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Author Topic: Footage Of Disappearing Culture - उत्तराखंड के गायब होती संस्कृति के चिहन  (Read 7203 times)

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Online एम.एस. मेहता /M S Mehta

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दोस्तो,

समय की बहती धारा एव आधुनिकीकरण की दौर मे हम लोग भी अपनी संस्कृति को खोते जा रहे है ! आने वाली पीड़ी एक अपनी संस्कृति को खोज भी नही पायेगी क्योकि इतिनी तेजी से यदि हमारा संस्कृति बदलती रही तो इसका अस्तित्व ढूदना मुश्किल हो जायगा. !

आएये प्रयास करे की internet के माध्यम से हम नई पीड़ी को उजागर करे और हामारी संस्कृति के खोये पद चिह्नों को इकट्ठा करने का प्रयास करे !


एम0 एस० मेहता
« Last Edit: August 16, 2009, 09:13:12 PM by हिमांशु पाठक »
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!

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Offline Himanshu Risky Pathak

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लुकी छिपी बादवो में चमकी जैसी ज्यून तेरो मुख चमको
तेरा रसीला होठो बे आज मौ जै टपको

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हाथ से बना जनेऊ (यज्ञोपवीत)
« Reply #122 on: July 21, 2009, 04:49:00 PM »
’तकली’ की मदद से हस्तनिर्मित और अभिमन्त्रित जनेऊ बनाने में ३-४ दिन लग जाते हैं. इस प्रकार की जनेऊ बनाने में एक-एक रेशे को बुनना होता है, और यदि एक भी ताना टूट जाये तो जनेऊ अशुद्ध मानी जाती है. अब इस तरह की जनेऊ बनाने वाले कम ही बुजुर्ग रह गये हैं. बाजार में उपलब्ध जनेऊ से ही काम चलाना पड़ता है.


भौत है गो तेरो रौराट-बौराट!
आब थामि जा रे चौमास !!!

Offline Himanshu Risky Pathak

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Pahado me hast nirmit janeyu KATTU ke dwara bnaya jata tha.

Janeyu bhi khane se phle kata/bnaya jata tha. Khane ke baad ya bina nhaye dhoye is karya karne per janeyu ko ashudh mana jata hai.

I have this tool(Kattu) at my home. and i know how to create janeyu using this :)
Very tedious work.

’तकली’ की मदद से हस्तनिर्मित और अभिमन्त्रित जनेऊ बनाने में ३-४ दिन लग जाते हैं. इस प्रकार की जनेऊ बनाने में एक-एक रेशे को बुनना होता है, और यदि एक भी ताना टूट जाये तो जनेऊ अशुद्ध मानी जाती है. अब इस तरह की जनेऊ बनाने वाले कम ही बुजुर्ग रह गये हैं. बाजार में उपलब्ध जनेऊ से ही काम चलाना पड़ता है.


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साभार - दैनिक जागरण 23 जुलाई 2009

वक्त के बदलाव ने पहाड़ की कला संस्कृति, रहन सहन, खानपान के साथ ही यहां के ठौर ठिकानों और आशियानों में भी भारी तब्दीली ला दी है। मिट्टी, गारे, लकड़ी, पत्थर और पाथर की जगह ईट, सीमेंट और लोहे का प्रचलन आम होने से पहाड़ में कंक्रीट का जंगल बढ़ता जा रहा है। जहां पहले लोग संयुक्त रूप से बाखली में रहते थे, अब प्रथक से कम्पाउंड और लाज का प्रचलन बढ़ गया है। पहाड़ में यहां की भौगोलिकता के अनुरूप सदियों से यहीं के संसाधनों पर भवन निर्माण होता था। नक्काशीदारी और मौसम के लिहाज से बनने वाले इन आशियानों की रंगत देखते ही बनती थी। अधिकांश गांवों में लोग बाखली में रहते थे। पत्थर, लकड़ी, पाथर और गारे से बने इन मकानों की खास विशेषता यह होती थी कि ये गर्मियों में शीतलता और सर्दियों में गर्माहट देते थे। छतें पाथर की ढ़ालदार होती थी जिसमें बर्फबारी के मौसम में भी छतों पर बर्फ रूकती नहीं थी। स्वास्थ्य के नजरिये से आशियाने अनुकूल थे। वैसे आज भी पहाड़ के कई हिस्सों में ये पुराने मकान उसी रंगत और ठसक के साथ खडे़ है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनके दीर्घकालिक होने की है आज भी ऐसे कई मकान है जो पिछले पांच सौ साल से कई पीढि़यों को आसरा देते आये हैं। उस जमाने में इन मकानों को बनाने में लंबा समय लगता था। जहां आजकल दो तीन महीने में भवन बन जाते है उन दिनों छोटे मकान के लिए तीन चार वर्ष लग जाते थे। मकानों के निर्माण में सामूहिकता की मिशाल देखने को मिलती थी पूरे गांव वाले हर तरह से मदद करते थे और यही वजह होती थी कि अधिकांश पर्वतीय इलाकों में रहने वाला चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो अपना पक्का मकान बना ही लेता था। जमाने की बयार ने पहाड़ के इन ठौर ठिकानों और आशियानों में भी जबरदस्त तब्दीली ला दी है। अब मकान यहां के संशाधनों पर कम बाहर से आने वाली सामग्री पर ज्यादा बन रहे है। ईट, सीमेंट के साथ ही रेता बजरी भी मैदानी हिस्सों से आता है। सरिया का भी इस्तेमाल कालम बीम के साथ ही स्लैब (लिंटल) में जरूरी है। टाइल्स मार्बल भी बाहर से आता है यहां तक की मकान निर्माण में पहाड़ के अधिकांश क्षेत्रों में बाहरी और बिहारी मिस्त्रियों और मजदूरों का ही राज है। अब आधुनिकता की दौड़ में लाज व कम्पाउंडों का प्रचलन बढ़ गया है और पहाड़ में भी अब मकान नही अपितु अच्छी खासी कोठियां खड़ी होने लगी है और इसकी देखादेखी पुराने आशियानों को तोड़कर गांवों और कस्बों में लोग सीमेंट कंक्रीट के मकान बना रहे है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इनका असर प्रतिकूल ही है। ये गर्मियों में जहां ज्यादा गर्मी देते है, वहीं ठण्डे दिनों में कोल्ड स्टोर से कम नही है। जिससे लोगों में तमाम बीमारियों का होना भी इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है। बहरहाल आधुनिकता के दौर में पहाड़ में पुराने ठौर ठिकानों में आया बदलाव यहां कंक्रीट व सीमेंट के जंगल खड़ा कर रहा है।

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Offline खीमसिंह रावत

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मै जब भी गाँव जाता हू तो पुराने मकानों में लकडी के संगाड (चौखट ) पर उकेरी गइ कला को देखकर ठगा सा रहा जाता हूँ सोचता हूँ की आज की तरह आई आई टी जैसे संस्थान नहीं थे न ही आज की तरह कम्पूटर डिजाइन न ही वे कारीगर पढ़े लिखे थे / बिलकुल अनपढ़, अभावों की जिंदगी /

कारीगरी को देखकर मन को विश्वास नहीं होता है कि क्या ये अनपढ़ शिल्पियों ने बनाये होगें /
सचमुच ये सूरदास के वात्सल्य प्रेम कि तरह लगता है/

खीम
परहित सरसि धर्म नहीं भाई, पर पीडा सम नहीं अधमाई ||

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आज के दौर में भी गड़वाल का भारतीय संस्कृति के संरक्षक के तौर पर देखा जा सकता है। अगर हम दार्शनिक ज्ञान के विकास-क्रम तथा मंदिर वास्तुकला में शास्त्रीय प्रकृतियों पर वेदों और महाकाव्यों के प्रभाव, प्रतिमा विज्ञान एवं भक्तिपरक नृत्यों,  जिनकी हिमालय की कंदराओं में रहने वाले महान ऋषियों ने व्याख्या की है, पर विचार करें तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगी। यह भारतीय संस्कृति एवं दर्शन का प्रतीक है।
"जुगराज रैया या धरती और याखाका मनखी जय देवभूमि उत्तराखंड "

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आज के दौर में भी गड़वाल का भारतीय संस्कृति के संरक्षक के तौर पर देखा जा सकता है। अगर हम दार्शनिक ज्ञान के विकास-क्रम तथा मंदिर वास्तुकला में शास्त्रीय प्रकृतियों पर वेदों और महाकाव्यों के प्रभाव, प्रतिमा विज्ञान एवं भक्तिपरक नृत्यों,  जिनकी हिमालय की कंदराओं में रहने वाले महान ऋषियों ने व्याख्या की है, पर विचार करें तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगी। यह भारतीय संस्कृति एवं दर्शन का प्रतीक है।


देवभूमि का कल्चर और संस्किर्ति का वर्णन


[youtube]http://www.youtube.com/watch?v=6KVUeZItQsU
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सांस्कृतिक रुप से उत्तरांचल को एक समृद्घ एवं गुन्जायमान विरासत प्राप्त हुई है। यहाँ पर अनेकों स्थानीय मेले एवं त्यौहार मनाये जाते हैं।
जैसे- झन्डा मेला (देहरादून), सरकन्डा देवी मेला (टिहरी गढवाल), माघ मेला (उत्तरकाशी), नन्दा देवी मेला (नैनीताल), चैती मेला (ऊधम सिंह नगर), पूर्णागिरि मेला (चम्पावत), पिरान कलियर मेला (हरिद्वार), जोलिजवी मेला (पिथौरागढ), उत्तरायणी मेला (बागेश्वर), कुम्भ एवं अर्द्ध कुम्भ मेला (हरिद्वार) इत्यादि। ये मेले एवं त्यौहार उत्तरांचल में सांस्कृतिक पर्यटन के लिए अपार सम्भावनाओं की ओर संकेत करते हैं।
 पर्वतों की रानी मसूरी, भारत का झील जिला नैनीताल, कोसानी, पौडी, लैंसडाउन, रानीखेत, अल्मोडा, पिथौरागढ, मुन्सयारी एवं अन्य बहुत से आकर्षक पर्यटन स्थल उत्तरांचल के भाग हैं।
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Bahut cheeje jo pahad se gayab ho gayee hai, Jaise :

 -   Alchi - one kind of spice
 
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जौनपुरी संस्कृति की है खास पहचान

नैनबाग (टिहरी गढ़वाल)। पिछड़ी, अनुसूचित जाति व जनजाति समिति का 26वां चार दिवसीय क्रीड़ा एवं सांस्कृतिक विकास समारोह मेला शुक्रवार से शुरू हो गया।

शुक्रवार को राइंका नैनबाग के खेल मैदान में क्रीड़ा एवं विकास समारोह का शुभारंभ करते हुए आपदा प्रबंधक एवं समाज कल्याण राज्यमंत्री खजानदास ने परेड की सलामी ली।

इस दौरान राइंका नैनबाग, गुरू रामराय, प्राथमिक विद्यालय, सरस्वती शिशु मंदिर व विद्या मंदिर के छात्रों द्वारा बैंड की धुन पर मार्चपास्ट किया। राज्यमंत्री खजानदास ने कहा कि इस तरह के आयोजन से ग्रामीण क्षेत्र में छिपी प्रतिभा उभरकर सामने आती है। उन्होंने कहा कि जौनपुर की लोक संस्कृति की खास पहचान है।

 इस मौके पर उन्होंने टीवाई रोड से यमुना ब्रिज तक विधायक निधि से रेलिंग लगाने की घोषणा की। जिला पंचायत उपाध्यक्ष मीरा सकलानी शौचालय के लिए एक लाख रुपये व ब्लाक प्रमुख गीता रावत ने प्राथमिक विद्यालय के सौंदर्यीकरण के लिए 50 हजार रुपये देने की घोषणा की।

 इस अवसर कनिष्ठ उप प्रमुख रेशा नौटियाल, जिपं सदस्य रेखा डंगवाल, समारोह के संरक्षक गजेन्द्र पंवार, सचिव किशन सिंह कैंतुरा आदि ने विचार रखे। समारोह समिति के अध्यक्ष डा. वीरेन्द्र सिंह रावत ने अतिथि का अभार जताया।
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उत्तराखंड गाँवों का प्रदेश है,और यहाँ गांव के सयाने बुजुर्ग का सब लोक सम्मान करते थे।देवता के रूप में पूजते थे। इससे लगता है कि उत्तराखण्ड का प्राचीन समाज कितना संवेदनशील था। समय बदला लोकगाथा गाने वाला गायक गायन के लिए पैसे मांगने लगा। गाँव का सयाना आदमी जिसे लोग देवता की तरह मानते थे वह भी डंगरिया के रूप में पारम्परिक बन गया। कुछ डंगरिये तो शराब भी पीने लगे।

कहने का तात्पर्य था परम्परा अच्छी थी, किन्तु उसका रूप बिगड़ गया। उत्तरांचल के ग्रामीण अंचलों में आज भी लोग दुःख, बीमारी आदि की स्थिति में अपने घर पर जागर लगवाकर अपने इष्ट से मनौती मांगते है। घर के आंगन में घूनी जलाई जाती है।

 लोक गायक के रूप में ढोल बजाने वाले को मजदूरी देकर बुलाया जाता है। ढोल बजाने वाले को 'औजी' कहा जाता है। गांव में ही देवता का प्रतीक कोई आदमी होता है, उसे डंगरिया कहा जाता है। औजी (ओझा) जब ढोल बजाता है। डंगरिये के शरीर में कम्पन होता है। वह जो भी बोलता है, उसे देवता का बोल माना जाता है।

 अपनी श्रद्धा व परम्परा के अनुसार लोग देवी, पाण्डवों, कत्येर, गोलू, हरज्यू, सैम, नृसिंह, भोलनाथ, गंगनाथ आदि देवी-देवताओं को जागर लगाकर उनसे अपने दुःख निवारण की प्रार्थना करते है। उत्तराखण्ड के गांवों में अभी भी काफी लोग इस परम्परा पर विश्वास करते हैं। कई क्षेत्रों के लोगों का विश्वास है कि बलि देने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मन की मुराद पूरी करते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रेतात्मा व मृत आत्माओं के पूजन की भी परम्परा है। यहां की सामाजिक परम्परा में कृषि कार्य को सामूहिक रूप से करने की परम्परा है। रोपाई तथा गुड़ाई के समय गांव की महिलाएं समूह में एक परिवार के खेत में एक साथ कार्य करती है।

 महिलाओं के साथ लोकगायक हुड़के की थाप पर लोकगाथा गाता है। लोकगाथा के बीच में महिलाएं भी बीच-बीच में कार्य करते हुये गाना गाती है। इससे कार्य जल्दी होता है तथा थकावट नहीं आती है। इस परम्परा को हुड़की बौल कहा जाता है।
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Offline सुधीर चतुर्वेदी

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वक्त की बयार ने पहाड़ के विवाहोत्सवों पर चढ़ाया आधुनिकता का रंग (Jun29/10 from Dainik Jagran)

 चम्पावत। वक्त के बदलाव की बयार ने पहाड़ की कला संस्कृति, रहन-सहन, खानपान के साथ ही यहा की परंपराओं, संस्कारों और उत्सवों में भारी तब्दीली ला दी है। पैदा होने से लेकर अंतिम संस्कार के रीतिरिवाजों व अनुष्ठानों में जहां रस्म अदायगी दिख रही है, वहीं पाश्चात्य संस्कृति का रंग सिर चढ़कर बोलने लगा है। विशेषकर गृहस्थी बसाने के लिए होने वाले विवाहोत्सवों में तो अब डीजे व बार संस्कृति के बेसुरे राग ने यहां की वैवाहिक परंपराओं के पुरातन सुर, लय, ताल को हाशिए में धकेल दिया है।

यथा नाम तथा गुण के अनुरूप देवभूमि में गृहस्थी की गाड़ी चलाने के लिए होने वाले विवाह यहा की संस्कृति के अनुरूप शालीनता, लोक सरोकारों व परस्पर सौहार्दपूर्ण और दिखावे से दूर होते थे। रिश्ता पारिवारिक पृष्ठभूमि नाते रिश्तेदारी जन्मकुंडली और हैसियत के अनुसार तय होता था। दिखावे की संस्कृति पर आज भी कई लोग नाक भौं सिकोड़ते हैं। लेकिन पिछले एक दशक से पहाड़ में शादी पर्व में जबरदस्त तब्दीली आ गई है। अब यह दिखावे और जलसे का रूप लेने लगी है। शुरूआती बदलाव तो पहले होने वाली दो दिवसीय शादी के एकदिनी होने से शुरू हुआ। पहले जहां द्वाराचार, धुलर्ग, गोठक ब्या, सात फेरे व नरनारायण की पूजा के बाद विदाई होती थी। और सायं से पूरी रात तथा दूसरे दिन सुबह तक विधिविधान से वैदिक रीति के तहत अनुष्ठान होते थे। बहू के घर पहुंचने पर देली गोठ्न और पूजा होती थी। लेकिन अब एकदिवसीय कार्यक्रम में यह सब रस्म अदायगी के तौर पर शार्टकट फार्मूले में हो रहा है। पहले पहाड़ में जयमाला नहीं होती थी। कहा जाता है कि दुल्हन गोठ के विवाह में कन्यादान के बाद ही अपने जीवनसाथी यानि दूल्हे को सौंपी जाती है। बकायदा कन्यादान से पूर्व की रस्में दोनों पक्षों के बीच पर्दा डालकर होती थी। अब ऐसा नहीं है। दिन में दो बजे धुलर्ग की रस्म अदायगी के बाद जयमाला होती है और बिना फेरे हुए वर-वधु को आशीर्वाद देने का दौर चल पड़ता है। फिर बारी आती है विवाह और फेरों की। यह सब कार्यक्रम एक दो घंटे में निपटाकर, पानी परखने की रस्म के साथ दुल्हन को विदा कर दिया जाता है। फेरों के समय ध्रुव तारे को अब दिन में ही दिखा दिया जाता है। वैवाहिक रस्मों में तो बदलाव आया ही है। इस अवसर पर बजने वाले वाद्ययंत्र भी अब हाशिए पर हैं। ढोल, दमाऊ, मशकबीन और छोलिया नृतकों की जगह अब बैंड बाजे, पंजाबी ढोल व डीजे ने ले ली है। देर रात तक कानफोड़ू शोर लोगों की नींद उड़ा रहे हैं। इस मौके पर आयोजित होने वाले भोज की परंपरा भी बदली है। पंडितों द्वारा बनाई गई रसोई और लौरों की जगह स्टैंडिंग सिस्टम के साथ ही यहां की परंपरागत डिसें गायब हो गई हैं। तेल, मसालों व वसायुक्त खाना परोसना शान समझा जाने लगा है। कहीं कहीं तो अब मांसाहार से भी परहेज नहीं रहा। बहरहाल पहाड़ के वैवाहिक रस्मों में आ रहा बदलाव हमारी संस्कृति व पहचान को लीलने लगा है।
« Last Edit: June 30, 2010, 10:56:56 AM by सुधीर चतुर्वेदी »
उत्तराखंड का मतलब पहाड़

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Offline Rajen

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बिलकुल सत्य कहा है सर आपने.  अपने आप को आधुनिक दिखाने की दौड़ में हम अपनी संस्कृति को अपने ही पैरों के तले रोंद रहे हैं.  बैदिक काल से चली आ रही हमारी संस्कृति और रीति रिवाज जितने प्रभावशाली हैं उतनी ही खोखली है ये आधुनिकता जो अंततः हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. 
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः | सर्वे सन्तु निरामयाः |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु | मां कश्चित्दुःख भाग भवेत ||


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