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Idioms Of Uttarakhand - उत्तराखण्डी (कुमाऊँनी एवं गढ़वाली) मुहावरे

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 25, 2007, 05:14:02 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जै कु पाप, तै कु छाप

जिसका पाप, उसी की छाप
(जैसे करनी वैसे भरनी)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बार बरसम बाघ ब्यैरौ,

अर्थात

लम्बे इंतज़ार के बाद फल मिलना

******

लग्नै बखत ह्गन

अर्थात

कार्य के बीच रुकावट

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


"जु नि धोला आपुन मुख, उ क्या देलो हिका सुख !"

जो न धोये अपना ही मुख, वह क्या दे औरो को को सुख !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


होलू होलू, नि होलू झवल

यानी - कुछ न से कुछ तो सही

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Prayag Pande

नैपाल छतिस धारा पानी का तुडुका |
समजिय्रै भैटनी ठौरा रवे जाये ढुरुका ||

भावार्थ :नैपाल के छतीस धारों में पानी की बहुत पतली धार निकल रही है |
ओ प्रेयसी ,जिस स्थान पर हम बैठते थे , उसे देखकर याद करना और चुपचाप आंसू वहा लेना |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Prayag Pandey

अलग उत्तराखंड बनने से पहले के वायदे और अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ की आम जनता को हासिल सुविधाओं को लेकर पेश है एक बहुत पुरानी लोकोक्ति -----

बात कैछ गजराज की ,दृष्टि दिखायी बैल |
पाणी पाड़ी कुकुड में ,हात लै च्यापो मैल ||
अर्थात -"आश्वासन दिया हाथी दान करने का ,सामने दिखाया बैल | संकल्प लेते समय मुर्गे के ऊपर पानी छिड़का और देते वक्त अपने हाथ का मैला निकलकर हाथ पर रख दिया |"इस राज्य में ऐसा ही कुछ यहाँ की आम जनता के साथ भी हो रहा है |

Risky Pathak

Sharad Pant posted to Pahadi Classes
May 29, 2011
१. ख्वारक बाट सुराव खोलण (सिर के रास्ते पायजामा खोलना) = अति कठिन काम करना
२. हल न मूसल ब्या करण हूँ चल = साधन हीन का बड़ा काम करने की मूर्खता
३. हिसालु खे बेर किल्मोड़ हगण = (सफ़ेद झूठ) झूठे ब्यवहार का प्रदर्शन

Risky Pathak

Sharad Pantposted toPahadi Classes
May 29, 2011
१. ख्वारक बाट सुराव खोलण (सिर के रास्ते पायजामा खोलना) = अति कठिन काम करना
२. हल न मूसल ब्या करण हूँ चल = साधन हीन का बड़ा काम करने की मूर्खता
३. हिसालु खे बेर किल्मोड़ हगण = (सफ़ेद झूठ) झूठे ब्यवहार का प्रदर्शन

Risky Pathak


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सैंकड़ों वर्षों तक यह गाँव ज्योतिष व संस्कृत के अध्ययन का केन्द्र बना रहा। इसकी विशिष्ट स्थिति के कारण नागपुर मंडल के अन्य गाँव इससे ईर्ष्या करते रहे। एक गढ़वाली कहावत में इसे देखा जा सकता है –

''ध्यूल पर घाम भी है चि, तामि पर आदु भी रौंधा त रा जान्दा त जा।''
अर्थात् मंदिर पर धूप भी है, छोटे बर्तन में आटा भी, रहते हैं तो रहो, जाते हो तो जाओ। परन्तु अपने अस्तित्व के लिये इस गाँव के लोगों ने वनों के बीच अपनी सामुदायिकता व आदर भावना को एक परंपरा के रूप में विकसित किया। इस विशिष्टता को 'मक्कू बोला' स्वभाव के नाम से जाना जाता है।