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Author Topic: Our Culture & Tradition - हमारी रीति रिवाज एव संस्कृति  (Read 3849 times)

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Offline एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Dosto,

जैसे की सांस्कृतिक बिभिनाताओं का देश है ! हर राज्य की अलग सांस्कृतिक पहचान है. ! यहाँ तक छोटे - २ क्षेत्रो मे  सांस्कृतिक बिभिनाताओं देखने को नज़र आता है. !

आएये अपने राज्य की संस्कृति को यह पर संजोये !

एम् एस मेहता
« Last Edit: August 16, 2009, 09:49:03 PM by हिमांशु पाठक »
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!

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हमारे उत्तराखंड मे एक यह भी रीति है की किसी भी पूजा पाठ एव शादी विवाह मे लोग जमीन मे बैठ कर लीन मे खाना खाते है.. जो की भाई चारा का एक अच्छा प्रतीक है... देखिये फोटो मे :



 



« Last Edit: December 31, 2007, 12:26:50 PM by M S Mehta »
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Wedding process  (This is called Doolarg)



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During the marriage in UK.. Specially in kumoan region. Choliya Dancers are called.

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Inhi Kadiyo Mai Banti Thi - Bhat Ke Dubke.

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traditional marriage.


« Last Edit: January 14, 2008, 05:29:10 PM by Hem Pant »
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Offline sanjupahari

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waah mehta jee,,pahare ki byoli dekh ke mera man bhi ab kah raha hai KI CHYAALA BYA KAR LE...awooooosome pics,,,1 karma
sanjupahari...A THETH PAHARI GUY frm MANAN
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JAI PAHAD>>>>JAI GOLU<<<<<JAI BADRIVISHAL

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यह रिवाज हमारे वहाँ प्रचलित है.. शादी के समय जब फेरे होते है...एक पत्थर मे एक सिक्का होता है. सात फेरो के दौरान हर बार दुल्हन सिक्के को पैर से गिराती है दूल्हा उसे खोज के फिर से पत्थर पर रखता है.  फेरे के दौरान एक चीड़ का छोटा पेड भी वह रखा होता है.


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kalash yatra in bageshwar.


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KNOW IN BREIF ABOUT BADRI NATH.

बद्रीनाथ का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। स्कंद पुराण के अनुसार जब भगवान शिव से बद्रीनाथ के उद्गम के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह शाश्वत है जिसकी कोई शुरूआत नहीं। इस क्षेत्र के स्वामी स्वयं नारायण हैं। जब ईश्वर चिरंतर है तो उसके नाम, छवि, जीवन तथा आवास सभी चिरंतर ही है। समयानुसार केवल पूजा का रूप एवं नाम ही बदलता है। स्कंद पुराण में भी वर्णन है कि सतयुग में इस स्थल को मुक्तिप्रद कहा गया, त्रेता युग में इसे भोग सिद्धिदा कहा गया, द्वापर युग में इसे विशाल नाम दिया गया तथा कलयुग में इसे बद्रिकाश्रम कहा गया। महाभारत महाकाव्य की रचना पास ही माणा गांव में व्यास एवं गणेश गुफाओं में की गयी।

माना जाता है कि एक दिन भगवान विष्णु शेष शय्या पर लेटे हुए थे तथा उनकी पत्नी भगवती लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी, उसी समय ज्ञानी मुनि नारद उधर से गुजरे तथा उस शुभ दृश्य को देखकर विष्णु को सांसारिक आराम के लिए फटकारा। भयभीत होकर विष्णु ने लक्ष्मी को नाग कन्याओं के पास भेज दिया तथा स्वयं एक घाटी में हिमालयी निर्जनता में गायब हो गये जहां जंगली बेरियां (बद्री) थी जिसे वे खाकर रहते। एक योग ध्यान मुद्रा में वे कई वर्षों तक तप करते रहे। लक्ष्मी वापस आयी और उन्हें नहीं पाकर उनकी खोज में निकल पड़ी। अंत में वह बद्रीवन पहुंची तथा विष्णु से प्रार्थना की कि वे योगध्यानी मुद्रा का त्याग कर मूल ऋंगारिक स्वरूप में आ जाये। इसके लिए विष्णु सहमत हो गये लेकिन इस शर्त्त पर कि बद्रीवन की घाटी तप की घाटी बनी रहे न कि सांसारिक आनंद का और यह कि योगध्यानी मुद्रा तथा ऋंगारिक स्वरूप दोनों में उनकी पूजा की जाय। प्रथम मुद्रा में लक्ष्मी उनकी बांयी तरफ बैठी थी एवं दूसरे स्वरूप में लक्ष्मी उनकी दायीं ओर बैठी थी फलस्वरूप उन दोनों की पूजा एक दैवी जोड़े के रूप में होती है तथा व्यक्तिगत प्रतिमाओं की तरह भी जिनके बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं होता क्योंकि परंपरानुसार पत्नी, पति के बायीं ओर बैठती है। यही कारण है कि रावल या प्रधान पुजारी को केवल केरल का नंबूद्रि ब्राह्मण लेकिन एक ब्रह्मचारी भी होना चाहिए। योगध्यानी की तीन शर्तों का कठोर पालन किया गया है। गर्मी में तीर्थयात्रियों द्वारा विष्णु के ऋंगारिक रूप की पूजा की जाती है तथा जाड़े में उनके योग ध्यानी मुद्रा की पूजा देवी-देवताओं तथा संतों द्वारा की जाती है।

इसी किंवदन्ती का दूसरा विचार यह है कि भगवान विष्णु ने अपने घर बैकुंठ का त्याग कर दिया। सांसारिक भोगों की भर्त्सना की तथा नर और नारायण के रूप में तप करने बद्रीनाथ आ गये। उनके साथ नारद भी आये। उन्होंने आशा की कि मानव उनके उदाहरण से प्रेरणा ग्रहण करेगा। ऐसा ही हुआ, देवों, संतों, मुनियों तथा साधारण लोगों ने यहां पहुंचने का जोखिम मात्र भगवान विष्णु का दर्शन पाने के लिए उठाया। इस प्रकार भगवान को द्वापर युग आने तक अपने सही रूप में देखा गया जब नर और नारायण के रूप में उनका अवतार कृष्ण और अर्जन के रूप में हुआ (महाभारत)।

कलयुग में भगवान विष्णु बद्रीवन से गायब हो गये क्योंकि उन्हें भान हुआ कि मानव बहुत भौतिकवादी हो गया है तथा उसका ह्दय कठोर हो गया है। देवगण एवं मुनि भगवान का दर्शन नहीं पाकर परेशान हुए तथा ब्रह्मदेव के पास गये जो भगवान विष्णु के बारे में कुछ नहीं जानते थे कि वे कहां हैं। उसके बाद वे भगवान शिव के पास गये और फिर उनके साथ बैकुंठ गये। यहां उन्हें यह आकाशवाणी सुनाई पड़ी कि भगवान विष्णु की मूर्त्ति बद्रीनाथ के नारदकुंड में पायी जा सकती है तथा इसे स्थापित किया जाना चाहिये ताकि लोग इसकी पूजा कर सके। देववाणी के अनुसार 6,500 वर्ष पहले मंदिर का निर्माण स्वयं ब्रह्मदेव द्वारा किया गया तथा विष्णु की मूर्त्ति, ब्रह्मांड के सृजक विश्वकर्मा द्वारा बनायी गयी।

जब विधर्मियों द्वारा मंदिर पर हमला हुआ तथा देवों को भान हुआ कि वे भगवान की प्रतिमा को अशुद्ध होने से नही बचा सकते तब उन्होंने फिर से इस प्रतिमा को नारदकुंड में डाल दिया। फिर भगवान शिव से पूछा गया कि भगवान विष्णु कहां गायब हो गये तो उन्होंने बताया कि वे स्वयं आदि शंकराचार्य के रूप में अवतरित होकर मंदिर की पुनर्स्थापना करेंगे इसलिए यह शंकराचार्य जो केरल के एक गांव में पैदा हुए और 12 वर्ष की उम्र में अपनी दिव्य दृष्टि से बद्रीनाथ की यात्रा की। उन्होंने भगवान विष्णु की मूर्त्ति को फिर से लाकर मंदिर में स्थापित कर दिया। कुछ लोगों का विश्वास है कि मूर्त्ति बुद्ध की है तथा हिंदू दर्शन के अनुसार बुद्ध, विष्णु का नवां अवतार है और इस तरह यह बद्रीनाथ का दूसरा रूप समझा जा सकता है।
अपने हिन्दुत्व पुनरूत्थान कार्यक्रम में जब आदि शंकराचार्य बद्रीनाथ धाम गये तो वहां उन्हें पास के नारदकुंड के जल के नीचे वह प्रतिमा मिली जिसे बौद्धों के वर्चस्व काल में छिपा दिया गया था। उन्होंने इसकी पुर्नस्थापना की। आदि शंकराचार्य ने महसूस किया कि केवल शुद्ध आर्य ब्राह्मणों ने उत्तरी भारत के मैदानों में अपना आवास बना लिया तथा इसमें से कुछ शुद्ध आर्य ब्राह्मण केरल चल गये, जहां अपने नश्ल की शुद्धता बनाये रखने के लिए उन्होंने कठोर सामाजिक नियम बना लिये। शंकराचार्य के समय के दौरान आर्य यहां 2,700 वर्ष से रह रहे थे तथा वे यहां के स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल गये एवं एक-दूसरे के साथ विवाह कर लिया। बौद्धों ने ब्राह्मण-धर्म तथा संस्कृत भाषा को लुप्तप्राय कर दिया पर थोड़े-से आर्य ब्राह्मण, नम्बूद्रिपादों ने, जो केरल के दक्षिण जा बसे थे, अपनी जाति की संपूर्ण, शुद्धता तथा धर्म को बचाये रखा। इस महान सुधारक ने अनुभव किया कि मात्र नम्बूद्रिपादों को ही भगवान बद्रीनाथ की सेवा करने का सम्मान मिलना चाहिए। उनका आदेश आज भी माना जाता है, मुख्य पुजारी सदैव केरल का एक नम्बूद्रिपाद ब्राह्मण ही होता है, जहां यह समुदाय, निकट से जड़ित आज भी परिवार ऋंखला में सामाजिक व्यवहारों में तथा विवाह-नियमों में वही पुराने कठोर नियमों को बनाये हुए हैं।





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भगवान विष्णु को समर्पित बद्रीनाथ का पवित्र मंदिर ही इस छोटे शहर बद्रीनाथ के अस्तित्व का एक मात्र कारण है। प्राचीन काल में संकटपूर्ण तथा दुर्गम यात्रा को झेलते हुए आने वाले तीर्थयात्रियों की आकांक्षा पूरी करने के लिए ही बद्रीनाथ शहर बना जिसका इतिहास मंदिर के साथ ही जुड़ा हुआ है।

कहा जाता है कि बद्रीनाथ का अस्तित्व पिछले 6,500 वर्षों से है। फिर भी इसके प्रारंभिक इतिहास की जानकारी 2,500 वर्षों से अधिक की नहीं है। कुछ इतिहास की पुस्तकों में इस तथ्य का वर्णन है कि इस मठ को बौद्धों ने आर्य वंश के शासक अशोक महान के शासनकाल में हासिल कर लिया था। आधुनिक मंदिर का निर्माण वर्तमान 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया, जिसका पुनर्निर्माण गढ़वाली राजाओं द्वारा वर्तमान 15वीं सदी में किया गया तथा इसका स्वर्ण कलश आकार का शिखर वर्तमान 19वीं सदी में रानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया।

ई.टी. एटकिंस (दी हिमालयन गजेटियर, वोल्यूम 111, भाग 1 वर्ष 1982) तथा एच.जी. वाल्टन (ब्रिटीश गढ़वालः ए गजेटियर वोल्यूम xxxvi वर्ष 1910) दोनों ने ही बद्रीनाथ मठ का समान वर्णन किया है, जिसमें वाल्टन का वर्णन नि संदेह एटकिंस के वर्णन पर ही आधारित है। दोनों ही बताते हैं कि मूल भवन का निर्माण 8वीं सदी में ही शंकराचार्य द्वारा किया गया। वर्तमान मंदिर का यह अत्याधुनिक स्वरूप है, पहले स्थित मंदिरों को ऊपरी पहाड़ से बर्फ, मिट्टी के ढेरों के नीचें खिसककर गिरने से मलवों ने ध्वस्त कर दिया। इसकी सपाट पत्थरों की दीवारों को सुर्खी चूना के गिलावों (मसालों) से जोड़ा गया है, जिसके ऊपर सीमेंट की एक पतली परत है जो इसकी सफाई को बढ़ाकर इसे पुरावेशषों से अलग करते हैं। छत के लिए देवदार लकड़ी का इस्तेमाल हुआ है। मंदिर के नीचे थोड़ी दूर पर एक तपत कुंड हैं, जो 16.5 फीट लंबा 14.25 फीट चौड़ा एक जलाशय है जहां लकड़ी के खंभे पर तख्तों की छत भी है। उसके उपभूमिगत संवाहन द्वारा गर्म झरने का पानी इसमें आता है। जल से सल्फरयुक्त धुआं या भाप इससे निकलता रहता है जो इतना गर्म रहता है कि इसे तबतक नहीं छूआ जा सकता जबतक कि इसके साथ ठंडा जल मिलाकर इसके तापमान को कम न कर लिया जाय। 26 मई को 1 बजे रात में इसका तापमान 1200 फारेनहाइट था। इस प्रकार बिना लिंगभेद के यहां स्नान किया जाता है। प्रक्षालन के बाद मूर्त्ति की पूजा करना तथा सहाय ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक दिये दान-दक्षिणा को पुराने दुष्कर्मों को धोने में समर्थ माना जाता है। इतना विश्वस्त कि हर वर्ष इस मठ में करीब पचास हजार तीर्थयात्री आते है तथा 12 वर्षीय कुंभ मेले के दौरान यह संख्या काफी अधिक होती है।

एटकिंस तथा वाल्टन दोनों ने ही बताया है कि मंदिर की प्रतिमा काले पत्थरों से बनी है तथा लगभग तीन फीट ऊंची है। दिन में स्वर्ण जड़ित पोशाक पहनाये जाते हैं तथा इसकी पूजा में कई सोने एवं चांदी के जेवर भी चढ़ाये जाते हैं। मूर्त्ति के सिर के ऊपर एक छोटा स्वर्णिम छत्र तथा एक चमकीला आईना है। सामने सदैव जलती हुई कई बत्तियां है तथा जड़ीदार कपड़े से ढंका एक टेबुल रहता है। मूर्त्ति एक स्वर्ण किरीट धारण किये हुए हैं जिसके बीच में एक सामान्य आकार का हीरा जड़ा है। परिधान एवं जेवर सहित संपूर्ण सम्पदा कम से कम दस हजार (तत्कालीन) की है।

मंदिर में हजारों वर्षों से हो रहे धार्मिक कर्मकांडों को आज भी उसी प्रकार किया जाता है तथा वर्ष (1910) का वाल्टन का वर्णन आज भी सच है। नवंबर में किसी शुभ दिन को मंदिर बंद कर दिया जाता है तथा कुछ वर्तनों को अंदर ही छोड़ कर बाकी सारी चीजों को जाड़े के मुख्यालय जोशी मठ ले जाया जाता है। नियमतः नवंबर से मध्य-मई तक मंदिर बर्फ से ढंका रहता हैं। कुल 1,750 रूपये भूमिकर की मांग सहित अल्मोड़ा जिले का 45 संपूर्ण ग्राम तथा 26 गांवों का भाग मंदिर को दान स्वरूप प्राप्त है तथा इस जिले में 164 संपूर्ण ग्राम तथा लग्गे तथा 111 गांवों का भाग भी है जिसकी आय 5,426 रूपये (तत्कालीन) है।

“वर्ष 1846 में श्री लुशिंगटन द्वारा वर्णित उन पुराने दिनों का एक रिवाज उस समय के रावल के लिए है जिसके अनुसार वंशनुगत मंदिर अधिकारियों के सहयोग से उनके जीवनकाल में ही उस व्यक्ति को उत्तराधिकारी चुनने का प्रावधान था जो शास्त्रानुसार उस पद के योग्य हो। नये रावल को शासक वर्ग से सनद प्राप्त होता था। अंग्रेजों के आने के बाद रावलों का यह अधिकार कुमाऊं के आयुक्त द्वारा इस्तेमाल होता था। बाद के इन वर्षों में नागरिक अधिकारी प्रायः मंदिर-मामलों के प्रबंध में हस्तक्षेप करते, जो असंतोषजनक स्थिति तक पहुंच गया। इनकी स्थिति सशक्त करने के लिए कई योजनाएं लायी गयी। वर्ष 1893 में तत्कालीन रावल ने बूढ़े हो जाने पर मंदिर के कार्यभार त्याग दिया। इसके बाद कोई योग्य नायब या उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण समय-समय पर दो या तीन प्रबंधकों की नियुक्ति की गयी जिन्होंने अपने अपने ढंग से उसे चलाया। अंत में वर्ष 1896 में स्थानीय सरकार के आदेश से एक संस्था की स्थापना नागरिक प्रक्रिया संहिता की धारा 539 अनुसार की गयी, फलस्वरूप, मंदिर के धर्मनिरपेक्ष मामलों के प्रबंधन के सारे अधिकार रावल को मिल गये, जिसका नियंत्रण टिहरी गढ़वाल के महामहिम राजा के अधीन होना था जो नायब रावल की नियुक्ति भी कर सकते थे, अगर रावल ने स्वयं ऐसा नहीं किया हो। रावल को अनिवार्य रूप से दक्षिण भारत का नंबूद्रि होना चाहिए था तथा अपनी जाति में पुजारी वर्ग का भी, जो अन्य विशिष्ट गुणों से भी विभूषित हो। (अन्य विशिष्ट गुणों से विभूषित अपनी जाति में पुजारी वर्ग का दक्षिण भारत का नंबूद्रि ब्राह्मण ही रावल का पद पा सकता था)।

एटकिंस बताता है कि तीर्थयात्रियों के उपयोग के लिए शहर में एक स्वास्थ्य केंद्र भी था जिसे सदाव्रत कोष तथा निजी सदाव्रत चौरिटी द्वारा स्थानीय तीर्थयात्रियों को राहत पहुंचाने के लिए चलाया जाता। ग्वालियर, कश्मीर तथा पलवल राज्यों एवं बद्रीनाथ के काली कंवली फकीरों द्वारा इसे पूरे रास्ते में चलाया जाता।
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