़वाल की एक पारंपरिक नाट्य-विधा पर आधारित थी, जो जाख, चंडिका, कांस और क्षेत्रपाल जैसे देवी-देवताओं की डोली जात्रा के दौरान खेली जाती है. इस नाटक की आत्मा भान और मुख्य पात्र बुढदेवा हैं, जिनके बीच चुटीले संवाद होते हैं. नाटक में मुख्यतः व्यंग्यात्मक हास्य मुखर रहा और इसका विस्तार भौगोलिक सीमाओं से परे करके स्थितियों और परिस्थितियों में साम्यता का बोध कराया गया.

बुढदेवा की भूमिका डॉ. डीआर पुरोहित ने और भान की भूमिका विमल बहुगुणा ने की. विभिन्न भूमिकाओं में थे अभिषेक बहुगुणा और हर्ष पुरी तथा मुखौटा नर्तक थे पंकज नैथानी, तान्या पुरोहित, दीपक डोभाल और राखी धनै. गायन और संगीत निर्देशन किया संजय पांडे और नियति कबटियाल के साथ-साथ कुसुम भट्ट, गोकर्ण बमराड़ा और तीन अन्य ने. प्रोडक्शन नियंत्रक थे मदनलाल डंगवाल और हार्विच बैटल. प्रस्तुति के आयोजन निदेशक थे डॉ. डीआर पुरोहित तो वस्त्र-विन्यास एवं मुखौटों की व्यवस्था की प्रेम मोहन डोभाल और सुरेश काला ने. संगीत दिया धूम लाल/संजय पांडे और राकेश भट्ट ने तो नाटककार थे डॉ. डीआर पुरोहित. नाटक का निर्देशन किया सुरेश काला ने, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला.

तीसरे दिन दिल्ली के द हाई हिलर्स ग्रुप ने सुरेश नौटियाल का गढ़वाली नाटक "फुंद्या पदान अर चखुलि प्रधान" खेला. यह नाटक  उत्तराखंड में प्रधानपति की अघोषित और असंवैधानिक व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी के साथ-साथ वहां की वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों पर सूक्ष्म टिप्पणियां और कटाक्ष करते हुए आगे बढ़ता है तथा इस संदेश के साथ समाप्त होता है कि यदि महिला प्रधान व्यवस्था पुरुषों नहीं स्वयं महिलाओं के हाथ में होनी चाहिए. व्यवस्था में पारदर्शिता, सामूहिकता और सुशासन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए यह नाटक ग्राम स्वराज और ग्राम सरकार की स्थापना का संदेश भी देता है.

इस नाटक में समाचारवाचिका की भूमिका निभाई अनीता नौटियाल ने और कोरस में महेंद्र रावत, कुसुम बिष्ट और ओंकार सिंह नेगी के अलावा सभी कलाकार शामिल थे. बसंत सिंह रावत उर्फ़ फुंद्या पदान की भूमिका निभाई रमेश ठंगरियाल ने और चखुलीदेवी का रोल किया कुसुम चौहान ने. शांतिदेवी की भूमिका में संयोगिता ध्यानी, पुरुषोत्तम बडोला की भूमिका में सुभाष कुकरेती, प्रताप सिंह नेगी के रोल में  गिरधारी रावत, बैशाखीलाल की भूमिका में खुशहाल सिंह बिष्ट, फ्यूंली के रोल में प्रकृति नौटियाल, उद्घोषक के रोल में सुरेश नौटियाल, बीडीओ की भूमिका में हरेन्द्र सिंह रावत, बस कंडक्टर की भूमिका में सुभाष कुकरेती, बस ड्राइवर के रोल में गिरधारी रावत, आन्दोलनकारी के रूप में हरेन्द्र सिंह रावत, ग्रामीण महिला की भूमिका में सुधा सेमवाल और स्कूली छात्र के रूप में सुशील भद्री ने भूमिकाएं निभाईं. मंच प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाई दिनेश बिजल्वाण और कुसुम बिष्ट ने तो प्रकाश व्यवस्था में थे बलवंत सिंह एवं हरि सेमवाल. मंच एवं वस्तु सामग्री की जिम्मेदारी थी ओंकार सिंह नेगी की और रूपसज्जा की सुशील भद्री ने. वेश-भूषा एवं वस्त्र विन्यास कलाकारों ने स्वयं किया. पार्श्व संगीत वासु सिंह का था तो संगीत निर्देशन था कृपाल सिंह रावत "राजू" का तथा वाद्ययंत्रों पर थे कृपाल सिंह रावत "राजू" (हारमोनियम), आनंद सिंह (ढोलक), गोपीचंद भारद्वाज (हुड़का) और सुशील भद्री (थाली). अंत में प्रकाश परिकल्पना एवं निर्देशन था हरि सेमवाल का.

चौथे और अंतिम दिन सामान और पुरस्कार वितरण समारोह के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. उत्तराखंड नाट्य लीजेंड का सम्मान जाने-माने रंगकर्मी ललितमोहन थपल्याल को मरणोपरांत दिया गया. उनका जन्म 1920 में ग्राम श्रीकोट, खातस्यूं, गढ़वाल में हुआ था.  जहां तक थियेटर का सवाल है, ललितमोहन छात्र-जीवन से ही थियेटर से जुड़ गये थे. उन्होंने गढ़वाली थिएटर और रंगकर्म को आगे बढाने में उल्लेखनीय योगदान किया.

लाइफ-टाइम सम्मान नईमा खान उप्रेती को दिया गया. उनका जन्म 26 मई1938 को अल्मोड़ा में हुआ था. नईमा ने अपने पति मोहन उप्रेती के अलावा बीएल शाह और बीएम् शाह जैसी सांस्कृतिक विभूतियों के साथ मिलकर उत्तराखंड के लोकगीतों और संगीत को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान किया. लाइफ-टाइम सम्मान शारदा नेगी को भी दिया गया. उनका जन्म पौड़ी गढ़वाल में 1956 में हुआ था. दिल्ली में रंगमंच और नाटकों में सर्वप्रथम हिस्सेदारी करने वाली महिलाओं में शारदा नेगी अग्रणी रही हैं. उन्होंने ऐसे समय और ऐसी परिस्थिति में गढ़वाली रंगमंच में प्रवेश किया जब स्वयं को संभ्रांत मानने वाले पहाडी लोग अभिनय करने वाली स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखते थे.

लाइफ-टाइम सम्मान उत्तराखंडी रंगमंच को समर्पित दिनेश कोठियाल को मरणोपरांत दिया गया. उनका जन्म ग्राम तछेटी (पाबौ), घुडदौड़स्यूं, पौड़ी गढ़वाल में 10 नवंबर 1952 को हुआ था. वह रंगकर्म के अच्छे संगठनकर्ता थे. लाइफ-टाइम सम्मान होशियार सिंह रावत को गढ़वाली थिएटर में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया. उनका जन्म ग्राम कोटली, पट्टी साबली, पौड़ी गढ़वाल में 3 फरवरी 1945 को हुआ था.

नाट्य-निर्देशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए मित्रानंद कुकरेती को सम्मान प्रदान किया गया. वह गढ़वाली रंगमंच के अग्रणी निर्देशक और रंगकर्मी हैं. नाट्य-लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए राजेन्द्र धस्माना को सम्मान प्रदान किया गया. गढ़वाली रंगमंच को भारतीय भाषाओं के आधुनिक रंगमंच के समकक्ष लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. नाट्य-समीक्षा के लिए दीवान सिंह बजेली को सम्मान प्रदान किया गया. उनका जन्म ग्राम कलेत, पत्रालय मनाण, जिला अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) में 1937 में हुआ था. बजेली पिछले चार दशक से नाटक, नाटककारों और कलाकारों के बारे में लगातार देश की सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं.


उत्तराखंड नाट्य समारोह-2015 के लिए पुरस्कार इस प्रकार से दिए गए: सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार कुसुम चौहान को सुरेश नौटियाल के गढ़वाली नाटक "फुन्द्या पदान अर चखुली प्रधान" में मुख्य भूमिका के लिए प्रदान किया गया और इसी नाटक में फुन्द्या पदान की भूमिका करने वाले रमेश ठंगरियाल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया. सर्वश्रेष्ठ आलेख का पुरस्कार "अदपुर तिपुर" को गया और इसके लिए शम्भुदत्त 'साहिल' को पुरस्कृत किया गया. सर्वश्रेष्ठ रूपसज्जा के लिए  "अदपुर तिपुर" के रूपसज्जाकार राजीव शर्मा को पुरस्कृत किया गया. सर्वश्रेष्ठ वस्त्र-विन्यास का पुरस्कार प्रेमबल्लभ डोभाल के खाते में गया जिन्होंने "बुढदेवा दिल्ली में" नाटक के लिए वस्त्र-विन्यास किया. सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार "बुढदेवा दिल्ली में" नाटक में संगीत देने के लिए संजय पांडे को दिया गया. सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार "बुढदेवा दिल्ली में" नाटक के निर्देशन के लिए सुरेश काला को दिया गया. और, "अदपुर तिपुर" को सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति माना गया.

अंत में, यह कहना आवश्यक है कि कालिंका चैरिटेबल ट्रस्ट ने उत्तराखंड नाट्योत्सव के नाम से जो रंगयात्रा बिना किसी सरकारी सहायता के आरंभ की है, उसे जारी रहना चाहिए. साथ ही, भविष्य में उत्तराखंड नाट्योत्सवों का आयोजन उत्तराखंड की भूमि में अनिवार्य रूप से होना चाहिए तभी यह रंगयात्रा अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल होगी.


Bhishma Kukreti

Garhwali Poems by Dr.Pritam Apachhyan
डा . प्रीतम अप्छ्याण  कि 45 गढवाली  कविताएँ
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-160                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti


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१०१
गजब कर्याले लाला जी, टूटि नि बर्खै धार
भैर भितर बी कन कै जौं, लुतपुत ह्वेगे सुलार
(मौसम ने गजब कर दिया लाला जी, बारिश की धार नहीं टूटी है. अब अंदर बाहर जाना भी मुश्किल हो गया, सुलार पजामा भीग कर लुतपुत हो गया है)
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१०२
गुरौ सि सळ्के उमर मेरी, द्यो जनु बदळे रूप
ज्वानि चौमास्या घाम सी, जीवन चीणा सि झूंप
(मेरी उम्र सांप जैसी सरसराती निकल गई और आसमान के मिजाज सा रूप बदलता रहा. यौवन तो बरसात की धूप जैसा अल्प था. पूरा जीवन ही चीणा (झंगोरे जैसा एक अनाज) की बाल सा लटकता ही रहा)
१०३
कखड़ी झ्यालों गैणि छा, राळि करौ द्वी चार
ग्वेर छुळदुमी चोरि खै, देखि नि बार तिवार
(ककड़ी की बेलों पर दो चार छोटे फूल (करौ या मादा पुष्प) गिने थे. बड़ी उम्मीद थी कि ये बड़े होंगे पर नटखट ग्वालों ने पहले ही, चोरी से खा दिए, बार त्योहारों का ध्यान भी नहीं रखा)
१०४
तीड़ि कपाळ जमीन बी, रुसै छयो जब घाम
रगड़ बगड़ अब मेघों की, पाणि का ऐड़ा डाम
(उस वक्त जब सूरज गुस्साया था तो प्राणियों के सर व भूमि तक फटने लगी थी. अब बादलों के गुस्से ने तोड़फोड़ मचाई है. पानी के ठंडे डाम(धातु से शरीर को दागना जो सामान्यत: गर्म होता है) से जीवन दागा जा रहा है. हे ईश्वर ऐसा क्यों?)
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१०५
च्यापति चीनी मांगि की, च्याइ बणौंदो साब
कख बिटि आलो दूध पर, गौं कमचूस खराब
(साहब लोगो आप आए, स्वागत है. चायपत्ती और चीनी मांग कर आपके लिए चाय तो बना देता पर...क्या करूं साहब! दूध कहां से लाऊं? आप नहीं जानते कि यह गाँव बड़ा खराब व कंजूस है. अब आप ही कहिए चाय कैसे पिलाऊं? (इस रूपक में साहब वोटर हैं, कंजूस विपक्ष है और कहने वाला सरकार है))
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१०६
मन्खि बड़ो विद्वान बल, खड़ु ह्वे चैन न लेटि
दैजा मा फुक्दो ब्वारि तैं, गर्भ गळौंदो बेटि
(सुना है कि मनुष्य बड़ा विद्वान होता है पर लगता नहीं. उसे तो किसी तरह चैन नहीं, न खड़े होकर न लेटकर. ऐसा आदमी खाक विद्वान है जो दहेज में बहू को जला देता है और गर्भ में बेटियों को गला देता है?(यहां आदमी माने स्त्री-पुरुष दोनों हैं जो ऐसा करते हैं))
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१०७
जब भी देखा व्यस्त छ, तेरो मुबाइल फोन
गळाकंठी कू क्वोच वो, बतौ त झर्क नि रौन
(जब भी देखता हूं, तेरा मोबाइल हमेशा व्यस्त रहता है. तेरा ऐसा गले का हार वह है कौन? एक बार उसके बारे में बता दे तो भ्रम-शक सब दूर हो जाएं, झर्क मिट जाए)
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१०८
उमर ढळकणी ब्वौल धौं, सच तेरि मंशा क्याच
कैकि जग्वाळ्या बैठिं छ, बाळि माया को ल्याज
(हे रूपसी! उम्र ढलने लगी है, सच सच बता तेरी मंशा क्या है? बचपन के प्रेम का लिहाज करके तू किसके इंतजार में बैठी है?)
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१०९
झौड़ बर्खा की धीड़ु का, अब ह्वे चिटमिट सर्ग
शाळि पंदेरा दनकणा, मिटी आज का झर्क
(सुबह से लगातार बारिश की झड़ियों के झड़ पड़े पर अभी आसमान जरा चिटमिट होकर थमा है. इसी बीच दौड़ दौड़कर फटाफट सब लोग गौशाला व पानी के धारों का काम निबटा आए. अब आज के सारे झर्क (चिंताएं) मिट गए हैं)
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११०
अपणी डिनर पार्ट्युं मा, मैकडॉवल का पैक
पेण त प्या या भाड़म् जा, तुम डेनिस का लैख
(सरकार ने गजब कर दिया है बोडा, अपनी डिनर पार्टियों व होटलों में तो इनके मैकडॉवल के पैक चलते हैं. हमें कह रहे हैं कि तुम लोग (माने जनता) डेनिस के लायक ही हो, पीना हो तो पियो वर्ना भाड़ में जाओ. ये भी कोई बात हुई.....
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१११
जल थल नभ चर अचर अब, प्रभू! त्यारै सार
मंशा सबुकी पूरि हो, तरि जौ सब संसार
(हे बाबा केदार! जल, थल, आकाश में रहने वाले सभी चर व अचर अब तुम्हारे ही भरोसे हैं, तुम्हारे ही सहारे जीते हैं. सबकी मनोकामना पूर्ण हो और यह संसार तर जाए, यही कामना है)
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११२
दिवा प्रेम को झपझप, कन कै ठोसूं गुल्ल
प्रभू! हर ले डर पिड़ा, जरा हैंसण दे मुल्ल
(प्रेम का दिया तो रात दिन झपझप कर रहा है, अब बुझा कि तब बुझा. उस दिए का गुल्ल (कार्बन) भी कैसे हिलाऊं? हे भगवन! मन से डर और पीड़ा को हर लीजिए तो थोड़ा सा मैं भी मुस्कुरा लूंगा)
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११३
परसि हैंसि ब्याळी बच्यै, आज घुस्ये की काख
भोळ कुजाण लबारुं को, ज्यान बचै की राख
(परसों हँसी थी, कल बात की और आज सरक सरक कर बगल में बैठ गई है. हे सीधे सरल नायक! कल को ये लबार (बेशर्म) क्या करेंगी, पता नहीं. इसलिए तू संभल जा और अपनी जान बचा कर रख)
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११४
जब बिटि नेता ह्वे दिदा, बौजी दूण च शिफ्ट
पितरकूड़ि तैं मीलिग्या, सगत ताळा कू गिफ्ट
(जी हां साहब! यह सच है कि जिस दिन से बड़े भाई नेता हुए हैं, उसी दिन से भाभीजी देहरादून शिफ्ट हो गई हैं. बाल बच्चों सहित सब वहीं चले गए. वहां से गांव के पित्रगृह को मिला है - एक बड़े ताले का उपहार)
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११५
वी छ तु पैली दां वळो, बोडी रखणू ख्याल
बांदर सूंगर भगौ निथर, ऐंसू फोड़लु कपाळ
(ओहो! अरे बेटा नेता! तू वही है ना पिछली बार वाला. तब तो बड़ी बड़ी हांक रहा था. बोडी (ताई जी) मेरा खयाल जरूर रखना, मैं सारे कष्ट दूर कर दूंगा. पर तू कान खोल के सुन ले! इन बंदरों व सूअरों को यहां से भगा वर्ना इस बार के चुनाव में मैं तेरा सर तोड़ दूंगी (कतई वोट नहीं दूंगी))
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११६
कळ्त कळ्त कतोळिगे, प्रेम कु पाणि पराण
ज्वानि जुटाये जोति ज्यू, जीति जगत क्या लाण
(मन, प्रेम के जल को कळ्त कळ्त (हाथों से पानी हिलाने की ध्वनि) हिला गया. इस जीवन में यौवन जुटाकर, प्राण रूपी बैलों को जोतकर सारा संसार जीत लिया. अब इन बातों को कहां तक बताऊं!)
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११७
दलबदलूं बिस्वास्युं का, टकम भर्यां छन पेट
वोट का ऐंसू ब्वाला दिदा, क्या हूण चैंदा रेट
(इस राज्य में दलबदलुओं और विश्वास देने वालों (१८ मार्च के बाद), दोनों के पेट (जेब) खांच खांच कर भर गए हैं. दाज्यू! आप बताओ, इस बार "वोट" के रेट (जैसे फ्लोर टेस्ट के थे) क्या होने चाहिए? फ्री में देकर कोई फायदा है क्या......)
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११८
अंताज्यूं छौ तेरो मी, या फिर ह्वे संजोग
आणिकारि की छ्वीं किलै, लाणा गौं का लोग
(तुमने मुझे पहले से अंदाजा (ताड़ कर रखा) था या फिर हमारा मिलना मात्र संयोग की बात थी? ये गांव के लोग इस तरह की अनहोनी बातें क्यों सुना रहे हैं?)
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११९
ज्यूड़ा तोड़ि की मुचि गयां, कनकै ठेकेला बागि
अजक्यालूं गळाकंठि छन, कुर्च्यूं गुसैं नि जागि
(हरी भरी सार (सत्ता भी हो सकती है) देखकर 'बागी' यानि भैंसे अपनी रस्सियां तोड़कर भाग रहे हैं. ये बिना नकेल के किस प्रकार रोके जाएंगे? आजकल ये किसी के (पार्टी भी संभव) गले के हार बने हैं पर....पिछला मालिक (सत्ताधीश भी संभव) बेचारा इनकी मनमानी मार से अभी तक उबर नहीं पाया है)
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१२०
टुप्प बुरांसी फूलों मा, छ्युंतमेल्यों का बीच
उड़े गगन बगि छीड़ौं मा, बचपन जनु क्वी नी च
(कभी बुरांस के फूलों में, तो कभी चीड़ के बीज(दाम या ग्वदाम) खोजने में लगा रहता है. कभी उड़कर गगनमंडल पहुंच जाता है तो कभी ऊंचे झरनों में बहने लगता है. अहा! मेरे बचपन तेरे जैसा कोई नहीं, कोई नहीं!)
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१२१
आँखि मिलै की आँखि ढकी, बौग सरैगे आँखि
कळछणि वा छ्वीं पुछदरी, रयीं च सौदी आँखि
(आँखें मिला कर फिर ढक दी और फिर उन्हीं आँखों ने किनारा कर लिया. फिर भी घनी काली व तमाम बातों को पूछने वाली वे आँखे, अभी भी एकदम ताजी ताजी हैं)
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१२२
डांड गंगाड़ों धार धरूं, मन मन मा हो प्रीत
खेल बच्यां रौ नौनु का, अर होठूं का गीत
(पर्वतों व गंगाघाटियों में, कहीं भी हों, हर मन में प्रेम व अपनत्व हो. बच्चों के खेल कौतुक जिन्दा रहें व प्रत्येक होठों पर गीत थिरकते रहें. ईश्वर से ऐसी ही कामना करता हूं.)
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१२३
जीवन की ईं चक्कि मा, मिन पीसे दिन रात
ल्वे छौंकी की दाळ अर, आँसु उमाळी भात
(जीवन की इस चक्की में मैंने दिनों व रातों को बारीक करके पीसा है. यह आटा दिन-रातों से बना है. यहां तक कि खून का छौंक लगाकर दाल बनाई है और आँसूं उबाल उबाल कर भात पकाना पड़ा है. )
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१२४
गोरो रंग तू ऐंठि ना, उदास ना हो काळु
चाम का चारै दिन होंदा, गुण बीजांदो उज्याळु
(हे गोरा रंग! तू अधिक घमंड मत कर और हे काले, तू इतना उदास मत हो. चमड़ी का रंग चार ही दिन रहता है प्यारे, चमकदार उजाले को तो गुण ही जगाते हैं और संसार में उगाते हैं)
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१२५
बर्त का दिन दे गयां सबी, अल्लु गोभि की ढेरि
जै दिन भूकन् कबलायूं, वे दिन कैन नि हेरि
(समय की कैसी बलिहारी है कि जिस दिन मेरा व्रत था, उस दिन सभी लोग मुझे आलू-गोभी (खाने की) ढेरियां थमा गए. जिस दिन में भूख से बिलबिलाता रहा, उस दिन कोई देखने तक नहीं आया)
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गढ़वाळि भाषा कि बधाणि अन्वार देखा शैबो......
ठिक्क कै रे द्याळ अैगा
दिल्लि मु बल घ्याळ ह्वेगा
का च मिलणी नौकरी आब
भान मज्यैकी काळ ह्वेगा
ह्वेइ जौलौ कुछ न कुछ ता
पुंगाडा मेनत वाळ ह्वेगा
च्या पकोला भुजि उगोला
गोर भल दुद्याळ ह्वेगा
छ: मौऊ जमीन कुछ नी
किलै हाम देश्वाळ ह्वेगा
गंगसार्या बौ भल किसाण
बाल बच्चूं वाळ ह्वेगा
भात माछौं ह्वोटल चल
मछरदैनी जाळ ह्वेगा
ताबै हामूं घ्यप्सु ब्वना
गौं मा बस डुट्याळ रैगा
(C) डॉ. प्रीतम अपछ्यांण

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१२६
भलु करि दगड़्या त्वैन बी, टोड़ि हमारी आस
कोरि कोरि की खायो मी, जाणी चलमलो गास
(अच्छा किया ऐ दोस्त, हमारी आशाओं को नष्ट करके तुमने अच्छा किया. तुमने मुझे स्वादिष्ट ग्रास समझ कर, खोद खोद कर खाया, अच्छा किया)
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१२७
लोग ब्वदिन तौं कांठौं मा, अंछर्यों को बल नाच
सासु मैंस की फूकिं क्वी, ताल डुबाईं क्वा च
(लोग तो बहुतेरे कहते रहते हैं कि उन पर्वतों में बल, वन परियां नाचती रहती हैं. पर मुझे लगता है पता नहीं बेचारी कौन होंगी? सास-पति द्वारा जलाई गई या गंगा-तालों में डुबाई गई कोई अभागन!!!)
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१२८
झौड़ सकणसट्ट ज्वानि मा, बर्खिनि भादो सौण
धीत ले माया फेर कबी, ईं ज्वानीन् नि औण
(यौवन में जबरदस्त झड़ी पड़ी तो लगा कि सारे सावन भादो बरस पड़े हैं. मित्र! इस प्रेम को तृप्त होकर पी लो, इस यौवन ने फिर दुबारा नहीं आना है..)
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१२९
लप्प लप्प लपल्याण लग्या, टिगट पाण कू जूंक
मिन त जाण विधानसभा, तू अपणो घर फूंक
(वैसे ही चौमास लगा है, और वैसे ही टिकट पाने की मारामारी में जोंक लपलपाने लगी हैं. सबकी एक ही इच्छा है, मैं तो विधानसभा जाऊंगा और तुम अपना घर फूंक कर भी मुझे पहुंचाओगे)
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१३०
म्यारा उत्तराखंड त्वे, हाईकमाना जौर
अब्बि नि छोड़्या त्वैन इ, कखी नि मिलणी ठौर
(हे मेरे उत्तराखंड! तुझे हाईकमान रूपी बुखार चढ़ गया है. बिना हाईकमान के ऑर्डर के तू सांस भी नहीं ले पा रहा है. यदि तूने अभी भी ये हाईकमान वाले नहीं छोड़े, तो समझ ले कहीं ठौर ठिकाना नहीं मिलने वाला है)
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आजादी 
लोक की वाणी में चिंता भी, गुस्सा भी, धाद भी...
अब त ख्वलणै पोड़ाला गिचों का ताळा
अब त ख्वजणै पोड़ाला कुछ उज्याळा
ईं काणी अजादी मा ईं ल्वेलिती व्यवस्था मा
गुजारु नी, न आज न भोळ
गरीब गुरबौं कि मवासि गोळ....
भांति भांति की रीत भांति का लोग
हम मिलि जुली क रौंदा त छा
भांति भांति का डाळा भांति का फूल
यख, चटकिला खिलौंदा त छा
मिलिजुली अजादि पाई पर गुलाम हथूं देद्याई
अब त करणै पोड़ालो कुछ उयार
अब त बगौणै पोड़ली नै बयार
ईं काणी अजादी मा.......
बनबनी का बौण बनबनी को पाणि
चुचौ, भलि सांजोळ गंगा जि छै
बनबनी की थाति जाति बंडि रिवाज
लोग, भली धाण पाण धंधा भि छै
ल्वे बगै गरदन कटै पर देश अब यु देश नि रै
अब त म्यळौणै पोड़ालो फेर मेळाग
अब त पुजौणै पोड़ाली नै नवाण
ईं काणी अजादी मा........
डॉ. प्रीतम अपछ्यांण, दूनागिरी, अल्मोड़ा

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१३१
धर्ति हिमालै थामि द्यूं, उड़दी बग्दि बयाळ
थामि नि साकू पर कबी, जरा सि मनौ उमाळ
(मैं संपूर्ण धरती, हिमालय व यहां तक कि उड़ते व बहते बयाळों व हवाओं तक को पकड़ सकता हूं. पर कभी भी यदि किसी को नहीं रोक सका, बस में नहीं रख सका तो वह मेरे 'मन की भावनाएं' थी. मन रोकने पर भी नहीं रोक सका)
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१३२
नेता जीतणा घमाघम, हाय! हारणू देश
कख या लिजाली ग्रहदशा, क्वो सुलझालो मेस
(इस प्रदेश व देश में नेता फटाफट जीतते जा रहे हैं परंतु हाय! देश व जनता हारती जा रही है. ऐसी ग्रहदशाएं पता नहीं हमें कहां ले जाएंगी? कौन हमारे उलझे धागों को सुलझा पाएगा?)
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१३२
नेता जीतणा घमाघम, हाय! हारणू देश
कख या लिजाली ग्रहदशा, क्वो सुलझालो मेस
(इस प्रदेश व देश में नेता फटाफट जीतते जा रहे हैं परंतु हाय! देश व जनता हारती जा रही है. ऐसी ग्रहदशाएं पता नहीं हमें कहां ले जाएंगी? कौन हमारे उलझे धागों को सुलझा पाएगा?)
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१३३
मंत्री रुप्या पद गनर, त्वे क्या चैंद तु बोल
त्वी छ म्यारू पाड़ि भुला, थाम सत्ता कू घोल
(मंत्री बना दूं, रुपये, मालदार विभाग, गनर, घोड़ा, बंगला, तू बोल तो सही जो मांगेगा दे दूंगा. तू मेरा प्रिय पहाड़ी भुला है, हे विधायक जी बस मेरी सत्ता के घोंसले को पकड़ कर रखना.)
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१३४
बेटि ह्वयां को हर्ष चा, दिशा खुलीगे प्यारि
दैणि हुये माँ नंदा तू, सुखि रख बेटी ब्वारि
(बेटी होने का यह कितना महान सुख है कि सारी दिशाएं खुल गई है. जिनकी बेटी नहीं, उनके लिए सारी दिशाएं बंद हो जाती हैं. हे माता नंदा! तुम हमेशा इनके दाहिने रहकर सभी बेटी-बहुओं को सुखी रखना)
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१३५
राजनीति का पर्दा यी, नकटा हूंदन भारि
यकी डोर मा कस्यां भितर, भैर चुटौंदन गारि
(ये राजनीति के 'पर्दे' बहुत ही बेशरम व नकटे होते हैं. अन्दर ही अन्दर ये एक ही डोरी से कसे होते हैं पर बाहर जनता के लिए पत्थर बरसाते रहते हैं.
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१३६
कैका गिचों पर ताळु नी, कैका कच्छों पर नाड़ु
चुनौ भ्याळ यूं लमडै दे, चौबटा खड्यो गिंदाड़ु
(इस राज्य में कमाल के नमूने हैं. किसी के मुंह पर ताला नहीं, जो मर्जी वही कह दे रहे हैं. किसी के कच्छों पर नाड़ा नहीं है (पाठक समझ रहे होंगे). हे राज्य के वोटर! इस बार इनको चुनाव की घाटी में लुढ़का दे व इनके नाम पर चौराहे में छल पूजने का 'गिंदाड़ू' गाढ़ दे)
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१३७
राजा त्यरा बी चार दिन, कर ल्हे लाठीचार्ज
आलो गरीबूं घत्त बी, वे दिन द्यूंला रिचार्ज
(अरे आजकल के राजा! तेरे भी चार दिन अच्छे चल रहे हैं. कर ले, जिस पर मर्जी लाठीचार्ज करवा ले पर....ध्यान रखना, हम गरीबों का भी समय आयेगा. उसी वोट के दिन तुझे भी रिचार्ज कूपन (???) थमा देंगे)
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१३८
मैंन गंछ्याये गीत यू, मैंन मिसाये भौण
पर ल्हीजा गैल्याणी तू, माणी मेरि समळौण
(हे साथी! यह गीत मैंने बनाया और इसकी धुन भी मैंने ही बनाई. पर तुम इसे ले जाओ. मेरी ओर से तुम्हारे लिए यही यादगार निशानी है)
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१३९
सूनु पैरै की भूलिगे, चांदि पैराईं याद
प्रेमै अर्जी पौंछि कब, झैर घुट्यां का बाद
(यह भी क्या अजब संसार है जहां आदमी उसे भूल जाता है, जिसे सोना पहनाया (विवाहिता) परंतु उसे याद करता है जिसे चाँदी पहनाई (बिना विवाह वाली स्त्री). निर्मोही पुरुष ऐसा कि प्रेम करने भी तब पहुंचा जब जहर निगला जा चुका था)
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१४०
मान कि रक्षा कर्द गै, आजीवन श्रीराम
रूंदौं हैंसाणू कृष्ण रे, जीवन भर निफराम
(श्रीराम आजीवन मान व मर्यादा की रक्षा करते रहे. अपने जीवन से उन्होंने मर्यादा का मानक बनाया और पूरी उम्रभर कृष्ण रोते हुओं को, अत्याचारों से पीड़ित लोगों को हँसाते रहे. ये दोनों हमें जीवन विद्या सिखाने वाले थे.)
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१४१
बर्खा बूंदौं थामि की, पौंछि जि क्वो असमान
मन्खि मरे धरती अमर, कनि माया भगवान
(बारिश की बूंदों को पकड़कर कौन कभी अासमान में चढ़ सका है? यह सब तो ईश्वर की माया है कि उसने कैसी कैसी अद्भुुत रचनाएं की हैं. यही कम अचरज है कि मनुष्य आते व जाते रहते हैं पर धरती अमर रहती है!)
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१४२
राजि रखी नारैण रे, तैं बाँदौ तकधीर
तनि कबि कनि रै छै अहा, मेरि बुढ़ळी तस्वीर
(हे नारायण! उस सुन्दरी के सुखों व भाग्य को कुशल मंगल रखना. एेसी ही तस्वीर कभी, अहा, मेरी बुढ़िया की भी थी पर....)
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१४३
सैणि मैंस की अड़ादड़ी, नौना पुळपुळ रोंद
गर्ब भकोर्दो ज्यान अर, रीस मवासी खोंद
(पति और पत्नी के कलह में सारा दुःख बच्चों को भुगतना पड़ता है. वे हमेशा मन ही मन रोते रहते हैं. इसीलिए विद्वान लोग कह गए हैं कि घमंड व अहंकार प्राणों को खाता है तथा क्रोध अपने ही कुल का विनाश करता है)
Copyright @ Pritam Apachhyan ; 2016
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पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली , कविता ; चमोली  गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; 
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  स्वच्छ भारत ; स्वच्छ भारत ; समर्थ गढ़वाल




Bhishma Kukreti


                    Kaul –Karar Patta in Batten Settlement

                            British Administration in Garhwal   -30       
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -46
            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -884
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                              By: Bhishma Kukreti (History Student)


            There were following aspects in Batten 20 Years settlement (Dabral from Vishnu Singh Rawat documents) –
It was necessary for owners written agreements for becoming a Malgujar. The words as Paukast and Sitani (Sirtan) were started written on agreement record or Kaul -Karar Patta. There were four dates for paying tax installments.
          Malgujar had to pay tax in case the owners did not pay taxes. Later on, Malgujar could collect tax amicably or through court.
  Malgujar did not have rights for collecting tax in advance.
There were records for Bemap or unmeasured land and forests of the village in Kaul-Karar Patta.  In case, in past, nearby villages used the land of another village for wood, grass or cattle grazing, the situation was kept 'Status Quo'. 
  Malgujar had to arrange collies for Kuli Godam and collie for postal works.



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Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 28/8/2016
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -885
*** History of British Rule/Administration over Kumaun, (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli) Garhwal (1815-1947) to be continued in next chapter
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
XX   
References 
1-Shiv Prasad Dabral 'Charan', Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page 186- 188
2- Bhanu, Dharam, History and administration of North West Provinces page 172. 173, 193, 178, 189


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History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system,  over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule , Administration , Policies Revenue system  over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system  over Bageshwar  Kumaon, Uttarakhand ;
History of British Rule, Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand;   







Bhishma Kukreti



Modern Garhwali Verses  Songs,  Migration from Garhwal,  empty village,    Poems

मेरा नौनियाळ हरचि गेन  (गढ़वाली कविता )

रचना --   हेमचन्द्र सकलानी  ( जन्म  1949,  पडियार गाँव , अठूर गढ़वाल  )
Poetry  by - Hemchandra Saklani
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 177
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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जब उतरिन
पहाड़ बिटिन
मेरा नौनियाळ
हरचिगिन
शहरूं का मायाजाळ मा
वो विचारा फंसगिन
सब्या कूड़ा खाली छन
गौं क गौं
खंद्वार ह्वैगिन
डांडी -कांठी भी झुम्म दिखेंदिन
अब त हवा बि
मैं से पुछदि
बता सब कख गेन
तुम्हारी खुद मा यख
घुघती -हिलांस -उदास छन
बुरांस काळा और डोखरा
बांजा पड़ गेन
अब त घुमण औंदा
यख देशी -बिदेशी
अपण ही गौं का
परदेशी ह्वैगिन
मेरा नौनियाळ  हरचिगिन 

(Ref-Angwal,2013)
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any
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  स्वच्छ भारत ; स्वच्छ भारत ; समर्थ गढ़वाल

Bhishma Kukreti

 Kukhari Chor: Interesting Garhwali Language story
Critical Review of Modern Garhwali Short Stories -167
    Analysis of Garhwali short story ''
   Critical Review for Garhwali Short Stories written by Mahesha Nand-5
  Literature Historian: @ Bhishma Kukreti
      Kukhari Chor means the hen thief.  There has been regular theft of chicken eggs from  Gatti Bwada house. Gatti tries for finding out the theif and failed to do so. There was waiting anew shock for Gatti. Thief stole his hen too. Now, Gatti was in deep trouble. Gatti goes to future teller. Future teller offered him a couple of non satisfactory reasons and remedies. Gatti caught the thief and it was shock for his life and shock for his wife and shock for readers too.
  The story is interesting from the beginning till end.
The words, phrases and dialogues are as per characters and situation. Garhwali literature creative and critics as Virendra Panwar and Vimal Negi appreciate Mahesha Nand for using Garhwali words those are lost because of Neo-Brahminical period (Modern education).
Mahesha Nand narrated the story in such style that readers read the story till end.
    This author appreciates efforts by Mahesha Nand in storytelling style and using those words which are less in use but were very much in use fifty years back.
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai, 2016
Reference – 'Augar' a Story collection by Mahesha Nnand page 28..
Critical Review of Garhwali Short story by Mahesha Nand to be continued in -6
Critical Review of Modern Garhwali Short Stories to be continued...168
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Let Us Celebrate Hundred and Third Year of Modern Garhwali   Stories!




Bhishma Kukreti

    Garhwali Story
         गौं कि भयात
Garhwali Story by: Mahesha Nand
झ्यंतु कौं कS छा भरि गरीब। बसग्याळम् झौड़ पुड़्यां छा। झ्यूंतु कौं कु कूढ़ू उजंण्यां हुंयू छौ। गिड़कतळ्यूम् कूढ़ू खळ्क उजड़ि ग्या। पांडि त उजड़ी च, उबरि बि गारा-माटन् तंणसट ह्वे ग्या। तौंकु मुक ढकांणौ टपट्याट पोड़ि ग्या।
गौं कS पदान जी छा भला मनिख। वु झ्यूंतु कौं कS कूढ़ा दिखंणू ऐनि। झ्यूंतु अर वे कि घरौंळ बरखै कि झुंमणाटम् ढुंग्गा-माटु छंट्यांणा। नौना वूं कS अपड़ा ब्वाडा उबरा चुल्ला फर बैठ्यां छा। पदान जी थैं कळकळि लगि ग्या। वून धाद मरा अर सौब गंवड़्या थौड़म् निड़्ये ग्येनि। पदान जीन् सब्यूम् मनिख्यात बिंगै कि बोलि-- "भा रै, भयात निबा। झ्यूंतु ब्यट्टौ घोल चिंण्णौ क्वी उयार कैरा। वेकS बाळा-गुफळा उजड़्यां घोला पंछी जन डबड्यांणा छन।"
"मै मा बि एक उबरि पांडि च। जु वूं थैं उबरु दींदु त हम पकांदै बि कक्ख छां। वेकि बि नौनौं कि घिमसांण (बहुसंख्या) च अर म्यरि बि। भुलै ब्वारि दग्ड़ि जिठंणौ कS खिचरोड़ जूदा छन।" झ्यूंता भैन् अपड़ि गड़दस लगा।
"इन कैरा कि, जबSरि तकै झ्यूंतू कूढ़ु चिंणेंदु तबSरि तकै वु हमSरा उबरा रै ल्याला। मि अपड़ु रुसSड़ु पांडा ल्ही जांदु।" दरमानसिंगन् बोलि।
"कूढ़ू क्यान चिंणाण वेन, दाँत तोड़ीकी ? ब्यखुन्यू सागौ खुंणै आलंण तकै नी वेकS ड्यार।" मैपालन् झ्यूंत्वा चुल्लै सकळि लगा।
पदान जीन् अपड़ि पदनचरिम् बोलि दे -- "भयूं जबSरि तकै वे कु कूढ़ू चिंणेंदु तबSरि तकै कि रासन-पांणि मि पुकै द्यूलु। तुम ब्वाला, कु क्य सहेल द्ये सक्द।"
कैन बोलि ध्वै-माटु मि द्यूलु, कैन ढुंग्गा-माटौ सरान् ओगि, कैन द्वार-पट्यला-कुर्रा दींणू बोलि त कैन फटSळा दींणू तांण मारि। मिस्त्र्यूंन् बि गौं कि भयातम् मोंण रुप्याS। वून चिंणैयी ओगंण छै। सर्रा गौं कि मनिख्यात अर भयात झ्यूंता कूढ़ा चिंण्ण फर मिस्ये ग्या। दस दिन बि नि ह्वे छा कि उबरि-पांडि टकटकि ह्वे ग्या। गौं कि भयातन् अपड़ु खैकि झ्यूंत्वी कूढ़ि ठड्ये द्या। झ्यूंतु अपड़ा ड्यार ऐ ग्या।
Copyright @ Mahesha Nand , 2016

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Bhishma Kukreti


Garhwali Humorous, Satirical Dictionary



                                             हास -परिहास में  अर्थशास्त्री की परिभाषा , व्याख्या   व चारित्रिक विशेषताएँ

                                                                गढ़वाळि हास्य -व्यंग्यकोष -भाग -  49     

                                          Garhwali Humorous and Satirical Dictionary part - 49
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                                     खुज्याण , छिंडन,  बिंवन,    ::: भीष्म कुकरेती

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१- अर्थशास्त्री खोपड़ीखाँदेर  सर्जन  हूंद , जु  खुंडु उस्तरान  खोपड़ी का  बाळू  खाल उतारद अर निर्जीवों ऑपरेसन भौत सुंदर ढंग, सलीका से करद अर जिंदौं पर अत्याचार करद

२- सरकारौ अर्थशास्त्रीय  सिद्धांत -यदि या चलणी हो त टैक्स लगै द्यावो ; फिर बि चलणी हो त विनियमित कर द्यावो  जब आर्थिक स्थिति जाम ह्वे जावो तो सब्सिडी द्यावो
३-अर्थशास्त्री 1000 तरां से प्रेम कारणों विधि जाणद च पर एक बि जनानी तैं नि  जणदू

४- इतिहास मा आज तक एक बि अर्थशास्त्री नि ह्वे जै तै 'यीं बेळी  क्या खाण' की चिंता हो

५-बजट बथान्द बल तुम अब क्या नि खरीद सकदा, पर फिर बि हम बजट से उम्मीद करदा ही छंवां ।

६- अर्थशास्त्री एक विशेषज्ञ हूंद जै तै  भोळ पता चलद कि परस्याकी  बाराम वैकि भविष्यवाणी गलत किलै ह्वे   
७- कै बि विषय पर पांच अर्थशास्त्रियों की अल्फ अलग व्याख्या हुन्दन , हाँ छै यदि ऊंमा मादे एक हावर्ड मा पढ्यूं हो (हमर मतलब सुबमणियम  स्वामी से मतलब नी च )




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                                      स्वच्छ भारत ! स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत !   

Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

Bhishma Kukreti


                    Kaul –Karar Patta Copy in Batten Settlement

                            British Administration in Garhwal   -31       
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -48
            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -885
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                              By: Bhishma Kukreti (History Student)


कौल करार पट्टा नाम सोबनसिं रावत मालगुजार  मौजे पर्सुलि मलि मय २६ दाखिलिपातीं पटि गुजडू पर्गने मलासलान जिल्ले गढवाल (I) आगे मौजे १ तुमारे गाऊ के हिसदारौ ने मय  तुमारे दरख्वास्ति २० साल सुरु संवत १८९७ शै लगायत संबत १९१६ तक बाबत फशल खरीफ रवि के साथ जमा ८३२० रुपयो सीके कम्पनी के सेवाय रक्म सायरे व आवकारी व भट्टी खैराड वगैरह स ... नयां बन्दोबस्त होन तलक गुजरनि तुमारे नाम मालगुजारी चाहने का इकरारनामा दाखल किया (I) इस्वास्ते ... सत मंजूरी साहबान सदर के पट्टा तुमको दिया जाता है (I) ठेका साल २० का वमुजीव गाऊं मुदर्ज दरख्वास्त जमा ८३२० रुपैयों के तुमारे नाम मुकरीर हुवा (I) माफीक किस्तों के रूपये कीस्तवार तहसीलदार या पटवारी पर्गने अपने के पाश पंहुचाय के दाखला लेते रहोगे  (I) जो फांट रक्म बाबत तुमारे गाऊं के हिशेदारों से वसूल किया नया फांट होने तक उसी फांट बमुजव वसूल करते रहोगे(I) जब तक किश्तवारी न होवे तब तक जमा वसूल न करोगे (I) व दो किश्त का रुपया येकी क़िस्त में वसूल न करोगे (I) जब कोई हिस्सेदार या असामी रक्म कीस्त वमुजव न देवे तो उसी क़िस्त के रुपयों का दावा सरकारी कचैरी मैं ... साल पूरा होने के १ माह बाद  सरकारी कचैरी मैं उसी साल का दावा सुना नही जायेगा  (I)
.....
.....
              तफसील   
खरीफ      ------------ २०८ रु ०--------रवी  ------------  २०८  रु ०
ता. १ नवम्बर सै १५ तारिक  तक ता. १ दीशैम्बर से १५ ता. १ मई से १५ तक ता . १ जु ० से १५ तक चार आने हिसाब सै चार के हीशाब से चार आने हिशाब से चार आने हिशाब  से
१०४ ) --------------------------१०४ ) -------------------१०४ ) -------------१०४ )
(Dabral, page 187 from Awatar Singh Collections) 


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Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 29/8/2016
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -886
*** History of British Rule/Administration over Kumaun, (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli) Garhwal (1815-1947) to be continued in next chapter
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
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References 
1-Shiv Prasad Dabral 'Charan', Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page 186- 188


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History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system,  over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule , Administration , Policies Revenue system  over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system  over Bageshwar  Kumaon, Uttarakhand ;
History of British Rule, Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand;   








Bhishma Kukreti

Sain Singh Rawat – A Garhwali Poet
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-92
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
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Sain Singh Rawat published only one poem published in Shailvani and then in Angwal. The information is that the poet belongs to Idwalsyun ,  near the village of lalit Keswan a famous Garhwali literature creative.
क्वन्ना पेट (गढ़वाली कविता )


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एक दिन
मिन अपणो छ्वटो
खूब मारी
पैली चपत
फेर मुक्का
फेर घपक
वो दिख्यो त चम्पत
जख लुकि हो
ढूंढा ढूंढ
वबरा पांडा
खोळा खोळा
डांडा -डांडा
कैको खाणू
कैको पेणू
द्वफरा घाम
अर मैना जेठ
भितर देख त
वो क्वन्ना पेट 

Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016
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  स्वच्छ भारत ; स्वच्छ भारत ; समर्थ गढ़वाल





Bhishma Kukreti



Modern Garhwali Verses  Songs,     Poems

आंदोलन की पीड़ा  (मुहावरेदार  कविता )

रचना --  सुमित्रा जुगरान 'विदेह'  ( जन्म  1950,  धौलखेत , लैंसडाउन , पौड़ी गढ़वाल  )
Poetry  by - Sumitra Jugran 'Videh'
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 178
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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गढ़वाळ मा एक मैणु च
काठ की कठमणि लुहा को पेच
मयारू मैणु नि खोलली तू अपण कपाळ रेच
मयारू  मैणु छ 
सफ़ेद बखरी पाणि पीण कु गै छयी
लाल बणिकि आई वख जैकी
क्यों ?
एकु जबाब कैमा नी छ     
होलू कनकै
यख सौंण मोरद सासू -सरकारs भादो  अंदीं आंसू
अर आंसू बि आँखों न  घुन्डों अंदीं
लोग सुरक़्क़ ब्वना छन
वे उत्तराखण्ड आंदोलन मा सुद्दि म्वरां हम
खाणी न पीणी
घुन्डों मा ठीणी
अर अब कखि आंदोलन होणू छ त ब्वना छन
फंड जै भै
तेरी नचै मेरी देखीं छ
म्यारा नौना न पतेडी 

(Ref-Angwal,2013)
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any
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Regards

Bhishma Kukreti