Author Topic: Articles By Dinesh Dhyani(Poet & Writer) - कवि एव लेखक श्री दिनेश ध्यानी के लेख  (Read 24699 times)

dinesh dhyani

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सब कुछ अधूरा

सफर है अधूरा
ड़गर है अधूरी
अधूरी है तृष्णा
है आशा अधूरी।

ये जीवन अधूरा
कुछ भी न पूरा
आखिर तलक सब
अधूरा- अधूरा।

समय हो चला है
सफर है अधूरा
सपने अधूरे
ये मंजर अधूरा
नियति का ये देखो
कैसा चलन है
घिरने को संध्या
रटन है अधूरी।

पाता बहुत है
करता बहुत भी
मगर पूछ देखो
है हसरत अधूरी।

भटकन अधूरी
है तड़पन अधूरी
ललक है अधूरी
मिलन है अधूरा
है मानव अधूरा
हैं अरमां अधूरे
दुनिया जहां में
है सबकुछ अधूरा।।





dinesh dhyani

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महानगर की भीड़

महानगर की भीड़-भाड़ में
बे मतलब की कोलाहल से
सच में अब उकता सा गया हूॅं
कुछ पल सुकूं के पाने को
जाना चाहता हूूॅं पहाड़ मैं
लेकिन मैं जा नही पा रहा।

महानगर की मशीनी जिन्दगी
बिना ड़गर की दौड़-धूप से
सच में अब थक सा गया हूॅं
कुछ पल राहत में जीने को
जाना चाहता हूॅं पहाड़ मैं
लेकिन मैं जा नही पा रहा।

बेरहमों की धरती है यह
महासमुद्र है मानवता का
कीड़ों के सम घिसट रहे हम
इस जीवन से उकता सा गया हूॅं
लेकिन कुछ कर नही पा रहा।

मोहपाश में बंध सा गया हूॅं
इस बन्धन को तोड़ न पाता
जितना दूर-दूर जाता हूॅं
लेकिन पुनिः-पुनिः खिंच जाता हूॅं
जाना चाहता हूॅं पहाड़ मैं
लेकिन मैं जा नही पा रहा।

जीवनभर झूठी खुशियों को
रहा भटकता बना यत्रंवत
चैन नही कुछ भी पाया है
जिनको पाला खुद से बढ़कर
उनकी प्रश्नीली आॅंखों से
खुद को बचा नही पाता हूॅं
जाना चाहता हूॅं पहाड़ मैं
लेकिन मैं जा नही पा रहा।

जीवन के सब सुख समेटकर
एक हारा सा जुआरी हूॅं मैं
सबकुछ पाकर हार गया हूॅं
अब प्रश्न बना यह जीवन
कुछ भी चैन नही है मन को
जाना चाहता हूॅं पहाड़ मैं
लेकिन मैं जा नही पा रहा।।







dinesh dhyani

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किस तरह जियें?

जी करता है जीने को
मगर किस तरह जियें
घुट-घुट के अश्क
कब तलक पियें?

नफरत की आग
शहर में लगी हुई
झुलसायेगी ये हमको भी
कहाॅं तलक बचें।
जी करता है..

अपने-पराये नाते सब
बेगाने हो गये
किस पर यकीं करें
सब एक से लगें।
जी करता..

अपने शहर का आदमी
महफूज ना रहा
जब बाड़ ही चोरी करे
तो कोई क्या करे।
जी करता है..

अपनी तो जिन्दगी ऐ दोस्त!
कुछ यों गुजर गई
मुट्ठी में बन्द रेत से
सपने बिखर गये।
जी करता..

भटका हूॅं कदम दर कदम
दर ना मिला कोई
गैरों की क्या सुनायें
अपनों से लुट गये।
जी करता ..

किस से गिलां करें
किसको बतायें हाल
अपना नहीं यहां कोई
हम अब समझ गये। जी करता..










एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Hat off to Dhyani Ji for providing very -2 interesting poems and articles on merapahad.com portal.

Hope our members must be liking these articels.


किस तरह जियें?

जी करता है जीने को
मगर किस तरह जियें
घुट-घुट के अश्क
कब तलक पियें?

नफरत की आग
शहर में लगी हुई
झुलसायेगी ये हमको भी
कहाॅं तलक बचें।
जी करता है..

अपने-पराये नाते सब
बेगाने हो गये
किस पर यकीं करें
सब एक से लगें।
जी करता..

अपने शहर का आदमी
महफूज ना रहा
जब बाड़ ही चोरी करे
तो कोई क्या करे।
जी करता है..

अपनी तो जिन्दगी ऐ दोस्त!
कुछ यों गुजर गई
मुट्ठी में बन्द रेत से
सपने बिखर गये।
जी करता..

भटका हूॅं कदम दर कदम
दर ना मिला कोई
गैरों की क्या सुनायें
अपनों से लुट गये।
जी करता ..

किस से गिलां करें
किसको बतायें हाल
अपना नहीं यहां कोई
हम अब समझ गये। जी करता..











dinesh dhyani

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क्षणिकायें

1
उतारी जो भगीरथ ने
संभाला क्या उसे तुमने
नयी गंगा बहाने को
कहाॅं कोई भगीरथ अब?
2
बहाने लाख करले तू
हकीकत को छुपाने के
बंया करती तरी सूरत
हकीकत खुद ब खुद हम से।
3
खड़े करलो महल अपने
गरीबों का लहू पीकर
समय खुद ही बतायेगा
तुम्हें अंजाम आगे का।
4
तेरी हस्ती की क्या कीमत
जो इतना तू उछलता है
मिटेगा पल में सब जौहर
जिसे तू अटल कहता है।
कि ड़र उसकी नजर से
न जाने कब कयामत हो
तेरे कर्मों का फल बन्दे
न जानें कब
तेरी नजर हो।

5
तुम हमारे जख्मों को
मत सहलाओ
कहीं ऐसा न हो
जख्म का दर्द
आॅंखों में उतर आया
गर ऐसा हुआ
तो फिर न कहना
यार तुमने ये क्या कर दिया।
6
हम हिमाल के देश के लोग
हिमालय के दर्द को जानते हैं
तू मुखौटे लाख बदल
हम तेरी सूरत
तेरी सीरत को जानते हैं





7
बतादो इन रहीसों को
नही कुछ खास है तुममें
तुम्हारे पास दौलत है
हमारे पास है दाता।

8
न मानवता रही जिंदी
न रिश्तों की आंच बाकी है
चहॅंु ओर अपनों को ही
ठगने चलन जारी है।
9
उन्हें कहते हो अपनों को
जरा संस्कार तो देते
सलीका तक नही जिनको
सही से बात करने का।
10
वतन पर मिटने वालों की
चिताओं पर नही मेले
वतन को लूटने वाले
लदें हैं पुष्प हारों से।
लुटेरों के कसीदे
सुनाये जा रहे हमको
कि जैसे हम हैं अनजाने
जमाने की हकीकत से।
11
समय की मार से जग में
बचा कोई है तो कहदे
विधाता को नचाया है
समय ने अपनी उंगली पर।
12
नही कोई पता पल का
क्यों वर्षों की फिकर करनी
जियो जो पल मिला खुश हो
कि कल आयेगा देखेंगे।
13
जवानी होती है पागल
नही संभले संभाले से
मगर कुछ होश होता है
तभी रहती सलामत ये।

14
कि उनकी नजर पर हम थे
कभी जुवां पर नाम होता था
मगर अब ना नजर आते
न कुछ सुनने मे आता है।
15
सुना है उनकी महफिल में
हमारा जिक्र होता है
ये सुनकर हमको सच यारो
बुरा अहसास होता है।

16
तुम्हारी याद को में
उम्रभर साथ रख लूंगा
तुम्हें अब रख नही सकता
कि मैं भी गृहस्थी वाला हूॅं।

dinesh dhyani

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अचानक

अचानक कभी
यादों में आज भी
उमड़ पड़ता है
यादों का झुरमुट
और
उघड़ने लगते हैं
बीते दिनों के
पैबन्द
खुलने लगती हैं
झुरमुटें और
ग्ुनगुनाने लगती हैं
मुंडे़रें
अपने आप।
अचानक
याद आजाती है
उन पगड़ंडियों और
रौले, पंधेरे, जंगलों
और उन लोगों की
जिनके साथ
बिताये थे कभी हसीन पल
न जाने आज
अचानक मेरे सामने
खड़ा हो गया
मेरा कल
और मैं उसे जानते हुए भी
पहचान नही सका
क्यों कि अब मेरी स्मृतियां
चाहते हुए भी
उन दिनों की यादों को
उन बिछुड़े लोगों को
बटोर ही नही सकती हैं
क्यों कि अब मेरी
प्राथमिकतायें
बदल गईं हैं
तभी तो अब उसकी याद आते ही
वह दर्द नही उभरता
हां कहीं एक हूक जरूर उठ जाती है
लेकिन यह उतनी तीखी
नही जितनी तब होती थी
मेरी आॅंखें कैसे अनवरत
 रोती थीं और मेरे
उठने, सोने और जागने रोने में
वही और बस वही होती थी।
आज उसकी यादें हैं
लेकिन तस्वीर धुंधला गई है
तभी तो आज अचानक
याद हो आई है।।
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dinesh dhyani

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कहानी
अपना-अपना दर्द
दिनेश ध्यानी


हैलो!
हां.
कैसे हो?
ठीक हूॅं, अपना सुनाओ कैसी हो?
मैं ठीक हूॅं। तुम सुनाओं?
बस चल रहा है।
बस चल रहा है? ये सुबह सुबह मुंह लटकाये क्यों हो?
कुछ नही, बस ऐसे ही।
तुम भी ना कुछ कहो तो मुंह लटकाकर बात करते हो और पूछो तो कहते हो कि कुछ नही।
कहा ना कुछ भी नही।
ठीक है तुम जानो और तुम्हारा काम जाने मैं क्यों परेशान होने लगी तुम्हारी उदासी देखकर।
अरे बाबा मैं उदास नही हूॅं, बस यूंू ही जरा आज सुबह मूड़ खराब हो गया था।
क्यों कुछ कहा किसी ने?
नही किसी ने कुछ नही कहा।
मत बताओं, मैं जानती हूॅं तुम्हारा वही पुराना राग। उसके साथ अभी तक बनाकर नही चले, उसे समझा नही पाये और अपने आप फुकते रहते हो। सच कहॅंू कभी-कभी मुझे लगता है कि तुम शायद सनकी इंसान हो। जानते हो क्यों? क्यों कि तुम अपनी परेशानी को किसी को बताना नही चाहते हो और अपने आपस में बैठकर कभी भी तुमने उससे सुलह की कोशिश की नही फिर कैसे होगा तुम्हारी समस्या का समाधान?
जानती हो दुनियां में कई ऐसी समस्यायें हैं जिनका अभी तक भी कोई समाधान नही निकला है। कई ऐसी बीमारियां हैं कि उनका इलाज नही खोजा जा सका है। इसमें अगर मेरी समस्या भी एक शािमल कर ली जाए तो फिर अचरच नही होना चाहिए।
तुम कोई फैसला क्यों नही ले लेते?
कैसा फैसला?
अरे कि तुम्हें क्या करना है? कैसे रहना है? ऐसे में तो तुम्हारा जीना मुहाल  लगता है।
जानती हो जब मुझे फैसला लेना था तब मेरे अपनों ने मुझे फैसला लेने नही दिया और आज मैं चाहकर भी कुछ फैसला नही कर सकता हूॅं। कैसी बिड़ंबना है जब फैसला लेने के हक में था तब अपनों की बंदिशें और आज किसी की बंदिशें नही हैं तो अब फैसला नही ले सकता हूॅं। वाह! री जिन्दगी तेरे रंग भी अजब-गजब हैं। छोड़ो मेरी तुम अपनी सुनाओं, काफी दिनों बाद मिलना हो रहा है। कैसी हो?
मिलना? मिलना हो रहा है कि फोन पर बातें हो रही हैं? सब ठीक चल रहा है।
घर में सब ठीक हैं?
हां फिलहाल सब ठीक हैं।
अरे तुम्हारे उसका क्या हुआ, वो जिस प्रोजेक्ट पर तुम बात कर रही थीं ना।
हां उसकी बात हो चुकी है मैंने प्रोजेक्ट सम्मिट कर दिया है। शायद अगले सप्ताह देहरादून जाना होगा।
वेरी गुड़।
थेंक्स। अच्छा एक बात कहॅंू?
हाॅं कहां।
तुम ऐसा क्यों नही कर लेते हो कि एक दिन उससे सीधी बात करों कि अब ऐसा कब तक चलेगा?
अरे छोड़ो भी उन बातों को। जिन बातों का कोई हल नही हो सकता है, जो बातें हमारे बस से बाहर हो चुकी हैं उनको कुरेदकर क्या फायदा? जानती हो मैंने क्या क्या नही किया लेकिन हारकर अब मन को मना पाया हॅंू कि दुनियां में कुछ चीजें ऐसी होती हैं कि उन्हें हम बदल नही सकते हैं। अब तो एक ही बहाना है कि किसी तरह से बच्चों का बुरा न हो। सच कहॅंू तो बच्चों के भविष्य और उनकी सलामती के लिए एक छत के नीचे रह रहे हैं।
हूं। लेकिन क्या तुम्हें नही लगता कि इस तरह अजनबियों की तरह रहना ठीक होगा?
अजनबियों की तरह? इसमें बुरा क्या है? लोग भी तो एक ही बस में, एक ही रेल में घंटों तक अजनबियों की तरह यात्रा करते हैं। मैं तो इसे इतना ही समझता हूॅं कि रात को सोने के लिए घर आ जाता हॅंू, खाना मिल जाता है कपड़े धुले मिल जाते हैं और क्या करना है?
अरे बस यही चाहिए?
और?
और भावनायें और इमोसन्स का क्या?
सच कहना, आज के जमाने में कोई किसी की भावनाओं और इमोसंेन्स की परवाह करता है?
अरे मैं औरों की बात नही कर रही हूॅं। जब हम एक ही परिवार में रहते हैं तो फिर पति-पत्नी के बीच भावनात्मक संबंध तो होने ही चाहिए नां
भावनात्मक संबंध? अरे जब रिश्ता ही भावनाओं को  दबाकर हुआ हो तो उसमें भावनात्मक संबध और इमोसेंस कहां से रहेंगे?
तो उस समय विरोध क्यों नही किया तुमने?
विरोध? सब कसाई की तरह खेड़े थे नाते रिश्तेदार। सबके सब इस तरह कर रहे थे कि जैसे इसके बराबर लड़की पूरे ब्रह्माण्ड में न हो या मुझे इसके अलाव कोई लड़की मिलने वाली नही है। वास्ता दिया गया था तब परिवार, नाते रिश्तों और खून का। तब मैं असहाय था और हां कहने के सिवाय कुछ नही कर पाया था।
तो अब क्यों रोते रहतेे हो?
रो नही रहा हूं।
इसे रोना ही कहते हैं। सुनों अब भलाई इसी में है कि चुपचाप अपनी गृहस्थी में जमे रहो और किसी प्रकार का दंश मत पालों। यह किसी के लिए भी उचित नही है। जितना हो सके जीवन को आराम और आनन्द से जियो।
हां तुम कह तो सही रही हो। कहोगी भी क्यों नही समाजशास्त्र की प्रवक्ता हो ना, तुम प्रैक्टीकल से अधिक थ्योरी पर जोर देती हो।
मैं तुम्हें पढ़ा नही रही हूॅं।मैं तो कह रही थी कि हो सके तो सुलह करलो।
सुलह? क्या मैंने कोई कारिगिल छेड़ा है? या शिमला समझौंते का उलंघ्न किया है? इतने साल से मैं सुलह के अलाव क्र ही क्या रहा हूंॅ? तुम सोचती हो कि मैंने अपनी तरफ से किसी तरह की कमी रखी होगी? नही ऐसा नही है मैंने हर वो प्रयास किया है जो कोई नही करता है। जानती हो मैंने हर तरह से समझौता किया लेकिन जानती हो न कि जिसने नही सुधरना है उसके लिए तुम अपनी जान भीे दे दो ना तो कम ही है। इसलिए अब इसे अपनी नियति मानकर चल रहा हॅू। हाॅं एक तुम हो जिससे मैं अपना दर्द बता देता हॅू, नही तो आज के जमाने में दूसरों के दर्द सुनने और समझने की फुरसत किसे हैं? अब जीवन में दर्द के सिवाय रह ही क्या गया है?
तुम कैसे इंसान हो इतनी बातें की दर्द से शुरू की और फिर दर्द पर आकल अटक गये?
क्या करूं? दर्द ही है जो अब मेरे जीवन का संगी साथी हैं। जानती हो ये दर्द ही है जो अपना फर्ज सिद्दत के साथ निभाता है और कभी भी दगा नही करता है। इसके अलाव  आदमी का क्या भरोसा कब धोखा दे जाए। आज तो अपना साया ही जब साथ नही देता तो दूसरों से क्या कामना की जा सकती है।
कभी कभी तुम बहुत ही दार्शनिक बातें करते हो और कभी-कभी छोट बच्चों की तरह उदास हो जाते हो ऐसा क्यों?
मुझे खुद पता होता तो फिर बात ही क्या थी लेकिन मैं तो इतना जानता हूॅं कि जब दर्द उठता है तो एक तड़प उठती है जो मुझे अन्दर तक हिला देती है और जब अपने दर्द को थोड़ा राहत देता हॅंू तो लगता है कि आराम है। बस यही दद्र है जो कम ज्यादा होता रहता है लेकिन सदा ही मेरे साथ बना रहता है। जानती हो दुनियां में सब का अपना अपना दर्द होता है। किसी का कुछ न मिलने का दर्द, किसी का कुछ होने के बाद भी दर्द और किसी का दर्द न होने का दर्द। लेकिन मैं मानता हूॅें कि दर्द हर किसी को है। कुछ सहा जाता है कुछ नही सहा जाता है। लेकिन यही दर्द है जो हमारे साथ है  हमेशा से ही हमेशा के लिए।
हां तुमसे कौन जीत पाया है। दर्द तो है लेकिन अलग-अलग।




jagmohan singh jayara

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प्रिय कविवर सिमन्या...

मेरु पंछी मन आपतैं खोजण लग्युं थौ,
मुलाकात ह्वैगि मेरा पहाड़ पोर्टल फर,
आपकी अनुभूति पढि-पढिक तीस बूझि,
जन बूझ्दि छ पहाड़ का धारा फर.

आपका दूरभास फर संपर्क कन्न की अभिलाषा थै मन मा...पर क्य कन्न कवि सम्मलेन का दिन हुल्ता कुल्ती मा  दूरभास संख्या न दी सक्यौं अर् न ली सक्यौं. 

"कभी ऐसा हो सकता है"

जब लोग कहेंगे यहाँ गंगा बहती थी,
खूब सूरत तटों पर उसके,
श्रध्दालुओं की स्नान के लिए,
पूजा पाठ हेतु मंदिरों में,
बहुत भीड़ रहती थी.

खूब सूरत धार्मिक शहर,
इसके  किनारों पर,
जहाँ लगते थे मेले,
लुप्त हो चुकी अब गंगा,
रह गए हैं अकेले.

आज पथ भूली गई,
या रूष्ट होकर सूख गई,
जिसकी बहती थी अविरल धारा,
प्रकृति का प्रकोप हुआ,
या इंसान ने उसको मारा.

जो भी होगा भविष्य में,
आज गाय को खोल दिया है,
और पवित्र गंगा को,
बांधों में बाँध कर,
त्रस्त होकर मरने के लिए,
जहर घोल दिया है.

सोचो! कभी इसका परिणाम,
गंगा और मानवता के लिए,
घातक हो सकता है,
ये है कवि "जिज्ञासू"  की अनुभूति,
"कभी ऐसा हो सकता है"

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
3.8.2009       
 

dinesh dhyani

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Hello!
Jayara sahab, thanks, bhaji now pl. note my mob no and when get time pl. call me. thanks
Dinesh Dhyani

dinesh dhyani

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उत्तराखण्ड की महान विभूतिः स्वर्गीय पत्रकार मदन जोशी
दिनेश ध्यानी

नई दिल्लीः उत्तराखण्ड आन्दोलन के अग्रणी चिंतकों में से एक वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय मदन जोशी को उनके नौंवें निर्वाण दिवस के अवसर पर याद किया गया। बैठक का आयोजन मदन जोशी के पत्रकार साथियों ने वसुन्धरा इन्कलेव में किया। उत्तराखण्ड सरकार से मांग की गई कि मदन जोशी के नाम से उनके गांव सैंधार से वेदीखाल तक की रोड़ का नामकरण मदनजोशी मार्ग किया जाए।  दूसरे प्रस्ताव मंे यह पारित हुआ कि स्वर्गीय जोशी की स्मृति में एक मदन जोशी स्मृति गं्रथ का प्रकाशन किया जाए। ज्ञातव्य हो कि मदन जोशी एक अग्रणी आन्दोलनकारी एवं चिंतक रहे हैं। श्री जोशी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को उत्तराखण्ड आन्दोलन को समर्पित कर दिया था।
मदन जोशी का जन्म 10 फरवरी 1955 को गढ़वाल के वीरौंखाल विकासखण्ड के अन्तर्गत सैंधार ग्राम में हुआ। इनकी प्रारंभिक शिक्षा इनके गांव के स्कूल एवं वेदीखाल से 12वीं पास किया  उसके बाद अपने पिताजी के साथ हिमाचल चले गये। वहीं से बीए पास किया। सरकारी नौकरी में आने के बाद भी स्वच्छन्द स्वभाव के जोशी सरकारी सेवा से त्यागपत्र देकर 1977 में देहरादून आ गये। देहरादून में एमए करने के साथ ही पत्रकारिता से जुड गये। यहंा इन्हौंने अपना टंकण एवं शार्टहैंड़ इस्टिट्यूट भी खोला लेकिन स्वचछन्दता के कारण एवं खोजी पत्रकारिता में व्यस्त रहने एवं उत्तराखण्ड आन्दोलन में रहने के कारण व्यवसाय पर ध्यान नही दे पाये।
स्वर्गीय मदन जोशी ने दूनदर्पण से अपनी पत्रकारिता की पारी की शुरूआत की और नियति की विडं़बना देखिये कि जीवन के अन्तिम पड़ाव में श्री मदन जोशी दून दपणर््ा में ही आ गये थे। दून दर्पण में श्री मदन जोशी 1986 से बतौर उप सम्पादक के तौर पर कार्य किया इस दौरान आपने दून दर्पण को नया कलेवर और तेवर दिये। समाचार पत्र के मालिकान से मतभेद होन के कारण आपने 1985 में दून दर्पण से त्याग पत्र दे दिया। इसके बाद श्री सी. एम. लखेड़ा द्वारा सम्पादित जनलहर, दैनिक में आपने बतौर उप सम्पादक कार्य किया। इस बीच आप स्वतंत्र रूप से भी लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। इस बीच  आपने एमएस में दुबारा एडमीशन लिया और एसएफआई से जुड़कर आप बामपंथ की राजनीति के माध्यम से डीएवी काॅलेज में भी छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। जल, जंगल और जमीन के सरोकारों से बढ़ते हुए आप अस्सी के दशक में उत्तराखण्ड राज्य की मांग और इसके औचित्य को जन-जन तक पहुंचाने के उदे्श्य से दिल्ली प्रवास पर आये और सन् 1986  में आप दिल्ली के होकर ही रह गये। दिल्ली से प्रकाशित तत्कालीन प्रसिद्ध पाक्षिक पर्वतीय टाईम्स में आप बतौर सहायक सम्पादक जुडे़। इस बीच उत्तराखण्ड से आये कनकटे बैल  जो कि पहाड़ के विकास एवं लोन के नाम पर निरीह जानवर के बार-बार कान काटकर उसे मृत घोषित कर दिये जाने के गंभीर षड़यंत्र को उजागर करने के लिए अल्मोड़ा से भवदेव नैनवाल द्वारा दिल्ली लाया गया था। कनकटा बैल प्रकरण ने सड़क से संसद तक काफी धूम मचाई थी और पहाड़ में बढ़ते भ्रष्टाचार की पोल खाली थी। इस प्रकरण में मदन जोशी जी का योगदान ऐतिहासिक रहा है। प्रकरण मे आपका सहयोग अविस्मरणीय रहा। पौड़ी से शराब माफिया द्वारा मारे गये पत्रकार उमेश ड़ोभाल हत्याकांड़ को आपने अपनी लेखनी और खोज परक पत्रकारिता के बल पर काफी हद तक लोगों के सामने रखा और शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी का फोटो पहली बार पर्वतीय टाईम्स में छापकर आपने काफी नाम कमाया। यह वह दौर था जब कोई भी मनमोहन का फोटो नही खींच सकता था और अगर खींच लिया तो किसी की हिम्मत नही थी कि उसका फोटो छाप सके लेकिन आपने पर्वतीय टाईम्स के माध्यम से पत्रकारिता को नया आयाम दिया।
पर्वतीय टाईम्स में कार्य करते हुए आपने दिल्ली में उत्तराखण्ड के लोगों एवं प्रवासी संगठनों को एक मंच पर लाने का कार्य किया। तत्कालीन उत्तराखण्ड युवा शक्ति मंच, उत्तराखण्ड प्रगतिशील मंच जैसे सामाजिक संगठनों को एक मंच पर लाकर आपने आने वाले समय के उत्तराखण्ड आन्दोलन की जमीन दिल्ली में तैयार की। इसी  बीच आप भवन मजदूरों के आन्दोलनों से लेकर हर उस आन्दोलन में अपनी भागीदारी निभाते रहे जो जन सरोकारों से जुड़ा हुआ था। फरवरी 1987 में दिल्ली में उत्तराखण्ड आन्दोलन के लिए जमीन तैयार करने के लिए उत्तराखण्ड एकता सम्मेलन का आयोजन करवाने में श्री मदन जोशी का योगदान अविस्मरणीय रहा। उक्त सम्मेलन में देश के कौने -कौने से उत्तराखण्ड के संगठनों एवं आन्दोलनकारी संगठनों को बुलाया गया था और यह उत्तराखण्ड आन्दोलन में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
श्री मदन जोशी ने सितम्बर 1991 से अगस्त 1992 तक आकाशवाणी दिल्ी में उप सम्पादक के रूप में भी कार्य किया। इसके बाद आप पुनः देहरादून चले गये।  मई 1995 से 1996 तक दैनिक हिमालय दर्पण में उप सम्पादक के रूप में कार्य किया। 1868-87 के दौरान आप पुनः दिल्ली  आ गये तथा दैनिक जागरण में बतौर उप सम्पादक कार्य किया। इसके अतिरिक्त जनसत्ता, चैथी दुनिया, गंगा रविवार, संचेतना, अवकाश आदि पत्र, पत्रिकाओं में लिखते रहे। हिन्दी से अंग्रेजी एवं अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद एवं शोधपरक लेख भी आपने लिखे।
श्री मदन जोशी का वैवाहिक जीवन सफल नही रहा। आपने अपनी पत्नी से मनमुटाव होन के कारण सहमति के आधार पर तलाक ले लिया। श्री जोशी किसी पर अपनी भावनाओं और इच्छा को नही थोपना चाहते थे और वे यह अपने लिए भी नही चाहते थे कि कोई उनकी आजादी या विचारों से समझौता करने को कहे। शायद असफल वैवाहिक जीवन का यह भी एक पहलू रहा हो। श्री मदन जोशी एक खुद्दार किस्म के व्यक्ति थे। उन्हौंने कभी भी अपने उसूलों से समझौता नही किया। यही कारण था कि उनके विचार अपने पिता श्री उमानन्द जोशी से कभी नही मिले। वे परिवार में दो बहन और दो भाईयों में से सबसे बड़े होने के बावजूद भी सामाजिक सरोकारों से आजीवन जूझते रहे और परिवार की जिम्मेदारी उनके पिता ने बाखूबी निभाई। उनके पिता हिमाचल सरकार में सेवारत थे। श्री मदन जोशी समाजिक सरोकारों के लड़ते हुए अचानक 29 जुलाई, 2000 को सदा के लिए हमसे विदा हो गये लेकिन उनके विचार और कार्य सदा ही हमें सम्बल देते रहेेंगे। श्री मदन जोशी का इन्तकाल देहरादून में हुआ तब वे दून दर्पण मंे उप सम्पादक के पद पर कार्यरत थे। श्री मदन जोशी को जानने वाले लोग जानते हैं कि वे किस उच्च कोटि के विचारक और आन्दोेलनकारी थे। श्री जोशी पूरी दुनिया के किसी भी विषय पर अपने सटीक विचार और राय देने के लिए मशहूर रहे है। उनके निजी मित्र उन्हें बूबू यानि कि दादा जी करकर बुलाते थे। लेखक को भी श्री जोशी के सानिघ्य में बहुत कुछ सीखने को मिला। दिल्ली में इनके निजी मित्रों में पत्रकार उमाकान्त लखेड़ा, सुरेश नौटियाल, वेद प्रकाश भदौला, दाताराम चमोली, हरिपाल रावत, अनिल पंत, बृजमोहन उपे्रती, उदयराम ढ़ौड़ियाल, राजेन्द्र शाह, रामप्रसाद ध्यानी, संयोगिता ध्यानी, दिनेश ध्यानी, ड़ीडी पाण्डेय, प्रताप शाही आदि थे।
श्री मदन जोशी का निधन उत्तराखण्ड समाज के लिए एक अपूर्णीय क्षति है। आज आवश्यकता है कि उनके विचारों को हम जिन्दा रखें और इस दिशा में कार्य करेे।



 

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