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Poems Written by Shailendra Joshi- शैलेन्द्र जोशी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 25, 2013, 10:21:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Official group of Narendra singh Negi
December 29 at 10:11pm ·

सुर कंठ मा
संज्या गीत आज
हैप्पी न्यू इयर का
सभि का गौलो पर
दन्कुदु दन्कुदु
खेलदू कुददु ऐगे
बाला कि मुखडी सि
ऐगे नयु बरस
जिकुड़ी मा हर्ष
नया साल मा
कल्पना कि उडान
उड़नि जेट विमान
जनि तेज आज
सुप्न्या का गंतव्य मा
थमली रुक्ली स्या उडान
जन भि होलू नयु साल
लुक्यु ढकायु भवसिया बतालु
फ़िलहाल तुम तै
मुबारक हो नयु साल
नयी बथो सुर सुरि
पुराणी हव्वा फर फर
कुसल मंगल रा सदानी
दग्ड़ीयों तुम तै हैप्पी न्यू इयर
रचना .........शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 28 at 8:36pm ·

शरमायी सकुचायी सी
गली चौराहे मे
पिया मिलन मे वो
हिरदय मे फुहार
चेहरे मे हल्की सी
प्यारी सी मुस्कान
संनाटे मे भी एक हल्ला था
इश्क का गली चौराहे मे
बाते अनछुयी अनकही
बहुत थी कहने को पिया से
फिर भी बाते थी पिया मिलन मे
गली चौराहे मे
कभी न खतम हो
ये पल भर का मिलन
गली चौराहे मे
ऐसी हसरत थी
दोनों के मन मे
रचना ........................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 24 at 1:56pm · Edited ·

फूल खिले है
जीन्स के प्रिंट मे
आजकल फुलकलियों मे
गुलशन गुलशन
फैशन डिजायनर
जानता है
जवानी का
वसन्त फूलो
से गुलशन
होता है
जो भी हम भी अगर
होते फुल कलिया
तो पहनते फूलो वाली
जीन्स पहन घुमते
गलिया गलिया
और गीत गुनगुनाकर
गाते फुल खिले है
हम जीन्स वाली
फुल कलियों पर
गुलशन गुलशन
रचना .......................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कत्गा खुसमिज्याज छे वा
खैरी विपदा मा भि
थोड़ा सि भि सिकन ना
मुखडी मा
हैसी कि बाच छे वा
गरीबी मा लाचारी मा
दुःख बिमारी मा भि
जीबन कु संघर्ष रै जारी
कमी नि ऐ
विका खुसमिज्याज सुभोऊ मा
चिरी लती कपड़ी सुखी गात
धाण विकी लगी दिन रात
सैरी धर्ती सजायी विकी
अपणा हट्गा तोड़ी
सुखी गात कु पस्न्या बगैकी
धन छे तू पाडे नारी
जै धर्ती बाना तिन
इत्गा कारी सब चल
गिनी बौगा सारी
फिर भि तू हैसणी छे
आंसू लुक्के कि
दिप मुखडी चमकणी
त्येरी क्या बुन भै
कत्गा खुसमिज्याज छे तू
साभार: शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 19 at 5:40pm · Edited ·

गली संगडी अर
मनखी चौडु ह्वेगे
बगत कि दौड़ा दौड़ी मा
दिल छुपियु कुजणी
कै मुसदुला मा
चौड़ी गात
सैनि सक्णी
छोटु दिल कु भार
पिरेम भौ कु
कखी मोल न भोऊ
रयु अज्क्याल
इन्नी छन भैजी सब्भी
मन्ख्यो का हाल
क्या वार क्या पार
रचना .......................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 17 at 5:38pm ·

आज इस्कुल्या बच्चा
बाजार मा
पौलीथींन विरोध
रैली मा
नारा लगाणा छा
एक दो एक दो
पौलिथीन फेंक दो
सौदैर ब्वे बबा बच्चों का
बाजारो मा बुना
लाला जी एक नि
द्वि पौलीथींन दो
एक फट जाली
अधबाटा मा
लाला जी
एक सब्स्टयूट दो
तभी बुल्दन
दुन्या द्वि रंगी च
रचना .............शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bharat Rawat
December 31, 2014 at 11:08am ·

सुर कंठ मा
संज्या गीत आज
हैप्पी न्यू इयर का
सभि का गौलो पर
दन्कुदु दन्कुदु
खेलदू कुददु ऐगे
बाला कि मुखडी सि
ऐगे नयु बरस
जिकुड़ी मा हर्ष
नया साल मा
कल्पना कि उडान
उड़नि जेट विमान
जनि तेज आज
सुप्न्या का गंतव्य मा
थमली रुक्ली स्या उडान
जन भि होलू नयु साल
लुक्यु ढकायु भवसिया बतालु
फ़िलहाल तुम तै
मुबारक हो नयु साल
नयी बथो सुर सुरि
पुराणी हव्वा फर फर
कुसल मंगल रा सदानी
दग्ड़ीयों तुम तै हैप्पी न्यूइयर
रचना .........शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 28, 2014 at 8:36pm ·

शरमायी सकुचायी सी
गली चौराहे मे
पिया मिलन मे वो
हिरदय मे फुहार
चेहरे मे हल्की सी
प्यारी सी मुस्कान
संनाटे मे भी एक हल्ला था
इश्क का गली चौराहे मे
बाते अनछुयी अनकही
बहुत थी कहने को पिया से
फिर भी बाते थी पिया मिलन मे
गली चौराहे मे
कभी न खतम हो
ये पल भर का मिलन
गली चौराहे मे
ऐसी हसरत थी
दोनों के मन मे
रचना ........................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
December 24, 2014 at 1:56pm

फूल खिले है
जीन्स के प्रिंट मे
आजकल फुलकलियों मे
गुलशन गुलशन
फैशन डिजायनर
जानता है
जवानी का
वसन्त फूलो
से गुलशन
होता है
जो भी हम भी अगर
होते फुल कलिया
तो पहनते फूलो वाली
जीन्स पहन घुमते
गलिया गलिया
और गीत गुनगुनाकर
गाते फुल खिले है
हम जीन्स वाली
फुल कलियों पर
गुलशन गुलशन
रचना .......................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कत्गा खुसमिज्याज छे वा
खैरी विपदा मा भि
थोड़ा सि भि सिकन ना
मुखडी मा
हैसी कि बाच छे वा
गरीबी मा लाचारी मा
दुःख बिमारी मा भि
जीबन कु संघर्ष रै जारी
कमी नि ऐ
विका खुसमिज्याज सुभोऊ मा
चिरी लती कपड़ी सुखी गात
धाण विकी लगी दिन रात
सैरी धर्ती सजायी विकी
अपणा हट्गा तोड़ी
सुखी गात कु पस्न्या बगैकी
धन छे तू पाडे नारी
जै धर्ती बाना तिन
इत्गा कारी सब चल
गिनी बौगा सारी
फिर भि तू हैसणी छे
आंसू लुक्के कि
दिप मुखडी चमकणी
त्येरी क्या बुन भै
कत्गा खुसमिज्याज छे तू
साभार: शैलेन्द्र जोशी

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