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Author Topic: कनाडा-अमेरिका तक फैला उत्तराखंड का 'मैती' आंदोलन  (Read 1768 times)

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Offline एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Dosto,

This is yet another movement like Chipko to save the environment. It really nice to see the awareness of people for environment.

M s Mehta

कनाडा-अमेरिका तक फैला उत्तराखंड का 'मैती' आंदोलन

 नैनीताल। कनाडा के युवा अब अपनी सगाई और जन्म दिन पर एक दूसरे को उपहार देने की बजाय धरती को एक पौधे का उपहार देना बेहतर मान रहे है। अमेरिका, इंग्लैंड, थाइलैंड व नेपाल में भी हजारों लोग भावनात्मक रूप से विश्व के इन अनूठे पर्यावरणीय अनुष्ठान में जुटे हुए हैं। ऐसे में आंदोलन का प्रणेता भारत भी क्यों पीछे रहे, यहां 12 राज्य इस अभियान में शरीक है। सबसे खास बात यह कि अभियान का 'मैत' यानी मायका उत्तराखंड में है जहां 12 वर्ष पूर्व एक जीव विज्ञान प्रवक्ता ने 'मैती' नाम से इस आंदोलन की शुरूआत की थी।
   'मैत्री' आंदोलन के प्रणेता व वर्तमान में राज्य पर्यावरण शिक्षा के राज्य समन्वयक कल्याण सिंह रावत गुरुवार को नैनीताल में थे। यहां 'जागरण' से एक विशेष भेंट में उन्होंने बताया कि वह राज्य के अनूठे 'चिपको आंदोलन' से गोपेश्वर में पढ़ाई के दौरान रूबरू हुए। इस आंदोलन से पेड़ों के कटान पर तो रोक लग गई पर गढ़वाल में कई जगह वृक्ष रहित नंगी चट्टानें देख मन विचलित हो उठता था। 1995 में ग्वालदम में विशेषकर महिलाओं को भावनात्मक रूप से पौधे लगाने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से उन्होंने 'मैती' आंदोलन प्रारंभ किया। इसके तहत गांव की हर बेटी अपने दूल्हे के साथ डोली में विदा होते समय अपनी मां को एक पौधा सौंपती है। दूल्हा गांव की लड़कियों को जूते छिपाने की रस्म के बदले पौधे की देखभाल के लिए पैसे देता है। इस धनराशि से गांव की गरीब लड़कियों की मदद भी की जाती है। बेटी के विदा होने के बाद मां व गांव की लड़कियां उसकी स्मृतियों को चिरस्थायी रखने के उद्देश्य से पौधे की आजन्म देखभाल करती है। आंदोलन का प्रभाव अब 6 हजार गांवों में विकसित हुए वनों के रूप में दिखाई देने लगा है। रावत बताते है 1997 में कौसानी में एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संगोष्ठी आयोजित हुई जिसमें उपस्थित कनाडा की पूर्व प्रधानमंत्री व तत्कालीन वित्त मंत्री फ्लोरा डोनाल्ड इससे बेहद प्रभावित हुई। उन्होंने इसे वहां शुरू किया, फलस्वरूप कनाडा आज इस अभियान की सफलता में प्रथम स्थान पर है। बीबीसी के अलावा विश्व की जानी-मानी पत्रिका टाइम्स में भी 'मैती' को स्थान मिला। नेपाल में अब अपने 'मैती' संगठन हैं। इंग्लैंड सहित अन्य देशों में भी आंदोलन सफलता के साथ चल रहा है।

[Saturday, October 06, 2007 3:22:54 AM (IST) ]
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!

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Offline हेम पन्त

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"Maitee" paryavaran ko bachane ke liye Uttarakhandiyo ki ek aur anoothi pehal hai......Thanx for the news update Mehta ji

ठंडु-माठु चौमास डांड्यूं मां सोरि गै!!!
तिसळि धरति की प्यास बुझे गै !!!

Offline Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Kamaalki news dhoondh ke laae ho Mehta ji.
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Offline sanjupahari

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sach main yeto muzhey bhi nahi pata tha,,,,jai hoo mehta jew aapki
sanjupahari...A THETH PAHARI GUY frm MANAN
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JAI PAHAD>>>>JAI GOLU<<<<<JAI BADRIVISHAL

Offline एम.एस. मेहता /M S Mehta

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We feel there is need of to pay attention towards saving our environment. Hills are getting naked by high rate of deforstaton resulting a lot of problem.

The chipo andolan was foums worlwide simiarly, we should make people aware about the importance of trees. 


sach main yeto muzhey bhi nahi pata tha,,,,jai hoo mehta jew aapki
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Offline पंकज सिंह महर

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देहरादून में वेलेंटाइन्स डे पर अनोखी पहल
 
वेलेंटाइन्स-डे पर जहां पूरी दुनिया में महंगे तोहफों, फूलों और रंगबिरंगे कार्डो की बहार है वहीं देहरादून में प्रेम के प्रतीक इस पर्व को प्रकृति से जोड़ने की अनूठी पहल की है एक संस्था ने.
मैती नाम की इस संस्था ने इस मौके पर प्रेमी जोड़ों को पौधे दिए, उनसे पेड़ भी लगवाए और पर्यावरण संरक्षण का वादा लिया.

मैती के कार्यकर्ताओं ने सड़कों, पार्को और जगमगाती दूकानों के आगे स्टॉल लगाकर पौधे बाँटे.

प्रेम करने वालों को भी कुदरत का ये अनोखा तोहफा और उससे जुड़ा उद्देश्य पसंद भी आया.

लंबी उम्र

वेलेंटाइन्स वृक्ष लगाकर वो भी अपने प्रेम को एक लंबी उम्र देना चाहते हैं.

एक स्कूली छात्रा चेतना कहती हैं, “गिफ्ट तो सभी देते हैं और वो कल रहे या न रहे लेकिन हम पेड़ को देखकर कह तो सकते हैं कि हमने साथ एक पेड़ लगाया था. दूसरी बात ये कि पर्यावरण को बचाने के लिए भी ये अच्छा है.”

  हमने काफी दिन पहले से इसके लिए तैयारी की थी. स्कूलों कॉलेजों में हमने पर्चे बांटे थे और अखबारों में भी सूचना भेजी थी. आज हमारे यहां आर्चीज़ जैसी भीड़ तो नहीं लेकिन इतना क्या कम है कि लोग हमारे यहां आ रहे हैं, रूकते हैं, देखते हैं, हमारे नारे पढ़ते हैं और उनमें से कुछ पौधे लेकर जा रहे हैं         अमित गैरोला, मैती के कार्यकर्ता

उन्हीं की दोस्त कल्पना कहती हैं, “इस दिन को यादगार बनाने के लिए ये एक अच्छी परिकल्पना है.”

अपनी दोस्त के लिए हरसिंगार का पौधा ले जाते इंजीनियरिंग के छात्र अनूप कुमार कहते हैं, “मैं ये तो नहीं कहूंगा कि मैं दूसरा गिफ्ट नहीं दूंगा लेकिन हां, मैं अपनी मित्र को ये पौधा भी ज़रूर दूंगा. और मैं चाहूंगा कि बाकी लोग भी मेरी तरह से पेड़ लगाएं तो आज एक ही दिन में हज़ारों पेड़ लग जाएंगें.”

स्टॉल लगाने वाले मैती कार्यकर्ता भी युवक युवतियों के इस उत्साह को देखकर खुश हैं. उन्हें लगता है कि उनका प्रयास रंग ला सकता है.

एक मैती कार्यकर्ता अमित गैरोला का कहना है कि, “हमने काफी दिन पहले से इसके लिए तैयारी की थी. स्कूलों कॉलेजों में हमने पर्चे बांटे थे और अखबारों में भी सूचना भेजी थी. आज हमारे यहां आर्चीज़ जैसी भीड़ तो नहीं लेकिन इतना क्या कम है कि लोग हमारे यहां आ रहे हैं, रूकते हैं, देखते हैं, हमारे नारे पढ़ते हैं और उनमें से कुछ पौधे लेकर जा रहे हैं.”

मैती और परंपरा

दरअसल मैती संस्था की शुरूआत 1994 में उत्तरांचल के चमोली गढ़वाल के ग्वालदम क्षेत्र से हुई थी.

क्षेत्र के गांवों की कुंवारी लड़कियों को जल जंगल ज़मीन से उनके कुदरती लगाव को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की मुहिम को मैती नाम दिया गया.

स्थानीय बोली में ‘मैत’ का मतलब मायका और ‘मैती’ मतलब मायके का होता है.
इस तरह लड़कियों के साथ मुहिम शुरू कर इसमें गांव की बुज़ुर्ग महिलाओं, पुरूषों और विवाहित लोगों को भी जोड़ा गया.

विवाह कर ससुराल चली जाने वाली लड़की शादी के समारोह के दौरान एक पौधा अपने घर के पास रोप कर जाती.

इस तरह वो पेड़ के रूप में, विदाई के समय एक मैती की याद भी अपने साथ ले जाती. ये परंपरा, बिखरी हुई पौधशालाओं की तरह अब गढ़वाल और कुमाऊं के कई गांवों तक फैल गई है.

अब ये बहुचर्चित मैती आंदोलन अपने ग्याहरवें साल में वेलेंटाइन-डे के साथ नए रंग रूप में आया है. और मक़सद है शहरी युवा वर्ग को अपनी मिट्टी अपने जंगल और अपनी धरती के प्रति जागरूक करना.

  तमाम लोग वेलेंटाइन्स डे का इस या उस बहाने विरोध करते हैं लेकिन मैं कहता हूं कि इसका विरोध न करके इसे रचनात्मक रूप देना चाहिए. प्रेम की याद में अगर कोई कहीं एक पेड़ लगाता है तो ये शायद ये पेड़ उनके वेलेंटाइन-डे की एक बहुत बड़ी अहमियत होगी कल्याण सिंह रावत, संस्थापक, मैती

मैती के संस्थापक कल्याण सिंह रावत कहते हैं, “तमाम लोग वेलेंटाइन्स डे का इस या उस बहाने विरोध करते हैं लेकिन मैं कहता हूं कि इसका विरोध न करके इसे रचनात्मक रूप देना चाहिए. प्रेम की याद में अगर कोई कहीं एक पेड़ लगाता है तो ये शायद ये पेड़ उनके वेलेंटाइन-डे की एक बहुत बड़ी अहमियत होगी. अगर सालों बाद आप उस जगह जाएं जहां वो पौधा रोपा था तो उसे देखकर निश्चित ही आपको खुशी होगी.”

इस बार तो मैती अकेली संस्था है हो सकता है कि अगली बार कुछ और संस्थांएँ कुछ और शहरों में ऐसा कर रही हों.

 
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

Offline Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Offline Rachana Bhagat

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Namaskar Anubhav ji,

to aaj kaal holiday enjoy kaar rahi ho. Gr8 Delhi mai aaj thodi thaand jyada hue hai. Lucknow mai mausam kaisa hai?

Wah Mahar bhai +1 karma aapko.

Offline पंकज सिंह महर

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खाल और सतेरा में नव दम्पति ने किया पौधरोपण


रुद्रप्रयाग। पर्यावरण संरक्षण एवं शादी के पलों को यादगार रखने के उद्देश्य से मैती आंदोलन के तहत दो अलग-अलग नव दम्पतियों ने खाल व सतेरा गांव में पौधरोपण कर इन अस्मरणीय पलों को यादगार बनाया।
विगत कई वर्षो से मैती आंदोलन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करता आ रहा है तथा क्षेत्रीय जनता भी इस आंदोलन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी के तहत गत दिवस खाल व सतेरा गांव में दो नव दम्पति आनंद प्रकाश व दीपिका तथा दीपक नेगी व कृष्णा ने अपनी शादी के अवसर पर संयुक्त रूप से माल्टे व नारंगी का फलदार पौध का रोपण कर शादी को यादगार बनाने के लिए साथ ही मैती आंदोलन को बढ़ावा देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर पर क्षेत्रीय लोगों ने भी मैती आंदोलन के तहत किये जा रहे कार्य की सराहना करते हुए कहा कि इस आंदोलन के तहत शादी के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है। कहा कि प्रत्येक शादी में मैती पौधरोपण किया जायेगा तथा अन्य क्षेत्रों को भी इस अभियान में प्रोत्साहित किया जायेगा। इस अवसर पर मैती संगठन के जिला समन्वयक हरीश वशिष्ठ ने कहा कि पहाड़ में मैती आंदोलन को जो समर्थन मिल रहा वह सराहनीय है और यदि इसी तरह व्यापक जन सहयोग मिलता रहे तो भविष्य में मैती आंदोलन पर्यावरण के क्षेत्र में नयी मिशाल कायम करेगा। उन्होंने क्षेत्र में मैती आंदोलन से जुड़े मैती बहनों व महिलाओं का स्वागत करते हुए कहा कि आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए सहभागिता से कार्य करें। इस मौके पर कुमारी वंदना, प्रियंका, नेहा, पूजा, संगीता, बबली, रेखा, कविता समेत कई मैती बहनें उपस्थित थी।






आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

Offline पंकज सिंह महर

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रुद्रप्रयाग। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में मैती आदोलन जिले में मील का पत्थर साबित हो रहा है। महिलाओं के बलबूते पर चल रहे इस आंदोलन में नव दंपतियां भी शादी के अवसर पर पौध लगाकर शादी को यादगार बना रहे हैं। बिना सरकारी सहायता के चल रहे इस आंदोलन का पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

रुद्रप्रयाग के तल्लानागपुर क्षेत्र से शुरू हुए मैती आंदोलन ने अल्प समय में ही बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वर्तमान समय में पूरे जनपद में मैती आंदोलन पर्यावरण सुरक्षा के लिए लोगों को प्रेरित कर रहा है। शत-प्रतिशत रूप से महिलाओं के बलबूते पर चल रहे इस आंदोलन से गांव-गंाव की महिलाएं जुड़ी हुई हैं। आंदोलन के तहत शादी-विवाह के अवसर पर नव दंपतियां पौधारोपण कर अपनी शादी को यादगार बना रहे हैं। अब तक सैकड़ों नवदंपतियां शादी पर पौध लगा चुके हैं। ग्राम सभा थलासू निवासी मैती आंदोलन के जिला समन्वयक हरीश वशिष्ठ का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण में आंदोलन सक्रिय भूमिका निभा रहा है। गांव-गांव में महिलाओं की समितियां गठित की गयी हैं तथा उन्हें पौध रोपण की जिम्मेदारियां सौंपी गयी हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी स्तर से उन्हें कोई सहायता नहीं मिल रही है बावजूद वह इस आंदोलन को चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इस दिशा में सकारात्मक पहल करे तो पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में शत-प्रतिशत सफलता हासिल की जा सकती है।
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मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

Offline Abhinav

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उत्तराखंड की लड़कियां अब शादी के लिए आए दूल्हों के जूते नहीं चुरातीं बल्कि उनसे अपने मैत यानी मायके में पौधे लगवाती हैं. इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दे दी है, जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है. पेड़ लगाने का यह आंदोलन अब उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपने जड़ें जमा रहा है.

कनाडा, थाईलैंड, चीन, नार्वे, अमरीका, नेपाल जैसे देशों ने भी इस महान प्रथा को अपना कर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया है.

इस आंदोलन के बारे में पढ़ें प्रसून लतांत का लेख -
http://raviwar.com/news/58_maiti-uttarakhand-prasunlatant.shtml

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उत्तराखंड की लड़कियां अब शादी के लिए आए दूल्हों के जूते नहीं चुरातीं बल्कि उनसे अपने मैत यानी मायके में पौधे लगवाती हैं. इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दे दी है, जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है. पेड़ लगाने का यह आंदोलन अब उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपने जड़ें जमा रहा है.

कनाडा, थाईलैंड, चीन, नार्वे, अमरीका, नेपाल जैसे देशों ने भी इस महान प्रथा को अपना कर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया है.

इस आंदोलन के बारे में पढ़ें प्रसून लतांत का लेख -
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BILKUL SAHI KAHA AAPNE OR ISASE HUMARE UTTARAKHND KE VANON KI SHAAN RAH JAYEGI
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