Author Topic: Poems By Vikam Negi 'Boond"- विक्रम नेगी "बूंद" की कवितायें तथा लेख  (Read 6570 times)

विक्रम नेगी

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सिलसिला ये ख़त्म उम्रभर नहीँ होता ।
बातोँ से किसी का भी गला तर नहीँ होता ।।

बातेँ तो निकल जाती हैँ बात-बात मेँ ।
बातोँ के पाँव होते हैँ पर सर नहीँ होता ।।

निकली है कोई बात, तो कोई बात नहीँ है ।
बातेँ हवा हैँ और हवा मेँ घर नहीँ होता ।।

तू मान या न मान, मगर बात सही है ।
खच्चर से कभी पैदा खच्चर नहीँ होता ।।

बारिश मेँ भीगकर नदी भी शोर करती है ।
यूँ ही कोई सैलाब, समन्दर नहीँ होता ।।

करना है कोई काम, तो करना भी पड़ेगा ।
दुनियाँ मेँ कोई काम यूँ कहकर नहीँ होता ।।

बातोँ मेँ वक़्त ग़ुज़रता है जिनका सुबह-शाम ।
उनका कभी भी जवाँ मुकद्दर नहीँ होता ।।

ख़ुद पे जिन्हेँ यक़ीन हो वो मानते हैँ बात ।
उनकी ज़ुबाँ पे कभी पर-मगर नहीँ होता ।।

ग़र ठान ली है बात, तो मुश्किल नहीँ कुछ भी ।
और बात सही हो, तो कोई डर नहीँ होता ।।

बातोँ मेँ जिसके दम है वही आदमी है "बूँद" ।
उस पर किसी की बात का असर नहीँ होता ।।

विक्रम नेगी

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लिखो,
शब्दों के ताने बाने से समाज का दर्द,
लोगों ने तुम्हारे शब्दों में चित्रकारी देखने का हुनर सीख लिया है.

लिखो
समाज की कड़वी सच्चाई,
पाठकों को अब करेले का स्वाद मीठा लगने लगा है.

करो तंज,
व्यवस्था पर, कुरीतियों पर,
लोग खाने में तीखी मिर्च लेने के आदी हो गए हैं.

भर दो चाहे कितनी भी संवेदनाएं कविताओं में-
दो आंसू तो फिल्म देखकर भी निकल आते हैं.

आक्रोश भर दो कविताओं में यथार्थ बोध के साथ
कहता तो पान सिंह तोमर भी है-
"बीहड़ में बागी बसते हैं.....डाकू तो पार्लियामेंट में बैठे हैं..."

"कला केवल कला के लिए है..."
बहुत खुश होंगे आजकल-
ऐसा कहने वाले-
यह सब देखकर....

क्या अब भी कोई तरीका बचा है लिखने का-
जिससे तुम कविताओं को-
कोलाज़/पेंटिंग या भोजन बनने से रोक सकते हो....??

विक्रम नेगी

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मस्तिष्क के धरातल पर,
हमेशा विद्ममान रहते हैं-
पहाड़ और मैदान.

पहाड़ नितांत वैयक्तिक है,
और मैदान सार्वजनिक.

वैयक्तिक हार और जीत,
हताशा और हर्ष,
समझौतों का तान-बाना है- पहाड़.
और हताशा से हारकर भागने के लिए बने हैं- मैदान.

और ठीक इसी तरह
दौड़कर थकने के बाद
सुकून भरी जगह है- पहाड़

पहाड़ भागता है मैदानों की ओर
दौड़ने के लिए
मैदान चला आता है पहाड़ों की ओर
कुछ देर आराम से बैठने के लिए.

एक दूसरे के पूरक होते हुए भी
अल्पकालिक होती है
दोनों की मुलाक़ात.

और यह भी सच है कि-
पहाड़ों से हर चीज़ मैदानों की ओर बहती रहती है.
लौटती हैं तो सिर्फ़ हवाएं
पर्यटकों की तरह कभी-कभी
पुरानी यादों को अपने साथ समेटकर उड़ा ले जाने को.

एक एल.ओ.सी. हमेशा खींची रहती है,
दोनों के बीच
उस जगह पर जहाँ मिलते हैं दोनों.

झेंप, अज़नबियत, मिलनसार स्वाभाव के मिश्रण से भरे
जाने-पहचाने अंदाज़ में
अक्सर मिला करते हैं-
पहाड़ और मैदान.

निजी अस्मिता को नाक पर लटकाए हुए,
दूरी और नज़दीकी का रिक्त स्थान बरकरार रखते हुए,
एक दूसरे का अक्सर अभिवादन करते हैं.

दाखिल होते हैं एक दूसरे की सीमाओं के भीतर
राष्ट्रवादियों की तरह
एक समझौता एक्सप्रेस हमेशा चलती है
पहाड़ और मैदान के बीच.

....
"बूँद"
१४-१२-२०१२

विक्रम नेगी

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कल्पनाओं का बिल्डिंग प्लान,
यथार्थ की ज़मीन,
शब्दों की ईटें,
अनुभूति का पानी,
विचारधारा का सीमेंट,
संवेदनाओं की रेत,
और पक्षधरता के लोहे से ही
कविता का घर बनता है.

इस घर में कविता रोती भी है,
हँसती भी है,
हंसाती भी है,
गाती भी है, चिल्लाती भी है,
कविता इसी घर में रहती है,
और इसी घर में दफ्न भी होती है.

खुशी इस बात की नहीं होती है कि कविता का घर बन गया.
बल्कि दुःख इस बात का होता है कि कविता जिंदा कैसे रहेगी....?
यह सवाल कविता का घर बनाने वाला मिस्त्री नहीं सोच सकता,
बल्कि कविता को घर में जिंदा देखने की ख्वाहिश रखने वाला कविता का हितेशी, कविता का पड़ोसी ही सोच सकता है...!

कविता कैसे जिंदा रहेगी...?
क्या आप कविता के पड़ोसी बनेंगे...?

विक्रम नेगी

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तस्वीर अपनी हो,
प्रकृति की हो
या फिर समाज की..!

इतना तो तय है
कि कुछ लोग लाईक करते हैँ और कुछ कमेँट.
और कुछ यह दिलचस्प नज़ारा देखते हैँ
तटस्थ होकर.

बैठे बिठाए
दुनियाँ का दस्तूर
समझ मेँ आ जाता है.
देखा जाए तो
पक्षधर और विपक्षी के होने के बावज़ूद भी
टतस्थ हैँ सब .

प्रत्यक्ष और परोक्ष तटस्थ

समुद्र तट पर बैठकर
लहरेँ गिनना किसे अच्छा नहीँ लगता.
लहरोँ के शोर मेँ
उत्साह, उमंग, मस्ती और उदासी सबकुछ तो मिल जाती है बारी बारी.

तट पर बैठे बैठे सुबह और शाम
दोनोँ खूबसूरत दिखाई देते हैँ.

है न?

...
"बूँद"

विक्रम नेगी

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आँखेँ बुलाती रही,
नीँद नहीँ आई.
नीँद ढीठ हो गई है,
आँखोँ की नहीँ सुनती अब.

रातभर
वक़्त के साथ
आँखेँ बात करती रही.
न जाने कब वक़्त चला गया,
आँखेँ थककर सो गई,
शायद नीँद भी चोरी छिपे
लौट आई थी
आधी रात के बाद.
आहट भी नहीँ हुई.

मनमौजी है,
बुलाने पर नहीँ आती,
ज़िद्दी हो गई है नीँद.

आँखेँ अकेली पड़ गई हैँ,
कल रात वक़्त साथ था,
वक़्त के चेहरे पर
स्याह रातोँ का साया था,
अपना सा लगा था
वक़्त.
सुबह आँख खुली
तो नीँद ने साथ छोड़ दिया.
और वक़्त के चेहरे पर,
परायेपन की रौशनी
चमक रही थी.
सचमुच वक़्त भी
बदल गया है अब.
और आँखेँ हैरान हैँ
बदले हुए वक़्त को देखकर...!

-
"बूँद"

विक्रम नेगी

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कभी कागज़ पर लिख लिया,
कभी फेसबुक पर,
कभी घर की दीवारों पर चीखे,
तो कभी टेलीविजन पर,
कभी दुनियां पर,
कभी धर्म पर,
कभी समाज की झूठी नैतिकताओं पर,
तो कभी किसी की विकृत मानसिकता पर.

कभी रोता है,
तो कभी सोच में घंटो गुज़ार देता है,
एकांत में ही संवेदनाएं जागृत होती हैं,
रोज़मर्रा के कामों में कहाँ कोई खुद के बारे में सोचता है?
और कहाँ कोई दूसरों के बारे में सोचता है?

गुस्सा आता है,
अपने लिए भी,
और दूसरों के लिए भी,
अपने पर भी,
और दूसरों पर भी,
एक लाचार व्यक्ति संवेदनशील होने का दर्द यों ही व्यक्त कर पाता है.

विक्रम नेगी

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कमज़ोरी गाली देती है, लाचारी झल्लाती है.
खुद पर जब गुस्सा आता है, ख़ामोशी चिल्लाती है.
कुछ अपनी, कुछ दुनियां की मज़बूरी ताने देती है,
जब भी दिल्ली और गुहाटी शर्मिंदा कर जाती है.
अपने दुःख-दर्दों को तो हम पलभर में सह लेते हैं,
लेकिन पीर पराई अक्सर बरसों तक तड़पाती है.

ये भी सच है घटनाओं को कौन याद रख पाता है,
ये भी सच है ज़ख्मों के भरने तक दर्द सताता है,
ये भी सच है जिस पर बीती दर्द उसे ही होता है,
ये भी सच है पीर पराई देखके दिल भी रोता है.
ये भी सच है बातें करके हम खुद को समझाते हैं.
ये भी सच है दुनियां बदले, आस में हम मर जाते हैं.

विक्रम नेगी

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आँखेँ सबकी एक सी
नज़रिया अलग अलग
बड़ी हैँ
घुच्ची हैँ
भेँगी हैँ
काली हैँ
नीली हैँ
भूरी हैँ

दिखाई तो सभी को देता.
उतना ही जितना बड़ी आँखेँ देखती हैँ
वैसा ही जैसा नीली आँखेँ देखती हैँ..!

चश्मे की बात अलग है...!

धनेश कोठारी

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बिक्रम भाई आपकी कविताएं वर्तमान की जिस तरह से चीरफाड़ करती हैं, वह जेहन को झकझोरती हैं, बताती हैं कि जो हम देख रहे हैं वह अधूरा सच है. और इसी को जीते हुए हम आत्मविभोर हैं. इसी धार को बरकरार रखिएगा. शुभकामनाएं

 

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